बालकाण्ड (भाग -4)
दो0 गाधिसूनु कह हृदयँ हँसि मुनिहि हरिअरइ सूझ।
अयमय खांड न ऊखमय अजहुँ न बूझ अबूझ।।275।।
व्याख्या : समता रूपी विश्वामित्र ने हृदय में हँसकर कहा कि मुनि को हरा ही हरा दिखायी पड़ रहा है। अर्थात् आत्मा रूपी राम व लखन भाव रूपी लक्ष्मण को साधारण भाव ही समझ रहे हैं। जबकि आत्म भाव और अन्य भावों में वैसा ही अन्तर होता है, जैसे लोहे की बनी हुए खांड यानी खड़ग-खांडा और गन्ने की बनी हुई खाँड में होता है। मुनि अभी भी इस बात से अनिभज्ञ हैं।
कहेउ लखन मुनि सीलु तुम्हारा। को नहिं जान बिदित संसारा।।
माता पितहि उरिन भए नीकें। गुर रिनु रहा सोचु बड़ जी कें।।
व्याख्या : तब लखन भाव पुन: कटाक्ष किया कि हे मुनि! आपके शील को संसार में कौन नहीं जानता है। तुम तो माता व पिता से तो अच्छी तरह उऋण हो गए परन्तु गुरु ऋण का मन में बड़ा सोच बना हुआ है। माता-पिता से उऋण होने का कठोर साधना पंथ में बहुत गहरा रहस्य है। वास्तविकता में यह होता है कि कठोर या हठ योग साधना में इन्द्रियों व मन का जबरदस्ती दमन किया जाता है। इसलिए परशुराम रूपी हठ योगी इन्द्रियों रूपी अपनी माँ का सिर काट देता है अर्थात् इन्द्रियों का बलपूर्वक दमन कर देता है। परन्तु मन रूपी पिता की आज्ञा पाकर पुन: इन्द्रियों रूपी माता का सिर लगा देता है। यानी मन के दृढ़ संकल्प से इन्द्रियों का दमन कर लेता है और मन के अन्दर पुन: विकार आने पर पुन: इन्द्रियाँ जीवित हो उठती हैं। इसलिए परशुराम को माता का सिर काटने वाला बताया गया है। परशुराम के पिता का नाम जमदग्नि बताया गया है। जमदग्नि का तात्पर्य जम अ अग्नि अर्थात् यम का पालन करने से होता है। यम के पालन से ही मन में वासनाओं से मुक्त होने के संकल्प उठते हैं। उसी को इन्द्रियों रूपी माता का वासना रूपी सिर काटना कहा गया है।
सो जनु हमरेहि माथे काढ़ा। दिन चलि गए ब्याज बड़ा बाढ़ा।।
अब आनिअ व्यवहरिआ बोली। तुरत देउँ मैं थैली खोली।।
व्याख्या : लखन भाव कहता है कि लगता है गुरु ऋण हमारे माथे पर ही निकाला है। दिन बहुत निकल गए हैं इसलिए ब्याज भी बढ़ गया होगा। इसलिए किसी हिसाब करने वाले को बुला लाइये, तो मैं तुरंत थैली खोलकर दे दूँ। लखन भाव के कटाक्ष करने का कारण यह है कि कठोर साधना से मन व वासनाओं पर तो नियंत्रण हो सकता है परन्तु ज्ञान रूपी गुरु का प्रकाश नहीं हो पाता है। उसी को गुरु ऋण बाकी रहना बताया गया है।
सुनि कटु बचन कुठार सुधारा। हाय हाय सब सभा पुकारा।।
भृगु बर परसु देखावहु मोही। बिप्र बिचारि बचउँ नृप द्रोही।।
व्याख्या : तब लखन भाव के कटाक्ष वचनों को सुनकर परशुराम रूपी गर्व के भाव ने फरसा को सुधारा। तब सभी भाव रूपी सभा में हाहाकार मच गया। तब पुन: लखन भाव बोला कि हे मुनिवर! मुझे फरसा दिखा रहे हो अर्थात् हठ साधना का दम्भ भर रहे हो। मैं तो विप्र अर्थात् विशुद्ध प्रकाश करने वाला जानकर नृप द्रोही अर्थात् नर की धड़कन से उत्पन्न भावों को नष्ट करने वाले को बचा रहा हूँ।
मिले न कबहुँ सुभट रन गाढ़े। द्विज देवता घरहि के बाढ़े।।
अनुचित कहि सब लोग पुकारे। रघुपति सयनहिं लखनु नेवारे।।
व्याख्या : आपको कभी भाव रूपी युद्ध में कोई भाव रूपी योद्धा नहीं मिला है। सात्विक और दैवीय भाव सब अपने घर में ही बड़े होते हैं। क्योंकि दैवीय व सात्विक भाव जब आसुरी भावों के सम्पर्क में आते हैं, तो ये परास्त हो जाते हैं। लखन भाव की इन बातों को सुनकर सभी भाव रूपी लोग अनुचित-अनुचित कहने लगे। तब आत्मा रूपी राम ने लखन भाव को प्रेरणा करके शान्त कराया।
दो0 लखन उतर आहुति सरिस भृगुबर कोपु कृसानु।
बढ़त देखि जल सम बचन बोले रघुकुल भानु।।276।।
व्याख्या : लखन भाव के उत्तर जो आहूति के समान थे और परशुराम के क्रोध को अग्नि के समान बढ़ता हुआ देखकर आत्मा रूपी राम जल के समान शांत बचन बोले।
नाथ करहु बालक पर छोहू। सूध दूध मुख करिअ न कोहू।।
जौं पै प्रभु कछु जाना। तौ कि बराबरि करत अयाना।।
व्याख्या : हे नाथ! आप तो लखन भाव रूपी बालक पर कृपा कीजिए। इस सीधे और दूध मुँह बच्चे पर क्रोध मत कीजिए। लखन भाव तो सदैव लक्षणों को लखता है, इसलिए उसे सीधा व दूध मुँह कहा गया है। हे प्रभु! अगर ये आपकी महिमा को जानता अर्थात् हठ योग के प्रभाव को जानता, तो क्या ये आपकी बराबरी करता?
जौं लरिका कछु अचगरि करहीं। गुर पितु मातु मोद मन भरहीं।।
करिअ कृपा सिसु सेवक जानी। तुम्ह समसील धीर मुनि ग्यानी।।
व्याख्या : बालक अगर कुछ चपलता भी करते हैं, तो गुरु, माता व पिता मन में प्रसन्न ही होते हैं। अत: इस छोटे बच्चे को अपना सेवक समझकर कृपा कीजिए। तुम्हारे समान शील, धीर व ज्ञानी कौन है?
राम बचन सुनि कछुक जुड़ाने। कहि कछु लखन बहुरि मुसुकाने।।
हँसत देखि नख सिख रिस ब्यापी। राम तोर भ्राता बड़ पापी।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम के वचन सुनकर थोड़े शांत हुए। वास्तव में गर्व के भाव को निज प्रशंसा सुनकर बहुत शान्ति मिलती है। यहाँ पर परशुराम रूपी गर्व के भाव को भी इसलिए शान्ति मिली है। परन्तु लखन भाव कुछ कहकर मुस्कुरा दिए। लखन भाव को हँसी आने का कारण है, गर्व रूपी भाव का थोता दम्भ करना। लखन भाव को मुस्कुराता हुआ देखकर परशुराम रूपी गर्व के भाव को नख से शिख तक क्रोध आ गया। तब बोले कि आत्मा रूपी राम! तुम्हारा भाई बहुत पापी है अर्थात् चिन्ता पैदा करने वाला है।
गौर सरीर स्याम मन माहीं। कालकूट मुख पयमुख नाहीं।।
सहज टेढ़ अनुहरइ न तोही। नीचु मीचु सम देख न मोही।।
व्याख्या : हे आत्मा रूपी राम! इसका शरीर गोरा है परन्तु मन काला है। इसके मुख में जहर भरा है, यह दूध मुँह नहीं है। यह स्वभाव से ही टेढ़ा है और तेरा अनुसरण (अर्थात् शील का आचरण) नहीं करता है। यह नीच मुझे काल के समान नहीं जानता है। साधना के हठ भाव को यह भ्रम होता है कि वह बलपूर्वक किसी भी प्रकार के भावों का दमन कर सकता है। इसलिए अपने आपको सदैव काल के समान ही जानता है।
दो0 लखन कहेउ हँसि सुनहु मुनि क्रोधु पाप कर मूल।
जेहि बस जन अनुचित करहिं चरहिं बिस्व प्रतिकूल।।277।।
व्याख्या : तब लखन भाव ने हँसते हुए कहा कि मुनि! क्रोध ही तो पाप अर्थात् चिन्ता का मूल होता है। जिसके कारण ही संसार में लोग अनुचित कर्म कर बैठते हैं और विश्वभर के प्रतिकूल चलते रहते हैं।
मैं तुम्हार अनुचर मुनिराया। परिहरि कोपु करिअ अब दाया।।
टूट चाप नहिं जुरिहि रिसाने। बैठिअ होइहिं पाय पिराने।।
व्याख्या : लखन भाव ने पुन: कहा कि हे मुनिवर! मैं तो आपका दास हूँ। इसलिए क्रोध को छोड़ दीजिए और मुझ पर कृपा कीजिए। टूटा हुआ धनुष क्रोध करने से पुन: जुड़ तो नहीं जायेगा। आप बैठ जाइये आपके पैर दुखने लग गए होंगे। यहाँ लखन भाव साधना के हठ भाव को कहते हैं कि मैं तो आपका दास हूँ अर्थात् मैं तो उन्हीं लक्षणों को लखता हूँ जो मैं तुम में देखता हूँ। अत: आप सहज हो जाइये।
जौं अति प्रिय तौ करिअ उपाई। जोरिअ कोउ बड़ गुनी बोलाई।।
बोलत लखनहिं जनकु डेराहीं। मष्ट करहु अनुचित भल नाहीं।।
व्याख्या : अगर अज्ञान रूपी धनुष बहुत ही प्रिय है, तो कुछ उपाय किया जाए और किसी गुणी को बुलाकर जोड़ा जाए। लखन भाव के बोलने से प्राण रूपी जनक डर जाते हैं और लखन को चुप रहने को बोलते हैं कि चुप रहिए, अनुचित बोलना ठीक नहीं है। जब भावों में द्वन्द्व चलता है, तो प्राण में हलचल मच जाती है। उसी अनुभूति को नाना प्रतीकों के माध्यम से यहाँ बताया गया है।
थर थर काँपहिं पुर नर नारी। छोट कुमार खोट बड़ भारी।।
भृगुपति सुनि सुनि निरभय बानी। रिस तन जरइ होइ बल हानी।।
व्याख्या : तब शरीर स्थित सब भावों का संचार करने वाले सब नर-नाड़ी थर-थर काँपने लगते हैं। सब कहने लगते हैं कि छोट कुमार अर्थात् लखन भाव का ही सब खोट है। उधर को परशुराम रूपी हठ साधना भाव का लखन भाव की निर्भय वाणी सुन-सुनकर बल घटने लग जाता है।
बोले रामहि देइ निहोरा। बचउँ बिचारि बंधु लघु तोरा।।
मनु मलीन तनु सुंदर कैसें। बिष रस भरा कनक घटु जैसें।।
व्याख्या : तब परशुराम रूपी हठ भाव आत्मा रूपी राम पर अहसान जताते हुए बोला कि हे आत्मा रूपी राम! मैं तुम्हारा भाई समझकर छोड़ रहा हूँ। इसका मन तो गंदा और शरीर कैसे सुन्दर है, जैसे सोने के घड़े में शराब भरी हो। हठ साधना भाव को लखन भाव की लक्षण बताने की बात अच्छी नहीं लगती है, क्योंकि लक्षणों को पहचान लेने से दम्भ का भाव आहत होता है।
दो0 सुनि लछिमन बिहसे बहुरि नयन तरेरे राम।
गुर समीप गवने सकुचि परिहरि बानी बाम।।278।।
व्याख्या : यह सुनकर लखन भाव पुन: हँसा। तब आत्मा रूपी राम ने तिरछी नजरों से लखन भाव को देखा तो लखन भाव सकुचाकर कुटिल बोलना छोड़कर गुरु के पास चले गए। अर्थात् जब आत्मा का प्रकाश हुआ तो लखन भाव गुण दोषों का विचार छोड़कर समता रूपी गुरु के पास चला गया। आत्मा का प्रकाश होना ही राम का तिरछी नजरों से देखने का प्रतीक है। जब आत्मा प्रकाशित होने लगती है, तो लखन भाव भी समता रूपी गुरु के पास पहुँच जाता है।
अति बिनीत मृदु सीतल बानी। बोले रामु जोरि जुग पानी।।
सुनहु नाथ तुम्ह सहज सुजाना। बालक बचनु करिअ नहिं काना।।
व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम बहुत मधुर और शीतल वाणी दोनों हाथ जोड़कर बोले कि हे नाथ! आप तो स्वभाव से सज्जन हैं। अत: बालक की बातों पर कान मत दीजिए अर्थात् अनसुना कर दीजिए। आत्मा रूपी राम हठ साधना के भाव को समझाने का प्रयास करते हैं कि तुम तो सहज में ही सज्जन हो। अत: लखन भाव के गुण दोषों से प्रभावित मत होइये।
बररै बालक एकु सुभाऊ। इन्हहि न संत बिदूषहिं काऊ।।
तेहिं नाहीं कछु काज बिगारा। अपराधी मैं नाथ तुम्हारा।।
व्याख्या : बर्रे एवं बालक का एक स्वभाव होता है इसलिए जिनके संशय मिट जाते हैं (संत जन) वे इन्हें कभी दोष नहीं लगाते हैं। उसने तो (लखन भाव) आपका कोई कार्य भी नहीं बिगाड़ा है अर्थात् हठ साधना में कोई बाधा भी नहीं दी है। अज्ञान रूपी धनुष को तो मैंने तोड़ा है, इसलिए मैं आपका अपराधी हूँ।
कृपा कोप बधु बँधब गोसाईं। मो पर करिअ दास की नाईं।।
कहिअ बेगि जेहि बिधि रिस जाई। मुनि नायक सोइ करौं उपाई।।
व्याख्या : हे इन्द्रियों को वश में करने वाले (गो अ साईं)। कृपा, क्रोध, बध, बन्धन जो भी करना है, दास की तरह मुझ पर कीजिए। आप वह उपाय बताइये, जिससे आपका गुस्सा शान्त हो जाए। हे मन के नायक! मैं वही उपाय करूँगा।
कह मुनि राम जाइ रिस कैसें। अजहुँ अनुज तव चितव अनैसें।।
एहि के कण्ठ कुठा डिग्री न दीन्हा। तो मैं काह कोपु करि कीन्हा।।
व्याख्या : हे आत्मा रूपी राम! मेरा क्रोध कैसे जाए। अभी तेरा भाई टेढ़ा ही देख रहा है। अत: इसके गले पर अगर फरसा नहीं मारा तो क्रोध करके क्या किया? हठ भाव अभी भी बलपूर्वक लखन भाव को जीतने का दम्भ भरता है। इसी को प्रतीकात्मक दृष्टि से लिखा गया है।
दो0 गर्भ स्रवहिं अवनिप रवनि सुनि कुठार गति घोर।
परसु अछत देखउँ जिअत बैरी भूप किसोर।।279।।
व्याख्या : मेरे कुठार का घोर गति सुनकर अर्थात् हठ योग की घोर साधना से भाव रूपी राजाओं की नारियों के गर्भ गिर जाते हैं अर्थात् भावों की उत्पत्ति रूक जाती है, परन्तु मेरी उसी घोर साधना के रहते हुए भी लखन भाव रूपी राजकुमार अभी जीवित है।
बहइ न हाथु दहइ रिस छाती। भा कुठा डिग्री कुंठित नृपघाती।।
भयउ बाम बिधि फिरेउ सुभाऊ। मोरे हृदयं कृपा कसि काऊ।।
व्याख्या : परन्तु आज मेरा हाथ नहीं चल रहा है और क्रोध से छाती जली जाती है। आज नड़ की धड़कन से उत्पन्न भावों का नाश करने वाला हठयोग रूपी कुठार कुण्ठित हो गया है। आज क्रिया (विधि) से मेरा स्वभाव बदल गया है, वरना मेरे हृदय में कृपा कहाँ है? अब हठ साधना के भाव परशुराम रूपी गर्व को धीरे-धीरे सहज साधना का महत्व पता चलने लगा है। उसी सहज विधि के कारण स्वभाव बदलने की बात कही गयी है।
आजु दया दुखु दुसह सहावा। सुनि सौमित्रि बिहसि सि डिग्री नावा।।
बाउ कृपा मूरति अनुकूला। बोलत बचन झरत जनु फूला।।
व्याख्या : आज दया मुझे दुसह दु:ख सहवा रही है। यह सुनकर सौ अ मित्र अर्थात् सौ भावों के मित्र लखन रूपी भाव ने हँसकर सिर नवाया और कहा कि आपकी कृपा की हवा भी आपकी मूर्ति के अनुसार ही बह रही है और आप बोलते हैं तो मानों फूल झड़ रहे हैं। लखन भाव कहना चाहते हैं कि हठ साधना से प्राप्त होने वाला फल (कृपा अर्थात् कृ अ पा यानी करके प्राप्त करना) भी साधना की विधि के अनुसार ही होता है।
जौं पै कृपाँ जरिहिं मुनि गाता। क्रोध भएँ तनु राख बिधाता।।
देखु जनक हठि बालकु एहू। कीन्ह चहत जड़ जमपुर गेहू।।
व्याख्या : हे मुनि! जो कृपा करने पर अगर आपके अंग जलते हैं अर्थात् करके प्राप्त करने पर अंग जलते हैं, तो क्रोध करने पर तो क्रिया करने वाले (बिधाता) का तन राख हो जायेगा। तब परशुराम रूपी हठ का भाव बोलता है कि प्राण रूपी जनक इस लखन भाव की हठ को देख यह मृत्यु को प्राप्त करना चाहता है।
बेगि करहु किन आँखिन्ह ओटा। देखत छोट खोट नृपु ढोटा।।
बिहसे लखनु कहा मन माहीं। मूदें आँखि कतहुँ कोउ नाहीं।।
व्याख्या : इसे शीघ्र ही आँखों की ओट क्यों नहीं करते? यह देखने में छोटा है परन्तु नर की धड़कन (नृप) से उत्पन्न लखन भाव बहुत खोटा है। तब लखन भाव ने हँसकर अपने मन में कहा कि आँखें बन्द कर लो कहीं कोई दिखायी नहीं देगा।
दो0 परसुरामु तब राम प्रति बोले उर अति क्रोधु।
संभु सरासनु तोरि सठ करसि हमार प्रबोधु।।280।।
व्याख्या : तब हठ रूपी परशुराम आत्मा रूपी राम पर क्रोध करते हुए बोले कि हे सठ! स्वयं के अज्ञान रूपी धनुष को तोड़कर उल्टा हमें ही ज्ञान दे रहा है। राम यहाँ सहज साधना के प्रतीक हैं। अत: परशुराम रूपी हठ भाव का दम्भ बहुत आहत होता है कि अज्ञान का निवारण तो कोई बड़ी बात नहीं है। अज्ञान तो स्वयं के द्वारा ही बनता है। हठ भाव का दम्भ होता है कि उसकी क्रियाएँ ही श्रेष्ठ होती हैं। उसी से परमात्मा की प्राप्ति सम्भव है।
बंधु कहइ कटु संमत तोरें। तू छल बिनय करसि कर जोरें।।
क डिग्री परितोषु मोर संग्रामा। नाहिं त छाड़ कहाउब रामा।।
व्याख्या : तेरा लखन भाव रूपी भाई तेरी सम्मति से ही कटु वचन बोलता है अर्थात् आत्मा के बल व प्रेरणा से ही लखन भाव भावों के लक्षणों को लख पाता है। तू कपटपूर्वक विनय करता है। अत: तू संग्राम में या तो मुझे संतुष्ट कर या फिर राम कहाना छोड़ दे। अर्थात् हठ साधक भाव आत्म तत्व को भी बलपूर्वक हठ योग के द्वारा वश में करना चाहता है। इसलिए आत्मा रूपी राम को हठ रूपी परशुराम चुनौती देता है।
छलु तजि करहि सम डिग्री सिवद्रोही। बंधु सहित न त मारउँ तोही।।
भृगुपति बकहिं कुठार उठाएँ। मन मुसुकाहिं रामु सिर नाएँ।।
व्याख्या : शिव द्रोही अर्थात् विश्वास के द्रोही हठ भाव का अपना विश्वास होता है। अत: जब आत्मा रूपी राम विश्वास से उत्पन्न शंका के धनुष को तोड़ देते हैं, तो हठ भाव के लिए आत्मा रूपी राम शिवद्रोही हो जाते हैं। हठ भाव कहता है कि या तो कपट छोड़कर मुझसे युद्ध करो नहीं तो लखन भाव सहित मार दूँगा। हठ भाव रूपी परशुराम बके जा रहे हैं अर्थात् अपनी साधना विधि के गर्व का बखान करते जा रहे हैं और आत्मा रूपी राम सिर झुकाकर मुस्कुरा रहे हैं। अर्थात् सहज साधना भाव को हठ भाव पर हँसी आ रही है।
गुनह लखन कर हम पर रोषू। कतहुँ सुधाइहु ते बड़ दोषू।।
टेढ़ जानि सब बंदइ काहू। बक्र चंद्रमहि ग्रसइ न राहू।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम मन ही मन विचार करते हैं कि गुनाह तो लखन भाव का है और दोष हम पर कर रहे हैं। कभी-कभी सीधापन में भी बड़ा दोष होता है। टेढ़ा जानकर सब वन्दना करते हैं। टेढ़े चन्द्रमा को तो राहू भी नहीं ग्रसता है।
राम कहेउ रिस तजिअ मुनीसा। कर कुठा डिग्री आगे यह सीसा।।
जेहिं रिस जाइ करिअ सोइ स्वामी। मोहि जानिअ आपन अनुगामी।।
व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने कहा कि हे मुनि! आप गुस्सा छोड़ दीजिए। ऐसा कहकर राम ने फरसे के आगे अपना सीस कर दिया अर्थात् सहज साधना के भाव ने हठ साधना के भाव के सामने अपनी सहजता दिखाई। आपका क्रोध जैसे जाए आप मुझे अपना दास जानकर वैसा ही कीजिए। सहज साधना का यही लक्षण होता है कि उसमें जिद्दीपन नहीं होता है, जबकि हठ साधना जिद पर टिकी होती है।
दो0 प्रभुहि सेवकहि सम डिग्री कस तजहु बिप्रबर रोसु।
बेषु बिलोकें कहेसि कछु बालकहू नहिं दोसु।।281।।
व्याख्या : स्वामी और सेवक में युद्ध कैसा अर्थात् हठ साधना और सहज साधना द्वारा प्रकाशित आत्मा में युद्ध कैसे सम्भव है। अत: विशुद्ध प्रकाश से प्रकाशित मन के हठ भाव! आप अपना क्रोध तज दीजिए। आपके वीरों जैसे भेष को देखकर अर्थात् हठ योग की कठोर साधना के लक्षणों को ही देखकर लखन भावरूपी बालक ने कुछ कहा है। उसमें उसका भी कोई दोष नहीं है।
देखि कुठार बान धनु धारी। भै लरिकहि रिस बी डिग्री बिचारी।।
नामु जान पै तुम्हहि न चीन्हा। बंस सुभायँ उत डिग्री तेहिं दीन्हा।।
व्याख्या : आपको कुठार, बाण और धनुष धारण किए देखकर अर्थात् आपके द्वारा हठ भाव, वासना भाव व इच्छाओं को वश किया देखकर ही लखन भाव ने क्रोध में भरा देखकर वीर मान लिया अर्थात् हठ साधना का गर्व भाव जान लिया। आपके नाम को तो जानता था अर्थात् हठ साधना के बारे में तो जानता था परन्तु आपके गर्व के मर्म को नहीं पहचाना। इसलिए लक्षणों को लखने की वृति के कारण ही आपको उत्तर दे दिया।
जौं तुम्ह औतेहु मुनि की नाईं। पद रज सिर सिसु धरत गोसाईं।।
छमहु चूक अन जानत केरी। चहिअ बिप्र उर कृपा घनेरी।।
व्याख्या : अगर आप मन को वश में करने वाले सहज भाव की तरह आते तो हे इन्द्रियों को वश में करने वाले (गो अ साईं उ अर्थात् इन्द्रियों का स्वामी)! वह आपके चरणों की धूल को सिर पर धारण करता। इसलिए आप अनजाने में की गयी भूल को क्षमा कर दीजिए। क्योंकि विशुद्ध प्रकाश अर्थात् हृदय में ज्ञान हो जाने पर तो बहुत कृपा का भाव हृदय में होना चाहिये।
हमहि तुम्हहि सरिबरि कसि नाथा। कहहु न कहाँ चरन कहँ माथा।।
राम मात्र लघु नाम हमारा। परसु सहित बड़ नाम तोहारा।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम बोले कि हे नाथ! आपकी और हमारी कहाँ बराबरी। कहाँ मस्तिष्क और कहाँ चरण। अर्थात् आत्मा रूपी राम कहते हैं कि हठ साधना के गर्व भाव और सहज आत्मा की बराबरी कैसे हो सकती है। क्योंकि सहज आत्मा तो निर्मल होने के कारण अति सूक्ष्म होती है और हठभाव तो गर्व के कारण बड़ा आकार वाला होता है। आत्मा तो ज्यों-ज्यों निर्मल होती चली जायेगी त्यों-त्यों सूक्ष्म होती चली जायेगी और दम्भ या गर्व का भाव भारी होता जायेगा। अत: दोनों में बराबरी कैसे हो सकती है।
देव एकु गुनु धनुष हमारें। नव गुन परम पुनीत तुम्हारें।।
सब प्रकार हम तुम्ह सन हारे। छमहु बिप्र अपराध हमारे।।
व्याख्या : हे देव! हमारे तो एक ही गुण होता है धनुष को धारण करना अर्थात् आत्मा तो केवल धनु अ ईष इच्छाओं को धारण करके अर्थात् वश में करके निर्मुक्त होती है और हठ साधना पथ के तो नौ गुण (शम, दम, तप, शौच, क्षमा, सरलता - ज्ञान, विज्ञान और आस्तिकता) होते हैं। इसलिए हम तो सब प्रकार से हारे हुए हैं अर्थात् माया के भावों का हरण किए हुए हैं। अत: हे विशुद्ध प्रकाश वाले! आप हमारे अपराध को क्षमा कर दीजिए अर्थात् अज्ञान के निवारण से जो साधना के गर्व को चोट पहुँची है, उस अपराध के लिए क्षमा कर दीजिए।
दो0 बार बार मुनि बिप्रबर कहा राम सन राम।
बोले भृगुपति सरुष हसि तहूँ बंधु सम बाम।।282।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम ने परशुराम रूपी हठ भाव को बार-बार मुनि (अर्थात् मन का भाव) और विशुद्ध प्रकाश वाला कहा तो क्रोध की हँसी हँसते हुए परशुराम ने कहा कि तुम भी अपने भाई की तरह टेढ़ा हो। अर्थात् आत्मा की निर्मलता भी लखन भाव की तरह ही हठ साधना के दम्भ भाव को आहत करने वाली होती है।
निपटहिं द्विज करि जानहि मोही। मैं जस बिप्र सुनावउँ तोही।।
चाप स्रुवा सर आहुति जानू। कोपु मोर अति घोर कृसानू।।
व्याख्या : मुझे निपट ज्ञान का भाव मत जानिए। मैं जैसा विशुद्ध ज्ञान का प्रकाश करने वाला हूँ वो तुम्हें सुनाता हूँ। अर्थात् हठ साधना का दम्भ भाव अपनी विशेषता बताना चाहता है कि मेरी साधना क्रिया कितनी कठोर और श्रेष्ठ है। मेरा धनुष अर्थात् इच्छाओं को वश में करना स्रुवा की तरह होता है और स्वर (सर) आहूति का काम करते हैं और वासनाओं को जलाने के लिए मेरा क्रोध भयंकर अग्नि के समान होता है। यहाँ पर हठ साधना भाव अपनी विशेषताओं को समझा रहा है।
समिधि सेन चतुरंग सुहाई। महा महीप भए पसु आई।।
मैं एहि परसु काटि बलि दीन्हे। समर जग्य जप कोटिन्ह कीन्हे।।
व्याख्या : गुणों की चार अवस्था रूपी (सत, रज, तम व गुणातीत) चतुरंगनि सेना होती है और बड़े-बड़े माया के भाव पशु की तरह होते हैं, जिन्हें मैंने इस कठोर साधना रूपी फरसे से बलि दिया है अर्थात् जीत लिया है। इस प्रकार भाव रूपी करोड़ों यज्ञ व जप मैंने किए हैं।
मोर प्रभाउ बिदित नहिं तोरें। बोलसि निदरि बिप्र के भोरें।।
भंजेउ चापु दापु बड़ बाढ़ा। अहमिति मनहुँ जीति जगु ठाढ़ा।।
व्याख्या : हे आत्मा रूपी राम! तुमको मेरा प्रभाव पता नहीं है। इसलिए मुझे केवल विशुद्ध ज्ञान का प्रकाश बोलकर निरादर कर रहे हो। तुमने अज्ञान रूपी धनुष को तोड़ दिया है, इसलिए तुम्हारा दम्भ बहुत बढ़ गया है। तुम्हारा अहंकार ऐसा है, मानो संसार को जीत लिया है।
राम कहा मुनि कहहु बिचारी। रिस अति बड़ि लघु चूक हमारी।।
छुअतहिं टूट पिनाक पुराना। मैं केहि हेतु करौं अभिमाना।।
व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम बोले कि हे मुनि! आप विचार कर बोलिए। हमारी थोड़ी सी भूल के लिए इतना क्रोध कर रहे हैं। अर्थात् सहज साधना द्वारा बिना जप, तप, संयम - नियम आदि के ही अज्ञान रूपी धनुष टूट गया तो यह छोटी सी क्रिया पद्धति भिन्न है, इसमें इतना क्रोध क्यों कर रहे हो। वह अज्ञान रूपी धनुष तो आत्मा के स्पर्श मात्र से टूट गया, इसलिए मेरा इसमें (सहज साधना) अभिमान करने का क्या औचित्य है?
दो0 जौं हम निदरहिं बिप्र बदि सत्य सुनहु भृगुनाथ।
तौ अस कौ जग सुभटु जेहि भय बस नावहिं माथ।।283।।
व्याख्या : हे प्रकृति को वश में करने वाले (भृगुनाथ)! अगर हम विशुद्ध प्रकाश कहकर निरादर करते हैं तो फिर संसार में ऐसा कौन सा योद्धा है अर्थात् ऐसा कौन सा भाव है, जिसके सामने हम सीस झुकाते हैं। अर्थात् विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश के अलावा ऐसा कोई भाव नहीं होता है जिसके आगे आत्मा झुक जाए।
देव दनुज भूपति भट नाना। समबल अधिक होउ बलवाना।।
जौं रन हमहि पचारै कोऊ। लरहिं सुखेन कालु किन होऊ।।
व्याख्या : देव, दनुज, भाव रूपी राजा या अन्य योद्धा चाहे हमारे समान बलवान हों या हमसे अधिक बलवान हों अगर हमें भाव रूपी युद्ध में ललकारें तो हम सुख पूर्वक लड़ेंगे, चाहे वो काल ही क्यों न हो। सहज साधना पद्धति की यही विशेषता होती है कि वो भाव युद्ध में सहज होकर ही लड़ती है।
छत्रिय तनु धरि समर सकाना। कुल कलंकु तेहिं पावरँ आना।।
कहउँ सुभाउ न कुलहि प्रसंसी। कालहु डरहिं न रन रघुबंसी।।
व्याख्या : क्षत्रिय शरीर धारण करके अर्थात् क्षय अ त्रिय यानी तीन गुणों से उत्पन्न माया का नाश करने वाला होकर अगर भावों के युद्ध में डर गया, तो वह तो अपने कुल यानी साधना पद्धति पर कलंक होता है। इसलिए आत्मा रूपी राम सहज स्वभाव से ही कहते हैं कि मैं कुल की प्रशंसा अर्थात् साधना पद्धति की प्रशंसा नहीं करके सहज में ही कहता हूँ कि सहज साधक भावों के युद्ध में काल से भी नहीं डरते हैं।
बिप्रबंस कै असि प्रभुताई। अभय होइ जो तुम्हहि डेराई।।
सुनि मृदु गूढ़ बचन रघुपति के। उघरे पटल परसुधर मति के।।
व्याख्या : परन्तु विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश की ऐसी प्रभुता होती है कि जो विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश से डरता है यानी विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश के आगे समर्पण करता है, वो भाव रूपी युद्ध में अभय हो जाता है। आत्मा रूपी राम के इस प्रकार गूढ़ वचनों को सुनने से परशुराम रूपी हठ साधना के दम्भ भाव की बुद्धि के कपाट खुल गए अर्थात् सहज साधना का रहस्य समझ में आ गया और साधना पद्धति के प्रति हठधर्मिता का भाव मिट गया।
राम रमापति कर धनु लेहू। खैंचहु मिटै मोर संदेहू।।
देत चापु आपुहिं चलि गयऊ। परसुराम मन बिसमय भयऊ।।
व्याख्या : जब परशुराम रूपी हठ भाव को समझ में आ जाता है कि आत्मा की सहजता से ही परम लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है, तो भी मन में थोड़ा संशय बच जाता है। उसी संशय को दूर करने के लिए परशुराम रूपी साधना का हठ भाव कहता है कि हे आत्मा रूपी राम! तुम कुण्डलिनि शक्ति को अपने वश में करके दिखाओ। कुण्डलिनि शक्ति ही धनुष की तरह होती है। जब वह सुप्त अवस्था में होती है, तो प्रत्यंचा ढीली होने के समान होती है और जागृत होने पर धनुष पर प्रत्यंचा जैसी चढ़ जाती है। अत: परशुराम भाव कहते हैं कि आप कुण्डलिनि शक्ति को वश में करके दिखाइये। तब आत्मा रूपी राम सहजता के साथ कुण्डलिनि शक्ति को उठाते हैं और वह सहजता से अपने-आप उठ गयी। यह देखकर परशुराम रूपी हठ भाव को बहुत आश्चर्य हुआ।
दो0 जाना राम प्रभाउ तब पुलक प्रफुल्लित गात।
जोरि पानि बोले बचन हृदयँ न प्रेमु अमात।।284।।
व्याख्या : तब परशुराम रूपी भाव ने आत्मा रूपी राम के प्रभाव को जान लिया, जिससे शरीर में पुलकावली छा गयी। तब दोनों हाथ जोड़कर परशुराम रूपी भाव बोला। उस समय हृदय में प्रेम नहीं समा रहा था।
जय रघुबंस बनज बन भानू। गहन दनुज कुल दहन कृसानु।।
जय सुर बिप्र धेनु हितकारी। जय मद मोह कोह भ्रम हारी।।
व्याख्या : तब उस अवस्था में हठ साधना भाव सहज हो जाता है और आत्मा रूपी राम की स्तुति करने लग जाता है। हे आत्मा रूपी राम। आपकी जय हो आप कमल वन के सूर्य हैं अर्थात् साधना द्वारा कमल खिल जाने पर आप सूर्य की तरह प्रकाश करने वाले हैं। आप वासना रूपी दनुजों के कुल को जलाने वाले ज्ञान रूपी अग्नि हैं। आप स्वरों, विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश व इन्द्रियों के हितकारी हैं। हे काम, क्रोध, मद व भ्रम को दूर करने वाले आपकी जय हो।
बिनय सील करूना गुन सागर। जयति बचन रचना अति नागर।।
सेवक सुखद सुभग सब अंगा। जय सरीर छबि कोटि अनंगा।।
व्याख्या : आप विनय, शील, करूणा व गुणों के सागर हो। हे सुन्दर वचनों की रचना करने वाले! आपकी जय हो। आप सेवक यानी साधना द्वारा सेवा करने वालों को सुख देने वाले हैं और सुन्दर अंगों वाले हैं अर्थात् सब प्रकार से सुभग उ सु अ भग यानी शुभ प्रकृति वाले हैं। हे करोड़ों कामदेवों की छवि जैसे सुन्दर शरीर वाले! आपकी जय हो।
करौं काह मुख एक प्रसंसा। जय महेस मन मानस हंसा।।
अनुचित बहुत कहेउँ अग्याता। छमहु छमामंदिर दोउ भ्राता।।
व्याख्या : मैं आपकी एक मुख से कैसे प्रशंसा करूँ अर्थात् आत्मा की प्रशंसा करना या गुणों का बखान करना असम्भव है। हे महेश के मन रूपी सरोवर के हंस! आपकी जय हो। मैंने अज्ञानता के वश में बहुत प्रकार से अनुचित कहा है। अत: क्षमा के घर दोनों भाई मुझे क्षमा करना।
कहि जय जय जय रघुकुल केतू। भृगुपति गए बनहि तप हेतू।।
अपभयँ कुटिल महीप डेराने। जहँ तहँ कायर गँवहिं पराने।।
व्याख्या : हे रघुकुल केतू! (अर्थात् रघु जीव का प्रतीक होता है और कुल जीव के भावों का प्रतीक होता है। अत: रघुकुल केतु का तात्पर्य जीव के भावों के शत्रु से हुआ।) आपकी जय हो, जय हो, जय हो। ऐसा कहकर प्रकृति को वश में करने वाले परशुराम रूपी हठ भाव आत्मा रूपी राम के सामने समर्पण कर दिए और वन में तप करने चले गए अर्थात् भाव रूपी वन में मन व इन्द्रियों का एकीकरण करके सहज हो गए। तब कुछ कुटिल वृति के भाव रूपी राजा आत्मा रूपी राम से बिना कारण ही डर गए और कायरों की तरह जहँ-तहँ चले गए।
दो0 देवन्ह दीन्हीं दुंदुभीं प्रभु पर बरषहिं फूल।
हरषे पुर नर नारि सब मिटी मोहमय सूल।।285।।
व्याख्या : तब ध्यान की उस अवस्था में दैवीय भावों में उत्साह छा गया और आनन्द रूपी फूल बरसने लग गए। जिससे समस्त शरीर के नर-नारियों में हर्ष छा गया और मोह के कारण जो दु:ख था, वह सब मिट गया। जब आत्मा का प्रकाश हो जाता है, तो मोह आदि के विकार मिट जाते हैं।
अति गहगहें बाजने बाजे। सबहिं मनोहर मंगल साजे।।
जूथ जूथ मिलि सुमुखि सुनयनीं। करहिं गान कल कोकिल बयनीं।।
व्याख्या : तब ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर के परमानन्द रूपी कोष में गहगहे बाजे बजने लगे अर्थात् प्राण की गति की नाना ध्वनियाँ सुनाई पड़ने लगी और मन को हरने वाली मंगल भावना पैदा होने लग गयी। फिर समूह के समूहों में सात्विक इच्छाएँ रूपी दिव्य दृष्टि के भाव पैदा होने लगे और मधुर-मधुर आवाज में मंगल भावना के दिव्य गान करने लगे।
सुखु बिदेह कर बरनि न जाई। जन्म दरिद्र मनहुँ निधि पाई।।
बिगत त्रास भइ सीय सुखारी। जनु बिधु उदयँ चकोर कुमारी।।
व्याख्या : उस समय प्राण रूपी विदेह जनक के सुख का वर्णन नहीं किया जा सकता है। ऐसा सुख मिल रहा था, मानों जन्म के दरिद्र को खजाना मिल गया हो। प्राण के आनन्द व भावों की निर्मलता से सुरता रूपी सीता का भय मिट गया और सुरता परम सुखी हो गयी। जैसे चन्द्रमा के उदय होने पर चकोरी सुखी हो जाती है।
जनक कीन्ह कौसकहि प्रनामा। प्रभु प्रसाद धनु भँजेउ रामा।।
मोहि कृत-कृत्य कीन्ह दुहुँ भाईं। अब जो उचित सो कहिअ गोसाईं।।
व्याख्या : तब प्राण रूपी जनक ने कोशिकाओं से उत्पन्न समता रूपी विश्वामित्र को नमस्कार किया और कहा कि आपकी कृपा से अर्थात् समता के भाव की कृपा से आत्मा रूपी राम ने अज्ञान रूपी धनुष को तोड़ दिया है। मुझे अर्थात् प्राण को आत्मा रूपी राम और लखन भाव ने कृत-कृत्य अर्थात् भावों के कर्मों के बन्धन से मुक्त कर दिया है। यह वैज्ञानिक सत्य है कि जब आत्मा का प्रकाश हो जाता है, तो अज्ञान का निवारण हो जाता है और अज्ञान मिट जाने पर भावों के कर्मों का प्रभाव मिट जाता है। अत: हे गोसाईं अर्थात् गो अ साईं यानी इन्द्रियों के स्वामी! आपको जो उचित लगे वो कीजिए।
कह मुनि सुनु नर नाथ प्रबीना। रहा बिबाहु चाप आधीना।।
टूट तहीं धनु भयउ बिबाहू। सुर नर नाग बिदित सब काहू।।
व्याख्या : तब समता रूपी विश्वामित्र भाव बोले कि हे नर की धड़कन के नाथ! सुरता रूपी सीता और आत्मा रूपी राम का मिलन तो अज्ञान रूपी धनुष के अधीन था। अत: जब अज्ञान रूपी धनुष टूट गया तो विवाह (मिलन) स्वत: ही हो गया। इस मिलन (विवाह) की घटना को स्वर, नर (धड़कन) व नाग प्राण वायु सभी जानते हैं। अर्थात् आत्मा व सुरता के मिलन की घटना को स्वरों, नर (नड़) व नाग प्राण वायु के माध्यम से अनुभूत किया जा सकता है।
दो0 तदपि जाइ तुम्ह करहु अब जथा बंस ब्यवहारू।
बूझि बिप्र कुलबृद्ध गुर बेद बिदित आचारू।।286।।
व्याख्या : हे प्राण रूपी जनक! वैसे तो विवाह हो गया है परन्तु फिर भी वंश व्यवहार अर्थात् भावों के आचरण के द्वारा मिलन (विवाह) की घटना का आयोजन करना चाहिए। अत: विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश वाले, कुलवृद्ध अर्थात् साधना के अनुभव वाले भाव, गुरु यानी प्रकाश करने वाले भाव व अनुभव ग्रहण करने वालों भावों द्वारा आचरण करना चाहिए। अर्थात् साधना की अनुभूति को मन, वचन, कर्म द्वारा आचरण में लाने का प्रयास करना चाहिए। इसी को समता रूपी भाव प्राण रूपी जनक को समझाते हैं।
दूत अवधपुर पठवहु जाई। आनहिं नृप दसरथहिं बोलाई।।
मुदित राउ कहि भलेहिं कृपाला। पठए दूत बोलि तेहि काला।।
व्याख्या : समता रूपी विश्वामित्र ने कहा कि अवधपुरी अर्थात् देह भाव को निमन्त्रण देने के लिए दूत भेजने चाहिये। यहाँ साधना का बहुत गम्भीर रहस्य छुपा हुआ है क्योंकि ध्यान की अनुभूति को आचरण में लाने के लिए देह भाव में आना ही पड़ेगा। अत: यहाँ समता रूपी विश्वामित्र कहते हैं कि अवधपुरी अर्थात् अवधी रूपी शरीर को सूचित करें। अवधी रूपी शरीर में दस इन्द्रियों रूपी दसरथ रहता है। अत: दसरथ को निमंत्रण देकर बुलाने की बात कहते हैं। तब प्राण रूपी जनक प्रसन्न होकर कहते हैं कि बहुत अच्छी बात है और ऐसा कहकर तुरन्त दसरथ रूपी भाव के पास भाव रूपी दूत भेज दिए।
बहुरि महाजन सकल बोलाए। आइ सबन्हि सादर सिर नाए।।
हाट बाट मंदिर सुरबासा। नग डिग्री सँवारहु चारिहुँ पासा।।
व्याख्या : तब प्राण रूपी जनक ने बहुत से भक्ति के भावों (महा अ जन) को बुलाया तो सबने आकर सिर झुकाया अर्थात् प्राण रूपी जनक के सामने समर्पण कर दिया। तब प्राण रूपी जनक ने कहा कि हाट बाट अर्थात् समस्त कोषों को, मन के अन्दर, व स्वरों के अन्दर प्रवेश करके शरीर रूपी नगर को दया, करूणा, मैत्री पर उपकार, प्रेम, सत्य आदि के द्वारा सजा दो। जब साधक को आत्म अनुभूति का ज्ञान हो जाता है, तो उसके प्राण में भक्ति के भावों का संचार होने लग जाता है और सद्गुण प्रकट होकर साधक को सुशोभित करने लगते हैं।
हरषि चले निज निज ग्रह आए। पुनि परिचारक बोलि पठाए।।
रचहु बिचित्र बितान बनाई। सिर धरि बचन चले सचु पाई।।
व्याख्या : प्राण रूपी जनक की प्रेरणा (आज्ञा) पाकर सभी सद्भाव अपनी-अपनी सहज अवस्था में आ गए और फिर भक्ति भावों को बल प्रदान करने वाले सद्गुणों को प्रेरित किया कि ऐसी बिचित्र अर्थात् बिना चित्र के यानी ऐसी दृष्टि के भावों का ताना बाना (बितान) बना दो जिससे किसी के प्रति आसक्ति पैदा न हो। तब यम, नियम संयम आदि के सद्भाव प्राण रूपी जनक की आज्ञा को सत्य मानकर पालन करने के लिए चल दिए। जब साधना परिपक्व अवस्था में आ जाती है तो प्राण से ऐसे भाव पैदा होने लग जाते हैं, जिससे साधक बन्धन मुक्त रहकर सहज हो जाता है।
पठए बोलि गुनी तिन्ह नाना। जे बितान बिधि कुसल सुजाना।।
बिधिहि बंदि तिन्ह कीन्ह अरंभा। बिरचे कनक कदलि के खंभा।।
व्याख्या : तब यम संयमादि सद्गुणों के भावों ने नाना प्रकार के त्याग, वैराग्य, प्रेम आदि के भावों को बुला भेजा अर्थात् त्यागादि के भावों को पैदा कर दिया, जो विचित्र अर्थात् बिना मोह की दृष्टि के भावों का ताना-बाना बुनने में विशेषज्ञ थे। विधि अर्थात् क्रिया की वन्दना करके अर्थात् यम-नियमादि की क्रिया करके उन भावों ने मोह रहित दृष्टि के भावों का ताना-बाना बुनना शु डिग्री कर दिया। तब उन्होंने कनक अर्थात् माया के भावों रूपी केलों का खम्भा बना दिया अर्थात् नियम-संयम से माया के भावों को वश में कर लिया।
दो0 हरित मनिन्ह के पत्र फल पदुम राग के फूल।
रचना देखि बिचित्र अति मनु बिरंचि कर भूल।।287।।
व्याख्या : हरित मनिन्ह अर्थात् सात्विक मन के भावों के पत्ते व फूल बनाए तथा परमात्मा के कमल रूपी चरणों में अनुराग के फूल बनाए (जिन्हें देखकर मन के भावों की रचना करनेवाले भावों का मन भी मोहित हो गया अर्थात् समस्त माया के भाव शान्त हो गए और सात्विक भाव बढ़ने लग गए।
बेनु हरित मनिमय सब कीन्हे। सरल सपरब परहिं नहिं चीन्हे।।
कनक कलित अहिबेलि बनाई। लखि नहिं परइ सपरन सुहाई।।
व्याख्या : साधना के दौरान ध्यान अवस्था में समझ में आने लगता है कि रीढ़ की हड्डी जिसके माध्यम से कुण्डलिनि शक्ति सहस्रसार चक्र पर पहुँचती है, वह बाँस की तरह गाँठ वाली होती है। इसलिए भक्ति के भाव रूपी सेवकों ने हरित मनिमय यानी सात्विक भावों से कुण्डलिनि शक्ति रूपी बाँस (रीढ़) को सजा दिया, जिससे कुण्डलिनि शक्ति की ऊर्जा सरल यानी सीधी होकर उर्ध्वगामी हो गयी। जिसका मालूम भी नहीं चल रहा था। माया के भावों से प्रभावित वासना रूपी (अहिबेली उ वासना की बेल) बेल बना दी, जिससे वासनाओं की आसक्ति मिट गयी। जिसमें भोग रूपी पत्ते होते हुए भी पता नहीं चल रहा था।
तेहि के रचि पचि बंध बनाए। बिच बिच मुकुता दाम सुहाए।।
मानिक मरकत कुलिस पिरोजा। चीरि कोरि पचि रचे सरोजा।।
व्याख्या : उसी भोग इच्छा रूपी वासना के बीच-बीच में बन्ध बनाए गए, जिसमें शीतलता रूपी भावों की झालरें लगी हुई हैं। भाव रूपी माणिक, पन्ने, हीरे और फिरोजाओं को चीर कर कोर करके कमल बनाए गए हैं।
किए भृंग बहुरंग बिहंगा। गुंजहिं कूजहिं पवन प्रसंगा।।
सुर प्रतिमा खंभन गढ़ि काढ़ी। मंगल द्रब्य लिएँ सब ठाढ़ी।।
व्याख्या : भौरें और बहुत रंगों के पक्षी प्राण की गति के अनुसार गुंजन और कूंजन करने लगते हैं। अर्थात् जब कुण्डलिनि शक्ति उर्ध्वगामी होकर सहस्र कमल में पहुँचने लगती है तो नाना प्रकार के भ्रमर व पक्षियों की ध्वनि सुनाई पड़ने लगती है। उस समय स्वरों से दैवीय भाव निकलने लगते हैं, मानों मंगल भाव द्रव्य लिए अर्थात् मंगल कलश लिए खड़े हों।
चौकें भाँति अनेक पुराईं। सिंधुर मनिमय सहज सुहाईं।।
व्याख्या : इस शरीर रूपी नगर में अनेक प्रकार के भाव रूपी चौक बनाए, जिसमें मन के सहज भाव रूपी मोती पिरोए गए।
दो0 सौरभ पल्लव सुभग उठि किए नीलमनि कोरि।
हेम बौर मरकत घवरि लसत पाटमय डोरि।।288।।
व्याख्या : अच्छे सद्भाव रूपी पत्ते लगाए गए तथा नीलमणि अर्थात् मन के अति निर्मल भावों की कोर बनायी गयी। वह भावमय अवस्था ऐसी सुन्दर लग रही थी मानों सोने के बौर (आम फल) और रेशम की डोर में बँधे हुए भाव रूपी फलों के गुच्छे लग रहे हो।
रचे रूचिर बर बंदनिवारे। मनहुँ मनोभवँ फंद सँवारे।।
मंगल कलस अनेक बनाए। ध्वज पताक पट चमर सुहाए।।
व्याख्या : भावों से निर्मित ऐसे सुन्दर बन्दनवार बनाए मानों कामदेव ने स्वयं फँदे सजाए होंे। अर्थात् साधना की उस अवस्था में जब साधक आत्मानुभूति करके देह भाव में आने लगता है तो सात्विक भावों की मनोहर सजावट होने लग जाती है, जिससे आनन्द व उत्साह की अवस्था आ जाती है। तब मंगल की भावना रूपी अनेक कलश सज जाते हैं और यश रूपी पताका व प्रभु कृपा रूपी पताका लहराने लग जाती है।
दीप मनोहर मनिमय नाना। जाइ न बरनि बिचित्र बिताना।।
जेहिं मंडप दुलहिनि बैदेही। सो बरनै असि मति कबि केही।।
व्याख्या : सात्विक भावों रूपी दीपक की माला मन को हरण करने वाली थी और विचित्र बिताना अर्थात् मोह रहित दृष्टि के भावों के ताना-बाना का वर्णन नहीं किया जा सकता है। जिस ब्रह्मरन्ध्र के परमानन्द रूपी कोष में सुरता रूपी दुल्हन थी, उस अवस्था का वर्णन तो कोई भी कवि नहीं कर सकता है।
दूलहु रामु रूप गुन सागर। सो बितानु तिहुँ लोक उजागर।।
जनक भवन कै सोभा जैसी। गृह गृह प्रति पुर देखिअ तैसी।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम जो दुल्हा थे वे भी गुणों के सागर होते हैं। अत: वह सुखद निर्मल भावों का ताना-बाना भी तीनों लोकों में उजागर होता है अर्थात् नख से शिख तक अनुभव में आ जाता है। प्राण रूपी जनक के घर की जैसी शोभा होती है, वैसी ही शोभा समस्त भावों के कोषों में देखी जा सकती है। अर्थात् जैसे भाव प्राण से पैदा होते हैं, वैसे ही भाव समस्त कोषों में छा जाते हैं।
जेहिं तेरहुति तेहि समय निहारी। तेहि लघु लगहिं भुवन दस चारी।।
जो संपदा नीच गृह सोहा। सो बिलोकि सुरनायक मोहा।।
व्याख्या : जिसने उस समय तेरहुति अर्थात् ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर की शोभा को देखा (दस इन्द्रियाँ, मन व बुद्धि बारह रास्ते माने जाते हैं परन्तु इनसे परे तेरहवाँ रास्ता है, जो परमात्मा के समीप ले जाता है उसी को तेरहुति कहा जाता है) उसे दस इन्द्रियों व चित की चार अवस्थाएँ भी लघु लगने लगी क्योंकि प्राणरूपी जनक से उत्पन्न लघु भावों को भी देखकर सुरनायक स्वर अ नायक अर्थात् चित रूपी इन्द्र भी मोहित होने लग गया यानी चित स्थिर होने लग गया।
दो0 बसइ नगर जेहिं लच्छि करि कपट नारि बर बेषु।
तेहि पुर कै सोभा कहत सकुचहिं सारद सेषु।।289।।
व्याख्या : जिस ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर में नारी की धड़कन से सुलक्षण पैदा होने लगते हैं, उस नगर की शोभा का वर्णन करने में तो शारदा व शेष भी संकोच करने लगते हैं। अर्थात् उस अवस्था के परमानन्द का वर्णन न तो लखन रूपी भाव और न ही सरस्वती कर सकती हैं।
पहुँचे दूत राम पुर पावन। हरषे नगर बिलोकि सुहावन।।
भूप द्वार तिन्ह खबरि जनाई। दसरथ नृप सुनि लिए बोलाई।।
व्याख्या : तब प्राण रूपी जनक के दूत अर्थात् विदेह भाव से उत्पन्न भाव रूपी दूत आत्मा रूपी राम के शरीर रूपी नगर में पहुँचे तो अवधी रूपी शरीर की शोभा को देखकर बहुत हर्षित हुए। जब दसरथ रूपी राजा के द्वार पर समाचार भेजवाया (यानी दस इन्द्रियों रूपी दसरथ को आभास कराया) तो दस इन्द्रियों रूपी दसरथ राजा ने उन्हें तुरन्त बुला लिया।
करि प्रनामु तिन्ह पाती दीन्ही। मुदित महीप आपु उठि लीन्ही।।
बारि बिलोचन बाँचत पाती। पुलक गात आई भरि छाती।।
व्याख्या : तब प्राण रूपी जनक के सात्विक भाव रूपी दूतों ने दस इन्द्रियों रूपी दसरथ राजा को पत्री दी अर्थात् संदेश दिया। तब दसरथ रूपी राजा ने स्वयं संदेश लिया और चिट्ठी बाँचते हुए आँखों में जल आने लग गया और पुलकावली छा गयी तथा छाती भर आयी यानी इन्द्रियों का भाव ब्रह्मरन्ध्र की अनुभूति से गदगद हो गया। वास्तविकता में ये सब अनुभूति ध्यान की अवस्था में क्षणभर में होती रहती हैं। परन्तु प्रतीकों का सहारा लेकर कहने में ऐसा लगने लगता है जैसे बहुत समय की घटना है। ये सब क्षणिक अनुभूति की अभिव्यक्ति है।
रामु लखनु उर कर बर चीठी। रहि गए कहत न खाटी मीठी।।
पुनि धरि धीर पत्रिका बाँची। हरषी सभा बात सुनि साँची।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम व लखन रूपी लक्ष्मण हृदय में हैं और संदेश दसरथ रूपी राजा के हाथ में है। तब कुछ खट्टी-मीठी नहीं कह पा रहे हैं अर्थात् सांसारिक भोग रूपी खट्टी और परमात्मा रूपी मीठी अनुभूति को कह नहीं पा रहे हैं। फिर धैर्य धारण करके प्राण रूपी जनक की भेजी चिट्ठी को पढ़ा अर्थात् संदेश को समझा तब भाव रूपी सभा सत्य के संदेश को सुनकर हर्षित हो उठी।
खेलत रहे तहाँ सुधि पाई। आए भरतु सहित हित भाई।।
पूछत अति सनेहँ सकुचाई। तात कहाँ तें पाती आई।।
व्याख्या : तब भरत रूपी पोषण का भाव और काम, क्रोध, मदादि शत्रुओं का दमन करने वाला भाव शत्रुघ्न खबर पाकर दसरथ रूपी राजा के पास दौड़कर आए और संकोच करते हुए पूछने लगे कि चिट्ठी कहाँ से आयी है।
दो0 कुसल प्रानप्रिय बंधु दोउ अहहिं केहिं देस।
सुनि सनेह साने बचन बाची बहुरि नरेस।।290।।
व्याख्या : तब पोषण रूपी भरत भाव व शत्रुघ्न भाव पूछने लगे कि हमारे प्राणों से प्रिय दोनों भाई अर्थात् आत्मा रूपी राम व लखन रूपी लक्ष्मण कहाँ किस देश में है और सकुशल तो है ना। प्रेममय वाणी सुनकर दस इन्द्रियों रूपी दसरथ ने पुन: प्राण रूपी जनक की भेजी हुई चिट्ठी पढ़ी अर्थात् निर्मल प्राण से उठने वाले भावों को ग्रहण करने का प्रयास किया।
सुनि पाती पुलके दोउ भ्राता। अधिक सनेहु समात न गाता।।
प्रीति पुनीत भरत कै देखी। सकल सभाँ सुखु लहेउ बिसेषी।।
व्याख्या : प्राण रूपी जनक की चिट्ठी को सुनकर अर्थात् सात्विक भावों के संदेश को सुनकर भरत व शत्रुघ्न रूपी दोनों भाई पुलकित हो उठे और प्रेम अंगों में नहीं समा रहा था। पोषण रूपी भाव के प्रेम को देखकर समस्त भाव रूपी सभा को विशेष सुख प्राप्त हुआ।
तब नृप दूत निकट बैठारे। मधुर मनोहर बचन उचारे।।
भैआ कहहु कुसल दोउ बारे। तुम्ह नीकें निज नयन निहारे।।
व्याख्या : तब दस इन्द्रियों रूपी दसरथ ने प्राण रूपी जनक के सात्विक भाव रूपी दूतों को अपने पास बैठाया और मधुर वचन बोले अर्थात् इन्द्रिय भाव ने प्राण की निर्मलता से उत्पन्न सात्विक भावों को ग्रहण करने का प्रयास किया। जब ध्यान द्वारा व गुरु कृपा द्वारा ज्ञान हो जाता है, तो उसके आचरण की सूक्ष्म शुरूआत होती है। क्योंकि कोई भी ज्ञान अचानक आचरण में नहीं आ पाता है। अत: यहाँ इन्द्रिय भाव धीरे-धीरे आत्म अनुभूति के ज्ञान को ग्रहण करने का प्रयास करता है। उसी को बहुत सूक्ष्म प्रतीकों के माध्यम से यहाँ लिखा गया है। इसलिए प्राण रूपी जनक के दूतों को इन्द्रिय भाव रूपी या स्थूल शरीर भाव रूपी दसरथ मधुर वाणी में पूछता है कि वे दोनों भाव आत्मा रूपी राम और लखन रूपी लक्ष्मण कुशल तो हैं ना? क्या तुमने उन्हें अपनी आँखों से देखा है? अर्थात् स्थूल भाव रूपी दसरथ जानना चाहते हैं कि क्या आत्म तत्व को देखा जा सकता है?
स्यामल गौर धरें धनु भाथा। बय किसोर कौसिक मुनि साथा।।
पहिचानहु तुम्ह कहहु सुभाऊ। प्रेम बिबस पुनि पुनि कह राऊ।।
व्याख्या : वे श्याम व गौरवर्ण हैं तथा इच्छा रूपी धनुष को हाथ में धारण किए हुए हैं अर्थात् इच्छाओं को वश में किए हुए हैं। उनकी अवस्था किशोर है और वे कोशिकाओं से उत्पन्न समता रूपी विश्वामित्र भाव के साथ हैं। अत: तुमने अगर जान लिया है, तो उनके स्वभाव के बारे में बताइये? अर्थात् स्थूल शरीर भाव रूपी दसरथ आत्म तत्व के बारे में जानना चाहता है कि आत्मा की क्या विशेषताएँ हैं? जब दसरथ रूपी भाव आत्मा के प्रेम में लीन होने लग जाता है, तो वह ऐसे प्रश्न बार-बार पूछने लगता है।
जा दिन तें मुनि गए लवाई। तब तें आजु साँचि सुधि पाई।।
कहहु बिदेह कवन बिधि जाने। सुनि प्रिय बचन दूत मुसुकाने।।
व्याख्या : जिस दिन से मन का समता रूपी भाव विश्वामित्र लेकर गए हैं, तब से आज ही हमने सच्ची खबर पाई है अर्थात् प्राण रूपी जनक के दूतों से ही आत्म तत्व के प्रभाव की सही जानकारी मिली है। तब स्थूल भाव रूपी दसरथ पुन: पूछते हैं कि बताइये तो प्राण रूपी जनक ने आत्मा रूपी राम व लखन रूपी लक्ष्मण को कैसे पहचाना? स्थूल भाव रूपी दसरथ के प्रेम भरे वचनों को सुनकर प्राण रूपी जनक के सात्विक भाव रूपी दूत मुस्कुराने लगे।
दो0 सुनहु महीपति मुकुट मनि तुम्ह सम धन्य न कोउ।
रामु लखनु जिन्ह के तनय बिस्व बिभूषन दोउ।।291।।
व्याख्या : हे शरीर के स्वामी (मही पति शरीर रूपी पृथ्वी के स्वामी)! आप भाव रूपी राजाओं के मुकुट की मणि हैं अर्थात् इन्द्रिय भाव समस्त भावों के लिए मणि के समान होता है क्योंकि जिस भी भाव की नजर इन्द्रियों पर पड़ती हैं, वह भाव वैसा ही खींचा चला जाता है। अत: आप धन्य हैं कि आत्मा रूपी राम व लक्षण रूपी लक्ष्मण के भावों का आभास भी आपके द्वारा ही सम्भव होता है। आत्मा रूपी राम व लक्ष्मण को दसरथ पुत्र मानने का कारण यही है कि इन्द्रियों द्वारा ही आत्मा व लक्षणों का आभास हो पाता है। अत: प्राण रूपी जनक के दूत कहते हैं कि आत्मा रूपी राम व लक्ष्मण दसरथ रूपी स्थूल भाव के पुत्र हैं, जो विश्व भूषण अर्थात् समस्त भावों में शिरोमणि हैं।
पूछन जोगु न तनय तुम्हारे। पुरुष सिंघ तिहु पुर उजिआरे।।
जिन्ह के जस प्रताप के आगे। ससि मलीन रबि सीतल लागे।।
व्याख्या : हे दसरथ रूपी राजन! आपके पुत्र पूछने लायक नहीं हैं क्योंकि वे तो पुरुष सिहं तीनों लोकों में प्रकाश करने वाले हैं अर्थात् आत्मा रूपी राम के प्रकाश से ही शरीर रूपी ब्रह्माण्ड के तीनों लोक प्रकाशित होते हैं। अत: उनका वर्णन नहीं किया जा सकता है, इसलिए वे पूछने के योग्य नहीं है। जिन आत्मा रूपी राम के यश व प्रताप के सामने चन्द्रमा मलीन व सूर्य भी शीतल लगने लगता है। यहाँ पर आत्म तत्व की महिमा का वर्णन किया गया है।
तिन्ह कहँ कहिअ नाथ किमि चीन्हे। देखिअ रबि की दीप कर लीन्हे।।
सीय स्वयंबर भूप अनेका। समिटे सुभट एक तें एका।।
व्याख्या : ऐसे आत्मा रूपी राम को कैसे पहचाना जा सकता है? क्या सूरज को कभी दीपक द्वारा देखा जा सकता है? यहाँ पर आत्म तत्व की अगम्यता को बताया गया है। सुरता रूपी सीता का वरण करने के लिए एक से एक भाव रूपी राजा व भाव रूपी योद्धा इकट्ठे हुए थे।
संभु सरासनु काहुँ न टारा। हारे सकल बीर बरिआरा ।।
तीनि लोक महँ जे भटमानी। सभ कै सकति संभु धनु भानी।।
व्याख्या : परन्तु स्वयं के अज्ञान से उत्पन्न अज्ञान रूपी धनुष को कोई भी भाव हिला नहीं पाया और समस्त वीर भावों ने भी हार मान ली। शरीर रूपी ब्रह्माण्ड के तीनों लोकों में जितने भी भाव थे, उन सब भावों की शक्ति को स्वयं के अज्ञान रूपी धनुष ने तोड़ दिया। अर्थात् स्वयं के भ्रम जाल से कोई भाव निकल नहीं पाए।
सकइ उठाइ सरासुर मेरू। सोउ हियँ हारि गयउ करि फेरू।।
जेहिं कौतुक सिव सैल उठावा। सोउ तेहि सभाँ पराभउ पावा।।
व्याख्या : जो भाव (बाणासुर अर्थात् तीव्र इच्छाओं के हजारों भाव) सुमे डिग्री को भी उठा सकता था अर्थात् जो तीव्र इच्छाओं वाला भाव जो कुण्डलिनि शक्ति से प्रवाहित होने वाली ऊर्जा को मेरूदण्ड में उठा देता है, वह भी हार मानकर अज्ञान रूपी धनुष की परिक्रमा करके लौट गया। जो काम रूपी भाव (रावण) खेल ही खेल में विश्वास रूपी पर्वत (कैलाश) को भी उठा देता है, वो भी हार मानकर चला गया।
दो0 तहाँ राम रघुबंसमनि सुनिअ महा महिपाल।
भजेउ चाप प्रयास बिनु जिमि गज पंकज नाल।।292।।
व्याख्या : वहाँ आत्मा रूपी राम ने सुरता रूपी सीता का वरण करने के लिए अज्ञान रूपी धनुष को वैसे ही तोड़ दिया जैसे कोई हाथी कमल की नाल को तोड़ देता है।
सुनि सरोष भृगुनायकु आए। बहुत भाँति तिन्ह आँखि देखाए।।
देखि राम बलु निज धनु दीन्हा। करि बहु बिनय गवनु बन कीन्हा।।
व्याख्या : अज्ञान रूपी धनुष को भंग हुआ जानकर हठ साधना द्वारा प्रकृति को वश में करने वाले परशुराम रूपी भाव आए, जिन्होंने आत्मा रूपी राम को नाना प्रकार से आँखें दिखायी अर्थात् सहज साधना से विचलित करने का प्रयास किया परन्तु आत्मा रूपी राम के बल को देखकर हठ साधना भाव आत्मा रूपी राम के सामने समर्पण करके और बहुत प्रकार से प्रार्थना करके तप करने चले गए अर्थात् परमात्मा में लीन हो गए।
राजन रामु अतुलबल जैसें। तेज निधान लखनु पुनि तैसें।।
कंपहिं भूप बिलोकत जाकें। जिमि गज हरि किसोर के ताकें।।
व्याख्या : हे दसरथ रूपी राजन! आत्मा रूपी राम का अतुलित बल जैसा है, वैसे ही लक्षण रूपी लक्ष्मण का तेज भी है। भाव रूपी राजा जिन्हें देखकर काँपने लगते हैं, जैसे सिंह के बच्चे को देखकर हाथी डरने लगते हैं।
देव देखि तव बालक दोऊ। अब न आँखि तर आवत कोऊ।।
दूत बचन रचना प्रिय लागी। प्रेम प्रताप बीर रस पागी।।
व्याख्या : हे देव! आपके आत्मा रूपी राम व लक्ष्मण को देखने के बाद अब आँखों में और कोई आ ही नहीं रहा है। इस प्रकार प्राण रूपी जनक के सात्विक भाव रूपी दूतों की प्रेम, प्रताप व वीरता के रस से सनी हुई वाणी दसरथ रूपी भाव को बहुत प्रिय लगी।
सभा समेत राउ अनुरागे। दूतन्ह देन निछावरि लागे।।
कहि अनीति ते मूदहिं काना। धरमु बिचारी सबहिं सुखु माना।।
व्याख्या : प्राण रूपी जनक के सात्विक भाव रूपी दूतों की बातें सुनकर दसरथ रूपी भाव बहुत अनुराग से भर गए और सात्विक भावों को भेंट देने लगे अर्थात् सात्विक भावों को भोगों की भेंट देने लगे। तब सात्विक भाव रूपी दूतों ने कान बन्द करके कहा कि यह अनीति है अर्थात् सात्विक भाव कभी भी इन्द्रिय भोगों के सुख में नहीं पड़ते हैं। तब सात्विक भावों की दृढ़ धारणा को (धर्म) समझकर सभी भावों ने बहुत सुख माना।
दो0 तब उठि भूप बसिष्ट कहुँ दीन्हि पत्रिका जाइ।
कथा सुनाई गुरहि सब सादर दूत बोलाइ।।293।।
व्याख्या : तब उस अवस्था में साधक के हृदय में विशिष्ट ज्ञान पैदा हो जाता है। उसीको प्रतीक रूप में वसिष्ठ गुरु के पास दसरथ रूपी भाव द्वारा पत्रिका देना कहा गया है। तब दसरथ रूपी राजा ने विशिष्ट ज्ञान रूपी वसिष्ठ गुरु को दूतों को बुलाकर सब बात बता दी।
सुनि बोले गुर अति सुखु पाई। पुन्य पुरुष कहुँ महि सुख छाई।।
जिमि सरिता सागर महुँ जाहीं। जद्यपि ताहि कामना नाहीं।।
व्याख्या : तब प्राण रूपी जनक के सात्विक भावों रूपी दूतों की बातें सुनकर विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ ने बहुत सुख पाया और बोले कि पुण्यात्मा पुरुष के लिए पृथ्वी सुखों से छाई हुई है। जैसे नदी समुद्र में अपने-आप चली जाती है। जबकि समुद्र को नदी की कामना नहीं रहती हैं।
तिमि सुख संपति बिनहिं बोलाएँ। धरम सील पहिं जाहिं सुभाएँ।।
तुम्ह गुर बिप्र धेनु सुर सेबी। तसि पुनीत कौसल्या देबी।।
व्याख्या : वैसे ही सुख व सम्पत्ति बिना बुलाए ही धर्मात्मा पुरुष के पास सहज में ही आ जाती हैं। हे दसरथ रूपी भाव! तुम तो गुरु, विशुद्ध ज्ञान का प्रकाश, धेनु अर्थात् इन्द्रियों को वश में करने वाले व स्वरों की साधना करने वाले हो और फिर पवित्र सुष्मना नाड़ी रूपी कौशल्या देवी हैं।
सुकृति तुम्ह समान जग माहीं। भयउ न है कोउ होनेउ नाहीं।।
तुम्ह ते अधिक पुन्य बड़ काकें। राजन राम सरिस सुत जाकें।।
व्याख्या : जब इन्द्रियाँ आत्मोन्मुखी हो जाती हैं, तो समस्त कर्म सुकृत हो जाते हैं। अत: उसी को यहाँ विशिष्ट ज्ञान रूपी भाव कहते हैं कि हे दसरथ रूपी राजन! तुम्हारे समान सुकृत करने वाला संसार में कोई नहीं है। न कोई हुआ है और न होने वाला है। हे राजन! जिसके आत्मा रूपी राम जैसा पुत्र है। अत: तुमसे अधिक पुण्यवान संसार में कौन है? अर्थात् जब इन्द्रियों के भाव के द्वारा आत्मा की अनुभूति कर ली है, तो आपसे बड़ा पुण्यात्मा कौन है?
बीर बिनीत धरम ब्रत धारी। गुन सागर बर बालक चारी।।
तुम्ह कहुँ सर्बकाल कल्याना। सजहु बरात बजाइ निसाना।।
व्याख्या : तुम्हारे पुत्र वीर, विनयी और धर्म का व्रत धारण करने वाले व गुणों के समुद्र हैं। अत: सब समय ही तुम्हारा कल्याण है। अर्थात् जब इन्द्रियाँ रूपी दसरथ का भाव परमात्मा में लग जाता है, तो साधक के चित की चार अवस्था रूपी चारों पुत्र सद्गुणों के सागर बन जाते हैं, जिससे सब समय में साधक का कल्याण होता रहता है। इसलिए विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ देह भावों की बरात सजाकर ब्रह्मरन्ध्र रूपी विदेह नगर में जाने की प्रेरणा करते हैं।
दो0 चलहु बेगि सुनि गुरबचन भलेहिं नाथ सि डिग्री नाइ।
भूपति गवने भवन तब दूतन्ह बासु देवाइ।।294।।
व्याख्या : विशिष्ट ज्ञान रूपी भाव ने जल्दी चलने की प्रेरणा करी तो गुरु के वचनों को सुनकर दसरथ रूपी भाव ने सिर झुकाकर कहा कि अच्छा है। तब दसरथ भाव प्राण रूपी जनक के दूतों (सात्विक भावों) को रूकने की व्यवस्था करके इन्द्रियों रूपी दसरथ भाव अपने महल में गया अर्थात् ईड़ा, पिंगला व सुष्मना नाड़ी में दसरथ रूपी राजा पहुँचा।
राजा सबु रनिवास बोलाई। जनक पत्रिका बाचि सुनाई।।
सुनि संदेसु सकल हरषानी। अपर कथा सब भूप बखानी।।
व्याख्या : दसरथ रूपी राजा ने समस्त रनिवास को बुलाकर अर्थात् समस्त नाड़ियों से उत्पन्न भावों को बुलाकर प्राण रूपी जनक के संदेश को सुनाया, तो सब रानियाँ सुनकर बहुत हर्षित हुई। तब दस इन्द्रियों रूपी दसरथ ने ब्रह्मरन्ध्र रूपी विदेह नगर की सब बातों को बताया।
प्रेम प्रफुल्लित राजहिं रानी। मनहुँ सिखिनि सुनि बारिद बानी।।
मुदित असीस देहिं गुर नारी। अति आनंद मगन महतारीं।।
व्याख्या : प्रेम में रानियाँ (नाड़ियाँ) ऐसे प्रफुल्लित हो रही थी, मानों बादलों की गरज सुनकर मोरनी होती है। प्रसन्न होकर ज्ञान का प्रकाश करने वाली नाड़ियाँ आशीर्वाद देने लगी तथा ईड़ा, पिंगला व सुष्मना नाड़ियाँ तो आनन्द में मग्न हो रही थीं।
लेहिं परस्पर अति प्रिय पाती। हृदयँ लगाइ जुड़ावहिं छाती।।
राम लखन कै कीरति करनी। बारहिं बार भूपबर बरनी।।
व्याख्या : प्राण रूपी जनक की प्रेरणा रूपी पवित्र चिट्ठी को परस्पर बार-बार नाड़ियों रूपी रानियाँ लेने लगी अर्थात् ब्रह्मरन्ध्र में जाने की प्रेरणा रूपी भाव परस्पर नाड़ियों में उठने लगे। जिससे नाड़ियाँ रूपी रानियाँ अपनी छाती को शीतल कर रही थी अर्थात् उठने वाले भावों से शीतलता आ रही थी। तब दसरथ रूपी राजा बार-बार आत्मा रूपी राम व लक्षण रूपी लक्ष्मण के गुणों की कीर्ति का बखान करने लगा। अर्थात् देह के स्थूल भाव में भी परमात्मा के प्रति प्रेम व भक्ति पैदा होने लग गयी।
मुनि प्रसादु कहि द्वार सिधाए। रानिन्ह तब महिदेव बोलाए।।
दिए दान आनंद समेता। चले बिप्रबर आसिष देता।।
व्याख्या : ""यह सब मुनि की कृपा है"" कहकर देह का स्थूल भाव रूपी दसरथ द्वार पर आ गए अर्थात् भृकुटि पर आ गए। तब नाड़ियों रूपी रानियों ने शरीर रूपी पृथ्वी के सात्विक भाव रूपी देवों को बुलाया और आनंद के साथ दान देने लगी। तब विशुद्ध ज्ञान का प्रकाश करने वाले (विप्र) भाव आशीर्वाद देते हुए प्रसन्न होकर चले गए।
सो0 जाचक लिए हँकारि दीन्हि निछावरि कोटि बिधि।
चि डिग्री जीवहुँ सुत चारि चक्रवर्ती दसरथ के।।295।।
व्याख्या : तब नाड़ियों रूपी रानियों ने भिक्षुक भावों को बुला लिया अर्थात् मन में चाह रखने वाले भावों को बुला लिया और करोड़ों प्रकार से उन्हें भेंट दी अर्थात् उन्हें नाना प्रकार से शान्त करने का प्रयास किया, जिससे दसरथ रूपी राजा अर्थात् स्थूल शरीर रूपी राजा के चित की चार अवस्था रूपी पुत्र चिरंजीवी रहें। यहाँ वास्तविकता यह है कि जब तक मन में वासना रहती हैं, तब तक चित की चार अवस्था निर्मल नहीं रह पाती हैं, इसलिए भिक्षुक रूपी वासनाओं को शान्त करके ही चित की अवस्थाओं को निर्मल रखा जा सकता है।
कहत चले पहिरें पट नाना। हरषि हने गहगहे निसाना।।
समाचार सब लोगन्ह पाए। लागे घर घर होन बधाए।।
व्याख्या : तब भिक्षु भाव यानी अपेक्षा के भाव नाना प्रकार की इच्छा पूर्ण रूपी वस्त्र पहनकर चले और हर्ष के उल्लास के कारण प्राण की गति में नगाड़ों के बजने की आवाजें आने लगी। तब देह स्थित सभी भाव रूपी लोगों ने खबर पायी तो प्रत्येक अंग-अंग रूपी घर में उत्सव होने लगा।
भुवन चारिदस भरा उछाहू। जनकसुता रघुबीर बिआहू।।
सुनि सुभ कथा लोग अनुरागे। मग गृह गली सँवारन लागे।।
व्याख्या : जब दसरथ रूपी स्थूल शरीर के समस्त भाव भी ब्रह्मरन्ध्र में परमात्मा से मिलने के लिए चलने को तैयार हो जाते हैं, तो चारिदस अर्थात् चार अ दस अर्थात् मन, बुद्धि, चित, अहंकार व दसों इन्द्रियों के भावों में सुरता रूपी सीता व आत्मा रूपी राम के मिलने का उत्साह छा जाता है। ये शुभ मिलन की बातें सुनकर समस्त भाव अनुराग से भर जाते हैं तथा स्वर रूपी रास्ते, कोष रूपी गृह और नाड़ियों रूपी गलियों को सँवारने लगते हैं अर्थात् स्वरों, कोषों और नाड़ियों में निर्मलता छाने लग जाती है।
जद्यपि अवध सदैव सुहावनि। राम पुरी मंगलमय पावनि।।
तदपि प्रीति कै प्रीति सुहाई। मंगल रचना रची बनाई।।
व्याख्या : हालाँकि अवधि रूपी शरीर सदैव सुहावना लगता है परन्तु जब साधक को यह समझ में आ जाता है कि यह आत्मा रूपी राम का घर है, तो यह घर रूपी शरीर मंगलमय व पवित्र हो जाता है। उस अवस्था में यद्यपि साधक का शरीर रूपी अवधि के प्रति मोह होता है परन्तु आत्मा रूपी राम के प्रति प्रेम पैदा हो जाता है। इस प्रकार यह अवधि रूपी शरीर मंगल रचना है। अर्थात् जब आत्मा के प्रति प्रेम हो जाता है, तो यह शरीर ही मंगलमय हो जाता है।
ध्वज पताक पट चामर चारू। छावा परम बिचित्र बजारू।।
कनक कलस तोरन मनि जाला। हरद दूब दधि अच्छतमाला।।
व्याख्या : इस अवधि रूपी शरीर में भावों रूपी बिचित्र बजार सजा हुआ रहता है, जिसमें ध्वजा धारणा, यश रूपी पताका व वृति रूपी चँवर सजे हुए रहते हैं। माया के भावों का जाल बना हुआ होता है और मंगलमय भावों रूपी हल्दी, दूब, दही व अक्षत की माला बनी रहती है।
दो0 मंगलमय निज निज भवन लोगन्ह रचे बनाइ।
बीथीं सींचीं चतुरसम चौकें चा डिग्री पुराइ।।296।।
व्याख्या : सभी भाव रूपी लोगों ने मंगलमय भावों द्वारा अपने कोष रूपी घरों को सजाया हुआ है अर्थात् सभी कोषों में मंगल की भावना भरी हुई है। जब मंगल की भावना प्रबल हो जाती है, तो नाड़ियों रूपी गलियों में भी चतुर सम के चौक अर्थात् जय, रूप, यश व वैभव रूपी चौक पुर जाते हैं।
जहँ तहँ जूथ-जूथ मिलि भामिनि। सजि नव सप्त सकल दुति दामिनि।।
बिधु बदनीं मृग सावक लोचनि। निज सरूप रति मानु बिमोचनि।।
व्याख्या : जब सुरता रूपी सीता व आत्मा रूपी राम के मिलन की अनुभूति देह के भावों को होने लगती है, तो वृतियाँ रूपी सुन्दर स्त्रियाँ समूहों के समूहों में मिलने लगती हैं। उस समय सातों वृतियाँ (वैसे तो सौ वृतियाँ होती हैं परन्तु सात वृतियाँ प्रधान होती हैं इसलिए यहाँ सप्त शब्द आया है) बिजली की सी कान्ति से सजी होती हैं। वे चन्द्रमा के से मुखवाली व हरिन के बच्चे की सी आँखों वाली व निज स्वरूप में रत अहंकार का नाश करने वाली होती हैं। अर्थात् उस समय सात्विक वृतियाँ प्रबल हो जाती हैं।
गावहिं मंगल मंजुल बानीं। सुनि कलरव कलकंठि लजानीं।।
भूप भवन किमि जाइ बखाना। बिस्व बिमोहन रचेउ बिताना।।
व्याख्या : उस समय सात्विक वृतियाँ मंगल व मनोहर भावरूपी गाने गाने लगती हैं, जिससे कोयल भी सुनकर लज्जित हो जाती है अर्थात् निश्छल मधुरता आ जाती है। दस इन्द्रियों रूपी राजा दसरथ अर्थात् स्थूल शरीर के भावों का वर्णन कैसे किया जा सकता है। क्योंकि शरीर का ताना-बाना तो विश्व को मोहित करने वाला है।
मंगल द्रव्य मनोहर नाना। राजत बाजत बिपुल निसाना।।
कतहुँ बिरिद बंदी उच्चरहीं। कतहुँ बेद धुनि भूसुर करहीं।।
व्याख्या : इस स्थूल शरीर में नाना प्रकार के मंगल द्रव्य अर्थात् मंगल के भाव पैदा करने वाले रसायन होते हैं तथा नाना प्रकार के बाजे बजते हैं अर्थात् प्राण की ध्वनि सुनाई पड़ती है। कहीं-कहीं बाजे बजते हैं अर्थात् प्राण की ध्वनि सुनाई पड़ती है। कहीं कहीं प्राण की ध्वनि से वन्दना के भाव उमग रहे हैं, तो कहीं कहीं स्वरों के माध्यम से वेदों की अनुभूति हो रही है।
गावहिं सुंदरि मंगल गीता। लै लै नामु रामु अ डिग्री सीता।।
बहुत उछाहु भवनु अति थोरा। मानहुँ उमगि चला चहु ओरा।।
व्याख्या : सुरता रूपी सीता और आत्मा रूपी राम का नाम लै-लै कर सात्विक इच्छाएँ मंगल गीत गाने लगती हैं, जिससे दसरथ रूपी स्थूल शरीर में बहुत उत्साह छा जाता है और ऐसा लगने लगता है जैसे उत्साह व आनन्द चारों तरफ उमड़ कर बहने लगा हो।
दो0 सोभा दसरथ भवन कइ को कबि बरनै पार।
जहाँ सकल सुर सीस मनि राम लीन्ह अवतार।।297।।
व्याख्या : दस इन्द्रियों रूपी दसरथ के भावों की शोभा का वर्णन कौन कवि कर सकता है? वो भी उस अवस्था में जब ब्रह्मरन्ध्र में सुरता रूपी सीता और आत्मा रूपी राम का मिलन हो जाने से आत्मा रूपी राम का हृदय में अवतरण हो जाता है। अर्थात् जब हृदय में परमात्मा का अवतरण हो जाता है, तो स्थूल शरीर भी निर्मल होकर शोभायमान हो जाता है।
भूप भरत पुनि लिए बोलाई। हय गय स्यंदन साजहु जाई।।
चलहु बेगि रघुबीर बराता। सुनत पुलक पूरे दोउ भ्राता।।
व्याख्या : फिर दसरथ रूपी स्थूल शरीर के भाव ने पोषण रूपी भरत भाव को बुला लिया और मन रूपी हाथी व इन्द्रियों रूपी घोड़ों के रथ को सजाने के लिए कहा और जल्दी आत्मा रूपी राम की बारात में ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर में चलने के लिए कहा, तो इसे सुनकर पोषण रूपी भरत व कामादि शत्रुओं का दमन करने वाले शत्रुघन बहुत प्रसन्न हुए।
भरत सकल साहनी बोलाए। आयसु दीन्ह मुदित उठि धाए।।
रचि रूचि जीन तुरग तिन्ह साजे। बरन बरन बर बाजि बिराजे।।
व्याख्या : तब पोषण रूपी भरत भाव ने इन्द्रिय रूपी घोड़ों को सम्भालने वाले संयम रूपी साहनी बुलाए और इन्द्रिय रूपी घोड़ों को सजाने की आज्ञा दी। आज्ञा पाकर संयम रूपी साहनी बहुत प्रसन्न होते हुए चले। तब संयम रूपी साहनियों ने अपनी-अपनी रूचि अर्थात् वृतियों के अनुसार इन्द्रियों रूपी घोड़ों को सजाना शु डिग्री कर दिया। उस अवस्था में नाना रंग अर्थात् नाना वृतियों के घोड़े हो गए।
सुभग सकल सुठि चंचल करनी। अय इव जरत धरत पग धरनी।।
नाना जाति न जाहिं बखाने। निदरि पवनु जनु चहत उड़ाने।।
व्याख्या : सभी इन्द्रिय रूपी घोड़े सुभग अर्थात् सद्वृति वाले, सुन्दर व चंचल थे। वे शरीर रूपी धरती पर ऐसे पैर रख रहे थे मानों जलते हुए लोहे पर रख रहे हों। जब साधक की साधना परिपक्व हो आती है तो इन्द्रियों रूपी घोड़ों को भी शरीर रूपी धरती की वासनाएँ तपते हुए लोहे जैसे ही लगने लग जाती हैं। उन इन्द्रियों रूपी घोड़ों की सब वृतियों (जाति) का वर्णन नहीं किया जा सकता है क्योंकि उस समय तो प्राण वायु का भी निरादर करके ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर के लिए मानों उड़ना चाह रहे हों ऐसा लगने लगता है।
तिन्ह सब छयल भए असवारा। भरत सरिस बय राजकुमारा।।
सब सुंदर सब भूषनधारी। कर सर चाप तून कटि भारी।।
व्याख्या : उन सभी इन्द्रिय रूपी घोड़ों पर पोषण रूपी भरत जैसे भाव रूपी राजकुमार ही सवार हुए, जो सब प्रकार से सुन्दर व सद्गुण रूपी आभूषणों को धारण किये हुए थे तथा संयम के द्वारा स्वरों से उत्पन्न इच्छाओं को दबाए हुए थे। अर्थात् जब देह भाव भी ब्रह्मरन्ध्र के लिए चलना शु डिग्री कर देते हैं, तो संयम के द्वारा साधक की सब इच्छाएँ वश में रहने लगती हैं और इच्छाएँ उर्ध्वगामी नहीं होकर कमर तक ही रूक जाती हैं। उसे ही कमर में भारी तरकस का बाँधना बताया गया है।
दो0 छरे छबीले छयल सब सूर सुजान नबीन।
जुग पदचर असवार प्रति जे असिकला प्रबीन।।298।।
व्याख्या : जो संयम के नाना भाव रूपी छबीले स्वरों की गति को वश में करने में पारंगत थे, जो कदम-कदम पर स्वरों से उठने वाले भावों को संयमित कर रहे थे तथा भावों के बनने वाले जाल को काटने के लिए संयम रूपी तलवार की कला में पारंगत थे।
बाँधे बिरद बीर रन गाढ़े। निकसि भए पुर बाहेर ठाढ़े।।
फेरहिं चतुर तुरग गति नाना। हरषहिं सुनि सुनि पनव निसाना।।
व्याख्या : तब ध्यान की अवस्था में देह के संयमादि भाव रूप हाथी मन व इन्द्रियों रूपी घोड़ों को लेकर भृकुटि अर्थात् शरीर रूपी नगर से बाहर आ जाते हैं। भृकुटि पर ध्यान में इसे अच्छी तरह से समझा जा सकता है। ये सब संयम मन व इन्द्रियादि के भाव भृकुटि पर आकर खड़े हो जाते हैं। ये भाव स्वयं के बल से आगे नहीं बढ़ पाते हैं, इसलिए ये भृकुटि पर ही खड़े हो जाते हैं और इन्द्रियादि घोड़ों को नाना प्रकार से फेरते हैं तथा प्राण की ध्वनि से उठने वाली नगाड़ों जैसी आवाज को सुनकर प्रसन्न होते रहते हैं।
रथ सारथिन्ह बिचित्र बनाए। ध्वज पताक मनि भूषन लाए।।
चँवर चा डिग्री किंकिनि धुनी करहीं। भानु जान सोभा अपहरहीं।।
व्याख्या : संयम रूपी सारथियों ने धारणा रूपी पताका और मन के सात्विक भाव रूपी आभूषण लगाकर इन्द्रियों रूपी रथों को विचित्र (विचित्र का तात्पर्य है वि अ चित्र अर्थात् ऐसी दृष्टि हो जाना जिससे विशुद्ध दृश्य दिखायी पड़े यानी किसी भी दृश्य के पीछे आसक्ति न हो सके) बना दिया, जिससे इन्द्रियों को किसी विषय की आसक्ति नहीं हो। उस ध्यान की अवस्था में प्राण की गति की आवाज मधुर-मधुर ध्वनि के रूप में आने लगती है। उसे ही सुंदर चँवरों की ध्वनि कहा गया है। उस समय इन्द्रियों रूपी घोड़े ऐसे सुशोभित लगने लगते हैं, मानों सूर्य के घोड़ों की शोभा का भी हरण कर रहे हों।
सावँकरन अगनित हय होते। ते तिन्ह रथन्ह सारथिन्ह जोते।।
सुंदर सकल अलंकृत सोहे। जिन्हहि बिलोकत मुनि मन मोहे।।
व्याख्या : जब ध्यान में समस्त भाव शान्त होने लग जाते हैं, तो प्राण के प्रवाह की ध्वनि साँव-साँव करके सुनाई पड़ने लग जाती है। उस साँव-साँव की अवस्था में अनेक भाव रूपी घोड़े पैदा होते हैं, जो सात्विक वृति के होते हैं। चतुर सारथियों ने उन्हीं सात्विक भाव रूपी घोड़ों को इन्द्रियों रूपी रथ में जोत दिया। वे सात्विक भाव रूपी घोड़े बहुत सुंदर व अलंकारों से सजे हुए थे। जिन्हें देखकर मुनियों के मन भी मोहित हो जाते हैं।
जे जल जलहिं थलहि की नाईं। टाप न बूड़ बेग अधिकाई।।
अस्त्र सस्त्र सबु साजु बनाई। रथी सारथिन्ह लिए बोलाई।।
व्याख्या : वे सात्विक भाव रूपी घोड़े जल पर अर्थात् ध्यान की गहन अवस्था में भी वैसे ही चलते हैं, जैसे देहभाव की अवस्था में चलते हैं, क्योंकि उनके चलने की गति बहुत तीव्र होती है। अर्थात् भाव रूपी घोड़ों की चाल को पकड़ना बहुत मुश्किल काम है। सात्विक भाव रूपी सारथियों ने नियम संयम रूपी अस्त्र-शस्त्रों को धारण करके रथियों को अर्थात् इन्द्रियों के भावों को बुला लिया।
दो0 चढ़ि चढ़ि रथ बाहेर नगर लागी जुरन बरात।
होत सगुन सुंदर सबहि जो जेहि कारज जात।।299।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में इन्द्रियों रूपी रथ पर चढ़-चढ़ कर भाव रूपी बरात भृकुटि पर अवधी रूपी देह नगर से बाहर जुड़ने लगी। उस समय भावों की ऐसी अवस्था आ जाती है कि सभी सगुन अर्थात् सात्विक गुण सुंदर हो जाते हैं। क्योंकि सभी भाव रूपी बारात तो ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर में आत्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता के मिलन समारोह में जाना चाहते हैं। इसलिए वासना रहित सब गुण सुंदर व सुखद ही लगने लगते हैं।
कलित करि बरन्हि पारीं अँबारी। कहि न जाहिं जेहि भाँति सँवारी।।
चले मत्त गज घंट बिराजी। मनहुँ सुभग सावन घन राजी।।
व्याख्या : जब ध्यान में देह के सब भाव भृकुटि पर इकट्ठे हो जाते हैं, तो ध्यान उर्ध्वगामी होने लगता है और मन रूपी हाथी पर सुन्दर अंबारियाँ पड़ी हुई सी लगती हैं अर्थात् ध्यान में एक स्पष्ट रेखा सी बनने लग जाती है और नर-नाड़ी की धड़कन की घण्टी स्पष्ट सुनाई पड़ने लगती है, जिसे सुनकर मन रूपी हाथी मतवाला होकर ब्रह्मरन्ध्र की तरफ चलने लगता है। उस समय भावों की व्यवस्था इतनी सुखद लगने लगती है मानों श्रावण के महीने में बादलों का समूह चल रहा हो। अर्थात् सुभग यानी अच्छी प्रकृति के भाव बिना तनाव व उलझन के उर्ध्वगामी होने लगते हैं।
बाहन अपर अनेक बिधाना। सिबिका सुभग सुखासन जाना।।
तिन्ह चढ़ि चले बिप्रबर बृंदा। जनु तनु धरें सकल श्रुति छंदा।।
व्याख्या : जब भाव प्रकृति से परे (अपर) होने लगते हैं, तो अनेक विधान होते हैं अर्थात् रास्ते होते हैं। साधना में उन्हीं सात्विक भाव रूपी सुखासनों पर ही विशुद्ध ज्ञान का प्रकाश करने वाले भाव चढ़कर चलते हैं। तब ऐसा लगता है मानों वेदों के छन्द अर्थात् वेदों की अनुभूति हो रही हो।
मागध सूत बंदि गुनगायक। चले जान चढ़ि जो जेहि लायक।।
बेसर ऊँट बृषभ बहु जाती। चले बस्तु भरि अगनित भाँति।।
व्याख्या : उस समय ध्यान की अवस्था में मागध (मन में कुछ चाह रखने वाले भाव) सूत (लग्न वाले भाव) बंदि (वन्दना करने वाले भाव) व परमात्मा के गुण गाने वाले भाव अपने-अपने अनुसार वाहनों पर चढ़कर चले। बहुत प्रकार के खच्चर रूपी (मंद) भाव, ऊँट अर्थात् दिखावे वाले भाव और वृषभ अर्थात् वासनाओं को बल देने वाले भाव बहुत प्रकार की अगनित इच्छाओं के भावों को लाद कर चले।
कोटिन्ह काँवरि चले कहारा। बिबिध बस्तु को बरनै पारा।।
चले सकल सेवक समुदाई। निज-निज साजु समाजु बनाई।।
व्याख्या : कहार रूपी संग्रहादि के भाव भी करोड़ों प्रकार से संग्रह की वृतियाँ (काँवर) लेकर बहुत सी विषय रूपी वस्तुओं को भर कर चले। सेवा भाव वाले भाव भी समूहों में अपने अपने समाज अर्थात् भाव वृति के अनुसार चले। वास्तव में जब ध्यान ब्रह्मरन्ध्र की तरफ बढ़ने लगता है तो सभी प्रकार के भाव भी ध्यान में सात्विक भावों के साथ उर्ध्वगामी होकर ब्रह्मरन्ध्र में पहुँचने लगते हैं। उन्हीं की सूक्ष्म अनुभूति को यहाँ नाना प्रतीकों के माध्यम से लिखा गया है।
दो0 सब कें उर निर्भर हरषु पूरित पुलक सरीर।
कबहिं देखिबे नयन भरि रामु लखनु दोउ बीर।।300।।
व्याख्या : सभी भावों के हृदय में अपार हर्ष है व शरीर पुलकित हो रहा है तथा सबके मन में एक ही लालसा है कि आत्मा रूपी राम व लक्षण रूपी लक्ष्मण को कब आँखों से देखेंगे।
गरजहिं गज घंटा धुनि घोरा। रथ रव बाजि हिंस चहु ओरा।।
निदरि घनहि घुर्म्मरहिं निसाना। निज पराइ कछु सुनिअ न काना।।
व्याख्या : मन रूपी हाथी गरजने लगता है तथा नर-नाड़ी की धड़कन की ध्वनि घण्टे की तरह गूँजने लगती है तथा इन्द्रियों रूपी रथ और भाव रूपी घोड़े चारों तरफ हिनहिना रहे हैं। बादलों की गरजना का भी निरादर करने वाली नगाड़ों की गरजना होने लगती है अर्थात् अनहद नाद की ध्वनि स्पष्ट होने लग जाती है, जिससे माया के भावों की आवाज सुनाई पड़ना बन्द हो गयी। अर्थात् मन रूपी हाथी अनहद की नाद में मस्त हो गया, जिससे और कुछ सुनायी पड़ना ही बन्द हो गया।
महा भीर भूपति के द्वारें। रज होइ जाइ पषान पबारें।।
चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नारीं। लिएँ आरती मंगल थारीं।।
व्याख्या : भूपति अर्थात् भावों के पति से तात्पर्य भृकुटि से होता है क्योंकि जब ध्यान भृकुटि में स्थिर होने लगता है, तो समस्त भावों की भीड़ वहाँ जमा हो जाती है और उस समय अगर कोई कठोरता (पत्थर) रूपी भाव भी अगर वहाँ उठता है तो वह निर्मल हो जाता है। उस अवस्था में देह स्थित नाड़ियाँ भी उर्ध्वगामी हो उठती हैं और मंगल भावों का प्रवाह करने लगती हैं।
गावहिं गीत मनोहर नाना। अति आनंदु न जाइ बखाना।।
तब सुमंत्र दुइ स्यंदन साजी। जोते रबि हय निंदक बाजी।।
व्याख्या : तब भावों में मनोहर गीत गाने के भाव उठने लगते हैं अर्थात् परमात्मा की स्तुति के नाना भाव उठने लगते हैं और बहुत आनन्द छा जाता है, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। तब दसरथ रूपी स्थूल भाव के सुमंत अर्थात् सात्विक मंत्रणा रूपी भाव ने लग्न और उत्साह रूपी दो सुन्दर रथ सजाए और उनमें सूर्य के घोड़ों को भी लजाने वाले ज्ञान व वैराग्य रूपी घोड़े जोते।
दोउ रथ रूचिर भूप पहिं आने। नहिं सारद पहिं जाहिं बखाने।।
राज समाजु एक रथ साजा। दूसर तेज पुंज अति भ्राजा।।
व्याख्या : सुमंत रूपी सुमंत्रणा के भाव ने दोनों उत्साह व लग्न रूपी रथों को दसरथ रूपी राजा के पास लाकर खड़ा कर दिया। जिनकी सुन्दरता का वर्णन सरस्वती भी नहीं कर सकती हैं। एक रथ पर भाव रूपी सामान सजाया गया और दूसरा जो तेज पुंज रूपी रथ था अर्थात् परमात्मा से मिलने की लग्न का भाव था।
दो0 तेहिं रथ रूचिर बसिष्ठ कहुँ हरषि चढ़ाइ नरेसु।
आपु चढ़ेउ स्यंदन सुमिरि हर गुर गौरि गनेसु।।301।।
व्याख्या : उस दिव्य तेज वाले रथ पर विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु वसिष्ठ को चढ़ाकर स्वयं दस इन्द्रियों रूपी दसरथ भाव हर यानी माया के भावों का हरण करके, गुरु यानी ज्ञान के प्रकाश का आभास करके, गौरि अर्थात् विषय वासनाओं से मुक्त (गौ अ अरि उ गौरि) इन्द्रियों व गुणों को पैदा करने वाले ईश्वर को याद करके रथ पर चढ़ गए।
सहित वसिष्ठ सोह नृप कैसें। सुर गुर संग पुरंदर जैसें।।
करि कुल रीति बेद बिधि राऊ। देखि सबहि भाँति बनाऊ।।
व्याख्या : विशिष्ट ज्ञान रूपी वसिष्ठ गुरु के साथ दसरथ रूपी स्थूल शरीर का भाव ऐसे सुशोभित हो रहा था, जैसे अन्त:करण को प्रकाशित करनेवाले गुरु के साथ चित रूपी इन्द्र शोभा पाता है। तब दसरथ रूपी राजा ने कुल की रीति और वेद क्रिया करके तथा सबको सजा हुआ देखकर।
सुमिरि रामु गुर आयसु पाई। चले महीपति संख बजाई।।
हरषे बिबुध बिलोकि बराता। बरषहिं सुमन सुमंगल दाता।।
व्याख्या : दसरथ रूपी राजा विशिष्ट ज्ञान रूपी वसिष्ठ की आज्ञा पाकर व आत्मा रूपी राम का स्मरण करके शंख ध्वनि करते हुए चले अर्थात् मंगल की भावना से युक्त होकर दसरथ रूपी राजा समस्त भाव रूपी बारात के साथ रवाना हो गए। भाव रूपी बारात को देखकर विशुद्ध देव रूपी भाव बहुत हर्षित हुए और मन में अच्छे भावों की बरसात होने लग गयी, जो मंगल को करने वाली थी।
भयउ कोलाहल हय गय गाजे। ब्योम बरात बाजने बाजे।।
सुर नर नारि सुमंगल गाईं। सरस राज बाजहिं सहनाईं।।
व्याख्या : जब भाव रूपी बारात ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर के लिए चल दी तो मन रूपी हाथी और इन्द्रियों रूपी घोड़ों के भाव गरजने लगे तथा मस्तिष्क रूपी आकाश और भाव रूपी बाजे बजने लग गए तथा चारों तरफ प्राण की ध्वनि में कोलाहल मच गया। उस अवस्था में समस्त स्वर, नर व नाड़ियों में मंगल के भावों का प्रवाह होना शु डिग्री हो जाता है। उसी अवस्था को मंगल गान करना बताया गया है। उस समय जब ध्यान गहरा होने लगता है, तो साधक को शहनाई की सरस आवाज सुनाई देती है।
घंट घंट धुनि बरनि न जाहीं। सरव करहिं पाइक फहराहीं।।
करहिं बिदूषक कौतुक नाना। हास कुसल कल गान सुजाना।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में अनहद नाद की ध्वनि का वर्णन नहीं किया जा सकता है। उस समय ऐसा लगने लगता है जैसे कमल नाल में सरव अर्थात् सं स की आवाज आने लगती है तथा धड़कन उछल-उछल कर चलने लगती है। उसी को पाइक फहराहीं बोलकर लिखा गया है, जो विदूषक भाव हैं अर्थात् जो विषयों रस में निपुण हैं और हँसी करने में कुशल होते हैं, वे देह भाव के गुण गान करते हैं। यहाँ गहराई से समझने की आवश्यकता है क्योंकि जो विषय रस में निपुण भाव होते हैं, वे भी ध्यान में उर्ध्वगामी होकर ब्रह्मरन्ध्र में पहुँचने लग जाते हैं, परन्तु वे अपने स्वभाव को नहीं छोड़ते हैं और बार-बार स्थूल देह का गुणगान करते रहते हैं। ऐसे भावों के मर्म को ध्यान में साधक स्वयं ही अच्छी तरह समझ सकता है।
दो0 तुरग नचावहिं कुअँर बर अकनि मृदंग निसान।
नागर नट चितवहिं चकित डगहिं न ताल बँधान।।302।।
व्याख्या : भाव रूपी राजकुमार मन रूपी घोड़ों को अनहद की आवाज पर नचाने लगते हैं अर्थात् अनहद नाद में मन लीन होने लग जाता है। तब उस अवस्था में नाग प्राण वायु से उत्पन्न भाव भी अनहद नाद की ध्वनि को चितवत अर्थात् एकटक लगाकर देखने लगते हैं। कहने का तात्पर्य है कि सभी भाव अनहद नाद की ध्वनि में समाने लग जाते हैं।
बनइ न बरनत बनी बराता। होहिं सगुन सुंदर सुभदाता।।
चारा चाषु बाम दिसि लेई। मनहुँ सकल मंगल कहि देई।।
व्याख्या : भाव रूपी बारात का वर्णन नहीं किया जा सकता है। परन्तु भावों की बारात को देखकर शुभ शकुन होने लग गए अर्थात जब भाव ब्रह्मरन्ध्र में चढ़ने लगते हैं, तो प्रकृति अनुकूल होकर शुभ शकुन के फल देने लग जाती है। उस अवस्था में विषय वासनाओं के भाव बायीं तरफ हो जाते हैं अर्थात् विषयों का त्याग हो जाता है, जो मंगल के आगमन का सूचक होता है।
दाहिन काग सुखेत सुहावा। नकुल दरसु सब काहूँ पावा।।
सानुकूल बह त्रिबिध बयारी। सघट सबाल आव बर नारी।।
व्याख्या : दाहिन काग अर्थात् दायें स्वरों में ध्यान दृढ़ होकर उर्ध्वगामी होने लग जाता है, तब क्षेत्र रूपी शरीर निर्मल हो जाता है और तब नकुल अर्थात् न अ कुल उ यानी विषयों के कुल (आसक्ति) से साधक मुक्त होने लग जाता है। उस विषय मुक्त अवस्था का अनुभव सभी भाव करने लगते हैं।
लोवा फिरि फिरि दरसु देखावा। सुरभी सनमुख सिसुहि पिआवा।।
मृगमाला फिरि दाहिनि आई। मंगल गन जनु दीन्हि देखाई।।
व्याख्या : विषयों से मुक्त होने के भाव बार-बार उठने लगते हैं। यहाँ नेवला निरासक्ति का प्रतीक है क्योंकि जैसे नेवला विषय रूपी सर्प को मार देता है। वैसे ही ध्यान में विषयों से विरक्ति का भाव उठने लगता है। इसलिए उसे ही नेवला के प्रतीक के रूप में लिखा गया है। उस अवस्था में सुरभी अर्थात् इन्द्रियाँ निर्मल होकर निर्मल भाव रूपी दूध भाव रूपी बछड़ों को पिलाने लगती है। फिर मृगमाला अर्थात् इच्छाओं के भाव दाहिने आ गए अर्थात् अनुकूल हो गए। जिससे मंगल करने के गुण लक्षित होने लग जाते हैं।
छेमकरी कह छेम बिसेषी। स्यामा बाम सुत डिग्री पर देखी।।
सनमुख आयउ दधि अ डिग्री मीना। कर पुस्तक दुइ बिप्र प्रबीना।।
व्याख्या : क्षेमकरी अर्थात् कल्याण करने वाले भाव विशेष कल्याण करने लगते हैं और श्यामा अर्थात् वासनाओं की लालसा रूपी श्यामा पक्षी भी सुत डिग्री अर्थात् सात्विकता रूपी पेड़ पर दिखायी देने लगती है। उस अवस्था में शुभ करने वाले दही रूपी भाव व मछली की तरह मन की शुभ इच्छाएँ सामने आने लगती हैं। तब विशुद्ध ज्ञान के भाव का भी प्रकाश होने लगता है और ज्ञान की अनुभूति होने लगती है। उसे ही पुस्तक हाथ में लिए ब्राह्मण बताया गया है।
दो0 मंगलमय कल्यानमय अभिमत फल दातार।
जनु सब साचे होन हित भए सगुन एक बार।।303।।
व्याख्या : उस ध्यान की अवस्था में मंगलमय, कल्याणमय व मनोवांछित फल देने वाले शकुन सच्चे होने के लिए सब एक बार ही होने लगे।
मंगल सगुन सुगम सब ताकें। सगुन ब्रह्म सुंदर सुत जाकें।।
राम सरिस ब डिग्री दुलहिनि सीता। समधी दसरथु जनकु पुनीता।।
व्याख्या : उसी साधक को मंगलमय शकुन सुगम होते हैं, जिसके सगुण ब्रह्म अर्थात् समस्त भाव निर्मल व ब्रह्म के चिंतन करने वाले होते हैं। तब आत्मा रूपी राम जैसा वर व सुरता रूपी सीता जैसी दुल्हन होती है और दस इन्द्रियों रूपी दसरथ व निर्मल प्राण रूपी जनक जैसा समधी होते हैं, तो सभी शकुन शुभदायक व मंगलकारी हो जाते हैं।
सुनि अस ब्याहु सगुन सब नाचे। अब कीन्हे बिरंचि हम साँचे।।
एहि बिधि कीन्ह बरात पयाना। हय गय गाजहिं हने निसाना।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता के मिलन रूपी विवाह होने पर तो सभी शुभकारक शकुन स्वत: ही नाचने लग जाते हैं क्योंकि यही भावों की विधि (क्रिया) का विधान होता है। क्योंकि जब सुरता आत्मा में लीन होती है, तो भावों में निर्मलता आ जाती है और जैसे भाव वैसे ही प्रकृति में शकुन होने लग जाते हैं। इस प्रकार भाव रूपी बारात ने ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर के लिए प्रस्थान किया, तो मन रूपी हाथी व इन्द्रियों रूपी घोड़े गरजने लगे और अनहद नाद की ध्वनि सुनाई पड़ने लगी।
आवत जानि भानुकुल केतू। सरितन्हि जनक बँधाए सेतू।।
बीच बीच बर बास बनाए। सुरपुर सरिस संपदा छाए।।
व्याख्या : भानुकूल केतू का गहरा अर्थ होता है। आत्मा को प्रतीक के रूप में सूर्य कहा जाता है और जीवात्मा को भानुकूल अर्थात् आत्मा से उत्पन्न कहा जाता है। इन्द्रियाँ ही जीवात्मा के लिए केतू ग्रह का काम करती हैं। अत: दस इन्द्रियों रूपी दसरथ को भानुकूल केतू बोला गया है। जब प्राण रूपी जनक ने समाचार पाए कि दसरथ रूपी भानुकूल केतु ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर में भाव रूपी बारात लेकर आ रहे हैं, तो भाव रूपी बारात कहीं भोग रूपी नदियों में नहीं बह जाए, इसलिए संयम रूपी पुल बँधवा दिए। बीच-बीच में नियम रूपी आवास बनवा दिए, जिससे भाव रूपी बारात सहजता के साथ ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर में पहुँच सके।
असन सयन बर बसन सुहाए। पावहिं सब निज निज मन भाए।।
नित नूतन सुख लखि अनुकूले। सकल बरातिन्ह मंदिर भूले।।
व्याख्या : वहाँ भाव रूपी बारातियों को अपनी भावना के अनुसार भाव रूपी भोजन व वसन मिले तथा नित्य नये सुख की अनुभूति करने से भाव अपने आपको भूलने लग गए। अर्थात् भाव वासनाओं को विस्मृत करके परमात्मा के चिन्तन का नित्य नया सुख लेने लग जाते हैं।
दो0 आवत जानि बारात बर सुनि गहगहे निसान।
सजि गज रथ पदचर तुरग लेन चले अगवान।।304।।
व्याख्या : जब ध्यान में ब्रह्मरन्ध्र के भावों को देह भावों रूपी बारात के आगमन की खबर मिलती है, तो ब्रह्मरन्ध्र से भाव रूपी बारात को लाने के लिए तरंगे सी उठने लगती हैं और भावों को ब्रह्मरन्ध्र में आकर्षित करने लगती हैं। उसी अवस्था को समझाने के लिए हाथी, रथ, पैदल व घोड़े सजाकर बारात को लाने की बात कही गयी है। इस भाव अनुभूति को ध्यान की अवस्था में ही अच्छी तरह समझा जा सकता है।
।। मासपरायण, दसवाँ विश्राम।।
कनक कलस भरि कोपर थारा। भाजन ललित अनेक प्रकारा।।
भरे सुधा सम सब पकवाने। नाना भाँति न जाहिं बखाने।।
व्याख्या : ब्रह्मरन्ध्र में ध्यान पहुँचने पर देह भाव और ब्रह्मरन्ध्र के भावों का जब मिलन होने लगता है, तो नाना प्रकार की अनुभूतियाँ होने लगती हैं तथा नाना प्रकार की नवीन इच्छाओं के भावों का आविर्भाव होने लगता है। तब सात्विक इच्छाएँ ऐसे लगने लगती हैं, जैसे सोने के कलश व ताँबे के थालों में नाना प्रकार के भाव रूपी व्यंजन भरे हों। अमृत तुल्य उन भाव रूपी पकवानों का वर्णन नहीं किया जा सकता है।
फल अनेक बर बस्तु सुहाई। हरषि भेंट हित भूप पठाई।।
भूषन बसन महामनि नाना। खग मृग हय गय बहुबिधि जाना।।
व्याख्या : उत्तम फल जैसी अनेक वस्तुएँ हर्षपूर्वक प्राण रूपी जनक ने भेजी अर्थात् नाना प्रकार के सात्विक फलों की अभिलाषा रूपी भेंट भेजी, जिसमें उत्तम भाव रूपी भूषण, महामनि अर्थात धीर मन के नाना भाव थे और पक्षी, हरिण, घोड़े, हाथी रूपी भावों की नाना भेंट थी। पक्षी आदि ब्रह्मरन्ध्र से नाना प्रकार की उठने वाली तरंगों के प्रतीक होते हैं।
मंगल सगुन सुगंध सुहाए। बहुत भाँति महिपाल पठाए।।
दधि चिउरा उपहार अपारा। भरि भरि काँवरि चले कहारा।।
व्याख्या : प्राण रूपी जनक ने मंगल भावों वाले सुगंधित गुणों की तरंगों को भेजा और दही, चिउड़ा रूपी उपहार भेजे यानी संतोष के भाव रूपी उपहार भेजे जिन्हें काँवर वाले कहार लेकर चले।
अगवानन्ह जब दीखि बराता। उर आनंदु पुलक भर गाता।।
देखि बनाव सहित अगवाना। मुदित बरातिन्ह हने निसाना।।
व्याख्या : जब ब्रह्मरन्ध्र से उठने वाली सूक्ष्म तरंगों रूपी अगवानों को भाव रूपी बारात दिखायी पड़ी, तो हृदय में आनन्द छा गया और शरीर पुलकित हो उठा। उधर को ब्रह्मरन्ध्र से उठने वाली तरंगों को देखकर भाव रूपी बारातियों ने प्रसन्न होकर नगाड़े बजाने शु डिग्री कर दिए। अर्थात् जब भाव ब्रह्मरन्ध्र की तरंगों के सम्पर्क में आते हैं, तो भाव निर्मल होने लग जाते हैं और प्राण के प्रवाह की ध्वनि स्पष्ट होने लग जाती है। उसी प्राण की ध्वनि के स्पष्ट हो जाने को नगाड़ा बजाना कहते हैं।
दो0 हरषि परसपर मिलन हित कछुक चले बगमेल।
जनु आनंद समुद्र दुइ मिलत बिहाइ सुबेल।।305।।
व्याख्या : जब ब्रह्मरन्ध्र के भाव रूपी अगवानों और देह भाव रूपी बारातियों का परस्पर मिलन होता है, तो ऐसे दौड़कर चले मानों दो आनन्द रूपी समुद्र मर्यादाओं को छोड़कर मिल रहे हो।
बरषि सुमन सुर सुंदरि गावहिं। मुदित देव दुंदुभी बजावहिं।।
बस्तु सकल राखीं नृप आगें। बिनय कीन्हि तिन्ह अति अनुरागें।।
व्याख्या : उस अवस्था में स्वरों में चलने वाली सूक्ष्म नाड़ियाँ सात्विक भावों की वर्षा करने लग जाती हैं और देव भाव प्रसन्न होकर नगाड़े बजाने लग जाते हैं। तब अगवानी में आए हुए भावों ने समस्त वस्तुएँ दस इन्द्रियों रूपी दसरथ के सामने रख दी और बहुत अनुराग के साथ विनय करी।
प्रेम समेत रायँ सबु लीन्हा। भै बकसीस जाचकन्हि दीन्हा।।
करि पूजा मान्यता बड़ाई। जनवासे कहुँ चले लवाई।।
व्याख्या : तब दसरथ रूपी राजा ने प्रेमपूर्वक ब्रह्मरन्ध्र के भावों के अनुराग को स्वीकार कर लिया और कामना वाली इच्छाओं को त्याग करना शु डिग्री कर दिया। क्योंकि जब परमात्मा के प्रति प्रेम बढ़ने लगता है तो कामनाएँ शान्त होने लग जाती हैं। उसी को बकसीस करना कहा जाता है। फिर अगवान रूपी भाव दसरथ रूपी राजा व भाव रूपी बारात को जनवासे में ले चले अर्थात् ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर में ले चले। जहाँ पर भक्ति के भावों का निवास होता है, उसी को जनवासा कहा जाता है। जहाँ पर प्रेम व अनुराग के भाव उमगते रहते हैं।
बसन बिचित्र पाँवड़े परहीं। देखि धनदु धन मदु परिहरहीं।।
अति सुंदर दीन्हेउ जनवासा। जहँ सब कहुँ सब भाँति सुपासा।।
व्याख्या : ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर में बसन बिचित्र अर्थात् ऐसी वासनाएँ जिन्हें देखा नहीं जा सकता है, के पाँवड़े पड़ गए अर्थात् अति सुखद निरासक्ति वाली इच्छाएँ साधक के सामने समर्पित हो गयी। यह अवस्था ही सिद्धियों की प्राप्ति की अवस्था कहलाती है। उन निरासक्त वासनाओं को देखकर धनदु धन अर्थात् कुबेर के धन का मद भी दूर हो जाए। ब्रह्मरन्ध्र के अगवानों ने अति सुन्दर जनवासा दिया अर्थात् परम सुखद भक्ति के भावों का स्थान दिया। जहाँ पर सभी देह भावों को अपनी इच्छानुसार सब सुविधाएँ मिल रही थी। अर्थात् सभी भाव रूपी बाराती सहज संतुष्ट थे।
जानी सियँ बरात पुर आई। कछु निज महिमा प्रगटि जनाई।।
हृदयँ सुमिरि सब सिद्धि बोलाईं। भूप पहुनई करन पठाई।।
व्याख्या : जब सुरता रूपी सीता ने जाना कि देह के भावों रूपी बारात आ गयी है, तो सुरता ने अपनी महिमा को प्रकट किया और हृदय में स्मरण करके सब सिद्धियों को बुला लिया और दस इन्द्रियों रूपी दसरथ राजा की सेवा करने के लिए भेज दिया। यहाँ साधना का गहरा रहस्य छुपा हुआ है। जब देह के भाव ब्रह्मरन्ध्र में पहुँच जाते हैं और सुरता अगर तनिक भी लग जाए तो भावों के अनुरूप सिद्धि लाभ होना शु डिग्री हो जाता है। उसी अनुभूति को यहाँ नाना प्रकार से बताया गया है।
दो0 सिधि सब सिय आयसु अकनि गईं जहाँ जनवास।
लिएँ संपदा सकल सुख सुरपुर भोग बिलास।।306।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में सुरता की चेतना के अनुसार समस्त सिद्धियाँ काम करने लग जाती हैं। उसी अनुभूति को प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा गया है कि सुरता रूपी सीता की आज्ञा पाकर समस्त सिद्धियाँ जन वासे में (अर्थात् जहाँ परमात्मा की भक्ति के भाव होते हैं) चली और समस्त सम्पत्ति व सुखों को लेकर प्रकट हो गयी। जब साधना पराकाष्ठा पर पहुँचने वाली होती है, तो साधक के सामने अपार सम्पत्ति, सुख व भोगों के रूप में सिद्धियाँ प्रकट होकर साधक को नाना प्रकार से मोहित करने की कोशिश करती हैं।
निज निज बास बिलोक बराती। सुर सुख सकल सुलभ सब भाँती।।
बिभव भेद कछु कोउ न जाना। सकल जनक कर करहिं बखाना।।
व्याख्या : जब भाव रूपी बारातियों ने ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर में अपने-अपने निवास स्थान देखे तो देवताओं के सब सुख वहा सुलभ हो गए। भाव रूपी बाराती सिद्धियों के रहस्य को नहीं जान पाए और सब मिलकर प्राण रूपी जनक की प्रशंसा करने लगे।
सिय महिमा रघुनायक जानी। हरषे हृदयँ हेतु पहिचानी।।
पितु आगमनु सुनत दोउ भाई। हृदयँ न अति आनंदु अमाई।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम यह सब सुरता रूपी सीता के रहस्य को जान गए और सुरता रूपी सीता के हृदय के प्रेम को पहचान करके बहुत हर्षित हुए। वास्तविकता में जब आत्मा में सुरता लग जाती है, तो हृदय में निश्छल प्रेम पैदा हो जाता है। तब दसरथ रूपी स्थूल भाव रूपी पिता के आगमन का समाचार सुनकर आत्मा रूपी राम व लक्षणों को लखने वाले लक्ष्मण बहुत प्रसन्न हुए और हृदय में विशेष आनन्द उमगने लग गया। जब आत्मा निर्मुक्त हो जाती है, तो सहज होकर शून्याकार हो जाती है परन्तु जब पुन: स्थूल शरीर का आभास करती है तो आत्मा में आनन्द की उमग उठने लगती है। वास्तविकता में तो आत्मा का सहज स्वरूप व स्वभाव आनन्द का ही है परन्तु आत्मा तो निर्भोक्ता होने के कारण आनन्द का रस नहीं ले पाती है। इसलिए ज्योंहि आत्मा के सम्पर्क में स्थूल शरीर के भाव आते हैं, तो आनन्द उमंग पड़ता है। उसी अवस्था को दसरथ के आगमन पर आत्मा रूपी राम लखन का आनन्दित होना बताया गया है।
सकुचन्ह कहि न सकत गुरु पाहीं। पितु दरसन लालचु मन माहीं।।
बिस्वामित्र बिनय बड़ि देखी। उपजा उर संतोषु बिसेषी।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम संकोच के वश में होने के कारण समता रूपी विश्वामित्र से कह नहीं पा रहे हैं, परन्तु दसरथ रूपी पिता से मिलने की बहुत लालसा मन में थी। संकोच के कारण का रहस्य यह है कि समता रूपी गुरु तो सदैव आत्मा को निर्लेप रखना चाहते हैं। अत: दस इन्द्रियों रूपी दसरथ से मिलने में संकोच होना स्वाभाविक है। क्योंकि इन्द्रिय भाव आत्मा को संसार की तरफ आकर्षित कर सकता है। इसी अनुभूति को संकोच बोलकर लिखा है। परन्तु समता के भाव ने जब आत्मारूपी राम के हृदय में प्रार्थना रूपी भाव देखा तो समता रूपी भाव को संतोष मिल गया कि आत्मा रूपी राम अगर दस इन्द्रियों रूपी दसरथ भाव से मिलेगा तो भी इन्द्रिय भावों में आसक्त नहीं होगा। इस भाव को जानकर समता रूपी विश्वामित्र को बहुत संतोष मिल गया।
हरषि बंधु दोउ हृदयँ लगाए। पुलक अंग अंबक जल छाए।।
चले जहाँ दसरथु जनवासे। मनहुँ सरोबर तकेउ पिआसे।।
व्याख्या : तब विश्वामित्र रूपी समता के भाव ने हर्षित होकर आत्मा रूपी राम व लखन रूपी भाव को छाती से लगा लिया और अंग-अंग पुलकित हो उठे तथा आँखों में जल आ गया। तब आत्मारूपी राम व लखन को लेकर ब्रह्मरन्ध्र के उस कोष में चले जहाँ पर स्थूल शरीर रूपी भाव अर्थात् दसरथ भाव व देह भाव रूपी बाराती रूके हुए थे। उस समय ऐसा लग रहा था, मानों सरोवर स्वयं प्यासे की तरफ जा रहा हो। यहाँ सरोवर का प्यासे की तरफ जाने का गहरा रहस्य है। क्योंकि सामान्यत: यह होता है कि देह भाव आत्म भाव की तरफ खींचे आते हैं परन्तु यहाँ आत्म भाव समता रूपी गुरु के साथ देह भाव रूपी दसरथ से मिलने के लिए चलते हैं। इसलिए सरोवर का प्यासे के पास जाना कहा गया है।
दो0 भूप बिलोके जबहिं मुनि आवत सुतन्ह समेत।
उठे हरषि सुख सिंधु महुँ चले थाह सी लेत।।307।।
व्याख्या : जब दसरथ रूपी भाव को आभास हुआ कि आत्मा रूपी राम समता रूपी गुरु के साथ आ रहे हैं, तो दसरथ रूपी देह भाव आत्मा रूपी राम से मिलने को हर्षित होकर उठ खड़े हुए, तो ऐसा लग रहा था कि मानों सुख के सागर को मापने के लिए दसरथ रूपी भाव खड़े हुए हैं।
मुनिहि दंडवत कीन्ह महीसा। बार बार पद रज धरि सीसा।।
कौसिक राउ लिए उर लाई। कहि असीस पूछी कुसलाई।।
व्याख्या : समता रूपी विश्वामित्र मुनि को देखकर स्थूल भाव रूपी दसरथ ने दण्डवत प्रणाम किया अर्थात् पूरी तरह समर्पण किया और बार-बार चरण रज को सिर पर धारण किया यानी पूरी तरह समर्पण के भाव में दृढ़ता लाए। तब कोशिकाओं से उत्पन्न समता के भाव ने दसरथ रूपी भाव को हृदय से लगा लिया और आशीर्वाद देकर कुशलक्षेम पूछी।
पुनि दंडवत करत दोउ भाई। देखि नृपति उर सुखु न समाई।।
सुत हियँ लाइ दुसह दुख मेटे। मृतक सरीर प्रान जनु भेंटे।।
व्याख्या : फिर आत्मा रूपी राम और लखन रूपी भाव ने स्थूल भाव रूपी दसरथ को दण्डवत प्रणाम किया अर्थात स्थूल भाव से मिल गए। तब आत्मा रूपी पुत्रों को देखकर स्थूल भाव रूपी राजा का सुख समा नहीं रहा था। तब आत्मा रूपी पुत्रों को पाकर विरह के दु:सह दु:ख को दूर कर लिया, जैसे मरे हुए शरीर में प्राण आ गए हों।
पुनि बसिष्ठ पद सिर तिन्ह नाए। प्रेम मुदित मुनिबर उर लाए।।
बिप्र बृन्द बंदे दुहुँ भाईं। मनभावती असीसें पाईं।।
व्याख्या : फिर आत्मा रूपी राम व लक्षण रूपी लक्ष्मण ने विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु वसिष्ठ के चरणों में सीस झुकाया। तब विशिष्ट ज्ञान रूपी वसिष्ठ ने छाती से लगा लिया और फिर विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश वाले भावों की दोनों भाईयों (आत्मा रूपी राम व लखन रूपी भाव) ने वन्दना की और मन की भावना के अनुसार आशीर्वाद प्राप्त किया।
भरत सहानुज कीन्ह प्रनामा। लिए उठाइ लाइ उर रामा।।
हरषे लखन देखि दोउ भ्राता। मिले प्रेम परिपूरित गाता।।
व्याख्या : तब पोषण रूपी भरत भाव ने कामादि शत्रु दमन रूपी शत्रुघन सहित आत्मा रूपी राम को प्रणाम किया और आत्मा रूपी राम ने हृदय से लगा लिया। तब लक्षणों को लखने वाला लखन भाव बहुत हर्षित हुआ और भरत व शत्रुघन रूपी भाव से पुलकित होते हुए मिला।
दो0 पुरजन परिजन जाति जन जाचक मंत्री मीत।
मिले जथा बिधि सबहि प्रभु परम कृपाल बिनीत।।308।।
व्याख्या : उसके बाद आत्मा रूपी राम अवधी रूपी शरीर के सब भावों से, जिनमें कुटुम्बी, जाति वाले, चाह वाले, मंत्रणा वाले व मैत्री भाव थे, सभी से यथायोग्य क्रिया (विधि) द्वारा परम कृपालु आत्मा रूपी राम विनय के साथ मिले।
रामहि देखि बारात जुड़ानी। प्रीति कि रीति न जाति बखानी।।
नृप समीप सोहहिं सुत चारी। जनु धन धरमादिक तनुधारी।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम ने भावों रूपी बारात को इकट्ठा देखा तो भावों की आपसी प्रीत का वर्णन नहीं किया जा सकता है। नृप यानी नर अ प अर्थात् नर की धड़कन स्थिर होने से नर की धड़कन से उत्पन्न चित की चार अवस्था रूपी पुत्र बहुत शोभा पाते हैं। तब ऐसा लगता है मानों धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष ने शरीर धारण कर रखा हो। राम, भरत, लक्ष्मण व शत्रुघन वास्तविकता में चित की चार अवस्थाओं के प्रतीक हैं। उसी को नाना प्रकार से समझाया गया है।
सुतन्ह समेत दसरथहि देखी। मुदित नगर नर नारि बिसेषी।।
सुमन बरिसि सुर हनहिं निसाना। नाकनटीं नाचहिं करि गाना।।
व्याख्या : शरीर रूपी नगर की नर-नाड़ी चित को चित की अवस्था रूपी पुत्रों के साथ देखकर बहुत प्रसन्न होते हैं अर्थात् चित जब सहज हो जाता है तो शरीर के नर-नाड़ी प्रसन्नता का आभास करने लगते हैं। उस अवस्था में सुमन यानी अच्छे मन के भाव उमगने लगते हैं और अनहद की आवाज आने लगती है। उस अवस्था में सहज इच्छाओं रूपी अप्सराएँ नाचने व गाने लगती हैं।
सतानंद अ डिग्री बिप्र सचिव गन। मागध सूत बिदुष बंदीजन।।
सहित बरात राउ सनमाना। आयसु मागि फिरे अगवाना।।
व्याख्या : तब सत्य के आनन्द रूपी सतानंद, विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश रूपी भाव, मंत्रणा रूपी भाव, मागध , सूत, विदूषक व वन्दना वाले भावों ने भाव रूपी बारात के साथ दसरथ रूपी राजा का आदर सत्कार किया और आज्ञा लेकर अगवानी में आए हुए भाव लौट गए।
प्रथम बारात लगन तें आई। तातें पुर प्रमोदु अधिकाई।।
ब्रह्मानंदु लोग सब लहहीं। बढ़हुँ दिवस निसि बिधि सन कहहीं।।
व्याख्या : भाव रूपी बारात ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर में लग्न लगा कर आयी इसलिए शरीर रूपी नगर में आनन्द अधिक हो रहा था। सभी भाव ब्रह्म के आनन्द का अनुभव कर रहे थे और ज्ञान रूपी दिवस लम्बा हो ऐसी प्रार्थना कर रहे थे।
दो0 रामु सीय सोभा अवधि सुकृत अवधि दोउ राज।
जहँ तहँ पुरजन कहहिं अस मिलि नर नारि समाज।।309।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम और सुरता रूपी सीता सुन्दरता की सीमा हैं तथा प्राण रूपी जनक व दस इन्द्रियों रूपी दोनों राजा सुकृत्यों (पुण्यों) की सीमा हैं। जहाँ तहाँ नर-नाड़ियों में प्रवाहित होने वाले सभी भाव ऐसा ही अनुभव करने लगते हैं।
जनक सुकृत मूरति बैदेही। दसरथ सुकृत रामु धरें देही।।
इन्ह सम काहुँ न सिव अवराधे। काहुँ न इन्ह समान फल लाधे।।
व्याख्या : इन चौपाइयों में साधना के परम रहस्य को बताया गया है। यह वैज्ञानिक सत्य है कि जब प्राण एकदम निर्मल हो जाता है, तो प्राण से उत्पन्न सुरता परमात्मा में लग जाती है और जब दस इन्द्रियाँ निर्मल हो जाती हैं, तो इन्द्रियाँ मन में और मन चित में समा जाता है। इसलिए प्राण रूपी जनक की सुरता और दसरथ रूपी चित की आत्मा रूपी राम मूर्ति हैं। इन दोनों के समान किसी ने भी शिव की आराधना नहीं करी अर्थात् परमात्मा के प्रति परम विश्वास की अवस्था को प्राप्त नहीं किया और इनके समान किसी ने फल की भी प्राप्ति नहीं करी क्योंकि जब प्राण की निर्मलता से सुरता परमात्मा में लग जाती है और चित की निर्मलता से आत्मा परमात्मा बन जाती है, तो साधक को सर्वस्व प्राप्त हो जाता है।
इन्ह सम कोउ न भयउ जग माहीं। हैं नहिं कतहूँ होनेउ नाहीं।।
हम सब सकल सुकृत कै रासी। भए जग जनमि जनकपुर बासी।।
व्याख्या : इनके समान कोई संसार में नहीं है और कोई होने वाला भी नहीं है। सभी भाव तब विचार करने लगे कि हम सब सुकृत्य वाले हो गए हैं क्योंकि हम प्राण के ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर में जन्में हैं। अर्थात् जब प्राण उर्ध्वगामी होकर ब्रह्मरन्ध्र में पहुँच जाता है, तो उस अवस्था में पैदा होने वाले सब भाव सुकृत्य करने वाले हो जाते हैं। क्योंकि वहाँ वासना का अभाव रहता है और वासना के अभाव में होने वाले सब कृत्य तो सुकृत्य ही होते हैं।
जिन्ह जानकी राम छबि देखी। को सुकृती हम सरिस बिसेषी।।
पुनि देखब रघुबीर बिआहू। लेब भली बिधि लोचन लाहू।।
व्याख्या : जिन भावों ने आत्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता को देखा हो तो हमारे समान सुकृत्यों (पुण्यों वाला) वाला कौन है? हम फिर आत्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता का मिलन देखेंगे और अच्छी प्रकार से मिलन की क्रिया को आँखों से देखेंगे।
कहहिं परसपर कोकिल बयनी। एहि बिआहँ बड़ लाभु सुनयनी।।
बड़े भाग बिधि बात बनाई। नयन अतिथि होइहहिं दोउ भाई।।
व्याख्या : मधुर वाणी में बोलने वाली सात्विक इच्छाओं रूपी नारियाँ आपस में बातें करने लगती हैं कि इस मिलन समारोह (आत्मा व सुरता के मिलन का) का दिव्य दृष्टि के लिए बहुत बड़ा लाभ है। बड़े भाग्य से क्रिया के द्वारा (विधि) इस मिलन की अवस्था को प्राप्त किया गया है। अब हमारे आँखों के ये दोनों भाई मेहमान होंगे। अर्थात् जब सुरता आत्मा में लीन हो जायेगी, तो साधक की दृष्टि भी परमात्मामय हो जायेगी। क्योंकि सुरता आत्मा में लीन होने पर भाव भी आत्मा में लीन हो जाते हैं और परमात्मामय अवस्था स्वत: आ जाती है।
दो0 बारहिं बार सनेह बस जनक बोलाउब सीय।
लेन आइहहिं बंधु दोउ कोटि काम कमनीय।।310।।
व्याख्या : इस दोहे में साधना का गहरा रहस्य छुपा हुआ है। क्योंकि प्राण से ही सुरता पैदा होती है। अत: जब प्राण से उत्पन्न सुरता रूपी सीता बार-बार प्राण रूपी जनक के पास आयेंगी, तो आत्मा रूपी राम व लखन बार-बार सुरता रूपी सीता को लेने आयेंगे। वास्तव में यह होता है कि जब ध्यान में सुरता एक बार आत्मा में लग जाती है और परमात्म स्वरूप को प्राप्त कर लेती है, तो सुरता संसार में वापस आ भी जाए तो पुन: परमात्मा में लीन होने की प्रबलता बनी रहती है। उसी अनुभूति को प्रतीकों के माध्यम से यहाँ लिखा गया है।
बिबिध भाँति होइहि पहुनाई। प्रिय न काहि अस सासुर माई।।
तब तब राम लखनहि निहारी। होइहहिं सब पुर लोग सुखारी।।
व्याख्या : साधक को ध्यान की अवस्था में नाना विचार आते रहते हैं कि अगर अब ध्यान टूट जायेगा तो पुन: ध्यान लगेगा तो ऐसा लगेगा, वैसा लगेगा इत्यादि। उसी भाव अनुभूति को यहाँ लिखा गया है कि पुन: ध्यान लगने पर आत्मा रूपी राम का नाना भाँति से सत्कार होगा। क्योंकि ब्रह्मरन्ध्र रूपी सासुर अर्थात् सात्विक स्वरों से उत्पन्न अवस्था किसको प्रिय नहीं लगती है? ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर में पुन: पुन: आत्मा रूपी राम व लखन भाव को देख-देखकर शरीर के समस्त भावों को परम सुख मिलेगा।
सखि जस राम लखन कर जोटा। तैसेइ भूप संग दुइ ढोटा।।
स्याम गौर सब अंग सुहाए। ते सब कहहिं देखि जे आए।।
व्याख्या : सात्विक भावना रूपी सखियाँ कहती हैं कि आत्मा रूपी राम व लखन के समान ही दसरथ रूपी राजा (अर्थात् चित की चार अवस्थाएँ) के साथ भी दो सुन्दर राजकुमार हैं। जिनमें एक श्याम वर्ण व दूसरा गौर वर्ण है। ऐसा जिन्होंने देखा है, वे भाव रूपी लोग कह रहे हैं।
कहा एक मैं आजु निहारे। जनु बिरंचि निज हाथ सँवारे।।
भरतु रामही की अनुहारी। सहसा लखि न सकहिं नर नारी।।
व्याख्या : गम्यता रूपी भावना ने कहा कि मैंने आज उन्हें देखा है। ऐसा लगता है कि ब्रह्म ने स्वयं उन्हें बनाया है। क्योंकि पोषण रूपी भरत का भाव तो आत्मा रूपी राम के समान ही होता है। उनमें नर-नाड़ियाँ भेद नहीं कर सकती हैं अर्थात् एक दूसरे को पहचान नहीं सकती हैं। अर्थात् पोषण रूपी भरत और आत्मा रूपी राम चित की अवस्था होने के कारण दोनों में भेद करना कठिन होता है।
लखनु सत्रुसूदनु एकरूपा। नख सिख ते सब अंग अनुपा।।
मन भावहिं मुख बरनि न जाहीं। उपमा कहुँ त्रिभुवन कोउ नाहीं।।
व्याख्या : लखन रूपी भाव और कामादि शत्रुओं का दमन करने वाला शत्रुघ्न रूपी भाव दोनों एक जैसे हैं तथा नख से शिख तक दोनों के अनुपम अंग हैं। लखन और शत्रुघन का एक जैसा होना गम्भीर रहस्य है। क्योंकि जब किसी विकार या विषय के लक्षण समझ में (लखने) आ जाते हैं तो कामादि विकार स्वत: मिट जाते हैं तथा कामादि भावों का दमन करने (शत्रु दमन अर्थात् शत्रुघन) से भी विकार मिट जाते हैं। अत: ये लखन व शत्रुघन रूपी भाव एक समान माने गए हैं। अत: मन के भावों का वर्णन मुख द्वारा नहीं किया जा सकता है क्योंकि तीनों प्रकार के भावों (त्रिभुवन) से इनकी उपमा नहीं दी जा सकती है।
छ0 उपमा न कोउ कह दास तुलसी कतहुँ कबि कोबिद कहैं।
बल बिनय विद्या सील सोभा सिन्धु इन्ह से एइ अहैं।।
पुर नारि सकल पसारि अंचल बिधिहि बचन सुनावहीं।
ब्याहिअहुँ चारिउ भाइ एहिं पुर हम सुमंगल गावहीं।।
व्याख्या : तुलसीदास कहते हैं कि उनकी सुंदरता की कोई उपमा नहीं हो सकती है। ऐसा ही सभी कवि व विद्वान कहते हैं। क्योंकि बल, विनय, विद्या, शील व शोभा के समुद्र तो इन्हीं से उपमा लेते हैं। देह स्थित नगर की समस्त नाड़ियाँ परमात्मा से अब यही प्रार्थना करती है कि इन चारों भाईयों अर्थात् चित की चारों अवस्थाओं का मिलन यहीं ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर में हो जाए, जिससे हम सब सुमंगल के भावों से भर जाएँ।
सो0 कहहिं परस्पर नारि बारि बिलोचन पुलक तन।
सखि सबु करब पुरारि पुन्य पयोनिधि भूप दोउ।।311।।
व्याख्या : तब उस अवस्था में समस्त नाड़ियाँ आनन्द से भर उठती हैं और आनन्द रस से शरीर पुलकित हो उठता है। तब सभी नाड़ियों रूपी सखियाँ बातें करने लगती हैं कि देहभाव से मुक्त दोनों राजा प्राण रूपी जनक व दस इन्द्रियों रूपी दसरथ पुण्य के समुद्र हैं। अत: सब अच्छा ही होगा।
एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। आनंद उमगि उमगि उर भरहीं।।
जे नृप सीय स्वयंबर आए। देखि बन्धु सब तिन्ह सुख पाए।।
व्याख्या : इस प्रकार समस्त नाड़ियाँ मन में इच्छा करने लगती हैं, जिससे हृदय में आनन्द उमगने लगता है, जो भाव रूपी राजा सुरता रूपी सीता के स्वयंवर में (स्वयं वरण करने के लिए) आए, वे सब आत्मा रूपी राम व लखन को देखकर बहुत सुख पाए।
कहत राम जसु बिसद बिसाला। निज निज भवन गए महिपाला।।
गए बीति कछु दिन एहि भाँती। प्रमुदित पुरजन सकल बराती।।
व्याख्या : तब आत्मारूपी राम के यश का गुणगान करते हुए कुछ भाव रूपी राजा अपने-अपने घरों को चले गए। इस प्रकार कुछ दिन बड़े आनन्द से एक साथ बीत गए। समस्त भाव रूपी बाराती आनन्द में थे। अर्थात् ध्यान में इस प्रकार की सुखद अवस्था का आभास कुछ समय होता रहता है और समस्त भाव उस समय आनन्द का अनुभव करने लगते हैं।
मंगल मूल लगन दिनु आवा। हिम रितु अगहनु मासु सुहावा।।
ग्रह तिथि नखतु जोगु बर बारू। लगन सोधि बिधि कीन्ह बिचारू।।
व्याख्या : ध्यान की अवस्था में मंगल के मूल की लगन का दिन आ गया अर्थात् ध्यान की परिपक्वता से मंगल का मूल आ गया। उस समय वासनाओं का ताप मिट जाता है और आनन्द रूपी बसन्त ऋतु का आगमन हो जाता है तथा उस अवस्था में अग अ हनु यानी भविष्य की कल्पनाएँ मिट जाती हैं, जिससे निर्भय अवस्था आ जाती है। ध्यान की विधि (क्रिया) द्वारा मंगल के लिए समस्त ग्रह, तिथि, नक्षत्र, योग व वार अनुकूल हो आए। तब परमात्मा के प्रति लग्न को देखकर क्रिया (विधि) का विचार किया अर्थात् किस क्रिया से परमात्मा में लीन हुआ जा सकता है, का विचार किया।
पठै दीन्हि नारद सन सोई। गनी जनक के गनकन्ह जोई।।
सुनी सकल लोगन्ह यह बाता। कहहिं जोतिषी आहिं बिधाता।।
व्याख्या : क्रिया (विधि) द्वारा परमात्मा में लग्न लगा कर मन के नारद भाव द्वारा वह संदेश समस्त भावों को भेज दिया अर्थात् ध्यान की क्रिया का सभी भावों को आभास हो गया। उसी ध्यान की क्रिया के प्रभाव को प्राण रूपी जनक से उत्पन्न भाव रूपी लोग भी जानते थे अर्थात् प्राण से उत्पन्न भावों को भी ध्यान की क्रिया का आभास था। जब सब भाव रूपी लोगों को ध्यान विधि का ज्ञान हुआ।
दो0 धेनुधूरि बेला बिमल सकल सुमंगल मूल।
बिप्रन्ह कहेउ बिदेह सन जानि सगुन अनुकूल।।312।।
व्याख्या : धेनुधूरी अर्थात् जब इन्द्रियों (धेनु) पर धूल हट जाती है यानी इन्द्रियाँ विषय वासनाओं से जब मुक्त होने लग जाती हैं, तो निर्मलता आ जाती है और वह अवस्था समस्त सुमंगलों के मूल की होती है। तब विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश वाले भावों ने प्राण रूपी जनक को समस्त शकुनों के अनुकूल होने का आभास कराया।
उपरोहितहि कहेउ नरनाहा। अब बिलंब कर कारनु काहा।।
सतानंद तब सचिव बोलाए। मंगल सकल साजि सब ल्याए।।
व्याख्या : तब नर की धड़कन से उत्पन्न प्राण रूपी जनक ने पुरोहितों अर्थात् पुर हित यानी देह रूपी पुर का कल्याण करने वाले भावों से कहा कि अब देरी किस कारण से हो रही है। अर्थात् जब सब बिधि अनुकूल है, तो आत्मा व सुरता के मिलन में देरी किस कारण से हो रही है। तब सत्य के आनन्द रूपी भाव ने सचिव रूपी भावों को बुलाया और वे सात्विक भाव रूपी सचिव मंगल के साज सजाकर चले आए अर्थात् समस्त भावों में मंगल की भावना छा गयी।
संख निसान पनव बहु बाजे। मंगल कलस सगुन सुभ साजे।।
सुभग सुआसिनि गावहिं गीता। करहिं बेद धुनि बिप्र पुनीता।।
व्याख्या : तब ध्यान की उस अवस्था में कल्याण के भाव रूपी शंख, अनहद नाद की प्राण के संचार में ध्वनि आने लग जाती है, जिससे मंगल की भावना प्रबल हो उठती है और शुभ वृति के शकुन होने लग जाते हैं। तब सुभग अर्थात् अच्छी प्रकृति के भाव उमगने लगते हैं और विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश के भाव वेदों की अनुभूति कराने लगते हैं अर्थात् आत्म ज्ञान का प्रकाश होना शु डिग्री हो जाता है।
लेन चले सादर एहि भाँति। गए जहाँ जनवास बराती।।
कोसलपति कर देखि समाजू। अति लघु लाग तिन्हहि सुरराजू।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर के भाव रूपी लोग देह नगर रूपी भावों के बारातियों को लेने के लिए चले। दसरथ रूपी स्थूल भाव के भाव रूपी समाज के वैभव को देखकर चित रूपी इन्द्र का वैभव भी लघु लगने लग गया। अर्थात् देह के भाव चित के भावों से ज्यादा वैभवशाली लगने लगते हैं। यह अवस्था प्रत्येक साधक की होती है और बीच-बीच में भावों का यह द्वन्द्व उठता ही रहता है कि कभी चित के भाव ज्यादा आकर्षक लगते हैं, तो कभी देह के भाव ज्यादा आकर्षित लगने लगते हैं।
भयउ समउ अब धारिअ पाऊ। यह सुनि परा निसानहिं घाऊ।।
गुरहि पूछि करि कुल बिधि राजा। चले संग मुनि साधु समाजा।।
व्याख्या : तब ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर के भावों ने देह रूपी अवधपुरी के भावों को प्रेरित किया कि अब तो परमात्मा से मिलने का समय आ गया है, अत: आप ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर में पधारिए। यह सुनते ही अर्थात् ब्रह्मरन्ध्र के भावों के आकर्षण को देखते ही अनहद नाद की ध्वनि स्पष्ट हो उठती है। तब विशिष्ट ज्ञान रूपी भाव की आज्ञा लेकर और कुल बिधि अर्थात् ध्यान क्रिया का अनुसरण करते हुए दसरथ रूपी भाव समस्त भावों सहित ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर के परमानन्द रूपी कोष के लिए चल दिए अर्थात् देह के भाव प्राण के भावों के आकर्षण से ब्रह्मरन्ध्र में पहुँचने लग जाते हैं।
दो0 भाग्य बिभव अवधेस कर देखि देव ब्रह्मादि।
लगे सराहन सहस मुख जानि जन्म निज बादि।।313।।
व्याख्या : तब समस्त दैवीय व सात्विक भाव दसरथ रूपी स्थुल भाव के वैभव को देखकर उसके भाग्य की सराहना करने लगे अर्थात् देह भावों के ब्रह्मरन्ध्र में पहुँचाने पर सुखद आनन्द की अनुभूति होने लगती है।
सुरन्ह सुमंगल अवस डिग्री जाना। बरषहिं सुमन बजाइ निसाना।।
सिव ब्रह्मादिक बिबुध बरूथा। चढ़े बिमानन्हि नाना जूथा।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में सुमंगल की अवस्था को देखकर समस्त स्वर सात्विक भाव पैदा करने लग जाते हैं और अनहद की ध्वनि उठने लग जाती है। तब शिव अर्थात् परमात्मा के प्रति दृढ़ विश्वास, सात्विक भावों के समूह व अन्य सात्विक भावों के समूह के समूह मस्तिष्क रूपी ब्राह्माण्ड में चढ़ गए।
प्रेम पुलक तन हृदयँ उछाहू। चले बिलोकन राम बिआहू।।
देखि जनकपुरु सुर अनुरागे। निज निज लोक सबहिं लघु लागे।।
व्याख्या : तब समस्त सात्विक व दैवीय भाव प्रेम में पुलकित होते हुए और हृदय में उत्साहित होते हुए आत्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता के मिलन (विवाह) को देखने के लिए चल दिए। उस ध्यान की अवस्था में ब्रह्मरन्ध्र रूपी जनकपुर को देखकर समस्त स्वर अनुराग से भर गए और सभी स्वरों को अपने-अपने लोक लघु लगने लगे। अर्थात् समस्त स्वरों को ब्रह्मरन्ध्र की अवस्था सुखद व दिव्य लगने लगी। वास्तविकता में यही होता है, जब ध्यान ब्रह्मरन्ध्र में स्थिर होने लग जाता है तो समस्त स्वर भी शान्त होकर ब्रह्मरन्ध्र में ही लीन होने लग जाते हैं तथा ईड़ा, पिंगला व सुष्मना स्वर भी शान्त हो जाते हैं। वह अवस्था ही सहज समाधि की अवस्था होती है।
चितवहिं चकित बिचित्र बिताना। रचना सकल अलौकिक नाना।।
नगर नारि नर रूप निधाना। सुघर सुधरम सुसील सुजाना।।
व्याख्या : उस ध्यान की अवस्था में समस्त भाव उस विचित्र अर्थात् दिव्य अवस्था को आश्चर्य चकित होकर देखने लगते हैं। क्योंकि वहाँ की समस्त रचना अलौकिक अर्थात् संसार से परे की होती है। उस समय ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर के नर-नाड़ी निर्मल होकर शोभा की खान बन जाते हैं, जिससे सहज अवस्था को धारण करके सुशीलता व सज्जनता आ जाती है।
तिन्हहि देखि सब सुर सुरनारी। भए नखत जनु बिधु उजिआरीं।।
बिधिहि भयउ आचरजु बिसेषी। निज करनी कछु कतहुँ न देखी।।
व्याख्या : ब्रह्मरन्ध्र में ध्यान लगने पर भावों को पैदा करने वाली नाड़ियाँ प्रभावहीन हो गयी जैसे चन्द्रमा के सामने तारागण हो जाते हैं। ब्रह्मरन्ध्र में ध्यान स्थिर होने पर तो ध्यान की क्रिया (विधि) को भी आश्चर्य होने लग जाता है, क्योंकि उस अवस्था में तो ध्यान की क्रिया का भी आभास नहीं रहता है अर्थात सहज ही ध्यान की अवस्था आ जाती है।
दो0 सिवँ समुझाए देव सब जनि आचरज भुलाहु।
हृदयँ बिचारहु धीर धरि सिय रघुबीर बिआहु।।314।।
व्याख्या : तब विश्वास रूपी शिव ने समस्त देवीय भावों को समझाया कि आश्चर्य को छोड़ दो और हृदय में आत्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता के मिलन (विवाह) का विचार करो।
जिन्ह कर नामु लेत जग माहीं। सकल अमंगल मूल नसाहीं।।
करतल होहिं पदारथ चारी। तेइ सिय रामु कहेउ कामारी।।
व्याख्या : विश्वास रूपी शिव बोले कि जिनका नाम लेते ही समस्त अमंगलों का नाश हो जाता है और धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष के चारों पदार्थ मिल जाते हैं। वे ही आत्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता हैं।
एहि बिधि संभु सुरन्ह समुझावा। पुनि आगे बर बसह चलावा।।
देवन्ह देखे दसरथु जाता। महामोद मन पुलकित गाता।।
व्याख्या : इस प्रकार स्वयं साधक का विश्वास स्वयं को समझाता है और पुन: आत्मा व सुरता के मिलन को देखने में दृढ़ता ले आता है। जब दैवीय भावों ने स्थूल भाव रूपी दसरथ को प्रसन्न चित व पुलकित होते हुए जाते देखा अर्थात् स्थूल शरीर के भाव ब्रह्मरन्ध्र में लीन होने लगे।
साधु समाज संग महिदेवा। जनु तनु धरें करहिं सुख सेवा।।
सोहत साथ सुभग सुतचारी। जनु अपबरग सकल तनुधारी।।
व्याख्या : उस अवस्था में महिदेवा अर्थात् शरीर रूपी पृथ्वी के भाव ऐसे लगने लगते हैं, जैसे शरीर धारण करके सुख की सेवा कर रहे हों अर्थात् चारों तरफ सुख उमगने लगता है। उस अवस्था में दसरथ रूपी चित के साथ चित की चार अवस्था रूपी पुत्र शोभायमान होने लगते हैं और अपबर्ग अर्थात् सुख-दु:ख से परे की अवस्था आ जाती है।
मरकत कनक बरन बर जोरी। देखि सुरन्ह भै प्रीति न थोरी।।
पुनि रामहि बिलोकि हियँ हरषे। नृपहि सराहि सुमन तिन्ह बरषे।।
व्याख्या : मरकत मणि के द्वारा सोने के वर्ण जैसा प्रकाश हुआ देखकर दैवीय भावों को बहुत प्रेम हो गया और आत्मा रूपी राम को देखकर हृदय में हर्षित हो उठे। तब ध्यान की उस अवस्था में नर की धड़कन अर्थात् चित की धड़कन की सराहना करते हुए सुमन यानी सु अ मन उ अच्छा मन के भावों की वर्षा होने लगी।
दो0 राम रूपु नख सिख सुभग बारहिं बार निहारि।
पुलक गात लोचन सजल उमा समेत पुरारि।।315।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम को नाखूनों से सिर तक सुभग यानी सु अ भग उ अच्छी प्रकृति अर्थात् सहज सुखद रूप, जिसे ध्यान में बार-बार देखने पर अंग-अंग पुलकित हो उठते हैं और श्रद्धा रूपी पार्वती व विश्वास रूपी शिव के नयनों में प्रेम रूपी जल आ जाता है।
केकि कंठ दुति स्यामल अंगा। तड़ित बिनिदंक बसन सुरंगा।।
ब्याह बिभूषन बिबिध बनाए। मंगल सब सब भाँति सुहाए।।
व्याख्या : जब ब्रह्मरन्ध्र में ध्यान स्थिर होने लगता है और सुरता भी आत्मा में लीन होने लगती है तो एक सूक्ष्म लकीर सी बनने लग जाती है। वह उस समय मयूर की गर्दन जैसे आभासित होने लगती है तथा बिजली की चमक जैसा प्रकाश होकर सुरंग में जाता हुआ सा लगने लगता है। तब आत्मा व सुरता के मिलन रूपी विवाह के नाना आनन्द रूपी आभूषणों का आभास होने लगता है, जो सब प्रकार से मंगलकारी अवस्था होती है।
सरद बिमल बिधु बदनु सुहावन। नयन नवल सजीव लजावन।।
सकल अलौकिक सुंदरताई। कहि न जाइ मनहीं मन भाई।।
व्याख्या : उस समय वासना रूपी ताप मिट जाने से शरद ऋतु के चन्द्रमा के समान शीतलता का आभास होने लगता है और आँखों में दिव्य दृष्टि रूपी कमल खिलने लग जाते हैं। उस समय सब प्रकार से अलौकिक सुंदरता छा जाती है, जिसे वर्णन करके कहा नहीं जा सकता है। उस दिव्य अवस्था का तो मन ही मन अनुभव किया जा सकता है।
बंधु मनोहर सोहहिं संगा। जात नचावत चपल तुरंगा।।
राजकुअँर बर बाजि देखावहिं। बंस प्रसंसक बिरिद सुनावहिं।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम के साथ भरत, लक्ष्मण व शत्रुघन रूपी भाव शोभा पा रहे हैं और वे चंचल मन रूपी घोड़ों की तरंगों को नचाते हुए जा रहे हैं अर्थात् चित की अवस्थाएँ मन की तरंगों को वश में कर रही हैं। चित की अवस्था रूपी राजकुमार चंचल मन को वश में करने की कला दिखा रहे हैं तथा वंश प्रशंसक अर्थात् जीव की वृतियाँ बिरदावलियाँ गाने लगती हैं अर्थात् भावों के रहस्य समझ में आने लगते हैं।
जेहि तुरंग पर रामु बिराजे। गति बिलोकि खगनायकु लाजे।।
कहि न जाइ सब भाँति सुहावा। बाजि बेषु जनु काम बनावा।।
व्याख्या : जिस मन रूपी घोड़े की तरंग पर आत्मा रूपी राम सवार थे। उसकी गति तो गरूड़ को भी लज्जित करने वाली थी। उस अवस्था का वर्णन किसी भी प्रकार नहीं किया जा सकता है। मानो काम ने ही मन रूपी घोड़े का रूप धारण कर रखा हो। ध्यान में आत्मारूपी राम मन रूपी घोड़े को वश में कर लेते हैं, तो उस अवस्था का वर्णन करना असम्भव होता है। क्योंकि उस अवस्था को तो साधक स्वयं ही अनुभव कर सकता है।
छ0 जनु बाजि बेषु बनाइ मनसिजु राम हित अति सोहई।
आपने बय बल रूप गुन गति सकल भुवन बिमोहई।।
जगमगत जीनु जराव जोति सुमोति मनि मानिक लगे।
किंकिनि ललाम लगामु ललित बिलोकि सुर नर मुनि ठगे।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में जब आत्मा रूपी राम मन की तरंग रूपी घोड़े पर सवार हो जाता हैं, तो ऐसा लगने लगता है मानों समस्त काम इच्छा ही आत्मा रूपी राम के घोड़े के रूप में वश में आ गयी। तब आत्मा रूपी राम के बल, रूप, गुण व गति को देखकर समस्त भाव मोहित होने लगते हैं अर्थात् समस्त भाव आत्मा में लीन होने लग जाते हैं। जब काम रूपी घोड़ा आत्मा रूपी सवार के वश में आ जाता है, तो प्राण की ऊर्जा से ज्योति का प्रकाश हो उठता है और ज्ञान रूपी जगमगाहट छा जाती है तथा सुमति रूपी माणिक्य प्रकट होने लग जाते हैं। उस समय ज्ञान रूपी सुन्दर मोतियों से जड़ी हुई काम रूपी घोड़े की सद्बुद्धि रूपी लगाम को देखकर स्वर, नर (धड़कन) व मन भी मोहित जाते हैं।
दो0 प्रभु मनसहिं लयलीन मनु चलत बाजि छबि पाव।
भूषित उड़गन तड़ित घनु जनु बर बरहि नचाव।।316।।
व्याख्या : ध्यान की उस गहन अवस्था में काम रूपी घोड़ा भी परमात्मा में लीन होने के लिए चल देता है तथा तब ऐसे लगने लगता है जैसे तारों व बिजली से सुशोभित बादल मानों मयूर को नचा रहे हों। अर्थात् उस अवस्था में काम रूपी घोड़ा आत्मा रूपी सवार को लेकर परमात्मा में लीन होने के लिए दौड़ पड़ता है।
जेहिं बर बाजि रामु असवारा। तेहि सारदउ न बरनै पारा।।
संक डिग्री राम रूप अनुरागे। नयन पंचदस अति प्रिय लागे।।
व्याख्या : जिस कामरूपी घोड़े पर आत्मा रूपी राम सवार होते हैं, उसका वर्णन तो किसी भी प्रकार से स्वयं सरस्वती भी नहीं कर सकती हैं। तब उस अवस्था में शंका रहित विश्वास रूपी शंकर आत्मा रूपी राम के रूप को देखकर अनुराग से भर जाते हैं और उस परमानंद की अनुभूति के लिए विश्वास रूपी शंकर को पाँच तंमात्राएँ (शब्द, स्पर्श, रूप, गंध व रस) तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ व पाँच कर्मेन्द्रियों रूप पन्द्रह आँखें भी कम लगने लगी अर्थात् उस परमानन्द का वर्णन इन्द्रियों व तन्मात्राओं द्वारा नहीं किया जा सकता है।
हरि हित सहित रामु जब जोहे। रमा समेत रमापति मोहे।।
निरखि राम छबि बिधि हरषाने। आठइ नयन जानि पछिताने।।
व्याख्या : जब माया के हरण करने वाले (हरि) विष्णु रूपी अणु-अणु में व्यापक भाव ने आत्मा रूपी राम को देखा तो रमा सहित अर्थात् प्राणशक्ति (कुण्डलिनि) सहित प्राण को पैदा करने वाला चित (रमापति) भी मोहित हो गया अर्थात् स्थिर होने लग गया। उस अवस्था को देखकर क्रिया (विधि) भी हर्षित हो गयी तथा पाँच तत्व, मन, बुद्धि व अहंकार रूपी आठ प्रकृति रूपी नयनों को देखकर क्रिया रूपी भाव को पश्चाताप होने लगा अर्थात् प्रकृति का प्रभाव भी निष्प्रभावी होने लग गया। क्योंकि जब चित रूपी विष्णु स्थिर होने लग जाता है, तो क्रिया रूपी विधाता भी प्रकृति से मुक्त होने लग जाता है।
सुर सेनप उर बहुत उछाहू। बिधि ते डेवढ़ लोचन लाहू।।
रामहि चितव सुरेस सुजाना। गौतम श्राप परम हित माना।।
व्याख्या : सुर सेनप अर्थात् कार्तिक रूपी सेनापति अर्थात् दस इन्द्रियों, मन व बुद्धि रूपी नेत्रों सहित भावों को संचालित करने वाला कार्तिक रूपी भाव बहुत उत्साहित है क्योंकि विधाता (क्रिया कर्ता) तो मन, बुद्धि, अहंकार व पंच भूतों से ही आनन्द का अनुभव कर पाता है परन्तु कार्तिक रूपी भाव तो दस इन्द्रियों, मन व बुद्धि रूपी बारह नेत्रों द्वारा आत्मा रूपी राम के दर्शन का आनन्द ले पाता है। आत्मा रूपी राम को चित रूपी इन्द्र द्वारा देखने पर गौतम श्राप अर्थात् इन्द्रियों की पवित्रता नहीं होने की ग्लानि को अपने कल्याण के लिए शुभकर मानता है। क्योंकि अगर इन्द्रियों की विषय-वासना में फँसने की ग्लानि चित रूपी इन्द्र को नहीं होती है, तो आत्मा रूपी राम की अनुभूति के आनन्द को प्राप्त नहीं किया जा सकता था। अत: गौतम श्राप (गो अ उत्तम) को चितरूपी इन्द्र हितकर मानता है।
देव सकल सुरपतिहिं सिहाहीं। आजु पुरंदर सम कोउ नाहीं।।
मुदित देवगन रामहि देखी। नृप समाज दुहुँ हरषु बिसेषी।।
व्याख्या : समस्त दैवीय भाव चित रूपी इन्द्र की सरहाना करने लगते हैं कि शरीर के अन्दर (पुर अ अंदर उ पुरंदर) चित के समान दूसरा कोई नहीं होता है। तब प्रसन्न होकर दैवीय भाव आत्मा रूपी राम को देखने लगते हैं तथा नृप समाज अर्थात नर की धड़कन से उत्पन्न समस्त भावों में विशेष हर्ष छा गया।
छ0 अति हरषु राज समाज दुहु दिसि दुंदुभी बाजहिं घनी।
बरषहिं सुमन सुर हरषि कहि जय जयति जय रघुकुल मनी।।
एहि भाँति जानि बरात आवत बाजने बहु बाजहीं।
रानी सुआसिनि बोलि परिछनि हेतु मंगल साजहीं।।
व्याख्या : तब ध्यान की उस अवस्था में ब्रह्मरन्ध्र के भावों और देह के भावों का मिलन होने लग गया तथा दोनों तरफ से बाजे बजने लगे। उस अवस्था में सात्विक भावों की वर्षा होने लगती है और आत्म भावों की जय-जयकार बोलने लगते हैं। इस प्रकार भाव रूपी बारात को आया हुआ जानकर अर्थात् देह भावों के ब्रह्मरन्ध्र में पहुँचने पर अनहद नाद की ध्वनि आने लग जाती है। तब सुआसिनि अर्थात् दिव्य दृष्टि रूपी रानी मंगल भावना रूपी साज सजाने लग जाती है।
दो0 सजि आरती अनेक बिधि मंगल सकल सँवारि।
चली मुदित परिछनि करन गजगामिनि नारि।।317।।
व्याख्या : तब ध्यान की अवस्था में मंगल भावना रूपी आरती सजाकर हाथी की सी चाल वाली सुन्दर नाड़ियाँ चलीं अर्थात् हाथी की सी चाल में ब्रह्मरन्ध्र स्थित नाड़ियाँ धड़कने लगीं। अर्थात् जब ध्यान ब्रह्मरन्ध्र में दृढ़ हो जाता है, तब नाड़ियों की धड़कन हाथी की चाल जैसी हो जाती है और सुमंगल के भाव पैदा होने लग जाते हैं।
बिधुबदनीं सब सब मृग लोचनि। सब निज तन छबि रति मदु मोचनि।।
पहिरें बरन बरन बर चीरा। सकल बिभूषन सजें सरीरा।।
व्याख्या : उस समय नाड़ियों की धड़कन चन्द्रमा के समान शीतलता वाली हो जाती है और उससे भाव पैदा होकर निर्मल दृष्टि पैदा करने लग जाते हैं। ये सब साधक के स्वयं के शरीर में ही घटित होता है तथा जो मद आदि का नाश करने वाली अवस्था होती है। शरीर में नाना प्रकार के भाव पैदा करने वाली नाड़ियाँ होती हैं, जिनसे उत्पन्न भावों से शरीर सुशोभित होने लगता है।
सकल सुमंगल अंग बनाएँ। करहिं गान कलकंठि लजाएँ।।
कंकन किंकिनि नूपुर बाजहिं। चालि बिलोकि काम गज लाजहिं।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में समस्त नाड़ियाँ सुमंगल के भावों का अंग-अंग में संचार करने लगती हैं और मधुर भाषा में कोयल को भी लजानेवाले गाने गाने लगती हैं अर्थात् निर्मल व मधुर वाणी के भाव पैदा होने लग जाते हैं। उस अवस्था में जब भाव शान्त हो जाते हैं, तो नाड़ियों में प्रवाहित होने वाले प्राण की गति से कंगन, नूपुर व करधनी की आवाज आने लगती है। उस समय नाड़ियों की गति को देखकर काम के प्रबल भाव भी शान्त होने लग जाते हैं।
बाजहिं बाजने बिबिध प्रकारा। नभ अ डिग्री नगर सुमंगल चारा।।
सची सारदा रमा भवानी। जे सुरतिय सुचि सहज सयानी।।
व्याख्या : तब नाना प्रकार के बाजों की आवाज आने लगती है और मस्तिष्क व शरीर में सुमंगल के भावों का संचार होने लग जाता है। उस ध्यान की अवस्था में शची अर्थात् चित रूपी इन्द्र की तरंग रूपी पत्नी, सरस्वती अर्थात स्वरों की वृति, रमा अर्थात् रमण करने वाली लक्षणों से युक्त लक्ष्मी रूपी प्राण धारा, व भावों को पैदा करने वाली श्रद्धा रूपी भवानी जो सुरतिय अर्थात् जो तीनों स्वरों से उत्पन्न होती हैं और जो सहज में ही सयानी हैं।
कपट नारि बर बेष बनाई। मिली सकल रनिवासहिं जाई।।
करहिं गान कलमंगल बानी। हरष बिबस सब काहुँ न जानी।।
व्याख्या : इन स्वरों की नाड़ियों ने कपट भेष बनाकर अर्थात् ध्यान की गहराई में ये तीनों नाड़ियाँ एक होकर ब्रह्मरन्ध्र में धड़कन के रूप में पहुँच गयी। उस समय मंगल के भाव उमगने लग गए तथा मधुर-मधुर ध्वनियाँ सुनायी पड़ने लग गयीं। उस समय हर्ष के भाव के वश में होने की अवस्था को कोई नहीं जान पा रहा था।
छ0 को जान केहि आनंद बस सब ब्रह्मु बर परिछन चली।
कलगान मधुर निसान बरषहिं सुमन सुर सोभा भली।।
आनंदकंदु बिलोकि दूलहु सकल हियँ हरषित भई।
अंबोज अंबक अंबु उमगि सुअंग पुलकावलि छई।।
व्याख्या : उस ध्यान के आनन्द की अवस्था में कौन भाव किसे जान पाता है। सब भाव तो दूल्हा रूपी ब्रह्म से मिलने के लिए चल देते हैं। उस अवस्था में मधुर-मधुर नगाड़ों की आवाज आने लगती हैं तथा सुमन अर्थात् सात्विक भावों की वर्षा होने लग जाती है। तब आनन्द के मूल ब्रह्म यानी आत्मा रूपी दूल्हे को देखकर समस्त नाड़ियाँ हर्षित हो उठती हैं। उस समय नाड़ियों के नयनों से अर्थात् धड़कन से प्रेम रस निकलना शु डिग्री कर देता है, जिससे सब अंगों में पुलकावली छा जाती है।
दो0 जो सुखु भा सिय मातु मन देखि राम बर बेषु।
सो न सकहिं कहि कलप सत सहस सारदा सेषु।।318।।
व्याख्या : उस आनन्द मग्न अवस्था में जो सुख सुरता रूपी सीता की दिव्य दृष्टि रूपी (सुनयना) माता को आत्मा रूपी राम को देखकर मिला, उसका वर्णन सरस्वती व शेषनाग भी कल्पना करके नहीं कर सकते हैं।
नयन नीर हटि मंगल जानी। परिछनि करहिं मुदित मन रानी।।
बेद बिहित अ डिग्री कुल आचारू। कीन्ह भली बिधि सब ब्यवहारू।।
व्याख्या : नाड़ियों की धड़कन से निकलने वाले प्रेम रस रूपी जल को मंगल का मूल जानकर दिव्य दृष्टि रूपी रानी सुनयना आत्मा रूपी राम का परछन करने लगी अर्थात् दिव्य दृष्टि आत्मा पर स्थिर हो गयी। उस अवस्था में वेदों में वर्णित कुल के आचार अर्थात् जीव द्वारा स्वयं अनुभूत की गयी क्रिया के व्यवहार को अच्छी तरह समझा जा सकता है। उस समय भाव व क्रिया का मर्म भी समझ में आ जाता है।
पंच सबद धुनि मंगल गाना। पट पाँवडे परहिं बिधि नाना।।
करि आरती अरघु तिन्ह दीन्हा। राम गमनु मंडप तब कीन्हा।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में पंच शब्दों (सोह्म, ओह्म, रं रकार, प्रकृति व निरञ्जन) की मंगल करने वाली धुन सुनाई पड़ने लग जाती है। उस अवस्था में नाना प्रकार की रिद्धि-सिद्धियों रूपी पाँवड़े पड़ने लगते हैं अर्थात् साधक को सिद्ध की अवस्था प्राप्त हो जाती है। तब दिव्य दृष्टि रूपी रानी ने उन्हें अर्घ्य दिया अर्थात् रिद्धि-सिद्धियों को छोड़ दिया और तब आत्मा रूपी राम मंडप अर्थात् मन अ डप उ मन के आवरण से मुक्त हो गया। उसी को राम के मंडप में जाना बोलकर बताया गया है। रिद्धि व सिद्धियों का प्रभाव मन की सीमा तक ही रहता है। जब आत्मा मन के आवरण से मुक्त हो जाती है, तो वह सहज हो जाती है।
दसरथु सहित समाज बिराजे। बिभव बिलोकि लोकपति लाजे।।
समयँ समयँ सुर बरषहिं फूला। सांति पढ़हिं महिसुर अनुकूला।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में भावों सहित स्थूल भाव रूपी दसरथ (दस इन्द्रियों सहति) शोभायमान हो उठते हैं तथा उनके वैभव को देखकर अर्थात् निर्मल भाव अवस्था को देखकर समस्त लोकपति लज्जा पाने लगते हैं। उस अवस्था में समय-समय पर स्वरों से आनन्दरूपी फूलों की वर्षा होने लगती है और महि अर्थात् स्थूल शरीर रूपी धरती के स्वर अनुकूल होकर शान्ति प्रदान करने लगते हैं।
नभ अ डिग्री नगर कोलाहल होई। आपनि पर कछु सुनइ न कोई।।
एहि बिधि रामु मंडपहिं आए। अरघु देइ आसन बैठाए।।
व्याख्या : उस समय मस्तिष्क रूपी आकाश और शरीर रूपी नगर में प्राण के प्रवाह का कोलाहल सुनाई पड़ने लगता है, जिसके कारण अपने-पराए के भावों की कोई नहीं सुनता है अर्थात् निर्मलता आ जाने से माया का प्रभाव मिट जाता है। इस प्रकार आत्मा रूपी राम मन की सीमा से पार होकर ब्रह्मरन्ध्र के परमानन्द रूपी कोष में आ गए। जहाँ पर अर्घ् देकर अर्थात् समस्त कामनाओं का त्याग करके आसन पर बैठाया गया।
छ0 बैठारि आसन आरती करि निरखि ब डिग्री सुखु पावहीं।
मनि बसन भूषन भूरि वारहिं नारि मंगल गावहीं।।
ब्रह्मादि सुरबर बिप्र वेष बनाइ कौतुक देखहीं।
अवलोकि रघुकुल कमल रबि छबि सुफल जीवन लेखहीं।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में आत्मा रूपी दूल्हा को परमानन्द रूपी आसन पर बैठा कर सुख का अनुभव हो रहा है और नाड़ियाँ मन के व्यसन व भोग आदि का त्याग करके मंगल के भाव पैदा करने लगती हैं। उस समय ब्रह्मादि अर्थात् ध्यान की क्रिया (विधि) व स्वर विशुद्ध ज्ञान के भावों का प्रकाश (विशुद्ध अ प्रकाश उ विप्र) करके आत्मा के आनन्द के खेल को देखने लगते हैं। उस समय रघुकुल अर्थात् जीवात्मा से परमात्मा रूपी कमल खिला देखकर सभी भाव अपने जन्म को धन्य मानने लगते हैं।
दो0 नाऊ बारी भाट नट राम निछावरि पाइ।
मुदित असीसहिं नाइ सिर हरषु न हृदयँ समाइ।319।।
व्याख्या : जब आत्मा रूपी राम आसन पर बैठ जाते हैं, तो नाई रूपी चतुराई, बारी रूपी माया, भाट रूपी दिखावा व नट रूपी चालाकी के भाव आत्मा रूपी राम से निछावर पाकर अर्थात् आत्मा के प्रभाव में आकर प्रसन्न होकर समर्पण करते हुए शान्त हो जाते हैं। अर्थात् साधक चतुराई, माया, दिखावा व चालाकी आदि भावों से मुक्त हो जाता है।
मिले जनकु दसरथु अति प्रीतीं। करि बैदिक लौकिक सब रीती।।
मिलत महा दोउ राज बिराजे। उपमा खोजि खोजि कबि लाजै।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में प्राण रूपी जनक व देह भाव रूपी दसरथ प्रीतिपूर्वक मिलते हैं। उस समय साधक को समस्त लौकिक व वैदिक भावों की अनुभूति हो जाती है। उस महामिलन की अवस्था दैहिक व प्राण के दोनों भाव समाजों के मिलन की होती है, जिसकी कोई कवि उपमा दे नहीं पाते हैं।
लही न कतहुँ हारि हियँ मानी। इन्ह सम एइ उपमा उर आनी।।
सामध देखि देव अनुरागे। सुमन बरषि जसु गावन लागे।।
व्याख्या : परन्तु कवियों ने भी हृदय में हार नहीं मानी इसलिए इनके समान इनकी ही उपमा दे डाली। उस समता की अवस्था को देखकर समस्त दैवीय भाव अनुराग से भर गए और सुमन अर्थात् सात्विक भावों की वर्षा होने लग जाती है।
जगु बिरंचि उपजावा जब तें। देखे सुने ब्याह बहु तब तें।।
सकल भाँति सम साजु समाजु। सम समधी देखे हम आजू।।
व्याख्या : जब से ब्रह्मा ने जगत को पैदा किया है अर्थात् जब से क्रिया (विधि) के द्वारा संसार का आभास हुआ है, तब से भावों के मिलन (विवाह) की बहुत बातें सुनी व देखी हैं। परन्तु सब प्रकार से प्राण व देह के भावों का समान रूप से मिलन की अवस्था को आज ही देखा है। अर्थात् पूर्ण रूप से समता की अवस्था का आभास हुआ है।
देव गिरा सुनि सुंदर साँची। प्रीति अलौकिक दुहु दिसि माची।।
देत पाँवड़े अरघु सुहाए। सादर जनकु मंडपहिं ल्याए।।
व्याख्या : दैवीय भावों की सुन्दर व सत्य वाणी को सुनकर देह व प्राण के भावों में अलौकिक प्रेम छा गया। तब प्राण रूपी जनक देह भाव रूपी दसरथ को सहारा देकर मंडप अर्थात् मन की सीमा से बाहर ले आए। वास्तविकता में यह ध्यान की बहुत सूक्ष्म अवस्था का वर्णन है। जब ध्यान पूरी तरह परमात्मा में लग जाता है तो प्राण की निर्मलता के साथ देह भावों का आभास भी निर्मल हो जाता है और देह भाव भी मन की सीमा को पार कर जाते हैं। उसी अवस्था को प्राण रूपी जनक द्वारा दसरथ रूपी देह भाव को मंडप में लाना बताया गया है।
छ0 मंडपु बिलोकि बिचित्र रचनाँ रूचिरताँ मुनि मन हरे।
निज पानि जनक सुजान सब कहुँ आनि सिंघासन धरे।।
कुल इष्ट सरिस बसिष्ट पूजे बिनय करि आसिष लही।
कौसकहि पूजत परम प्रीति की रीति तौ न परै कही।।
व्याख्या : मन से पार की विचित्र रचना (अर्थात् वह दृष्टि जिसमें मोह का बन्धन नहीं होता है) को देखकर अनुराग बढ़ जाता है और मन का पूरी तरह हरण हो जाता है। उस अवस्था में साधक स्वयं के प्राण को निर्मल करके सिंहासन पर अर्थात् परम अवस्था में अवस्थित हो जाता है। तब प्राण रूपी जनक अपने इष्ट परमात्मा के समान ही विशिष्ट ज्ञान रूपी वसिष्ठ मुनि की विनयपूर्वक पूजा करके आशीर्वाद लेते हैं अर्थात् देह के विशिष्ट ज्ञान को अपने अनुकूल कर लेते हैं। उसी समय कौशिकाओं से उत्पन्न समता रूपी विश्वामित्र की प्राण रूपी जनक प्रेमपूर्वक पूजा करने लगते हैं अर्थात् समता का भाव भी निर्मल प्राण के अनुकूल होकर प्रत्येक कोशिका में संचरित होने लगा। उस अवस्था के प्रेम के आनन्द का वर्णन नहीं किया जा सकता।
दो0 बामदेव आदिक रिषय पूजे मुदित महीस।
दिए दिव्य आसन सबहि सब सन लही असीस।।320।।
व्याख्या : तब महीस अर्थात् शरीर रूपी पृथ्वी के ईश्वर यानी प्राण रूपी जनक ने शरीर के बाएँ अंगों में रहने वाले दैवीय भावों की पूजा की और सभी को दिव्य आसन देकर अपने अनुकूल कर लिया। उसी को आशीर्वाद लेना कहा गया है।
बहुरि कीन्हि कोसलपति पूजा। जानि ईस सम भाउ न दूजा।।
कीन्हि जोरि कर बिनय बड़ाई। कहि निज भाग्य बिभव बहुताई।।
व्याख्या : तब प्राण रूपी जनक ने बहुत प्रकार से चित रूपी दसरथ की पूजा करी। सुष्मना नाड़ी ही कौशल प्रदेश होता है और जब इन्द्रियाँ निर्मल होकर मन में समा जाती है और मन निर्मल होकर चित में समा जाता है, तो दसरथ यानी दस इन्द्रियों रूपी भाव ही चित स्वरूप हो जाता है। उसे ही कौसलपति यानी सुष्मना नाड़ी का स्वामी चित रूपी दसरथ कहा जाता है। जब चित निर्मल हो जाता है, तब चित ही ईश्वर स्वरूप हो जाता है, इसलिए प्राण रूपी जनक चित रूपी दसरथ की ईश्वर के समान मानकर पूजा करते हैं। उस अवस्था में प्राण रूपी जनक नाना प्रकार से प्रार्थना करता है तथा स्वयं के भाग्य की सराहना करने लगता है।
पूजे भूपति सकल बराती। समधी सम सादर सब भाँती।।
आसन उचित दिए सब काहू। कहौं काह मुख एक उछाहू।।
व्याख्या : तब प्राण रूपी जनक ने भाव रूपी समस्त बरातियों की पूजा करी और समता के भाव से आदर प्रदान किया। उस अवस्था में सहज में ही समता आ जाती है। सभी भावों को यथायोग्य आसन दिए अर्थात् पूरी तरह सहजता में आरूढ़ हो गए। उस अवस्था का वर्णन कैसे किया जा सकता है क्योंकि मुख तो एक होता है परन्तु भावों के आनन्द का उत्साह तो सभी भाव लेते हैं।
सकल बरात जनक सनमानी। दानमान बिनती बर बानी।।
बिधि हरिह डिग्री दिसिपति दिनराऊ। जे जानहिं रघुबीर प्रभाऊ।।
व्याख्या : समस्त भाव रूपी बारात को प्राण रूपी जनक ने सम्मान दिया और दान, मान, विनय व सुन्दर वाणी द्वारा सबको स्वीकार किया। उस ध्यान की अवस्था में विधि अर्थात् क्रिया, हरि अर्थात् माया के भावों को हरण करने वाला भाव, प्राण रूपी दिशाओं के स्वामी और ज्योति स्वरूप सूर्य, जो आत्मा रूपी राम के प्रभाव को जानते हैं।
कपट बिप्र बर बेष बनाएँ। कौतुक देखहिं अति सचु पाएँ।।
पूजे जनक देव सम जानें। दिए सुआसन बिनु पहिचानें।।
व्याख्या : इन सबने कपटपूर्वक अर्थात् जब साधना चरम पर पहुँच जाती है तो निर्मलता की अति चरम सीमा आ जाती है। उस अवस्था में विधि (क्रिया) हरि (माया का हरण करने वाला भाव) व हर (अर्थात् माया का हरण कराने वाला) आदि सभी विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश के रूप में प्रकट हो जाते हैं। तब आत्मा रूपी राम के खेल को देखकर बहुत सुख पाने लगते हैं। तब बिना पहिचाने ही प्राण रूपी जनक ने इन सबको देव भावों के रूप में पूजा और सहज आसन प्रदान किया। वास्तविकता में यही होता है, जब प्राण निर्मल हो जाता है और ध्यान से आत्मा ब्रह्मकमल पर स्थिर हो जाती है, तो प्राण के बल से ही समस्त भाव ब्रह्मरन्ध्र में पहुँच पाते हैं और प्राण के बल से ही वहाँ रह पाते हैं। इसलिए सभी भावों को जनक द्वारा पूजना बताया गया है।
छ0 पहिचान को केहि जान सबहि अपान सुधि भोरी भई।
आनंद कंदु बिलोकि दूलहु उभय दिसि आनन्दमई।।
सुर लखे राम सुजान पूजे मानसिक आसन दए।
अवलोकि सीलु सुभाउ प्रभु को बिबुध मन प्रमुदित भए।।
व्याख्या : उस अवस्था में अपान वायु एकदम शान्त हो जाती है, तो भावों में विभेद मिट जाता है और समता की अवस्था आ जाती है। अत: उसी अनुभूति को लिखते हुए कहा गया है कि अपान वायु शान्त हो गयी इसलिए भावों को अब कौन पहचाने? आनन्द के मूल ब्रह्मकमल को देखकर आत्मा रूपी राम के दोनों दिशाओं अर्थात् परमात्मा की प्राप्ति का आनन्द और शरीर की सहजता का आनन्द प्राप्त हो गया। तब स्वरों के मर्म का ज्ञान हो जाता है और आत्मा रूपी राम मानसिक पूजा करके दैवीय भावों को आसन देते हैं। तब परमात्मा के शील स्वभाव का अनुभव करके मन के नाना भाव आनन्दित हो गए।
दो0 रामचन्द्र मुख चंद्र छबि लोचन चा डिग्री चकोर।
करत पान सादर सकल प्रेमु प्रमोदु न थोर।।321।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम के चन्द्रमा रूपी मुख को देखकर सभी भावों के नेत्र चकोर पक्षी की तरह मुग्ध हो रहे हैं और आदरपूर्वक रस पान करते हुए प्रेम व आनन्द कम नहीं है।
समउ बिलोकि बसिष्ठ बोलाए। सादर सतानंदु सुनि आए।।
बेगि कुँअरि अब आनहु जाई। चले मुदित मुनि आयसु पाई।।
व्याख्या : तब समय की अनुकूलता को देखकर विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ जी ने सत्य के आनन्द स्वरूप सतानंद जी को आदरपूर्वक बुलाया अर्थात् विशिष्ट ज्ञान के भाव ने सत्य के आनन्द की अवस्था का आभास करवाया। विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ मुनि ने कहा कि जल्दी राजकुमारी अर्थात् सुरता रूपी सीता को ले आइए। यानी विशिष्ट ज्ञान के भाव ने प्रेरणा की कि सुरता को परमात्मा में लीन करने के लिए ले आओ। ऐसी आज्ञा सुनकर सत्य के आनन्द स्वरूप सतानंद भाव प्रसन्न होकर सुरता रूपी राजकुमारी को लेने के लिए चल दिए।
रानी सुनि उपरोहित बानी। प्रमुदित सखिन्ह समेत सयानी।।
बिप्र बधू कुलबृद्ध बोलाईं। करि कुल रीति सुमंगल गाईं।।
व्याख्या : तब दिव्य दृष्टि रूपी सुनयना ने पुरोहित अर्थात् शरीर का हित करने वाले (पुर अ हित) सतानंद रूपी भाव की बात सुनकर दया, क्षमा, मैत्री व करूणादि रूपी सखियों के साथ प्रसन्न चित होकर विशुद्ध प्रकाश करनेवाली क्रिया व ज्ञान वैराग्य रूपी अनुभवी भाव रूपी लोगों को बुलाकर मंगल के गीत गाने लगी और कुलरीति अर्थात् सुरता के परमात्मा में मिलने की रीतियों को करते हुए मंगल गान गाने लगी।
नारि बेष जे सुर बर बामा। सकल सुभायँ सुंदरी स्यामा।।
तिन्हहि देखि सुखु पावहिं नारीं। बिनु पहिचानि प्रानहु ते प्यारीं।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में शरीर के बाएँ अंगों वाली नाड़ियाँ भी सुन्दर स्वभाव वाली लगने लगती हैं। शरीर के बाएँ अंगों में आसुरी भावों का निवास होता है परन्तु ब्रह्मरन्ध्र में ध्यान लगने पर बाएँ अंगों की नाड़ियाँ भी सात्विक भाव वाली हो जाती हैं। अत: उन्हें देखकर सभी ब्रह्मरन्ध्र की नारियाँ सुख का अनुभव करने लग जाती हैं और बिना जाने ही बाएँ अंगों वाली नाड़ियाँ भी प्राणों से प्यारी लगने लग जाती हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि समस्त नाड़ियाँ निर्मल होकर सात्विक भावों वाली हो जाती है।
बार बार सनमानहिं रानी। उमा रमा सारद सम जानी।।
सीय सँवारि समाजु बनाई। मुदित मंडपहिं चलीं लवाई।।
व्याख्या : बार-बार दिव्य दृष्टि रूपी सुनयना रानी ईड़ा, पिंगला व सुष्मना नाड़ियों के समान जानकर सभी का आदर करने लगी और सुरता रूपी सीता को सजाकर प्रसन्न होकर मन की सीमा से बाहर (मंडप) चलीं।
छ0 चलि ल्याइ सीतहि सखीं सादर सजि सुमंगल भामिनीं।
नव सप्त साजें सुंदरीं सब मत्त कुंजर गामिनीं।।
कल गान सुनि मुनि ध्यान त्यागहिं काम कोकिल लाजहीं।
मंजीर नूपुर कलित कंकन ताल गति बर बाजहीं।।
व्याख्या : तब क्षमा, करूणा, मैत्री व दयादि रूपी सखियाँ मंगल भावों के साथ सुरता रूपी सीता को लेकर आत्मा रूपी राम से मिलने के लिए लेकर चलीं। तब समस्त नौ नाड़ियों और सप्त चक्रों से सुंदर व सहज भाव उमगने लगते हैं तथा नाड़ियों व चक्रों की गति हाथी की चाल के समान स्थिर होने लग जाती है। उसी को हाथी के समान चलना बोलकर लिखा गया है। तब नाड़ियों व सात चक्रों में प्राण के प्रवाह से मधुर ध्वनि बज उठती है, जिसे सुनकर काम रूपी कोयल भी लजा जाती है और मन के समस्त भाव मधुर ध्वनि में विलीन होने लग जाते हैं। ध्यान में तब मंजीरों, नूपुर और सुंदर कंकनों की आवाज लयबद्ध होने लग जाती है।
दो0 सोहति बनिता बृंद महुँ सहज सुहावनि सीय।
छबि ललना गन मध्य जनु सुषमा तिय कमनीय।।322।।
व्याख्या : समस्त सुगति से धड़कने (चलने) वाली नाड़ियों के बीच में सुरता रूपी सीता ऐसे शोभा पाने लगती है, मानों सुन्दरता की छबि कमनीय स्त्रियों के बीच में पा रही हो।
सिय सुंदरता बरनि न जाई। लघु मति बहुत मनोहरताई।।
आवत दीखि बरातिन्ह सीता। रूप रासि सब भाँति पुनीता।।
व्याख्या : सुरता रूपी सीता की सुन्दरता का वर्णन नहीं किया जा सकता है क्योंकि सुन्दरता तो बहुत है परन्तु वर्णन करने के लिए बुद्धि छोटी है। सुरता रूपी सीता को पवित्र भावों रूपी बरात ने आता हुआ देखकर मन ही मन प्रणाम किया क्योंकि सुरता उस समय सुन्दरता की सीमा व सब प्रकार से पवित्र थी।
सबहिं मनहिं मन किए प्रनामा। देखि राम भए पूरन कामा।।
हरषे दसरथ सुतन्ह समेता। कहि न जाइ उर आनँदु जेता।।
व्याख्या : सभी भाव रूपी बारातियों ने मन ही मन सुरता रूपी सीता को प्रणाम किया और आत्मा रूपी राम को देखकर तो समस्त भावों की पूर्ण संतोष की अवस्था आ गयी। जब सब भाव रूपी बाराती सुरता रूपी सीता व आत्मा रूपी राम को देखकर पूर्ण काम अर्थात् संतुष्ट हो गए, तो चित रूपी दसरथ अपने चार अवस्था रूपी पुत्रों को देखकर बहुत प्रसन्न हुए। उस समय चित रूपी दसरथ के आनन्द का वर्णन नहीं किया जा सकता है।
सुर प्रनामु करि बरिसहिं फूला। मुनि असीस धुनि मंगल मूला।।
गान निसान कोलाहलु भारी। प्रेम प्रमोद मगन नर नारी।।
व्याख्या : उस परमानन्द की अवस्था में समस्त स्वर निर्मल होकर आनन्द रूपी फूलों की वर्षा करने लगते हैं तथा मंगल भावों की ध्वनि उठने लगती है, जिससे मन परमात्मा के आशीर्वाद से भर जाता है। उस समय अनहद नाद की ध्वनि से चारों तरफ कोलाहल मच जाता है अर्थात् ध्यान में अनहद नाद के घण्टे बज उठते हैं, जिससे शरीर के नर और नाड़ी प्रेम व आनन्द से भर उठते हैं।
एहि बिधि सीय मंडपहिं आई। प्रमुदित सांति पढ़हिं मुनिराई।।
तेहि अवसर कर बिधि ब्यवहारू। दुहुँ कुलगुर सब कीन्ह अचारू।।
व्याख्या : इस प्रकार सुरता रूपी सीता मन की सीमा को पार करके परमात्मा रूपी राम से मिलने के लिए आयी। जिससे मन में प्रसन्नता छा गयी व शान्ति मिल गयी। उस समय ध्यान की क्रिया (विधि) द्वारा दोनों कुल गुरुओं अर्थात् विशिष्ट ज्ञान रूपी वसिष्ठ व सत्य के आनन्द स्वरूप सतानन्द ने आचरण किया अर्थात परम ज्ञान व सत्य की अवस्था का आभास होने लगा।
छ0 आचा डिग्री करि गुर गौरि गनपति मुदित बिप्र पुजावहीं।
सुर प्रगटि पूजा लेहिं देहिं असीस अति सुखु पावहीं।।
मधुपर्क मंगल द्रव्य जो जेहि समय मुनि मन महुँ चहैं।
भरे कनक कोपर कलस सो तब लिएहिं परिचारक रहैं।।
व्याख्या : कुलाचार करके अर्थात् निज स्वरूप को पहचान कर साधक विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश (विप्र) द्वारा परम ज्ञान रूपी गुरु, गौ अ अरि (अर्थात् इन्द्रिया जब पर पावन अवस्था को प्राप्त कर लेती हैं तो विशुद्ध श्रद्धा पैदा हो जाती है। अत: उसी परमात्मा के प्रति विशुद्ध श्रद्धा की अवस्था को ही गौरि के प्रतीक के रूप में बताया गया है।) और गणपति अर्थात् जिस परम अवस्था से गुणों की उत्पत्ति होती है। इन सबकी प्रसन्न मन से पूजा होने लगती है अर्थात इन भावों (गुरु उ परम ज्ञान, गौरि उ परम श्रद्धा व गणपति उ गुणों के स्वामी) का प्रभाव बढ़ने लग जाता है और परम सुख का अनुभव करने लगते हैं। उस ध्यान की परम अवस्था में मन के भाव जो भी द्रव्य आदि चाहते हैं, वे तुरन्त सेवकगण सोने के थालों में लेकर प्रकट हो जाते हैं। अर्थात् सिद्धियों की अवस्था आ जाती है, जिससे साधक का मन चाहा होने लग जाता है।
छ0 कुल रीति प्रीति समेत रबि कहि देत सबु सादर कियो।
एहि भाँति देव पुजाइ सीतहि सुभग सिंघासनु दियो।।
सिय राम अवलोकनि परसपर प्रेमु काहुँ न लखि परै।
मन बुद्धि बर बानी अगोचर प्रगट कबि कैसे करै।।
व्याख्या : कुल रीति अर्थात् जीवात्मा के प्रेम को देखकर सभी भावों का आदर करके व समस्त दैवीय भावों की पूजा करके अर्थात् दैवीय भावों को प्रबल करके सुरता रूपी सीता को सिंहासन पर बैठाया गया अर्थात सुरता दैवीय भावों से प्रबलता प्राप्त करके परमात्मा में लीन होने के लिए सिंहासन पर बैठने लगी। सुरता रूपी सीता व परमात्मा रूपी राम जब एक दूसरे को देखते हैं, तो उस प्रीत का वर्णन नहीं किया जा सकता है। क्योंकि वह प्रेम की अनुभूति तो मन, बुद्धि, वाणी व इन्द्रियों से परे की होती है। अत: उसका वर्णन कोई कवि कैसे कर सकता है।
दो0 होम समय तनु धरि अनलु अति सुख आहुति लेहिं।
बिप्र बेष धरि बेद सब कहि बिबाह बिधि देहि।।323।।
व्याख्या : ध्यान की उस परम अवस्था में प्राण के यजन की प्रक्रिया में जिसमे पान में अपान का हवन होने लगता है। जिससे शरीर स्थित हिरण्यानल में आहूतियाँ पड़ने लगती हैं और परम सुख की अनुभूति होने लगती है। तब विशुद्ध ज्ञान का प्रकाश होने लग जाता है, जिससे सुरता रूपी सीता व परमात्मा रूपी राम के मिलन (विवाह) का रहस्य समझ में आने लग जाता है।
जनक पाटमहिषी जग जानी। सीय मातु किमि जाइ बखानी।।
सुजसु सुकृत सुख सुंदरताई। सब समेटि बिधि रची बनाई।।
व्याख्या : प्राण रूपी जनक की दिव्य दृष्टि रूपी सुनयना पटरानी को समस्त संसार जानता है। वो सुरता रूपी सीता की माता हैं अर्थात दिव्य दृष्टि से ही परमात्मा में सुरती लग पाती है। अत: उस दिव्य दृष्टि रूपी सुनयना का वर्णन कैसे किया जा सकता है। दिव्य दृष्टि में तो सुयश, सुकृत्य, सुख व सुन्दरता सब समाए रहते हैं।
समउ जानि मुनिबरन्ह बोलाईं। सुनत सुआसिनि सादर ल्याई।।
जनक बाम दिसि सोह सुनयना। हिमगिरि संग बनी जनु मयना।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था की अनुकूलता को देखकर मन के भावों ने दिव्य दृष्टि रूपी रानी को बुलाया तो सात्विक वृति रूपी सखियाँ आदरपूर्वक ले आयी अर्थात् सात्विक वृतियों से दिव्य दृष्टि प्रकट हो गयी। प्राण रूपी जनक की बाएँ दिशा में दिव्य दृष्टि रूपी सुनयना ऐसे सुशोभित हो रही हैं, मानो हिमगिरि के साथ मयना शोभा पा रही हों। जब वासनाएँ बर्फ के समान शीतल हो जाती हैं, तो मयना यानी मैं नहीं अर्थात् अहंकार विहीन अवस्था आ जाती है।
कनक कलस मनि कोपर रूरे। सुचि सुगंध मंगल जल पूरे।।
निज कर मुदित रायँ अ डिग्री रानी। धरे राम के आगे आनी।।
व्याख्या : उस अवस्था में वासना रूपी स्वर्ण कलश अर्थात मन के वासनायुक्त भाव भी कोपर अर्थात् कामादि से परे होकर सुन्दर हो जाते हैं और सद्गुण रूपी पवित्रता, सुंगध व मंगल भावना रूपी जल से वासना रूपी कलश भर जाता है अर्थात् वासना की वृतियाँ रूपान्तरित होकर सद्गुण व मंगल भावना रूपी रस पैदा करने लग जाती हैं। तब प्राण रूपी जनक और दिव्य दृष्टि रूपी सुनयना रानी अपने आप प्रसन्न होने लगते हैं और समस्त भावों सहित आत्मा रूपी राम के सामने समर्पण कर देते हैं। उसी को ""धरे राम के आगे आनी"" बोलकर लिखा गया है।
पढ़हिं बेद मुनि मंगल बानी। गगन सुमन झरि अवस डिग्री जानी।।
ब डिग्री बिलोकि दंपति अनुरागे। पाय पुनीत पखारन लागे।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में मंगल वाणी में वेदों की (परमात्मा) अनुभूति होने लग जाती है तथा मस्तिष्क रूपी आकाश में आनन्दरूपी फूल झरने लगते हैं। तब आत्मा रूपी राम को देखकर प्राण रूपी जनक और दिव्य दृष्टि रूपी सुनयना अनुराग से भर जाते हैं तथा परम पवित्र अवस्था को प्राप्त करके समर्पित होने लग गए। उसी को ""पाय पुनीत पखारन लागे"" बोलकर लिखा गया है।
छ0 लागे पखारन पाय पंकज प्रेम तन पुलकावली।
नभ नगर गान निसान जय धुनि उमगि जनु चहुँ दिसि चली।।
जे पद सरोज मनोज अरि उर सर सदैव बिराजहीं।
जे सकृत सुमिरत बिमलता मन सकल कलिमल भाजहीं।।
व्याख्या : जब प्राण रूपी जनक और दिव्य दृष्टि रूपी रानी आत्मा रूपी राम के चरण कमलों को धोने लगे अर्थात् परमात्मा में लीन होने लगे, तो प्रेम से तन में पुलकावली छाने लग गयी और मस्तिष्क रूपी आकाश में अनहद रूपी बाजे बजने लगे और चारों दिशाओं में उमंग छाने लग गयी। जो परमात्मा के चरण कमल सदैव काम के शत्रु के हृदय में सदैव विराजते हैं अर्थात् जब साधक काम से मुक्त हो जाता है, तो परमात्मा के चरण कमल ही उसके हृदय में रहते हैं अर्थात् काममुक्त अवस्था परमात्मा में लीनता की अवस्था होती है। जिन परमात्मा के चरण कमलों का स्मरण करने से मन में निर्मलता आ जाती है और देह बुद्धि के विकार मिट जाते हैं।
छ0 जे परसि मुनिबनिता लही गति रही जो पातकमई।
मकरंदु जिन्ह को संभु सिर सुचिता अवधि सुर बरनई।।
करि मधुप मन मुनि जोगिजन जे सेइ अभिमत गति लहैं।
ते पद पखारत भाग्यभाजनु जनकु जय जय सब कहैं।।
व्याख्या : जिस आत्मा रूपी राम के चरणों का स्पर्श करके मन की वासना रूपी वृति ने सद्गति प्राप्त कर ली और जिन चरण कमलों के मकरंद को साधक स्वयं सिर पर धारण करके पवित्रता की सीमा को प्राप्त कर लेता है। जो उसके स्वरों की गति के माध्यम से प्रकट हो जाता है। इसलिए मुनिगण अपने मन रूपी भ्रमर को परमात्मा के चरण कमलों में लगाकर अमृत रस का पान करने लगते हैं। उन्हीं चरण कमलों को भाग्यशाली प्राण रूपी जनक धोने लगते हैं। अर्थात् निर्मल प्राण ही आत्मा रूपी राम के चरणों का स्पर्श कर पाते हैं।
छ0 बर कुअँरि करतल जोरि साखो चा डिग्री दोउ कुलगुर करैं।
भयो पानिगहनु बिलोकि बिधि सुर मनुज मुनि आनंद भरैं।।
सुखमूल दूलहु देखि दंपति पुलक तन हुलस्यो हियो।
करि लोक बेद बिधानु कन्यादानु नृपभूषन कियो।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता के हाथों को जोड़कर विशिष्ट ज्ञान रूपी वसिष्ठ व सत्य के आनन्द स्वरूप सतानंद रूपी दोनों कुल गुरु साखो चा डिग्री अर्थात् मंगल की मूल वृतियों को जोड़ने लगे। जब समस्त मंगल की वृतियाँ मिल जाती हैं, तो पानि ग्रहण अर्थात् जैसे जल जल में मिलकर एक हो जाता है, वैसे ही समस्त वृतियाँ व भाव परमात्मा में लीन होकर एक हो जाते हैं। उसी अवस्था को पाणिग्रहण कहा जाता है। ध्यान की अवस्था में पाणिग्रहण की विधि (क्रिया) को देखकर स्वरों व मन में आनन्द भर जाता है। उस अवस्था में सुख के मूल परमात्मा रूपी दूल्हे को देखकर प्राण रूपी राजा व दिव्य दृष्टि रूपी रानी प्रसन्न हो उठे और उनका हृदय उल्लास से भर गया। तब प्राण रूपी जनक ने लोक व वेद विहित क्रियाओं का पालन करके सुरता रूपी सीता कन्या का दान कर दिया अर्थात् प्राण से उत्पन्न सुरता को परमात्मा में लीन कर दिया।
छ0 हिमवतं जिमि गिरिजा महेसहि हरिहि श्री सागर दई।
तिमि जनक रामहि सिय समरपी बिस्व कल कीरित नई।।
क्यों करै बिनय बिदेहु कियो बिदेहु मूरति साँवरी।
करि होमु बिधिवत गाँठि जोरी होन लागीं भाँवरी।।
व्याख्या : जैसे हिमवंत ने गिरिजा को महेश को और सागर ने श्री को हरि को दिया वैसे ही जनक ने सीता को राम को देकर संसार में नयी कीर्ति को प्राप्त किया। यहाँ साधना का गहरा रहस्य छुपा हुआ है। क्योंकि जब साधक की वासनाएँ शान्त हो जाती हैं, तो वह बर्फ के समान शीतल (हिम अ वंत) हो जाता है और हिमवंत से उत्पन्न श्रद्धा रूपी पार्वती का भाव परमात्मा के महेश्वर भाव (महा अ ऐश्वर्य) में लीन हो जाता है। अत: उसी को हिमवंत द्वारा श्रद्धा रूपी पुत्री को महेश रूपी महेश्वर भाव को समर्पित करना बताया गया है। दूसरी तरफ जब साधक हरि अर्थात् माया के भावों को हरण कर लेता है, तो वासना रूपी उदर (सागर) से उत्पन्न श्री (सुख-वैभव रूपी वृति) का भाव भी परमात्मा में लीन हो जाता है अर्थात् सांसारिक वैभव को छोड़कर परमात्मा के प्रेम का आनन्द मिलने लग जाता है। अत: उसी को वासना रूपी सागर (उदर) से उत्पन्न श्री को हरि को सौंपना बताया गया है। वैसे ही ध्यान में प्राण तत्व निर्मल हो जाता है, तो प्राण से उत्पन्न सुरता भी परमात्मा रूपी राम में लीन हो जाती है। उसी अवस्था को सुरता रूपी सीता को परमात्मा रूपी राम को सौंपना बताया गया है। अब उस महामिलन की अवस्था में प्राण रूपी विदेह जनक क्यों प्रार्थना करे? क्योंकि सभी भाव तो परमात्मा में लीन हो गए। ऐसी अवस्था में अच्छी प्रकार से ध्यान की क्रिया (विधि) सध जाती है और पान का अपान में अच्छी तरह होम होने लगता है और भाँवरी पड़ने लग जाती हैं। भाँवरी अर्थात् भाव अ अरि यानी उस अवस्था में पान का अपान में हवन होता रहता है परन्तु भाव पैदा नहीं होते हैं। पूरी तरह शून्य की अवस्था आ जाती है। उसी अवस्था को भावों की शत्रु अर्थात् भाँवरी पड़ना बोला गया है।
दो0 जय धुनि बंदी बेद धुनि मंगल गान निसान।
सुनि हरषहिं बरषहिं बिबुध सुरत डिग्री सुमन सुजान।।324।।
व्याख्या : ध्यान की उस महामिलन की अवस्था में मंगल भावना की वाणी उमगने लगती है और अनहद नाद की नाना ध्वनियाँ बजने लगती हैं। जिनको सुनकर स्वर का मूल चित (सुरतरू) सुमन अर्थात् अच्छे भाव पैदा करने लगता है और आनन्द व हर्ष के भावों की वर्षा होने लगती है।
कुअँ डिग्री कुअँरि कल भावँरि देहीं। नयन लाभु सब सादर लेहीं।।
जाइ न बरनि मनोहर जोरी। जो उपमा कछु कहौं सो थोरी।।
व्याख्या : उस महामिलन की अवस्था में चित रूपी राजकुमार व चित की अवस्था रूपी राजकुमारी भाँवरी अर्थात् भाव रहित होने लगते हैं यानी शून्य में समाने लगते हैं और सभी भाव उस अवस्था को देखने का लाभ लेना चाहते हैं। उस मन को हरण (मनोहर) करने वाली अवस्था का वर्णन नहीं किया जा सकता है, क्योंकि उस अवस्था की जो भी उपमा दी जाये वह छोटी ही होगी।
राम सीय सुंदर प्रतिछाहीं। जगमगात मनि खंभन माहीं।।
मनहुँ मदन रति धरि बहु रूपा। देखत राम बिआहु अनूपा।।
व्याख्या : परमात्मा रूपी राम और सुरती रूपी सीता की प्रतिछाया मणियों के खम्भों जैसे जगमगाने लगती है। उस समय ऐसा लगने लगता है, मानो काम व काम की वृति रूपी रति ने बहुत रूप धारण कर लिए हैं और आत्मा व सुरता के मिलन को देख रहे हैं।
दरस लालसा सकुच न थोरी। प्रगटत दुरत बहोरि बहोरि।।
भए मगन सब देख निहारे। जनक समान अपान बिसारे।।
व्याख्या : उस महामिलन की अवस्था को देखने की लालसा तो बहुत होती है परन्तु वह अवस्था कभी प्रकट तो कभी दूर होती चली जाती है। उस अवस्था (आत्मा व सुरता) को देखने वाले सब भाव मग्न हो जाते हैं और उस अवस्था में साधक का पान (जनक) समान व अपान वायु भी बिसर जाता है अर्थात् प्राण का भी आभास मिट जाता है। वह अवस्था परम शून्य की अवस्था होती है।
प्रमुदित मुनिन्ह भावँरी फेरीं। नेग सहित सब रीति निबेरी।।
राम सीय सिर सेंदुर देहीं। सोभा कहि न जाति बिधि केहीं।।
व्याख्या : उस अवस्था में मन की अवस्था प्रसन्न हो जाती है और मन भी भावों से परे हो जाता है तथा मन समस्त वृतियों से मुक्त हो जाता है। ध्यान की उस अवस्था में मन भावों से मुक्त होकर प्रसन्नता के आभास के रूप में बच जाता है। उस अवस्था में परमात्मा रूपी राम स्वयं सुरता रूपी सीता के सिर में सिंदूर देते हैं अर्थात् स्वयं परमात्मा सुरता को अपने रंग में रंगने लग जाती है। उस अवस्था के आनन्द की शोभा का वर्णन किसी भी प्रकार नहीं किया जा सकता है।
अरुन पराग जलजु भरि नीकें। ससिहि भूष अहि लोभ अमी कें।।
बहुरि बसिष्ठ दीन्हि अनुसासन। ब डिग्री दुलहिनि बैठे एक आसन।।
व्याख्या : ध्यान में जब सुरता परमात्मा में लीन होने लगती है, तो ब्रह्मकमल खुल जाता है और दिव्यशक्ति की दिव्यता से भर जाता है। उसी अवस्था को प्रतीकों का सहारा लेकर कहा गया है कि ब्रह्म कमल लाल पराग (दिव्यता) से भर जाता है और उस समय सांसारिक वासनाएँ एकदम शान्त हो जाती हैं। अत: उन्हीं वासनाओं की अवस्था को बताते हुए कहा गया है कि वासना रूपी सर्प मानो चन्द्रमा रूपी शीतलता को अमृत की लालसा से सुशोभित कर रहे हों। जब ब्रह्मकमल दिव्यता से भर जाता है, तब विशिष्ट ज्ञान रूपी वसिष्ठ सुरता व आत्मा को एक आसन पर बैठने की आज्ञा देते हैं। अर्थात् विशिष्ट ज्ञान के अनुभव से ही सुरता व आत्मा एक होने लगते हैं। यह अवस्था सुरता की परमात्मा में लीन होने की शुरूआत की होती है। जब आत्मा व सुरता का मिलन हो जाता है और सुरता परमात्मा में लीन होने लग जाती है, तब जो अनुभूति होती है, उसी को आगे के छन्द में लिखा गया है।
छ0 बैठे बरासन रामु जानकि मुदित मन दसरथु भए।
तन पुलक पुनि पुनि देखि अपने सुकृत सुरत डिग्री फल नए।।
भरि भुवन रहा उछाहु राम बिबाहु भा सबहीं कहा।
केहि भाँति बरनि सिरात रसना एक यहु मंगलु महा।।
व्याख्या : जब बरासन अर्थात् बराबर के आसन पर सुरता रूपी सीता और आत्मा रूपी राम बैठ गए, तो चित रूपी दसरथ का मन प्रसन्न हो गया और अपने सुकृत्यों को देखकर अर्थात् वासना से मुक्त हुआ देखकर और स्वर रूपी त डिग्री में शान्ति रूपी नए फल देखकर बार-बार शरीर पुलकित होने लग गया। उस अवस्था में सभी भावों में उत्साह छा गया तथा सब कहने लगे कि परमात्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता का मिलन (विवाह) हो गया। उस परमानन्द की अवस्था का वर्णन कैसे किया जा सकता है, क्योंकि महामंगल तो अनेक होता है परन्तु जीभ्या तो एक ही होती है।
छ0 तब जनक पाइ बसिष्ठ आयसु ब्याह साज सँवारि कै।
मांडवी श्रुति कीरति उरमिला कुअँरि लईं हँकारि कै।।
कुसकेतु कन्या प्रथम जो गुन सील सुख सोभामई।
सब रीति प्रीति समेत करि सो ब्याहि नृप भरतहि दई।।
व्याख्या : तब प्राण रूपी जनक ने विशिष्ट ज्ञान रूपी वसिष्ठ की आज्ञा लेकर मिलन (विवाह) के साज को सजा दिया अर्थात् विशिष्ट ज्ञान की प्रेरणा के बल से प्राण ने सुरता व परमात्मा के मिलन की व्यवस्था कर दी। जब सुरता परमात्मा में लीन होने लगती है, तो चित व चित की वृतियाँ व उपवृतियाँ सब एक होने लग जाती हैं। उसी अनुभूति को यहाँ बहुत सूक्ष्मता के साथ लिखा गया है। मांडवी महिमामंडन की वृति होती है और श्रुतकीरति यश सुनने की वृति होती है तथा उर्मिला अर्थात् उर अ मिला उ उरमिला मोह की वृति होती है। ये चित की वृतियां चित की अवस्थाओं के अनुरूप चलती हैं। इसलिए महिमा मंडन रूपी मांडवी को त्याग रूपी भरत को विवाह दी जाती है क्योंकि महिमा मंडन की वृति जब त्याग के भाव के अधीन रहती है, तभी जाकर सुरता परमात्मा में लीन रह सकती है। मांडवी के पिता का नाम कुश ध्वज बताया गया है। कुश ध्वज अहंकार का प्रतीक होता है क्योंकि अतिसूक्ष्म अहंकार यानी कुश से भी सूक्ष्म अहंकार से ही महिमा मंडन रूपी मांडवी पैदा होती है। महिमामंडन रूपी मांडवी शील व गुणों की खान तो होती है क्योंकि बिना शील व सद्गुणों के तो महिमा मंडन हो ही नहीं पाता है। अत: ध्यान में सुरता के परमात्मा में लीन होने पर प्रथम में मांडवी रूपी महिमामंडन के भाव को त्याग रूपी भरत को सौंप दिया जाता है। सुरता रूपी सीता की छोटी बहिन मोह युक्त प्रीति रूपी उर्मिला होती है, जो प्राण रूपी जनक से ही पैदा होती है। जब मोहयुक्त प्रीत का भाव अगर परमात्मा में लग जाता है, तो कल्याणकारी हो जाता है और अगर संसार में लग जाए तो जीव को मोह जाल में फँसा देता है। अत: मोहयुक्त प्रीत के लक्षणों को पहचान करके लखन रूपी लक्ष्मण को देने से मोहयुक्त प्रीत परमात्मा में लग जाती है। अत: उर्मिला को लक्ष्मण के साथ ब्याह ने की बात कही गयी है। उसी को आगे के छन्द में लिखा गया है।
छ0 जानकी लघु भगिनी सकल सुंदरि सिरोमनि जानि कै।
सो तनय दीन्ही ब्याहि लखनहि सकल बिधि सनमानि कै।।
जेहि नामु श्रुतकीरति सुलोचनि सुमुखि सब गुन आगरी।
सो दई रिपुसूदनहि भूपति रूप सील उजागरी।।
व्याख्या : सुरता रूपी सीता की छोटी बहिन मोह मुक्त प्रीत रूपी उर्मिला जो कि सब प्रकार से सुंदर होती है, का विवाह अर्थात् मिलन लखन रूपी लक्ष्मण के साथ सब प्रकार से विधि पूर्वक कर दिया। अहंकार रूपी कुशध्वज से ही यशगान रूपी श्रुतकीर्ति का भाव पैदा होता है। अत: यश भाव का दमन करना जरूरी होता है, वरना सुरता का परमात्मा में लीन रहना कठिन हो जाता है। अत: यशज्ञान रूपी श्रुतकीर्ति को शत्रुघन रूपी भाव को ब्याहने की बात कही गयी है।
छ0 अनुरूप बर दुलहिनि परस्पर लखि सकुच हियँ हरषहीं।
सब मुदित सुंदरता सराहहिं सुमन सुर गन बरषहीं।।
सुंदरी सुंदर बरन्ह सह सब एक मंडप राजहीं।
जनु जीव उर चारिउ अवस्था बिभुन सहित बिराजहीं।।
व्याख्या : चित की वृतियों के अनुरूप चित की चारों अवस्थाओं रूपी दूल्हा व दुल्हिनियों को देखकर आनन्दित होकर सांसारिक हृदय सिमट गया। उस अवस्था में सब प्रकार से भावों की सुन्दर अवस्था आ गयी और स्वरों के माध्यम से अच्छे भाव (सु अ मन) बरषने लग गए। समस्त चित की वृतियाँ चित की अवस्थाओं के साथ मिल गयी। तब ध्यान में यह अवस्था आ जाती है, तो जीव के चित की चारों अवस्था भावहीन अर्थात् शून्य में समा जाती हैं।
दो0 मुदित अवधपति सकल सुत बधुन्ह समेत निहारि।
जनु पाए महिपाल मनि क्रियन्ह सहित फल चारि।।325।।
व्याख्या : सुरता के परमात्मा में लीन होने की अवस्था को देखकर दस इन्द्रियों रूपी दसरथ चित की वृतियों व चित की चारों अवस्थाओं को देखकर धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष के चारों फलों को प्राप्त कर लेता है। अर्थात् साधक की परम सहज अवस्था आ जाती है।
जसि रघुबीर ब्याह बिधि बरनी। सकल कुअँर ब्याहे तेहिं करनी।।
कहि न जाइ कछु दाइज भूरी। रहा कनक मनि मंडपु पूरी।।
व्याख्या : जैसे आत्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता का मिलन (विवाह) होता है, वैसे ही चित की वृति रूपी राजकुमारियों और चित की अवस्था रूपी राजकुमारों का भी मिलन हो जाता है। उस अवस्था में दाइज अर्थात् दहेज यानी देह के भावों का त्याग हो जाता है, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। क्योंकि समस्त मंडप अर्थात् मन से परे की अवस्था आ जाती है और ज्ञान रूपी मणि के प्रकाश से माया चकाचौंध हो जाती है अर्थात् माया के भाव निष्प्रभावी हो जाते हैं।
कंबल बसन बिचित्र पटोरे। भाँति भाँति बहु मोल न थोरे।।
गज रथ तुरग दास अ डिग्री दासी। धेनु अलंकृत काम दुहा सी।।
व्याख्या : उस परम मिलन की अवस्था में कंबल अर्थात् कामना अ बल यानी कामनाओं और वासनाओं का प्रभाव मिट जाता है, जिससे विचित्र अर्थात् विशुद्ध अ चित्र अर्थात् दृष्टा बनकर देखने की अवस्था आ जाती है। उस अवस्था में कामना व वासनाओं का कोई महत्व नहीं रह जाता है। वासनाओं की इच्छा नाना प्रकार की कामनाओं के अलंकार से अलंकृत रहती हैं। कुछ वासनाओं की कामना हाथी की वृति वाली तो कुछ रथ, घोड़े, दास व दासी वृति की होती हैं।
बस्तु अनेक करिअ किमि लेखा। कहि न जाइ जानहिं जिन्ह देखा।।
लोकपाल अवलोकि सिहाने। लीन्ह अवधपति सबु सुखु माने।।
व्याख्या : इच्छा रूपी अनेक वस्तुएँ होती हैं। अत: उनका वर्णन नहीं किया जा सकता है। उस अवस्था का तो वर्णन नहीं किया जा सकता है। उसे तो वही जान पाता है जिसने उसका अनुभव किया हो। उस परम अवस्था को देखकर तो लोकपाल अर्थात् लोक भाव सिहा गए अर्थात् निष्प्रभावी हो गए। उस परम अवस्था को अवधपति अर्थात् अवधी रूपी शरीर के स्वामी निर्मल चित रूपी दसरथ ने सुख मानकर स्वीकार कर लिया।
दीन्ह जाचकन्हि जो जेहि भावा। उबरा सो जनवासेहिं आवा।।
तब कर जोरि जनकु मृदु बानी। बोले सब बरात सनमानी।।
व्याख्या : उस परम मिलन की अवस्था में मन की चाह रूपी याचकों को सब कुछ भावों के अनुरूप मिल गया अर्थात् स्वत: परम सिद्धि की अवस्था आ गयी। उस अवस्था में जो कुछ बच गया अर्थात् मन की चाहपूर्ण होने पर भी कुछ कामना बच ही जाती हैं, वे सब भावों के उत्पत्ति स्थान (जनवासा) में जाकर समा गयी अर्थात् शान्त हो गयी। तब प्राण रूपी जनक ने मधुर वाणी में सभी भाव रूपी बारात का सम्मान करते हुए बोला। अर्थात् प्राण रूपी जनक अब पूरी तरह सहज हो गया। उस अवस्था की अनुभूति का ही आगे के छन्द में वर्णन किया गया है।
छ0 सनमानि सकल बरात आदर दान बिनय बड़ाइ कै।
प्रमुदित महामुनि बृंद बंदे पूजि प्रेम लड़ाइ कै।।
सि डिग्री नाइ देव मनाइ सब सन कहत कर संपुट किएँ।
सुर साधु चाहत भाउ सिंधु कि तोष जल अंजलि दिएँ।।
व्याख्या : प्राण रूपी जनक ने भाव रूपी बारात का दान व प्रार्थना द्वारा सम्मान करके प्रेमपूर्वक महामन के भावों का पूजन किया। जब मन प्रकृति की सीमा को पार कर जाता है, तब वह महामन अर्थात् समष्टि में लीन हुआ मन कहलाता है। तब उस अवस्था में प्राण रूपी जनक कहते हैं कि देव व साधु तो केवल भावों को चाहते हैं। उन्हें कोई वस्तु देकर संतुष्ट नहीं किया जा सकता है। जैसे समुद्र को क्या एक अंजुलि जल देकर संतुष्ट किया जा सकता है? उसी प्रकार महामन के भावों को कुछ देकर संतुष्ट नहीं किया जा सकता है।
छ0 कर जोरि जनकु बहोरि बंधु समेत कोसलराय सों।
बोले मनोहर बयन सानि सनेह सील सुभाव सों।।
संबंध राजन रावरें हम बड़े अब सब बिधि भए।
एहि राज साज समेत सेवक जानिबे बिनु गथ लए।।
व्याख्या : तब प्राण रूपी जनक अपने भाई अहंकार रूपी कुशध्वज सहित निर्मल चित रूपी दसरथ के पास जाकर प्रेम, विनय व शील से युक्त मन को हरने वाली वाणी बोले कि हे चित रूपी राजा! आपके साथ सम्बन्ध हो जाने से आज हम सब प्रकार से बड़े हो गए हैं। इसलिए आज से राज समाज अर्थात् समस्त भावों सहित मुझे मेरे भाई अहंकार रूपी कुशध्वज सहित आपका दास समझिये। वास्तविकता में यही होता है कि जब चित की समस्त वृतियाँ व अवस्थाएँ एक हो जाती हैं, तो प्राण व अहंकार भी पूरी तरह चित के अधीन हो जाता है। उसी अवस्था के अनुभव को यहाँ लिखा गया है। उसी अनुभूति को आगे के छन्द में लिखते हैं कि --
छ0 ए दारिका परिचारिका करि पालिबीं करूना नई।
अपराधु छमिबो बोलि पठए बहुत हौं ढीठयो कई।।
पुनि भानुकुल भूषऩ सकल सनमान निधि समधी किए।
कहि जाति नहीं बिनती परस्पर प्रेम परिपूरन हिए।।
व्याख्या : इन वृति रूपी लड़कियों को सेविका मानकर नित्य नई करूणा करके पालना अर्थात् चित की वृतियों को सदैव करूणा के भावों के द्वारा अपने वश में रखना चाहिए वरना स्वतंत्र होकर चित को पुन: विचलित कर सकती हैं। मेरे अपराधों को क्षमा करना कि इस अवस्था में पहुँचाने के लिए बहुत ढीठता की है। अर्थात् परम मिलन की अवस्था बहुत मुश्किल से प्राप्त हुई है। तब निर्मल चित रूपी सूर्य ने प्राण रूपी जनक को सब प्रकार से सम्मान देकर सम्मान का समुद्र ही बना दिया अर्थात् चित और प्राण की एक सी अवस्था हो गयी। उस परस्पर चित व प्राण के प्रेम का वर्णन नहीं किया जा सकता है। क्योंकि उस अवस्था में हृदय पूर्ण प्रेम से भर जाता है।
छ0 बृंदारका गन सुमन बरिसहिं राउ जनवासेहि चले।
दुंदुभी जय धुनि बेद धुनि नभ नगर कौतुहल भले।।
तब सखीं मंगल गान करत मुनीस आयसु पाइ कै।
दूलह दुलहिनिन्ह सहित सुंदरि चलीं कोहबर ल्याइ कै।।
व्याख्या : उस परम मिलन की अवस्था में दैवीय भावों का समूह अर्थात् वृंद अ दारका यानी स्वरों की नाड़ियों से सुमन यानी दैवीय भावों की वर्षा होने लगती है और प्राण रूपी व चित रूपी राजा जनवासे अर्थात मूल अवस्था के लिए चले। उस अवस्था में नगाड़ों व अनहद नाद की ध्वनि आने लगती है, जिससे शरीर रूपी नगर में कौतुहल मच जाता है। तब मुनि की आज्ञा पाकर अर्थात् मन की एकाग्रता पाकर सब वृति रूपी सखियाँ मंगल भावना को पैदा करने लगती हैं। तब वृति रूपी सखियाँ चित की अवस्था रूपी दूल्हों और वृति रूपी दुल्हनों को लेकर कोहबर अर्थात् परम मूल अवस्था में लेकर चलीं। उस अवस्था में चित समस्त वृतियों सहित परमात्मा में लीन होने लग जाता है। उसी अनुभूति को यहाँ लिखा गया है।
दो0 पुनि पुनि रामहि चितव सिय सकुचति मनु सकुचैन।
हरत मनोहर मीन छबि प्रेम पिआसे नैन।।326।।
व्याख्या : उस परम मिलन की अवस्था में सुरता रूपी सीता बार-बार परमात्मा रूपी राम को देखकर सकुचा जाती हैं, परन्तु उनका मन नहीं सकुचाता है। उस परम अवस्था में मन की मछली रूपी समस्त वृतियों का हरण हो जाता है और सुरता के नयन प्रेम के प्यासे हो जाते हैं। अर्थात् परमात्मा के प्रति अटूट प्रेम पैदा हो जाता है।
।। मास पारायण, ग्यारहवाँ विश्राम।।
स्याम सरी डिग्री सुभायँ सुहावन । सोभा कोटि मनोज लजावन।।
जावक जुत पद कमल सुहाए। मुनि मन मधुप रहत जिन्ह छाए।।
व्याख्या : उस परम मिलन की अवस्था का क्या-क्या अनुभव होता है। उसी अनुभूति को यहाँ लिखा गया है कि परमात्मा का श्याम शरीर होता है जो सहज में ही सुन्दर होता है और करोड़ों कामदेवों को लजाने वाला होता है। परमात्मा का कोई आकार नहीं होता है परन्तु जब आत्मा पूर्ण रूप से निर्मल हो जाती है, तो श्यामता का आभास होने लगता है। इसलिए श्याम शरीर जो सहज में ही सुन्दर होता है, बताया गया है। परमात्मा के चरण कमल प्रेम रूपी पराग से भरे हुए बहुत सुन्दर लगते हैं, जिन पर मन की एकाग्रता रूपी भ्रमर मँडराता रहता है। चरण कमल का तात्पर्य परमात्मा की सत्ता से होता है।
पीत पुनीत मनोहर धोती। हरति बाल रबि दामिनि जोती।।
कल किंकिनि कटि सूत्र मनोहर। बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर।।
व्याख्या : ध्यान की अवस्था में जब परममिलन की अवस्था आ जाती है तो कुण्डलिनि शक्ति का मकर तार पीले वर्ण का पवित्र होकर मन का हरण करने वाला हो जाता है तथा कुण्डलिनि शक्ति की ज्योति बाल सूर्य व बिजली की चमक को भी हरने वाली हो जाती है। अर्थात् कुण्डलिनि शक्ति का तेज बाल सूर्य यानी उदित होते हुए सूर्य व बिजली की चमक से भी ज्यादा लगने लगता है। उस अवस्था में कमर से उठकर कुण्डलिनि शक्ति मन को हरने वाले सूत्र की तरह हो जाती है। उस अवस्था में साधक का आत्मबल विशाल हो जाता है तथा सद्गुण रूपी आभूषणों से सुशोभित हो उठता है।
पीत जनेउ महाछबि देई। कर मुद्रिका चोरि चितु लेई।।
सोहत ब्याह साज सब साजे। उर आयत उरभूषन राजे।।
व्याख्या : उस अवस्था में पीत वर्ण की जनेउ की तरह दिखने वाली कुण्डलिनि शक्ति बहुत शोभा को प्राप्त होती है और ध्यान की मुद्रा चित का हरण करके चित को स्थिर कर देती है। उस अवस्था में महामिलन (विवाह) के सब साज सज जाते हैं और साधक का विशाल हृदय सद्गुण रूपी आभूषणों से सज जाता है।
पिअर उपरना काखा सोती। दुहुँ आँचरन्हि लगे मनि मोती।।
नयन कमल कल कुंडल काना। बदनु सकल सौंदर्ज निधाना।।
व्याख्या : प्रकृति रूपी सुन्दर दुपट्टे के दोनों कोनों पर मन के भाव रूपी मोती लगे होते हैं। उस समय साधक की दिव्य दृष्टि कमल के फूल की तरह खुल जाती है और प्राण की ध्वनि स्थिर होने लग जाती है। उसे ही कल (ध्वनि) कुंडल काना बोलकर लिखा गया है। इस प्रकार समस्त शरीर ही सौन्दर्य की खान बन जाता है।
सुंदर भृकुटि मनोहर नासा। भाल तिलकु रूचिरता निवासा।।
सोहत मौ डिग्री मनोहर माथे। मंगलमय मुकुता मनि गाथे।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में भृकुटि और नासिका मन का हरण करने वाले हो जाते हैं और भौंहों पर तीन गुण एक होकर सुन्दर तिलक का आभास कराने लगते हैं। उस अवस्था में सिर पर मनोहर मोर बन जाता है अर्थात् माया के भाव मिटकर सब सृष्टि में ही आनन्द रूपी मोर बनकर मंगल भावना के भाव नाचने लगते हैं।
छ0 गाथे महामनि मौर मंजुल अंग सब चित चोरहीं।
पुर नारि सुर सुंदरीं बरहि बिलोकि सब तिन तोरहीं।।
मनि बसन भूषन वारि आरति करहिं मंगल गावहीं।
सुर सुमन बरिसहिं सूत मागध बंदि सुजसु सुनावहीं।।
व्याख्या : जब ध्यान में महामन की अवस्था आ जाती है, तो समस्त सृष्टि में आनन्द छा जाता है एवं चित की समस्त वृतियाँ परमात्मा में लग जाती हैं। उस समय शरीर रूपी नगर की समस्त नारियाँ (नाड़ियाँ) व स्वर सुन्दर भावना से भर जाते हैं और परमात्मा को देखकर आश्चर्य चकित होकर तृन तोड़ने लगते हैं अर्थात् कामना करते हैं कि सदैव यह सुखद अवस्था बनी रहे। मन की वासनाएँ दूर हो जाती हैं और मंगल की भावना भर जाती है। उस अवस्था में स्वरों से सात्विक भावों की वर्षा होने लग जाती है तथा वन्दना के भाव परमात्मा का यशोगान करने लगते हैं।
छ0 कोहबरहिं आने कुअँर कुअँरि सुआसिनिन्ह सुख पाइकै।
अति प्रीति लौकिक रीति लागीं करन मंगल गाइ कै।।
लहकौरि गौरि सिखाव रामहि सीय सन सारद कहैं।
रनिवासु हास बिलास रस बस जन्म को फलु सब लहैं।।
व्याख्या : ध्यान की उस परम अवस्था में समस्त सद्वृतियाँ सुख के साथ चित की अवस्था रूपी राजकुमारों और वृतियाँ रूपी राजकुमारियों को परमात्मा की मूल अवस्था (कोहबर) में लेकर चली। उस समय अति प्रेम की अवस्था पैदा हो जाती है और मंगल भावना के भाव पैदा हो उठते हैं। उस अवस्था में श्रद्धा रूपी पार्वती (गौरि का तात्पर्य परमात्मा के प्रति अटूट श्रद्धा भाव से होता है, इसलिए श्रद्धा रूपी पार्वती को गौरि यानी गो अ अरि अर्थात् इन्द्रियों की शत्रु) परमात्मा रूपी राम को लहकोरी अर्थात् ग्रास खिलाना सिखाती हैं, तो दूसरी तरफ सरस्वती अर्थात् स्वरों को संयमित करने वाला परम भाव रूपी सरस्वती सुरता रूपी सीता को लहकोरी सिखाता है। अर्थात् श्रद्धा से परमात्मा और स्वर संयम से सुरता दृढ़ होकर एक हो जाते हैं। ऐसी परम अवस्था आ जाने पर समस्त नाड़ियों में आनन्द विलास के भाव संचरित हो उठते हैं। ऐसी अवस्था को प्राप्त कर लेने पर साधक का जन्म धन्य हो जाता है।
छ0 निज पानि मनि महुँ देखि अति मूरति सुरुपनिधान की।
चालति न भुजबल्ली बिलोकनि बिरह भय बस जानकी।।
कौतुक बिनोद प्रमोदु प्रेमु न जाइ कहि जानहिं अलीं।
बर कुअँरि सुंदर सकल सखीं लवाइ जनवासेहि चलीं।।
व्याख्या : जब सुरता परमात्मा में लीन हो जाती है, तो परमात्मा की सुन्दर छवि को अपने आपमें ही निहार कर सुरता विरह के भय से परमात्मा में ही स्थिर हो जाती है। उस अवस्था के विनोद, आनन्द व प्रेम का वर्णन नहीं किया जा सकता है। उस अवस्था को तो सुरता की वृति रूपी सखियाँ ही जान सकती हैं। उस अवस्था में समस्त वृतियों सहित सुरता व परमात्मा अपनी मूल अवस्था में आ जाते हैं।
छ0 तेहि समय सुनिअ असीस जहँ तहँ नगर नभ आनँद महा।
चि डिग्री जिअहुँ जोरीं चारू चार्यो मुदित मन सबहीं कहा।।
जोगीन्द्र सिद्ध मुनीस देव बिलोकी प्रभु दुंदुभि हनी।
चले हरषि बरषि प्रसून निज निज लोक जय जय जय भनी।।
व्याख्या : ध्यान की उस परम मिलन की अवस्था में समस्त शरीर रूपी नगर व मस्तिष्क रूपी आकाश में आनन्द छा जाता है और शुभासिस के भाव पैदा हो जाते हैं। तब मन प्रसन्न होकर चाहता है कि चित की चारों अवस्था व चारों वृतियाँ सदैव मिले रहें। उस अवस्था को प्राप्त करके योगियों, सिद्धों व मुनियों ने परमात्मा को प्राप्त कर लेने का डंका बजाया है। अर्थात् सभी ने सुरता व परमात्मा के मिलन को ही परमात्मा की प्राप्ति होना बताया है। उस अवस्था को प्राप्त कर लेने पर परम सहज अवस्था आ जाती है और सब शरीर के अंग रूपी लोकों में जय जय जय ध्वनि छा जाती है।
दो0 सहित बधुटिन्ह कुअँर सब तब आए पितु पास।
सोभा मंगल मोद भरि उमगेउ जनु जनवास।।327।।
व्याख्या : ध्यान में महामिलन की अवस्था सदा नहीं बनी रह सकती है। अत: ध्यान पुन: धीरे-धीरे उतरने लगता है, तो परमात्मा का अनुभव करने के बाद शरीर में कैसा अनुभव होता है? उसी अनुभूति को इस दोहे में लिखा गया है। ध्यान जब पुन: उतरने लगता है तो चित की अवस्था रूपी चारों राजकुमार व चारों राजकुमारी रूपी वृतियाँ दसरथ रूपी स्थूल चित के पास आते हैं, तो उस समय शोभा, मंगल भावना व आनन्द से समस्त जनवास अर्थात् प्राण भर जाते हैं।
पुनि जेवनार भई बहु भाँती। पठए जनक बोलाइ बराती।।
परत पाँवड़े बसन अनूपा। सुतन्ह समेत गवन कियो भूपा।।
व्याख्या : फिर भाव रूपी बारातियों को प्राण रूपी जनक ने बुलाकर नाना प्रकार से जेवनार करायी। अर्थात् जब परम मिलन की अवस्था में भाव शून्य में समा गए। अब वे ही भाव पुन: ध्यान उतरने पर प्राण रूपी जनक के सम्पर्क में आने लग गए। उसी को भाव रूपी बारात की जेवनार बताया गया है। उस समय जो इच्छाएँ पैदा होती हैं, वे बहुत ही अनुपम होती हैं अर्थात् निर्मल होती हैं। तब उस अवस्था में दसरथ रूपी चित अपने पुत्र रूपी चारों अवस्थाओं को साथ लेकर चले।
सादर सब के पाय पखारे। जथा जोगु पीढ़न्ह बैठारे।।
धोए जनक अवधपति चरना। सीलु सनेहु जाइ नहिं बरना।।
व्याख्या : तब प्राण रूपी जनक ने सब भाव रूपी बारातियों के चरण धोए और यथायोग्य आसन पर बैठाया अर्थात् भावों के अनुरूप प्राण ने क्रिया करी। तब प्राण रूपी जनक ने दसरथ रूपी चित के चरण धोए तो उस समय के शील व प्रेम का वर्णन नहीं किया जा सकता है। अर्थात् जब प्राण की तरंगे चित के सम्पर्क में आती हैं, तो उस समय के प्रेम व शीलता का वर्णन नहीं किया जा सकता है।
बहुरि राम पद पंकज धोए। जे हर हृदय कमल महुँ गोए।।
तीनिउ भाइ राम सम जानी। धोए चरन जनक निज पानी।।
व्याख्या : तब प्राण रूपी जनक ने आत्मा रूपी राम के चरणों को धोया जिन चरणों को विश्वास रूपी शिव ने अपने हृदय कमल में छुपाकर रखा है। शरीर में सात चक्र होते हैं। उसमें हृदय चक्र जो होता है, उससे विश्वास व श्रद्धा की उत्पत्ति होती है। आत्मा रूपी राम की पहचान भी श्रद्धा व विश्वास के बिना नहीं हो पाती है, इसलिए आत्मा रूपी राम के चरणों को विश्वास रूपी शिवके हृदय कमल में बताया गया है। प्राण रूपी जनक ने तीनों भाईयों को भी आत्मा रूपी राम के समान जानकर चरण धोए। अर्थात् प्राण की तरंगों ने चित की चारों अवस्थाओं को ही छुआ।
आसन उचित सबहि नृप दीन्हे। बोलि सूपकारी सब लीन्हे।।
सादर लगे परन पनवारे। कनक कील मनि पान सँवारे।।
व्याख्या : प्राण रूपी जनक ने सभी भाव रूपी बारातियों को उचित स्थान दिया और चतुर सूपकारों को बुला लिया। आदरपूर्वक पनवारे अर्थात् प्राण की तरंगें उठने लगी। उस समय ऐसा लगने लगता है मानों सोने की कीलों से मन के भाव रूपी पन्नों को सँवारा गया हो।
दो0 सुपोदन सुरभी सरपि सुंदर स्वादु पुनीत।
छन महुँ सब के परुसि गे चतुर सुआर बिनीत।।328।।
व्याख्या : जब ध्यान की परम अवस्था से धीरे-धीरे ध्यान उतरने लगता है, तो देह भाव और प्राण का संगम होने लगता है, जिससे नाना प्रकार के सात्विक हार्मोन्स (रसायन) निकलने लगते है। उन्हीं सात्विक हार्मोन्स को ही गो घृत अर्थात पवित्र इन्द्रियों रूपी गाय का सुगंधित घी प्रतीक रूप में कहा गया है। उसी को चतुर रसोईयों द्वारा सुगंधित गाय का घी व भात (चावल) परोसना कहा गया है। भावों के प्राण के सम्पर्क में आने पर रसायन पैदा होने की घटना क्षण भर में घटित होती है।
पंच कवल करि जेवन लागे। गारि गान सुनि अति अनुरागे।।
भाँति अनेक परे पकवाने। सुधा सरिस नहिं जाहिं बखाने।।
व्याख्या : जब भाव प्राण के सम्पर्क में आते हैं, तो भावों से उत्पन्न रसायन तुरन्त पाँच प्राणों में विभक्त हो जाता है। इसलिए ही भोजन करने पर पंच कवल अर्थात् प्राणाय स्वाह:, अपनाय स्वाह: समानाय स्वाह: उदानाय स्वाह:, व्यानाय स्वाह: करने की परम्परा है। भावों से उत्पन्न हार्मोन्स पंच कवल (पाँच प्राणों के ग्रास) के माध्यम से पाँचों प्राणों के सम्पर्क में आकर पुन: भाव पैदा करने लगते हैं। परन्तु ध्यान में परमात्मा की अनुभूति होने पर जब पुन: भाव पैदा होते हैं तो वे भाव बड़े सुखद व सात्विक होते हैं। इसलिए सांसारिक भाव होते हुए भी अनुराग पैदा करने वाले होते हैं। उसी को ""गारि गान सुनि अति अनुरागे"" बोलकर लिखा गया है। उस अवस्था में नाना प्रकार के रसायन पैदा होने लगते हैं जो सात्विक व निर्मल होते हैं। परन्तु उन सबका वर्णन करना सम्भव नहीं है।
परूसन लगे सुआर सुजाना। बिंजन बिबिध नाम को जाना।।
चारि भाँति भोजन बिधि गाई। एक एक बिधि बरनि न जाई।।
व्याख्या : उस अवस्था में पंच प्राणों के भी उप प्राण भावों को ग्रहण करने लगते हैं। इस प्रकार नाना प्रकार के भाव रूपी व्यञ्जन पैदा हो जाते हैं, जिनका वर्णन करना कठिन कार्य है। वैसे तो चार प्रकार के सात्विक, राजसिक, तामसिक व गुणातीत भावों का वर्णन किया जाता है, परन्तु इनमें भी एक-एक प्रकार के भावों का वर्णन नहीं किया जा सकता है।
छरस रूचिर बिंजन बहु जाती। एक एक रस अगनित भाँती।।
जेवँत देहिं मधुर धुनि गारी। लै लै नाम पुरुष अ डिग्री नारी।।
व्याख्या : रसायनों में मुख्यत: छ: रस प्रधान होते हैं। उन्हीं छ: रसायनों से नाना प्रकार के भाव रूपी व्यञ्जन बनते हैं। इन छ: रसों में एक-एक रस से भी अनन्त भाव पैदा होते हैं। उसी अनुभूति को छ: रसों से युक्त व्यञ्जन बताया गया है। उन रसों के ग्रहण करने पर मधुर-मधुर अर्थात् निर्मल सांसारिक भाव पैदा होने लगते हैं। उस अवस्था में नर की धड़कन रूपी पुरुष और नारी की धड़कन रूपी स्त्रियाँ नाना भाव पैदा करने लगती हैं।
समय सुहावनि गारि बिराजा। हँसत राउ सुनि सहित समाजा।।
एहि बिधि सबहीं भोजनु कीन्हा। आदर सहित आचमनु दीन्हा।।
व्याख्या : उस अवस्था में समय बहुत सुखद लगने लगता है और सात्विक देह भाव सोभा पाने लगते हैं। उस अवस्था को देखकर चित रूपी दसरथ राजा मन ही मन मुस्कुराने लगते हैं। इस प्रकार भाव रूपी व्यञ्जनों का भाव रूपी बाराती भोजन करने लगते हैं। उस अवस्था में सभी भाव सहज हो जाते हैं।
दो0 देइ पान पूजे जनक दसरथु सहित समाज।
जनवासेहि गवने मुदित सकल भूप सिरताज।।329।।
व्याख्या : तब प्राण रूपी जनक ने चित रूपी दसरथ सहित समस्त भाव समाज की पूजा करी अर्थात् प्राण और देह का संगम (मिलन) हो गया। तब भावों के मूल चित रूपी दसरथ अपनी मूल (सहज) अवस्था में चले गए। ध्यान उतरने पर जो जो अनुभूति होती है, उसी को यहाँ लिखा गया है। ध्यान उतरने पर प्राण की क्या अवस्था होती है? चित की क्या अवस्था होती है? व भावों की क्या अवस्था होती है? उसी अनुभूति को आगे की चौपाइयों में लिखा गया है।
नित नूतन मंगल पुर माहीं। निमिष सरिस दिन जामिनि जाहीं।।
बड़े भोर भूपतिमनि जागे। जाचक गुन गन गावन लागे।।
व्याख्या : ध्यान उतरने पर शरीर रूपी नगर में नित्य नए-नए मंगल भाव पैदा होने लगते हैं और रात-दिन क्षण मात्र में गुजरते हुए लगने लगते हैं। उस सुखद अवस्था रूपी सुहावने प्रात:काल में भावों के मूल चित रूपी राजा जागे अर्थात चित जागृत हो उठा। उस समय अनेक सात्विक इच्छाएँ पैदा होने लग जाती हैं। उसी को ""जाचक गुन गन गावन लागे"" बोलकर लिखा है।
देखि कुअँर बर बधुन्ह समेता। किमि कहि जात मोदु मन जेता।।
प्रातक्रिया करि गे गुरु पाहीं। महाप्रमोदु प्रेमु मन माहीं।।
व्याख्या : चित रूपी दसरथ अपने चार अवस्था रूपी रजाकुमारों व चार वृति रूपी दुल्हनों को देखकर बहुत आनन्दित होते हैं। जिस अवस्था का कैसे वर्णन किया जा सकता है। प्रातक्रिया करके अर्थात् चित रूपी दसरथ स्फूर्तिवान होकर विशिष्ट ज्ञान रूपी वसिष्ठ गुरु के पास जाते हैं। उस समय चित रूपी दसरथ के मन में महा आनन्द बना होता है।
करि प्रनामु पूजा कर जोरी। बोले गिरा अमिअँ जनु बोरी।।
तुम्हरी कृपाँ सुनहु मुनिराजा। भयउँ आजु मैं पूरन काजा।।
व्याख्या : चित रूपी दसरथ ने प्रणाम करके विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु को प्रणाम किया अर्थात् चित की चेतना विशिष्ट ज्ञान में समाने लगी। तब चित की चेतना से अमृत तुल्य पवित्र भाव पैदा होने लगते हैं। उसी को अमृतवाणी बोलना लिखा गया है। उस अवस्था में चित रूपी दसरथ विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु के सामने पूरी तरह समर्पण करते हुए बोलते हैं, आपकी कृपा से मैंने सब कुछ पाया है और इसलिए आज परम संतोष मिल गया है।
अब सब बिप्र बोलाइ गोसाईं। देहु धेनु सब भाँति बनाई।।
सुनि गुर करि महिपाल बड़ाई। पुनि पठए मुनिबृंद बोलाई।।
व्याख्या : जब चित की चेतना विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु के सन्मुख समर्पण कर देती है अर्थात् चेतना के साथ जब विशिष्ट ज्ञान मिल जाता है, तो चेतना का भाव गो अ साईं अर्थात् इन्द्रियों के स्वामी विशिष्ट ज्ञान से कहता है कि विशुद्ध प्रकाश के भावों को बुलाकर इच्छा रूपी गायों का दान कर देना चाहिए। चित की चेतना की इस बात को सुनकर विशिष्ट ज्ञान का भाव बहुत प्रसन्न होता है और मन की एकाग्रता के भावों को बुला लेता है। अर्थात उस अवस्था में मन की एकाग्रत बढ़ जाती है।
दो0 बामदेव अ डिग्री देवरिषि बालमीकि जाबालि।
आए मुनिबर निकर तब कौसिकादि तपसालि।।330।।
व्याख्या : उस अवस्था में वामदेव, देवऋषि, बाल्मिकी, जाबालि रूपी देव भाव आए एवं कौशिकाओं से उत्पन्न तप वाले भाव भी आए। अर्थात् चित की चेतना जब विशिष्ट ज्ञान के साथ मिल जाती है, तो बाएँ अंगों के देव भाव, सात्विक देव भाव, बाल भाव, जाबाल अर्थात् वाणी के भाव व कोशिकाओं से उत्पन्न भाव भी विशिष्ट ज्ञान के पास चले आते हैं।
दंड प्रनाम सबहि नृप कीन्हे। पूजि सप्रेम बरासन दीन्हे।।
चारि लच्छ बर धेनु मगाई। काम सुरभि सम सील सुहाई।।
व्याख्या : तब चित रूपी दसरथ ने सभी एकाग्रता के भावों को दण्डवत प्रणाम किया अर्थात् चित की धड़कन से एकाग्रता के भाव पैदा होने लग गए। तब चार प्रकार के लक्षणों वाली इच्छाएँ (धेनु) पैदा होने लगी। सभी इच्छाएँ कामना रूपी गाय अर्थात् इन्द्रियों में चार प्रकार की कामना (धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष) पैदा होने लग जाती है। जब ध्यान पूर्ण अवस्था में होता है, तब तो कोई कामना ही नहीं बचती है परन्तु जब ध्यान उतरने लगता है, तो चार प्रकार की कामनाएँ पैदा होने लग जाती हैं।
सब बिधि सकल अलंकृत कीन्हीं। मुदित महिप महिदेवन्ह दीन्हीं।।
करत बिनय बहु बिधि नर नाहू। लहेउँ आजु जग जीवन लाहू।।
व्याख्या : वे कामना रूपी गायें सब प्रकार से सजी होती हैं, जिन्हें प्रसन्न होकर स्थूल चित रूपी दसरथ ने भाव रूपी देवों को दे दी अर्थात् कामनाओं के प्रति अनासक्ति का भाव आ गया। तब नर नाहू अर्थात् चित रूपी राजा बहुत प्रकार से विनय के भाव पैदा करने लग गया और जीवन का लाभ प्राप्त कर लिया अर्थात् सहज अनासक्त अवस्था आ गयी।
पाइ असीस महीसु अनंदा। लिए बोलि पुनि जाचक बृंदा।।
कनक बसन मनि हय गय स्यंदन। दिए बूझि रूचि रबिकुल नंदन।।
व्याख्या : तब दैवीय भावों का आशीर्वाद प्राप्त करके चित रूपी दसरथ बहुत आनन्दित हुआ और फिर याचकों के समूहों को बुला लिया अर्थात् कुछ प्राप्त करने की चाह के भाव पैदा हो गए। तब चित रूपी दसरथ ने माया व वासना के भावों को रूचि के अनुसार सूर्यात्मा रूपी चित ने दान दे दिया अर्थात् चाह के भावों को मनचाहा देकर संतुष्ट कर दिया। यह अवस्था ही सिद्धियों की अवस्था होती है।
चले पढ़त गावत गुन गाथा। जय जय जय दिनकर कुल नाथा।।
एहि बिधि राम बिआह उछाहू। सकइ न बरनि सहस मुख जाहू।।
व्याख्या : तब याचना के भाव अर्थात् कुछ चाह रखने वाले भाव अपनी मनोकामना पूर्ण हुई जानकर चित रूपी दसरथ के गुणों का बखान करते हुए चले। हे सूर्यात्मा! आपकी जय हो, जय हो, जय हो। इस प्रकार आत्मा रूपी राम के विवाह के उत्साह का वर्णन नहीं किया जा सकता है। उस आनन्द का वर्णन तो हजारों मुखों से भी नहीं किया जा सकता है।
दो0 बार-बार कौसिक चरन सीसु नाइ कह राउ।
यह सबु सुखु मुनिराज तव कृपा कटाच्छ पसाउ।।331।।
व्याख्या : तब चित रूपी राजा दसरथ ने कौशिकाओं से उत्पन्न विश्वामित्र रूपी भाव को सीस झुकाकर कहा कि हे मुनिराज! यह सब सुख आपकी कृपा से ही प्राप्त हुआ है।
जनक सनेहु सीलु करतूती। नृपु सब भाँती सराह बिभूती।।
दिन उठि बिदा अवधपति मागा। राखहिं जनकु सहित अनुरागा।।
व्याख्या : प्राण रूपी जनक के प्रेम व शील की चित रूपी दसरथ सब प्रकार से सराहना करने लगते हैं। ध्यान जब उतरने लगता है, तो प्राण ध्यान को निरन्तर बनाए रखने का प्रयास करता है। उसी अवस्था को प्राण रूपी जनक द्वारा चित रूपी दसरथ को अनुराग सहित रोकना बताया गया है। उस अवस्था में चित का भाव ध्यान से बाहर आना चाहता है, तो प्राण ध्यान को बनाए रखना चाहता है। इसी को परस्पर जनक व दसरथ का प्रेम के प्रतीक के रूप में बताया गया है।
नित नूतन आद डिग्री अधिकाई। दिन प्रति सहस भाँति पहुनाई।।
नित नव नगर अनंद उछाहू। दसरथ गवनु सोहाइ न काहू।।
व्याख्या : उस अवस्था में नित्य नए आदर सत्कार में बढ़ोतरी होने लगती है अर्थात् देह के भाव और प्राण के भावों में नित्य नया समन्वय बढ़ने लगता है। सैकड़ों प्रकार से भाव ही भावों की मेहमान नवाजी करने लगते हैं। जिसके कारण नित्य देह रूपी नगर में नया आनन्द व उत्साह छाने लग जाता है। इसलिए चित रूपी दसरथ का जाना किसी को भी अच्छा नहीं लगता है।
बहुत दिवस बीते एहि भाँती। जनु सनेह रजु बँधे बराती।।
कौसिक सतानंद तब जाई। कहा बिदेह नृपहि समुझाई।।
व्याख्या : इस प्रकार ध्यान की अवस्था में बहुत समय व्यतीत हो जाता है और सभी भाव प्रेम रूपी रस्सी में बँधे हुए से लगने लगते हैं। तब कौशिकाओं से उत्पन्न विश्वामित्र व सत्य के आनन्द रूपी सतानंद प्राण रूपी जनक के पास जाकर समझाकर कहते हैं।
अब दसरथ कहँ आयसु देहू। जद्यपि छाड़ि न सकहु सनेहू।।
भलेहिं नाथ कहि सचिव बोलाए। कहि जय जीव सीस तिन्ह नाए।।
व्याख्या : अब चित रूपी दसरथ को जाने की आज्ञा दीजिए। हालांकि आपके स्नेह को छोड़ना नहीं चाहते हैं। तब प्राण रूपी जनक ने अच्छा स्वामी कहकर अपने मंत्रियों को बुलाया और मंत्रियों ने आकर जय जीव कहकर सीस झुकाया।
दो0 अवधनाथु चाहत चलन भीतर करहु जनाउ।
भए प्रेमबस सचिव सुनि बिप्र सभासद राउ।।332।।
व्याख्या : अवधी रूपी शरीर के स्वामी चित रूपी दसरथ अब चलना चाहते हैं। यह भीतर अर्थात् दिव्य दृष्टि रूपी व करूणा आदि रूपी रानियों को बता दीजिए। यह सुनकर प्राण रूपी जनक के प्रेरणा रूपी सचिव विशुद्ध प्रकाश के भावों रूपी सभासदों और राजा की बात सुनकर प्रेम के वश में हो गए।
पुरबासी सुनि चलिहि बराता। बूझत बिकल परस्पर बाता।।
सत्य गवनु सुनि सब बिलखाने। मनहुँ साँझ सरसिज सकुचाने।।
व्याख्या : जब जनकपुर अर्थात प्राण के भावों ने सुना कि भाव रूपी बारात अब चलना चाहती है तो यह सुनकर सभी भावों में व्याकुलता आ जाती है। भाव रूपी बारात का जाना जानकर सभी भाव बिलखने लगते हैं और वैसे ही उदास हो जाते हैं जैसे संध्या होने पर कमल मुरझाने लग जाते हैं। वास्तव में जब ध्यान उतरने लगता है, तो भाव भी बिछुड़ने लगते हैं और भावों का आपस में बिछुड़ना ही उदासी का प्रतीक है।
जहँ जहँ आवत बसे बराती। तहँ तहँ सिद्ध चला बहु भाँती।।
बिबिध भाँति मेवा पकवाना। भोजन साजु न जाइ बखाना।।
व्याख्या : जब ध्यान लगता है तो जैसे-जैसे भाव चक्रों के माध्यम से जनकपुर रूपी ब्रह्मरन्ध्र नगर में जाते हैं, वैसे-वैसे ही चक्रों के माध्यम से उतरने लगते हैं। ब्रह्मरन्ध्र में पहुँचने पर तो साधक समस्त सिद्धियों को पार कर जाता है परन्तु पुन: जब ध्यान चक्रों के माध्यम से उतरने लगता है, तो समस्त चक्रों पर साधक को सिद्ध की अवस्था मिलती चली जाती है। वहाँ उन चक्रों पर नाना प्रकार की रिद्धि-सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। जिनका किसी भी प्रकार से वर्णन नहीं किया जा सकता है।
भरि भरि बसह अपार कहारा। पठईं जनक अनेक सुसारा।।
तुरग लाख रथ सहस पचीसा। सकल सँवारे नख अ डिग्री सीसा।।
व्याख्या : शरीर स्थित चक्रों पर अपार सिद्धियों रूपी कहार भरे रहते हैं, जो प्राण रूपी जनक के द्वारा भेजे गए होते हैं। अर्थात् प्राण से निकलने वाले स्वरों से ही सिद्धियों की अवस्था आती है। सुसारा का मतलब प्राण के निर्मल हो जाने पर सु स्वर अर्थात् निर्मल स्वरों की अवस्था से होता है। जब सु स्वर अर्थात् निर्मल स्वर चलने लग जाते हैं, तो लाखों भावों की तरंग व पच्चीस प्रकृतियों रूपी वृतियाँ पूरी तरह निर्मल होकर सज जाती हैं। अर्थात् पूर्ण रूप से निर्मलता आ जाती है।
मत्त सहस दस सिंधुर साजे। जिन्हहि देखि दिसि कुंजर लाजे।।
कनक बसन मनि भरि भरि जाना। महिषीं धेनु बस्तु बिधि नाना।।
व्याख्या : उस अवस्था में मतवाले दस प्राण रूपी हाथी भी सज जाते हैं अर्थात् निर्मल हो जाते हैं, जिन्हें देखकर प्रकृति के दस प्राण रूपी हाथी भी लजा जाते हैं। उस अवस्था में माया के भोग रूपी सुख भी भर जाते हैं और वासना रूपी इच्छाएँ भी बहुत सी पूर्ण होने को तैयार रहती हैं। भैंस वासना का प्रतीक होती है और गाय इन्द्रिय सुख भोग की इच्छा का प्रतीक होती है। ध्यान उतरने पर ये सब इच्छाएँ स्वत: पूर्ण होने लग जाती हैं।
दो0 दाइज अमित न सकिअ कहि दीन्ह बिदेहँ बहोरि।
जो अवलोकत लोकपति लोक संपदा थोरि।।333।।
व्याख्या : उस अवस्था में प्राण रूपी जनक द्वारा जो साधक की इच्छाएँ पूरी की जाती हैं, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। अर्थात् प्राण पूरी तरह निर्मल हो जाने पर स्वत: ही साधक की समस्त कामनाएँ पूर्ण होने लग जाती हैं। उस अवस्था को देखकर लोकपाल अर्थात् देह के चक्रों पर स्थित सिद्धियों की सम्पदा भी थोड़ी लगने लग जाती है।
सबु समाजु एहि भाँति बनाई। जनक अवधपुर दीन्ह पठाई।।
चलिहि बरात सुनत सब रानी। बिकल मीन गन जनु लघु पानी।।
व्याख्या : इस प्रकार प्राण रूपी जनक ने समस्त कामनापूर्ण रूपी व्यवस्था करके अवधी रूपी शरीर में भेज दी। जब दिव्य दृष्टि रूपी, करूणा, मैत्री व दयादि वृति रूपी रानियों ने भाव रूपी बरात के जाने की खबर सुनी तो वे सब ऐसे व्याकुल हो गयी जैसी पानी कम होने पर मछलियाँ व्याकुल हो जाती हैं।
पुनि पुनि सीय गोद करि लेहीं। देइ असीस सिखावनु देहीं।।
होएहु संतत पियहि पिआरी। चि डिग्री अहिबात असीस हमारी।।
व्याख्या : उस अवस्था में वृति रूपी रानियाँ बार-बार सुरता रूपी सीता को गोद में लेती हैं अर्थात् बार-बार वृतियाँ सुरता के साथ मिलने का प्रयास करती हैं। वृतियाँ रूपी रानियाँ सुरता रूपी सीता को आशीर्वाद देकर शिक्षा देती हैं। अर्थात् वृतियाँ सुरता को परमात्मा में लीन रहने की प्रेरणा करती हैं। इसलिए कहती हैं कि हे सुरता रूपी सीता! तुम सदैव परमात्मा की प्यारी रहना, जिससे तुम्हारा अहिवात (अर्थात् अहि अ वात यानी वासनाओं से मुक्त अवस्था) सदा बना रहे। यही हमारा आशीर्वाद है अर्थात् वृतियों रूपी रानियों का प्रयास है।
सासु ससुर गुर सेवा करहू। पति रूख लखि आयसु अनुसरेहू।।
अति सनेह बस सखीं सयानी। नारि धरम सिखवहिं मृदु बानी।।
व्याख्या : हे सुरता रूपी सीता! तुम सदैव श्वास (सासु), स्वर (ससुर) व परम ज्ञान (गुर) की साधना करती रहना अर्थात् श्वास जब निर्मल स्वरों के माध्यम से संचालित होता रहेगा, तो परम ज्ञान की अवस्था बनी रहेगी। अत: तुम सहज होकर परमात्मा रूपी पति की इच्छा को आज्ञा मानकर अनुसरण करती रहना। उस समय समस्त सखियाँ प्रेम के वश में हो गयी और अर्थात समस्त वृतियों में प्रेम का संचार हो उठा। उस अवस्था में नारी की धड़कन से मधुर-मधुर भाव पैदा होने लग जाते हैं।
सादर सकल कुअँरि समुझाई। रानिन्ह बार बार उर लाई।।
बहुरि बहुरि भेटहिं महतारीं। कहहिं बिरंचि रचीं कत नारी।।
व्याख्या : वृति रूपी रानियों ने बार-बार राजकुमारी रूपी चित की वृतियों को बार-बार छाती से लगाया और बहुत प्रकार से आदरपूर्वक समझाया। वृति रूपी रानियाँ बार-बार वृति रूपी कुमारियों से मिलती हैं और कहती हैं कि नारी की धड़कन से किस प्रकार (विधि) ये वृतियाँ पैदा हो गयी।
दो0 तेहि अवसर भाइन्ह सहित रामु भानु कुल केतु।
चले जनक मंदिर मुदित बिदा करावन हेतु।।334।।
व्याख्या : उस अवस्था में चित की अवस्था रूपी भाइयों को लेकर आत्मा रूपी सूर्य राम प्राण रूपी जनक के घर में विदा कराने के लिए आ गए। अर्थात् चित की अवस्था अब प्राण नगर यानी ब्रह्मरन्ध्र से विदा लेना चाहते हैं।
चारिउ भाइ सुभायँ सुहाए। नगर नारि नर देखन धाए।।
कोउ कह चलन चहत हहिं आजू। कीन्ह बिदेह बिदा कर साजू।।
व्याख्या : चित की अवस्था रूपी चारों भाई निर्मल हैं इसलिए शरीर रूपी नगर के नर-नाड़ी निर्मलता के साथ धड़कने लगते हैं। कोई भाव तब चित की अवस्थाओं को देखकर समझ जाते हैं कि अब ये चलना चाहते हैं अर्थात् ध्यान अब उतरने लगा है। इसलिए प्राण रूपी जनक ने भी विदा करने की तैयारी करली।
लेहु नयन भरि रूप निहारी। प्रिय पाहुने भूप सुत चारी।।
को जानै केहिं सुकृत सयानी। नयन अतिथि कीन्हे बिधि आनी।।
व्याख्या : इसलिए ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर के भाव कहते हैं कि आज इन चित की अवस्था रूपी राजकुमारों को आँख भरकर देख लो। ये दसरथ रूपी चित की सुन्दर अवस्था रूपी पुत्र हैं। कौन जाने कौन-सा पुण्य है, जिसकी वजह से आज इनके दर्शन हुए हैं।
मरनसीलु जिमि पाव पिऊषा। सुरत डिग्री लहै जनम कर भूखा।।
पाव नारकी हरि पदु जैसें। इन्ह कर दरसनु हम कहँ तैसें।।
व्याख्या : जैसे कोई मरने वाले को अमृत मिल गया हो और किसी जन्म के भूखे को कल्पवृक्ष मिल जाए तथा पापी को जैसे परमात्मा का पद मिल जाए, ऐसे ही इनके दुर्लभ दर्शन हमको हुए हैं।
निरखि राम सोभा उर धरहू। निज मन फनि मूरति मनि करहू।।
एहि बिधि सबहि नयन फलु देता। गए कुँअर सब राज निकेता।।
व्याख्या : इसलिए ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर के भाव व वृतियाँ आपस में कहते हैं कि इनकी सुन्दरता को देखकर हृदय में धारण कर लीजिए और अपने मन की मणि को स्वयं ही धारण कर स्वयं के अन्त:करण में ही प्रकाश कर लीजिए। इस प्रकार समस्त भावों को सुख देते हुए चित की अवस्था रूपी चारों राजकुमार प्राण के घर में प्रवेश किए।
दो0 रूप सिंधु सब बंधु लखि हरषि उठा रनिवासु।
करहिं निछावरि आरती महा मुदित मन सासु।।335।।
व्याख्या : चित की निर्मल चार अवस्थाओं रूपी चारों भाईयों को देखकर वृति रूपी रनिवास हर्ष से भर उठा और प्रसन्न मन से वासना रूपी इच्छाओं का श्वास के माध्यम से त्याग (न्यौछावर) होने लग गया। अर्थात् वृतियों से भी वासना की भावना का त्याग होने लग गया।
देखि राम छबि अति अनुरागी। प्रेम बिबस पुनि पुनि पद लागीं।।
रही न लाज प्रीति उर छाई। सहज सनेहु बरनि किमि जाई।।
व्याख्या : समस्त वृतियाँ रूपी रानियाँ आत्मा रूपी राम की सुन्दरता को देखकर अनुराग से भर गयी और प्रेम में विवश होकर बार-बार वृतियाँ समर्पण करने लग गयी। उस अवस्था में लज्जा आदि की वृति नहीं रही और सहज प्रेम पैदा हो गया, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता है।
भाइन्ह सहित उबटि अन्हवाए। छरस असन अति हेतु जेवाएँ।।
बोले रामु सुअवस डिग्री जानी। सील सनेह सकुचमय बानी।।
व्याख्या : वृति रूपी रनिवास में आत्मा रूपी राम को भाइयों सहित उबटन लगाकर स्नान कराया अर्थात चित की चारों अवस्थाओं को वृतियों ने निर्मल किया और छ: रसों से युक्त भोजन कराया अर्थात् वृतियों से उत्पन्न रस वासनओं से रहित (असन) हो जाने के कारण चित की अवस्था रूपी चारों भाई तृप्त हो गए। तब आत्मा रूपी राम ने सु समय जानकर संकोच करते हुए मधुर वाणी में कहा कि --
राउ अवधपुर चहत सिधाए। बिदा होन हम इहाँ पठाए।।
मातु मुदित मन आयसु देहू। बालक जानि करब नित नेहू।।
व्याख्या : चित रूपी राजा अवधी रूपी शरीर में लौटना चाहते हैं अर्थात् देह भाव में बरतना चाहते हैं। इसलिए हम चार अवस्था रूपी भाईयों को आप से विदा लेने के लिए भेजा है। अत: हे दिव्य वृतियों रूपी माताओं! अब प्रसन्न मन से हमें जाने की आज्ञा दीजिए और सदैव निर्मल बाल रूप जानकर हम पर प्रेम बनाए रखना।
सुनत बचन बिलखेउ रनिवासु। बोलि न सकहिं प्रेम बस सासू।।
हृदयँ लगाइ कुअँरि सब लीन्ही। पतिन्ह सौंपि बिनती अति कीन्ही।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम की बातें सुनकर समस्त वृतियों रूपी रनिवास ने विशुद्ध रूप को जान लिया (बि अ लख उ विशुद्ध ज्ञान) और प्रेम के वश में होकर श्वास (सासू) निर्मल होकर वाणी के भावों से हीन हो गया। वास्तव में जब निर्मल प्रेम पेदा हो जाता है, तो श्वास निर्मल हो जाता है और साधक की वाणी मौन हो जाती है। तब वृति रूपी रानियों ने राजकुमारी रूपी वृतियों को बुलाकर हृदय से लगा लिया और चित की अवस्था रूपी पतियों को सौंपकर प्रार्थना करने लगी।
छ0 करि बिनय सिय रामहि समरपी जोरि कर पुनि पुनि कहै।
बलि जाऊं तात सुजान तुम्ह कहुँ बिदित गति सबकी अहै।।
परिवार पुरजन मोहि राजहि प्रानप्रिय सिय जानिबी।
तुलसीस सीलु सनेहु लखि निज किंकरी करि मानिबी।।
व्याख्या : दिव्य दृष्टि रूपी सुनयना ने सुरता रूपी सीता को आत्मा रूपी राम को सौंपकर विनय करते हुए कहा कि हे आत्मा रूपी राम! तुमको तो सबकी गति की मालूम है। ये सुरता रूपी सीता मुझे (दिव्य दृष्टि) और प्राण रूपी राजा सहित समस्त भावों को बहुत प्रिय है। सुरता सभी को प्रिय होती है क्योंकि जहाँ सुरता लगी होती है, वही भाव स्वत: प्रबल हो जाता है। अत: सुरता सदैव सभी भावों व वृतियों को प्रिय होती है। इसलिए सुरता को सदैव तुलसीस अर्थात् तुल अ सीस अर्थात् उर्ध्वगामी करके रखना चाहिये, जिससे परमात्मा का सदैव स्मरण बना रहे। जब सुरता उर्ध्वगामी बनी रहती है, तब आत्मा रूपी राम के अनुकूल बनी रहती है। उसी को दासी मानना बोलकर लिखा है।
सो0 तुम्ह परिपूरन काम जान सिरोमनि भावप्रिय।
जन गुन गाहक राम दोष दलन करूनायतन।।336।।
व्याख्या : हे आत्म रूपी राम! तुम तो पूर्ण काम हो अर्थात् पूरी तरह से संतुष्ट हो इसलिए समस्त भावों के शिरोमणि हो और भावों को आप प्रिय भी हो। हे आत्मा रूपी राम! तुम भक्तों के गुणों को ग्रहण करने वाले व दोषों का नाश करने वाले व दया के घर हो। यहाँ पर दिव्य दृष्टि की वृति आत्मा के लक्षणों का वर्णन कर रही है।
अस कहि रही चरन गहि रानी। प्रेम पंक जनु गिरा समानी।।
सुनि सनेहसानी बर बानी। बहु बिधि राम सासु सनमानी।।
व्याख्या : ऐसा कहकर दिव्य दृष्टि रूपी रानी ने समर्पण कर दिया। उसी को ""चरन गहि रानी"" बोलकर लिखा है। उस समय दिव्य दृष्टि की वाणी मानो प्रेम रूपी दलदल में फँस गयी हो। पाठकों को आश्चर्य नहीं करना चाहिये क्योंकि प्रत्येक छोटे से छोटे भाव की भी वाणी होती है। इसलिए जब जीव शान्त रहता है, फिर भी उसके अन्दर भाव आपस में वार्तालाप करते रहते हैं। तब प्रेम से युक्त वाणी को सुनकर आत्मा रूपी राम ने दिव्यदृष्टि रूपी रानी का बहुत सम्मान किया।
राम बिदा मागत कर जोरी। कीन्ह प्रनामु बहोरि बहोरि।।
पाइ असीस बहुरि सि डिग्री नाई। भाइन्ह सहित चले रघुराई।।
व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने हाथ जोड़कर दिव्य दृष्टि रूपी रानियों से विदा माँगी और बार-बार प्रणाम किया। फिर दिव्य दृष्टि रूपी रानी का आशीर्वाद पाकर अर्थात प्रेरणा पाकर चित की अवस्था रूपी भाईयों सहित आत्मा रूपी राम विदा कराकर चले।
मंजु मधुर मूरति उर आनी। भई सनेह सिथिल सब रानी।।
पुनि धीरजु धरि कुअँरि हँकारी। बार बार भेटहिं महतारी।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम की सुंदर मधुर मूर्ति को हृदय में रखकर वृतियों रूपी रानियाँ शिथिल हो गयी अर्थात् वृतियाँ शान्त हो गयी। तब वृति रूपी राजकुमारियों को बुलाकर वृति रूपी माताएँ बार-बार मिलने लगीं।
पहुँचावहिं फिरि मिलहिं बहोरी। बढ़ी परस्पर प्रीति न थोरी।।
पुनि पुनि मिलत सखिन्ह बिलगाई। बाल बच्छ जिमि धेनु लवाई।।
व्याख्या : वृति रूपी राजकुमारियों को पहुँचाती हैं और फिर उनसे मिलती हैं। इस प्रकार प्रेम कम नहीं बढ़ा अर्थात् अत्यधिक प्रेम बढ़ गया। बार-बार मिलती हुई माताओं को करूणा, मैत्री, दयादि रूपी सखियों ने सुरता रूपी सीता व अन्य वृति रूपी राजकुमारियों से वैसे ही अलग कर दिया जैसे नयी ब्याही हुई गाय को बछड़े से अलग कर दिया हो।
दो0 प्रेम बिबस नर नारि सब सखिन्ह सहित रनिवासु।
मानहुँ कीन्ह बिदेहपुर करूनाँ बिरहँ निवासु।।337।।
व्याख्या : उस अवस्था में शरीर की नर-नाड़ियाँ सब प्रेम के वश में हो जाती हैं और वृतियाँ भी प्रेम के वश में हो जाती हैं। उस समय ऐसा लगने लगता है, मानों ब्रह्मरन्ध्र रूपी जनकपुर करूणा और विरह का घर बन गया हो।
सुक सारिका जानकी ज्याए। कनक पिंजरन्हि राखि पढ़ाए।।
ब्याकुल कहहिं कहाँ बैदेही। सुनि धीरजु परिहरइ न केही।।
व्याख्या : शुक व सारिका अर्थात् तोता व मैना जिनको सुरता रूपी सीता ने माया रूपी सोने के पिंजड़े में रखकर पाला पोषा था। वे व्याकुल होकर कहते हैं कि वैदेही अर्थात् प्राण से उत्पन्न सुरता कहाँ है? तोता और मैना वास्तव में सांसारिकता के प्रतीक हैं। क्योंकि सुरता से संसार व सुरता से ही परमात्मा मिलता है। माया के भी सभी भाव सुरता से ही पैदा होते हैं। इसलिए तो जानकी को जगत जननी भी कहा जाता है। अत: जब सुरता परमात्मा में लग जाती है तो सांसारिकता रूपी तोता-मैना, व्याकुल हो जाते हैं। ऐसी अवस्था में किसका धैर्य नहीं टूट जायेगा?
भए बिकल खग मृग एहि भांती। मनुज दसा कैसें कहि जाती।।
बंधु समेत जनकु तब आए। प्रेम उमगि लोचन जल छाए।।
व्याख्या : जब खग मृग रूपी भाव सुरता के विरह से व्याकुल हो जाते हैं, तो मन के भावों की दशा का वर्णन कैसे किया जा सकता है। उस अवस्था में प्राण रूपी जनक और उनका अहंकार रूपी कुशध्वज भाई आते हैं। उनके हृदय में यह अवस्था देखकर (सुरता का परमात्मा में लीन होता हुआ देखकर) प्रेम उमड़ पड़ा, जिससे आँखों में प्रेम रस रूपी जल आ गया।
सीय बिलोकि धीरता भागी। रहे कहावत परम बिरागी।।
लीन्हि रायँ उर लाइ जानकी। मिटी महामरजाद ग्यान की।।
व्याख्या : सुरता रूपी सीता को देखकर प्राण रूपी जनक जो परम वैराग्यवान कहलाते थे, का धैर्य चला गया और सुरता रूपी सीता को छाती से लगा लिया, जिससे परम वैराग्य के ज्ञान की मर्यादा भी टूट गयी अर्थात् प्राण रूपी जनक का सुरता रूपी सीता से मोह प्रकट हो गया।
समुझावत सब सचिव सयाने। कीन्ह बिचा डिग्री न अवसर जाने।।
बारहिं बार सुता उर लाईं। सजि सुंदर पालकीं मगाईं।।
व्याख्या : उस अवस्था में प्राण रूपी जनक को बार-बार बुद्धिमान सचिव समझाने लगते हैं अर्थात् प्राण के स्वर ही प्राण के सचिव होते हैं और स्वर रूपी सचिव प्राण को सुरता से अलग होने के लिए प्रेरित करने लगते हैं। उस अवसर का विचार कोई नहीं कर रहा है। अर्थात् स्वर तो ध्यान उतरने पर देह भावों में बरतने लगते हैं और प्राण रूपी जनक सुरता रूपी सीता से अलग नहीं होना चाहते हैं। अत: इस द्वन्द्व की अवस्था को कोई नहीं देख पा रहे हैं। फिर प्राण रूपी जनक ने बार-बार सुरता रूपी सीता को छाती से लगा लिया और निर्मलता रूपी सुंदर पालकी सजाकर मँगवायी।
दो0 प्रेम बिबस परिवा डिग्री सबु जानि सुलगन नरेस।
कुअँरि चढ़ाईं पालकिन्ह सुमिरे सिद्धि गनेस।।338।।
व्याख्या : परमात्मा में सुरता रूपी सीता की सुलगन अर्थात् पूरी तरह लीन होने की लग्न को देखकर व समस्त भाव रूपी परिवार को प्रेम के वश में हुआ जानकर वृति रूपी राजकुमारियों को गुणों को वश में करके (गण अ ईश) पालकियों पर चढ़ा दिया अर्थात् सुरता व माण्डवी, श्रुतकीर्ति व उर्मिला रूपी सभी वृतियों को पालकियों अर्थात् श्वास की गति के साथ मिला दिया।
बहुबिधि भूप सुता समुझाईं। नारि धरमु कुल रीति सिखाईं।।
दासीं दास दिए बहुतेरे। सुचि सेवक जे प्रिय सिय केरे।।
व्याख्या : तब प्राण रूपी राजा ने वृतियों रूपी पुत्रियों को बहुत प्रकार से समझाया तथा नाड़ी की धड़कन से उत्पन्न प्रभाव की रीति को समझाया। सुरता रूपी सीता को जो प्रिय थे, ऐसे बहुत से दास व दासियाँ दिए अर्थात् सात्विकता रूपी भाव व इच्छाएँ दी।
सीय चलत ब्याकुल पुरबासी। होहिं सगुन सुभ मंगल रासी।।
भूसुर सचिव समेत समाजा। संग चले पहुँचावन राजा।।
व्याख्या : सुरता रूपी सीता जब ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर से चलीं तो सभी भाव रूपी नगर निवासी व्याकुल हो गए। उस अवस्था में शुभ व मंगलकारी सगुन होने लगते हैं। उस अवस्था में भूसुर अर्थात शरीर के स्वर, मंत्रणा रूपी भाव व प्राण रूपी राजा समेत सभी सुरता रूपी सीता को पहुँचाने के लिए चले। अर्थात् जब सुरता रूपी सीता आत्मा रूपी राम के साथ चित रूपी दसरथ की अवधी रूपी देह में आती है तो स्वर, भाव व प्राण सभी देहोन्मुखी हो जाते हैं।
समय बिलोकि बाजने बाजे। रथ गज बाजि बरातिन्ह साजे।।
दसरथ बिप्र बोलि सब लीन्हे। दान मान परिपूरन कीन्हे।।
व्याख्या : उस अवस्था में समय की अनुकूलता को देखकर बाजे बजने लग जाते हैं अर्थात् ध्यान में नाना आवाजें सुनाई पड़ने लग जाती हैं और वृति रूपी रथ, हाथी व घोड़ों के भाव रूपी बाराती सजने लगते हैं। तब चित रूपी दसरथ ने विशुद्ध प्रकाश वाले भावों को बुला लिया और दान व मान देकर संतुष्ट कर दिया अर्थात् इच्छा व वासनाओं का त्याग करके संतोष की अवस्था को प्राप्त कर लिया।
चरन सरोज धूरि धरि सीसा। मुदित महीपति पाइ असीसा।।
सुमिरि गजाननु कीन्ह पयाना। मंगलमूल सगुन भए नाना।।
व्याख्या : चित रूपी राजा दसरथ ने विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश वाले भावों के चरणों की धूल को सिर पर धारण करके प्रसन्नता के साथ आशीर्वाद लिया। उसेक बाद गुणों की सहजता को सुमिर करके अवधी रूपी देह नगरी के लिए प्रस्थान किया। उस अवस्था में मंगल करने वाले नाना प्रकार के सगुन होने लगे।
दो0 सुर प्रसून बरषहिं हरषि करहिं अपछरा गान।
चले अवधपति अवधपुर मुदित बजाइ निसान।।339।।
व्याख्या : उस अवस्था में देव भाव आनन्द रूपी फुल बरसाने लगते हैं और सात्विक प्रकृति (अपछरा) मधुर गान करने लगती है। इस प्रकार डंके की चोट पर चित रूपी दसरथ अवधी रूपी देह नगरी के लिए प्रसन्न होकर चले।
नृप करि बिनय महाजन फेरे। सादर सकल मागने टेरे।।
भूषन बसन बाजि गज दीन्हे। प्रेम पोषि ठाढ़े सब कीन्हे।।
व्याख्या : तब चित रूपी दसरथ ने सभी महाभावों को बुलाया और विनय करके लौटा दिया। फिर चाह रखने वाले भावों को बुलाया और इच्छा, वासनाओं व वृति रूपी हाथी, घोड़ों का त्याग कर दिया तथा प्रेम से पोषण करके निष्काम भावना को प्रबल कर दिया।
बार बार बिरिदावलि भाषी। फिरे सकल रामहि उर राखी।।
बहुरि बहुरि कोसलपति कहहीं। जनकु प्रेम बस फिरै न चहहीं।।
व्याख्या : अब ध्यान धीरे धीरे ब्रह्मरन्ध्र से उतरने लगता है, तो बार-बार ध्यान की परम अवस्था के आनन्द की याद आने लगती है। उसी को ""बार-बार बिरिदावलि भाषी"" बोलकर लिखा गया है। ब्रह्मरन्ध्र के भाव आत्मा रूपी राम को हृदय में रखते हुए वापस लौट गए। अब ध्यान धीरे-धीरे भृकुटि में आने लगता है, तो सुष्मना नाड़ी में केन्द्रित होने लग जाता है। इसलिए सुष्मना रूपी कौशल्या पति के नाम से दसरथ को यहाँ कौशलपति कहा गया है। सुष्मना नाड़ी में ध्यान आने पर चित रूपी दसरथ प्राण रूपी जनक को बार-बार लौट जाने को कहते हैं परन्तु प्रेम के कारण लौटना नहीं चाहते हैं। वास्तविकता में यही होता है कि प्राण भी चित के साथ को छोड़ना नहीं चाहता है।
पुनि कह भूपति बचन सुहाए। फिरिअ महीस दूरि बड़ि आए।।
राउ बहोरि उतरि भए ठाढ़े। प्रेम प्रवाह बिलोचन बाढ़े।।
व्याख्या : फिर चित रूपी दसरथ कहते हैं कि हे प्राण रूपी जनक! आप बहुत दूर आ गए हैं। अत: अब तो लौट जाइये। तब चित रूपी दसरथ वृति रूपी रथ से उतरकर खड़े हो गए और प्रेम का प्रवाह स्पष्ट रूप से प्रकट हो गया।
तब बिदेह बोले कर जोरी। बचन सनेह सुधाँ जनु बोरी।।
करौं कवन बिधि बिनय बनाई। महाराज मोहि दीन्हि बड़ाई।।
व्याख्या : तब प्राण रूपी जनक प्रेम व अमृत में सने हुए वचन बोले कि मैं किस प्रकार बनाकर प्रार्थना करूँ। हे चित रूपी महाराज! आपने मुझे जो बड़ाई दी है। अर्थात् चित की अवस्थाओं की निर्मलता से ही प्राण निर्मल होकर परम पद में अवस्थित हो पाता है। अत: उस अवस्था का कैसे वर्णन करूँ।
दो0 कोसलपति समधी सजन सनमाने सब भाँति।
मिलनि परसपर बिनय अति प्रीति न हृदयँ समाति।।340।।
व्याख्या : तब चित रूपी सुष्मना रूपी नाड़ी के कौशल पति दसरथ ने प्राण रूपी जनक का सब प्रकार से सम्मान किया। उस समय के मिलन की परस्पर प्रीत हृदय में नहीं समा रही थी अर्थात् बहुत प्रेम उमड़ रहा था।
मुनि मंडलिहि जनक सि डिग्री नावा। आसिरबादु सबहि सन पावा।।
सादर पुनि भेंटे जामाता । रूप सील गुन निधि सब भ्राता।।
व्याख्या : फिर प्राण रूपी जनक ने मुनियों अर्थात् मन के भावों को सीस झुकाया और सबका आशीर्वाद प्राप्त किया अर्थात मन के भावों से पुन: प्राण प्रबल हुआ। फिर आदरपूर्वक चित की अवस्था रूपी चारों दामादों से मिले जो सभी गुण व शील के घर थे।
जोरि पंकरूह पानि सुहाए। बोले बचन प्रेम जनु जाए।।
राम करौं केहि भाँति प्रसंसा। मुनि महेस मन मानस हंसा।।
व्याख्या : तब प्राण रूपी जनक हाथ जोड़कर प्रेममय वचन बोले कि हे आत्मा रूपी राम! मैं आपकी किस प्रकार प्रशंसा करूँ। आप तो मुनियों व महेश्वर के मन रूपी सागर के हंस हो। अर्थात् आप तो मन के एकाग्रता के भावों और महाऐश्वर्य के भावों के बीच में चलने वाले हकार व सकार रूप हो। हकार व सकार रूप में श्वास चलती रहती है। उसे ही साधना पंथों में हँस कहा गया है।
करहिं जोग जोगी जेहि लागी। कोहु मोहु ममता मदु त्यागी।।
ब्यापकु ब्रह्मु अलखु अबिनासी। चिदानंदु निरगुन गुन रासी।।
व्याख्या : जिसके बल पर अर्थात ह कार सकार श्वासों को पकड़कर योगी लोग परमात्मा से मिल जाते हैं और क्रोध, मोह, ममता व मद का त्याग कर देते हैं। आप तो सर्वव्यापक, ब्रह्म, अलख व अविनाशी हो तथा चित के आनन्द स्वरूप, गुणों से निर्लिप्त व समस्त गुणों की राशि हो। यहाँ पर आत्मा के स्वरूप का वर्णन किया गया है।
मन समेत जेहि जान न बानी। तरकि न सकहिं सकल अनुमानी।।
महिमा निगमु नेति कहि कहई। जो तिहुँ काल एकरस रहई।।
व्याख्या : जिसको अर्थात् आत्मा रूपी राम को मन व वाणी भी नहीं जान पाते हैं और समस्त अनुमान लगाकर के भी तर्क नहीं दिया जा सकता है। आपकी महिमा का तो वेदों ने भी ""ऐसा भी नहीं"", ""ऐसा भी नहीं"" बोलकर बताया है (आप (आत्म) तो तीनों कालों में एक रस रहते हो।
दो0 नयन बिषय मो कहुँ भयउ सो समस्त सुख मूल।
सबइ लाभु जग जीव कहँ भएँ ईसु अनुकूल।।341।।
व्याख्या : हे आत्मा रूपी राम! यह अच्छी बात है कि आप मेरी आँखों के विषय हो गए हो, जो समस्त सुखों का मूल है। अर्थात् जब परमात्मा में दृष्टि लग जाती है, तो स्वत: ही सुख की प्राप्ति हो जाती है। इसलिए इसे सुख का मूल कहा गया है। जीव को संसार में सब कुछ लाभ मिल जाता है, जब परमात्मा अनुकूल हो जाते हैं।
सबहि भाँति मोहि दीन्हि बड़ाई। निज जन जानि लीन्ह अपनाई।।
होहिं सहस दस सारद सेषा। करहिं कलप कोटिक भरि लेखा।।
व्याख्या : आपने मुझे सब प्रकार से बढ़ाई दी है इसलिए आपने मुझे (प्राण) अपना जानकर अपना लिया है। उस भाव अवस्था का दस हजार सरस्वती व शेषों द्वारा करोड़ों कल्पों तक लिखने पर भी वर्णन नहीं किया जा सकता है।
मोर भाग्य राउर गुन गाथा। कहि न सिराहिं सुनहु रघुनाथा।।
मैं कछु कहउँ एक बल मोरें। तुम्ह रीझहु सनेह सुठि थोरें।।
व्याख्या : मेरे भाग्य और आपके गुणों की गाथा को कहा नहीं जा सकता है क्योंकि मैं तो मेरे इस बल पर कुछ कहता हूँ कि आपतो थोड़े से प्रेम से ही प्रसन्न हो जाते हो।
बार बार मागउँ कर जोरें। मनु परिहरै चरन जनि भौरें।।
सुनि बर बचन प्रेमु जनु पोषे। पूरन काम रामु परितोषे।।
व्याख्या : मैं तो बार बार हाथ जोड़कर यही माँगता हूँ कि मेरा मन भूलकर के भी आपके चरणों को न छोड़ें। इस प्रकार प्रेम से सने हुए वचनों को सुनकर आत्मा रूपी राम पूरी तरह से संतुष्ट हो गए।
करि बर बिनय ससुर सनमाने। पितु कौसिक बसिष्ठ सम जाने।।
बिनती बहुरि भरत सन कीन्ही। मिलि सप्रेम पुनि आसिष दीन्ही।।
व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने प्राण रूपी ससुर (अर्थात् स्वरों में बहने वाले प्राण को) चित रूपी दसरथ, कौशिकाओं और विशिष्ट ज्ञान रूपी वसिष्ठ के समान जानकर बहुत सम्मान दिया। तब प्राण रूपी जनक त्याग रूपी भरत से बहुत प्रार्थना किए और प्रेमपूर्वक मिलकर पुन: आशीर्वाद दिया।
दो0 मिले लखन रिपुसूदनहि दीन्हि असीस महीस।
भए परसपर प्रेमबस फिरि फिरि नावहिं सीस।।342।।
व्याख्या : तब प्राण रूपी जनक लखन रूपी लक्ष्मण व कामादि का दमन करने वाले शत्रुघन से मिले और आशीर्वाद दिया। उस अवस्था में सब परस्पर प्रेम के भाव के वश में हो गए और बार-बार सीस झुकाने लगे अर्थात विनम्रता की पराकाष्ठा आ गयी।
बार बार करि बिनय बड़ाई। रघुपति चले संग सब भाई।।
जनक गहे कौसिक पद जाई। चरन रेनु सिर नयनन्ह लाई।।
व्याख्या : प्राण रूपी जनक की बार-बार बिनती और बड़ाई करते हुए चित की चारों अवस्था रूपी भाई साथ-साथ चले। तब प्राण रूपी जनक कौशिकाओं से जाकर मिल गए। उसी को ""कौसिक पद जाई"" बोलकर लिखा है। कौशिक पुत्र विश्वामित्र रूपी भाव के चरणों की धूल को सिर और आँखों पर लगा लिया। अर्थात् कोशिकाओं में प्राण रच बस गया।
सुनु मुनीस बर दरसन तोरें। अगमु न कछु प्रतीति मन मोरें।।
जो सुखु सुजसु लोकपति चहहीं। करत मनोरथ सकुचत अहहीं।।
व्याख्या : हे मुनि! आपके सुंदर दर्शनों से सब कुछ प्राप्त हो जाता है। ऐसा मेरे मन को विश्वास होता है। जिस सुख और सुयश को लोकपति अर्थात् देह स्थित चक्र चाहते हैं अर्थात् जो सुख चक्रों की जागृति से मिलता है, वो सब सुख व सुयश तो आपके दर्र्शन से स्वत: ही मिल जाता है। क्योंकि समस्त सिद्धियाँ तो आपके दर्शन की अनुगामी हैं। कहने का मतलब है कि जो सुख व सुयश चक्रों की जागृति होने पर मिलता है, वो तो कोशिकाओं के जागृत होने पर स्वत: मिल जाता है।
सो सुखु सुजसु सुलभ मोहि स्वामी। सब सिधि तव दरसन अनुगामी।।
कीन्हि बिनय पुनि पुनि सि डिग्री नाई। फिरे महीसु आसिषा पाई।।
व्याख्या : चक्रों (लोकपतियों) को जो सुख व सुयश मिलता है, वो तो सहज में ही मुझे मिल जाता है क्योंकि समस्त सिद्धियाँ तो आपके दर्शन की अनुगामी होती हैं। फिर बार-बार सीस झुकाकर प्राण रूपी जनक ने बिनती की और आशीर्वाद पाकर वापस लौट गए।
चली बरात निसान बजाई। मुदित छोट बड़ सब समुदाई।।
रामहि निरखि ग्राम नर नारी। पाइ नयन फलु होहिं सुखारी।।
व्याख्या : इस प्रकार भाव रूपी बारात ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर को छोड़कर चली। समस्त छोटे-बड़े भावों के समुदाय प्रसन्न थे। उस अवस्था में आत्मा रूपी राम को देखकर ब्रह्मरन्ध्र के नर-नाड़ियों ने सुख की अनुभूति की।
दो0 बीच बीच बर बास करि मग लोगन्ह सुख देत।
अवध समीप पुनीत दिन पहुँची आइ जनेत।।343।।
व्याख्या : तब धीरे-धीरे चक्रों पर रूकता रूकता ध्यान उतरकर अवधी रूपी शरीर में आने लगता है। उसी को बीच बीच में रूकते हुए भाव रूपी बारात का अयोध्या में आना बताया गया है।
हने निसान पनव बर बाजे। भेरि संख धुनि हय गय गाजें।।
झाँझि बिरव डिंडिमी सुहाई। सरस राग बाजहिं सहनाई।।
व्याख्या : जब ध्यान ब्रह्मरन्ध्र से उतरने लगता है तो शरीर के चक्रों पर भी नगाड़ों की बजने की आवाज आने लगती है और भेरी, शंख व हाथी, घोड़ों की आवाज आने लगती है। झाँझ व सुहावनी डफलियाँ तथा सरस राग के साथ शहनाईयाँ बजने लगती हैं। अर्थात् शरीर में सुखद अनुभूति होने लगती है।
पुर जन आवत अकनि बराता। मुदित सकल पुलकावलि गाता।।
निज निज सुंदर सदन सँवारे। हाट बाट चौहट पुर द्वारे।।
व्याख्या : भाव रूपी बारात को आता हुआ देखकर देह भावों में पुलकावली छा गयी और सब भाव अपनी-अपनी वृति के अनुसार अपने घर को सजाने लगे अर्थात् सभी भाव निर्मल होने लग गए। समस्त चक्रों रूपी हाट व शरीर रूपी पुर के समस्त द्वार निर्मल होने लग गए।
गलीं सकल अरगजाँ सिंचाईं। जहँ तहँ चौकें चा डिग्री पुराईं।।
बना बजा डिग्री न जाइ बखाना। तोरन केतु पातक बिताना।।
व्याख्या : समस्त नाड़ियों रूपी गलियाँ अरगजा से सींछ गयी और जहाँ तहाँ सुन्दर भावना रूपी चौक पुर गए। उस समय जो शरीर रूपी बाजार सजा, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। तोरन व ध्वजा-पताकाएँ सज गयी।
सफल पुगफल कदलि रसाला। रोपे बकुल कदंब तमाला।।
लगे सुभग तूर परसत धरनी। मनिमय आल बाल कल करनी।।
व्याख्या : जब ध्यान उतर कर अवधी रूपी शरीर में आता है, तो अवधी रूपी शरीर सुहावना लगने लग जाता है। क्योंकि शुभ भाव रूपी सुपारी व केले व आम के पेड़ लगे हुए लगते हैं। बकुल अर्थात् सात्विक अहंकार रूपी भाव, कदंब व तमाल के वृक्ष भी लगे हुए शोभा दे रहे हैं। इन शुभ भाव रूपी वृक्षों पर सद्गुण रूपी फल लगे हुए हैं, जो शरीर रूपी पृथ्वी को छूकर सुभग अर्थात् अच्छी प्रकृति का आभास कराने लगते हैं। मनिमय अर्थात मन के सब भाव पूरे शरीर में आल-बाल यानी बालस्वरूप निर्मल होकर छा गए।
दो0 बिबिध भाँति मंगल कलस गृह गृह रचे सँवारि।
सुर ब्रह्मादि सिहाहिं सब रघुबर पुरी निहारि।।344।।
व्याख्या : उस अवस्था में नाना प्रकार की मंगल इच्छाओं रूपी कलश जगह-जगह सजने लगते हैं। जिससे स्वर व सात्विक भाव रूपी ब्रह्मा आदि शरीर रूपी पुरी को देखकर सराहना करने लगते हैं।
भूप भवन तेहि अवसर सोहा। रचना देखि मदन मनु मोहा।।
मंगल सगुन मनोहरताई। रिधि सिधि सुख संपदा सुहाई।।
व्याख्या : उस अवस्था में चित रूपी राजा का महल बहुत शोभा को प्राप्त कर रहा था, जिसे देखकर काम आदि भावों का मन भी मोहित हो जा रहा था। उस समय मंगल के गुण पैदा होकर मन का हरण करने लग जाते हैं और रिद्धि व सिद्धियों के सुख की अपार सम्पदा प्राप्त हो जाती है।
जनु उछाह सब सहज सुहाए। तनु धरि धरि दसरथ गृहँ छाए।।
देखन हेतु राम बैदेही। कहहु लालसा होहि न केही।।
व्याख्या : उस अवस्था में सभी भावों में सहज उत्साह छा गया तथा चितरूपी दसरथ का दस इन्द्रियों के रूप में समस्त शरीर में विस्तार हो गया। सुरता रूपी सीता और आत्मा रूपी राम को देखने के लिए बताइये किस भाव के मन में लालसा नहीं होगी?
जूथ जूथ मिलि चलीं सुआसिनी। निज छबि निदरहिं मदन बिलासिनि।।
सकल सुमंगल सजें आरती। गावहिं जनु बहु भेष भारती।।
व्याख्या : तब समूह की समूहों में सात्विक इच्छाएँ चलने लगी, जिन्हें देखकर काम की वासनाएँ अपना स्वरूप भूल गयी। अर्थात् अब जो इच्छाएँ पैदा होने लगी, वे सहज इच्छाएँ होने लगी। उनमें वासना का प्रभाव नहीं रहा। ऐसी सुखद अवस्था में चारों तरफ मंगल भावना की आरती सज जाती है और सुरों की सुखद अवस्था आ जाती है।
भूपति भवन कोलाहलु होई। जाइ न बरनि समउ सुखु सोई।।
कौसल्यादि राम महतारीं। प्रेम बिबस तन दसा बिसारीं।।
व्याख्या : उस समय चित रूपी राजा के भवन में भावों का कोलाहल होने लगता है, जिसके सुख का वर्णन नहीं किया जा सकता है। तब सुष्मना रूपी कौशल्यादि आत्मा रूपी राम की माताओं ने प्रेम के वश में होकर शरीर की सुध-बुध खो दी।
दो0 दिए दान बिप्रन्ह पूजि गनेस पुरारि।
प्रमुदित परम दरिद्र जनु पाइ पदारथ चारि।।345।।
व्याख्या : तब ईड़ा, पिंगला व सुष्मना रूपी रानियाँ ऐसी प्रसन्न हुई कि उन्होंने गणेश अर्थात् गुणों के ईश्वर व परम कल्याणकारी भाव की पूजा करके विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश वाले भावों को इच्छाओं का बहुत दान दिया अर्थात् सहज होकर इच्छाओं का त्याग कर दिया।
मोद प्रमोद बिबस सब माता। चलहिं न चरन सिथिल भए गाता।।
राम दरस हित अति अनुरागी। परिछनि साजु सजन सब लागीं।।
व्याख्या : उस अवस्था में ईड़ा, पिंगला व सुष्मना रूपी रानियाँ मोद-प्रमोद के भावों के वश में हो गयी। इसलिए चल भी नहीं पा रही थी और शिथिल हो गयी। जब भावों में पूर्ण निर्मलता आ जाती है, तो शरीर की नाड़ियाँ शिथिल हो जाती हैं। उसी अवस्था की अनुभूति को यहाँ लिखा गया है। तब शरीर की नाड़ियाँ आत्मा रूपी राम के दर्शन की लालसा से अनुराग से भर जाती हैं और निर्मलता के भावों से सज जाती हैं।
बिबिध बिधान बाजने बाजे। मंगल मुदित सुमित्राँ साजे।।
हरद दूब दधि पल्लव फूला। पान पूगफल मंगल मूला।।
व्याख्या : तब नाना प्रकार के सुखद भाव पैदा होने लगते हैं और मंगल की भावना से भरकर ईड़ा रूपी सुमित्रा रानी सजने लग जाती है। उस समय मंगल रूपी हल्दी, दूब, दही, फूल, पत्तियाँ, पान, सुपारी रूपी भाव पैदा होने लग जाते हैं।
अच्छत अंकुर लोचन लाजा। मंजुल मंजरि तुलसि बिराजा।।
छुहे पुरट घट सहज सुहाए। मदन सकुन जनु नीड़ बनाए।।
व्याख्या : उस समय जब ध्यान उतर कर अयोध्या रूपी शरीर में आता है तो शरीर में समस्त भावों में निर्मलता छा जाती है। शरीर की वह निर्मलता पवित्र चावल, अँखुएँ, लावा व तुलसी की सुन्दर पंक्तियों जैसी लगने लगती है। उस समय शरीर स्वर्ण के घड़े की तरह सुंदर व निर्मल लगने लग जाता है और ऐसा लगने लगता मानों काम ने अपना घोंसला बनाया हो।
सगुन सुगंध न जाहिं बखानी। मंगल सकल सजहिं सब रानी।।
रचीं आरतीं बहुत बिधाना। मुदित करहिं कल मंगल गाना।।
व्याख्या : उस समय सद्गुणों की सुगंध का वर्णन नहीं किया जा सकता है तथा समस्त नाड़ियाँ रूपी रानियाँ मंगल भावना से सजने लगती हैं। अर्थात् समस्त नाड़ियों में मंगल की भावना का संचार होने लग जाता है।
दो0 कनक थार भरि मंगलन्हि कमल करन्हि लिएँ मात।
चलीं मुदित परिछनि करन पुलक पल्लवित गात।।346।।
व्याख्या : तब स्वर्ण के समान उज्जव मंगल की भावना से युक्त होकर नाड़ियों रूपी माताएँ प्रसन्न व पुलकित होती हुई चित की अवस्था रूपी चारों भाईयों व चारों वृति रूपी दुल्हनों को देखने के लिए चलीं।
धूप धूम नभु मेचक भयऊ। सावन घन घमंडु जनु ठयऊ।।
सुरत डिग्री सुमन माल सुर बरषहिं। मनहुँ बलाक अवलि मन करषहिं।।
व्याख्या : ध्यान उतरने की अवस्था में शरीर में सद्गुणी भावों रूपी धूप मस्तिष्क रूपी आकाश में बादलों के समान छा जाती है। जिससे ऐसा लगने लगता है मानों श्रावण के बादल छा रहे हों। उस समय स्वरों से सुमन अर्थात् अच्छे भावों की वर्षा होने लगती है। जो ऐसे लगते हैं मानों बगुलों की पंक्तियाँ मन को आकर्षित कर रही हों।
मंजुल मनिमय बंद निवारे। मनहुँ पाकरिपु चाप सँवारे।।
प्रगटहिं दुरहिं अटन्ह पर भामिनी। चा डिग्री चपल जनु दमकहिं दामिनि।।
व्याख्या : सुन्दर मन के भावों के बन्दनवार लगने लगते हैं मानो इन्द्र अपने धनुष को सजा रहा हो। उस समय इच्छाएँ कभी प्रकट होती हैं, तो कभी छुप जाती हैं। वे सुन्दर इच्छाएँ बिजली की तरह चमकने लगती हैं।
दुंदुभि धुनि घन गरजनि घोरा। जाचक चातक दादुर मोरा ।।
सुर सुगंध सुचि बरषहिं बारी। सुखी सकल ससि पुर नर नारी।।
व्याख्या : शरीर रूपी अयोध्या में दुंदभि की ध्वनि व बादलों की गर्जना होने का आभास होने लगता है। उस समय आसक्ति रूपी चातक, मेढ़क व वासना रुपी मोर पैदा हो जाते हैं। स्वरों के माध्यम से सद्गुण रूपी सुगंध की वर्षा होने लगती है, जिससे अयोध्या रूपी शरीर के नर-नाड़ी सुखी अर्थात निर्मल हो जाते हैं।
समउ जानि गुर आयुस दीन्हा। पुर प्रबेसु रघुकुलमनि कीन्हा।।
सुमिरि संभु गिरिजा गनराजा। मुदित महीपति सहित समाजा।।
व्याख्या : तब समय को अनुकूल समझकर विशिष्ट ज्ञान रूपी वसिष्ठ ने देह रूपी नगर में प्रेवश करने की अनुमति दी। तब शरीर रूपी नगर में आत्मा रूपी राम ने प्रवेश किया अर्थात् ध्यान भृकुटि से नीचे के चक्रों पर आने लगा। उस अवस्था में स्वयं साधक (शंभू) श्रद्धा व गुणों के मूल को याद करके भावों सहित प्रसन्न हो जाता है।
दो0 होहिं सगुन बरषहिं सुमन सुर दुंदुभीं बजाइ।
बिबिध बधू नाचहिं मुदित मंजुल मंगल गाई।।347।।
व्याख्या : उस अवस्था में शरीर रूपी अयोध्या में सगुन होने लगते हैं और स्वरों के संचार की आवाज सुनाई पड़ने लगती है। उस समय विशुद्ध इच्छाओं रूपी स्त्रियाँ नाचने लगती हैं और प्रसन्न होकर मंगल गान गाने लगती हैं। अर्थात् मंगल भावना प्रबल हो उठती है।
मागध सूत बंदि नट नागर। गावहिं जसु तिहु लोक उजागर।।
जय धुनि बिमल बेद बर बानी। दस दिसि सुनिअ सुमंगल सानी।।
व्याख्या : उस अवस्था में मागध अर्थात् चाह रखने वाले भाव, सूत अर्थात् इच्छाओं की राह दिखाने वाले भाव, बन्दना के भाव, कला आदि के भाव तीनों लोकों में अर्थात् मस्तिष्क, धड़ और पैरों में पैदा होने लगते हैं। उस समय भावों को वश में करने की जय ध्वनि पैदा हो जाती है और नाना प्रकार की अनुभूतियाँ (वेद) होने लग जाती हैं। दशों दिशाओं में अर्थात् प्राण के दसों प्रकारों में मंगल की भावना का संचार होने लग जाता है।
बिपुल बाजने बाजन लागे। नभ सुर नगर लोग अनुरागे।।
बने बराती बरनि न जाहीं। महा मुदित मन सुख न समाहीं।।
व्याख्या : उस अवस्था में देह रूपी अयोध्या में नाना प्रकार के भाव रूपी बाजे बजने लगते हैं, जिससे शरीर के स्वर व भाव अनुराग से भर जाते हैं। उस समय के भाव रूपी बारातियों का वर्णन नहीं किया जा सकता है, क्योंकि सभी भाव तो प्रसन्न होकर अपने मन में नहीं समाते हैं।
पुरबासिन्ह तब राय जोहारे। देखत राहि भए सुखारे।।
करहिं निछावरि मनिगन चीरा। बारि बिलोचन पुलक सरीरा।।
व्याख्या : तब देह रूपी नगर के भावों ने चित रूपी दसरथ राजा को देखा अर्थात् शरीर में धड़कन का आभास हुआ। तब आत्मा रूपी राम को देखते ही सभी भाव रूपी नगरवासी सुखी हो गए। उस समय शरीर में पुलकावली छा गयी और मनिगन अर्थात् मन के भावों से वासना का त्याग हो गया। अर्थात् सहज अवस्था आ गयी।
आरति करहिं मुदित पुर नारी। हरषहिं निरखि कुअँर बर चारी।।
सिबिका सुभग ओहार उघारी। देखि दुलहिनिन्ह होहिं सुखारी।।
व्याख्या : उस अवस्था में शरीर स्थित नाड़ियाँ प्रसन्न होकर धड़कने लगती हैं और चित की अवस्था रूपी चारों राजकुमारों को देखकर हर्षित होने लगती हैं। तब पलकों अर्थात् धड़कन से सुभग यानी अच्छे भाव निकलने लगते हैं और वृति रूपी दुलहनों को देखकर सुख की अनुभूति होने लगती है। अर्थात् नाड़ियों की धड़कन से अच्छी प्रकृति के भाव पैदा होने लग जाते हैं, जिससे साधक को सुख की अनुभूति होने लग जाती है।
दो0 एहि बिधि सबही देत सुखु आए राजदुआर।
मुदित मातु परिछनि करहिं बधुन्ह समेत कुमार।।348।।
व्याख्या : इस प्रकार सभी भावों को सुख देते हुए चित की चारों अवस्था रूपी राजकुमार राज द्वार अर्थात् भृकुटि पर आ गए। तब समस्त नाड़ियों रूपी रानियाँ प्रसन्न होकर धड़कने लगी और चित की चार अवस्था व चारों वृति रूपी बहूओं को देखकर प्रसन्न होने लगी।
करहिं आरती बारहिं बारा। प्रेमु प्रमोदु कहै को पारा।।
भूषन मनि पट नाना जाती। करहिं निछावरि अगनित भाँती।।
व्याख्या : तब नाड़ियाँ रूपी रानियाँ बार-बार आरती करने लगती हैं अर्थात् निर्मल होकर धड़कने लगती हैं। उस समय के प्रेम व आनन्द का वर्णन नहीं किया जा सकता है। उस अवस्था में नाना प्रकार की इच्छाओं रूपी आभूषणों का नाड़ियाँ रूपी रानियाँ त्याग करने लगती हैं।
बधुन्ह समेत देखि सुत चारी। परमानंद मगन महतारी ।।
पुनि पुनि सीय राम छबि देखी। मुदित सफल जग जीवन लेखी।।
व्याख्या : वृतियों रूपी बहूओं सहित चित की चार अवस्था रूपी पुत्रों को देखकर महतत्व को धारण करने वाली नाड़ियाँ परमानन्द में मग्न हो गयी। उस अवस्था में बार-बार वे आत्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता को देखने लगती हैं तथा प्रसन्न होकर संसार के सुखद भाव पैदा करने लगती हैं। उसी को प्रतीकों के माध्यम से ""जग जीवन लेखी"" बोलकर लिखा गया है।
सखीं सीय मुख पुनि पुनि चाही। गान करहिं निज सुकृत सराही।।
बरषहि सुमन छनहिं छन देवा। नाचहिं गावहिं लावहिं सेवा।।
व्याख्या : सखियाँ बार-बार सुरता रूपी सीता के मुख को बार-बार देखना चाहती हैं और गान करती हुए अपने पुण्यों की सराहना करने लगती हैं। उस समय मन में क्षण-क्षण में सात्विक दैवीय भावों की वर्षा होने लग जाती है। सात्विक भाव उमंग व उत्साह के साथ साधक को प्रेरणा करने लगते हैं।
देखि मनोहर चारिउ जोरीं। सारद उपमा सकल ढँढ़ोरीं।।
देत न बनहिं निपट लघु लागीं। एकटक रहीं रूप अनुरागीं।।
व्याख्या : चित की अवस्था रूपी राजकुमार व वृति रूपी दुल्हनों की सुन्दर जोड़ियों को देखकर सरस्वती उपमा खोजने लगी। परन्तु सभी उपमाएँ छोटी लगने लगी, इसलिए वो उपमा देना छोड़कर अनुपम रूप में अनुरक्त होकर एकटक लगाकर देखने लगी। अर्थात वाणी भी मौन होने लग गयी।
दो0 निगम नीति कुल रीति करि अरघ पाँवड़े देत।
बधुन्ह सहित सुत परिछि सब चलीं लवाइ निकेत।।349।।
व्याख्या : तब वेद व कुल रीति का पालन करके व अर्घ् व पाँवड़ें बिछाते हुए बहूओं सहित पुत्रों को लेकर रानियाँ अपने घर को चलीं। अर्थात् नाड़ियों की धड़कन सहज होने लगी तथा नाना प्रकार की लौकिक व अलौकिक अनुभूतियाँ होने लगी।
चारि सिंघासन सहज सुहाए। जनु मनोज निज हाथ बनाए।।
तिन्ह पर कुअँरि कुअँर बैठारे। सादर पाय पुनीत पखारे।।
व्याख्या : चारों गुणों की अवस्था उस समय सहज हो जाती है। अत: उन्हीं गुणों की सहज अवस्था को चार सिंहासन बताया गया है। मानों उन गुण रूपी सिंहासनों को काम ने स्वयं बनाया हो। उन गुण रूपी सहज सिंहासनों पर चित की अवस्था व वृति रूपी दूल्हों व दूल्हनों को बैठाया। तब आदरपूर्वक उनके पैर धोए अर्थात् नाड़ियों की धड़कनों से उठने वाली तरंगों ने उनको छुआ।
धूप दीप नैबेद बेद बिधि। पूजे बर दुलहिनि मंगल निधि।।
बारहिं बार आरती करहीं। ब्यजन चा डिग्री चामर सिर ढरहीं।।
व्याख्या : धूप, दीप, नैवेद व वेद की रीति के अनुसार मंगल के निधि दूल्हों व दुल्हनों को पूजा अर्थात चित की अवस्था व वृतियों के प्रति समर्पण की अवस्था आ गयी। जिससे नाड़ियाँ रूपी रानियाँ बार-बार आरती करने लगी अर्थात् निर्मल होकर धड़कने लगी। जिससे भावों की सुंदर अवस्था आ गयी। उसी को सिर पर सुंदर पंखे व चँवर ढलना बोला गया है।
बस्तु अनेक निछावरि होहीं। भरीं प्रमोद मातु सब सोहीं।।
पावा परम तत्व जनु जोगीं। अमृतु लहेउ जनु संतत रोगीं।।
व्याख्या : उस अवस्था में नाना प्रकार की वासनाओं व चाहों का त्याग होने लग जाता है, जिससे नाड़ियाँ रूपी माताएँ आनन्द में भर जाती हैं। जब इच्छाएँ शान्त होने लग जाती हैं, तो नाड़ियों की धड़कन भी सहज हो जाती है और सहजता ही आनन्द पैदा करने लग जाती है। तब ऐसे लगने लगता है मानों परम तत्व की प्राप्ति हो गयी और बहुत दिनों के रोगी को अमृत पीने को मिल गया हो।
जनम रंक जनु पारस पावा। अंधहि लोचन लाभु सुहावा।।
मूक बदन जनु सारद छाई। मानहुँ समर सुर जय पाई।।
व्याख्या : जैसे जन्म के भिखारी को पारस मिल गया हो और अंधे को मानो आँखें मिल गयी हों तथा गूँगे को मानो वाणी मिल गयी हो और युद्ध में मानो योद्धा को जीत मिल गयी हो। उपर्युक्त परिस्थितियों में जैसा आनन्द मिलता है, वैसा ही आनन्द साधक को साधना की इस अवस्था में पहुँचने पर मिलता है।
दो0 एहि सुख ते सत कोटि गुन पावहिं मातु अनंदु।
भाइन्ह सहित बिआहि घर आए रघुकुलल चंदु।।350(क)।।
व्याख्या : जो ऊपर बताया गया है, उससे भी सौ गुना आनन्द सहज अवस्था आने पर नाड़ियों को मिलने लगता है। अर्थात् जब चित की चारों अवस्था व चारों वृतियों निर्मल होकर मिल जाते हैं, तब परम आनन्द मिलने लग जाता है।
दो0 लोक रीति जननीं करहिं बर दुलहिनि सकुचाहिं।
मोदु बिनोदु बिलोकि बड़ रामु मनहिं मुसुकाहिं।।350(ख)।।
व्याख्या : जब नाड़ियों से लोक रीति अर्थात् सांसारिकता के भाव पैदा होने लगते हैं, तो चित की अवस्था व वृतियाँ संकोच करने लगती हैं। तब ऐसी अवस्था के मोद-बिनोद को देखकर आत्मा रूपी राम मन ही मन मुस्कुराने लगते हैं। अर्थात् आत्मा रूपी राम सांसारिकता के भावों (कुल रीति) को देखकर मुस्कुराने लगते हैं, क्योंकि निर्मल आत्मा तो माया से स्वत: दूर रहने लगती है।
देव पितर पूजे बिधि नीकी। पूजीं सकल बासना जी की।।
सबहि बंदि मागहिं बरदाना। भाइन्ह सहित राम कल्याना।।
व्याख्या : तब नाड़ियों रूपी माताओं ने दैवीय व पितर भावों की पूजा करी अर्थात् दैवीय भाव ने प्रारब्ध के भावों को पैदा किया तथा मन में जो वासना थी सब प्रकट कर दी। तब सब इच्छाएँ व भाव वरदान यानी चाह पूरी करना चाहते हैं। क्योंकि सभी इच्छाएँ पूरी होने पर ही चित की चार अवस्था रूपी भाईयों का कल्याण सम्भव हो पाता है अर्थात् पूर्ण संतुष्टि की अवस्था में ही सहज अवस्था आ पाती है।
अंतरहित सुर आसिष देहीं। मुदित मातु अंचल भरि लेहीं।।
भूपति बोलि बराती लीन्हे। जान बसन मनि भूषन दीन्हे।।
व्याख्या : उस अवस्था में अन्त:करण के स्वरों से शुभ आशीष के भाव निकलने लग जाते हैं, जिन्हें प्रसन्न होकर नाड़ियाँ रूपी माताएँ संचारित करनी लग जाती हैं। तब चित रूपी दसरथ ने भाव रूपी बारात को बुला लिया अर्थात् चित ने भाव रूपी बारातियों को अपनी तरफ आकर्षित कर लिया और समस्त मन की वासनाओं का त्याग कर दिया।
आयसु पाइ राखि उर राहि। मुदित गए सब निज निज धामहि।।
पुर नर नारि सकल पहिराए। घर घर बाजन लगे बधाए।।
व्याख्या : तब चित रूपी राजा की आज्ञा सुनकर सब भाव निज निज कोष में चले गए अर्थात् सभी भाव सहज अवस्था में आ गए। समस्त सहज भाव देह रूपी पुर के नर-नाड़ियों में संचरित होने लगे, जिससे समस्त भावों के कोषों में प्रसन्नता के बाजे बजने लगे।
जाचक जन जाचहिं जोइ जोई। प्रमुदित राउ देहिं सोइ सोई।।
सेवक सकल बजनिआ नाना। पूरन किए दान सनमाना।।
व्याख्या : उस सुखद व सहज भाव अवस्था में जो मन की चाह होती है, वो स्वत: ही चित रूपी राजा प्रसन्न होकर पूरी कर देते हैं। उस समय समस्त सेवा के भाव व यशोगान वाले भाव भी सम्मानित होकर पूर्ण रूप से संतुष्ट हो जाते हैं।
दो0 देहिं असीस जोहारि सब गावहिं गुन गन गाथ।
तब गुर भूसुर सहित गृहँ गवनु कीन्ह नरनाथ।।351।।
व्याख्या : तब समस्त भाव शुभ कामना करते हुए प्रणाम करके चित रूपी राजा के गुणों का गान करते हुए चले। तब अन्त:करण के विशिष्ट ज्ञान व स्वरों के साथ चित रूपी राजा ने अपने महल में प्रवेश किया अर्थात चित रूपी राजा सहज अवस्था में आ गया।
जो बसिष्ट अनुसासन दीन्ही। लोक बेद बिधि सादर कीन्ही।।
भूसुर भीर देखि सब रानी। सादर उठीं भाग्य बड़ जानी।।
व्याख्या : जो विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु ने प्रेरणा की, उसी के अनुसार चित रूपी राजा ने लोक व वेद नीति का पालन किया अर्थात् उसी के अनुसार अनुभूति हुई। तब नाड़ियों रूपी रानियों ने स्वरों में भावों की भीड़ देखी, तो आदरपूर्वक भाग्य बड़ा जानकर उठ खड़ी हो गयी अर्थात् सहज होकर सात्विक भावों का संचार होने लगा।
पाय पखारि सकल अन्हवाए। पूजि भली बिधि भूप जेवाएँ।।
आदर दान प्रेम परिपोषे। देत असीस चले मन तोषे।।
व्याख्या : समस्त भावों को निर्मल प्राण का संचार करके स्नान कराया और फिर चित रूपी राजा ने सबको भोजन कराया अर्थात् भावों से भावों का मेल कराया। उस अवस्था में आदर, दान, प्रेम व संतोष के भाव पैदा होकर शुभाशीष देते हुए संतुष्ट होकर चले।
बहु बिधि कीन्हि गाधि सुत पूजा। नाथ मोहि सम धन्य न दूजा।।
कीन्हि प्रसंसा भूपति भूरी। रानिन्ह सहित लीन्हि पग धूरी।।
व्याख्या : तब बहुत प्रकार से चित रूपी राजा ने कोशिकाओं से उत्पन्न विश्वामित्र भाव की पूजा करी और बहुत प्रकार से प्रशंसा करके नाड़ियों रूपी रानियों सहित कोशिकाओं के मैत्रीभाव के आगे समर्पण कर दिया। चित और कोशिकाओं का विज्ञान बहुत गम्भीर होता है। क्योंकि चित के अनुसार शरीर की कोशिकाएँ जागृत होती हैं और कोशिकाओं के अनुसार चित की गति होती है। अत: इसका सम्बन्ध परस्पर बहुत गहरा होता है।
भीतर भवन दीन्ह बर बासू। मन जोगवत रह नृपु रनिवासू।।
पूजे गुर पद कमल बहोरी। कीन्हि बिनय उर प्रीति न थोरी।।
व्याख्या : उस अवस्था में कोशिकाएँ निर्मल होकर अन्त:करण की चेतना के अनुसार भाव पैदा करने लगती हैं और उसी के अनुसार मन का स्वरूप बन जाता है तथा नर व नाड़ियों की गति भी उसी के अनुसार चलने लग जाती है। तब चित रूपी राजा ने विशिष्ट ज्ञान रूपी वसिष्ठ की बहुत प्रकर से पूजा करी। उस समय सहज प्रेम कम नहीं होता है।
दो0 बधुन्ह समेत कुमार सब रानिन्ह सहित महीसु।
पुनि पुनि बंदत गुर चरन देत असीस मुनीसु।।352।।
व्याख्या : उस सहज अवस्था में चित व चित की नाड़ियों सहति चित की चारों अवस्था व चारों वृतियाँ विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु की पूजा करने लगते हैं और विशिष्ट ज्ञान भी आशीर्वाद अर्थात् सद्प्रेरणा देने लगते हैं।
बिनय कीन्हि उर अति अनुरागें। सुत संपदा राखि सब आगें।।
नेगु मागि मुनिनायक लीन्हा। आसिरबादु बहुत बिधि दीन्हा।।
व्याख्या : तब चित रूपी दसरथ ने चारों अवस्था रूपी पुत्रों सहित बहुत अनुराग के साथ विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु की प्रार्थना करी और अपना नेगु अर्थात् वासनाओं का त्याग कराकर मन को वश में करनेवाले विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु ने बहुत प्रकार से आशीर्वाद दिया।
उर धरि रामहि सीय समेता। हरषि कीन्ह गुर गवनु निकेता।।
बिप्र बधू सब भूप बोलाईं। चैल चा डिग्री भूषन पहिराईं ।।
व्याख्या : तब विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु ने आत्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता को हृदय में धारण करके प्रसन्न होकर अपने घर को प्रस्थान किया अर्थात विशिष्ट ज्ञान का भाव अपनी सहज अवस्था में लौट गया। क्योंकि सदैव विशिष्ट ज्ञान की अवस्था नहीं बनी रह पाती है। अत: भाव आते व जाते रहते हैं। तब चित रूपी राजा ने विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश वाली वृतियों को बुलाया और नाना प्रकार की इच्छाओं को पूर्ण करने की प्रेरणा करी। उसी को ""चा डिग्री भूषन पहिराई"" बोलकर लिखा है।
बहुरि बोलाइ सुआसिनि लीन्हीं। रूचि बिचारी पहिरावनि दीन्हीं।।
नेगी नेग जोग सब लेहीं। रूचि अनुरूप भूपमनि देहीं।।
व्याख्या : तब बहुत सी सात्विक इच्छाएँ पैदा हो गयी, जिन्हें रूचि के अनुसार पूर्ण होने का वर देकर संतुष्ट कर दिया। उस अवस्था में नाना प्रकार के भाव व इच्छाएँ चित की चेतना के अनुसार पूर्ण होने लगती हैं और इच्छाएँ पूर्ण होने पर शान्ति मिलना स्वत: शु डिग्री हो जाती है।
प्रिय पाहुने पूज्य जे जाने। भूपति भली भाँति सनमाने।।
देव देखि रघुबीर बिबाहू। बरषि प्रसून प्रसंसि उछाहू।।
व्याख्या : जो प्रिय सात्विक भाव पूजनीय होते हैं, उनको चित रूपी राजा ने उचित सम्मान दिया। उस अवस्था में आत्मा व सुरता के मिलन को देखकर दैवीय भाव अच्छे मनके भाव पैदा करने लगते हैं, जिससे शरीर में प्रशंसा व उत्साह छा जाता है।
दो0 चले निसान बजाइ सुर निज निज पुर सुख पाइ।
कहत परसपर राम जसु प्रेम न हृदयँ समाइ।।353।।
व्याख्या : उस अवस्था में शरीर के समस्त स्वर (सुर) सुख पूर्वक अपनी-अपनी गति के अनुसार सहज होकर चलने लगते हैं। उस समय स्वर आपस में आत्मा रूपी राम का यशोगान करते हुए चलते हैं, जिससे हृदय में सहज प्रेम पैदा हो जाता है।
सब बिधि सबहि समदि नर नाहू। रहा हृदयँ भरि पूरी उछाहू।।
जहँ रनिवासु तहाँ पगु धारे। सहित बहूटिन्ह कुअँर निहारे।।
व्याख्या : सब प्रकार से सब भावों में समता का भाव आ जाने से नर की धड़कन निर्मल हो गयी जिससे पूरे शरीर में उत्साह भर गया। तब चित रूपी राजा नाड़ियों के मूल स्थान पर गए और वृतियों रूपी बहूओं सहित चितावस्था रूपी पुत्रों को देखा।
लिए गोद करि मोद समेता। को कहि सकि भयउ सुखु जेता।।
बधू सप्रेम गोद बैठारीं। बार बार हियँ हरषि दुलारीं।।
व्याख्या : तब चित रूपी राजा ने वृति रूपी बहू को प्रेम सहित गोद में ले लिया। उस अवस्था के सुख का वर्णन कौन कर सकता है। जब वृति रूपी बहू को चित रूपी राजा ने गोद में बैठा लिया, तो हर्ष व प्यार की हिलोरें स्वत: उठने लग जाती हैं। अर्थात् जब वृतियों का चित में समावेश होने लग जाता है, तो स्वत: हर्ष पैदा होने लग जाता है।
देखि समाजु मुदित रनिवासू। सब के उरअनंद कियो बासू।।
कहेउ भूप जिमि भयउ बिबाहू। सुनि सुनि हरषु होत सब काहू।।
व्याख्या : उस समय की भाव अवस्था को देखकर समस्त नाड़ियों रूपी रानियाँ प्रसन्न हो उठती हैं तथा हृदय में आनन्द भर जाता है अर्थात् आनन्द के भावों का संचार होने लग जाता है। तब चित रूपी राजा ने बताया कि किस प्रकार आत्मा व सुरता का मिलन हुआ। जिसे सुनकर सबका हृदय आनन्द से भर गया।
जनक राज गुन सीलु बड़ाई। प्रीति रीति संपदा सुहाई।।
बहुबिधि भूप भाट जिमि बरनी। रानीं सब प्रमुदित सुनि करनी।।
व्याख्या : प्राण रूपी जनक के गुण व शील की बड़ाई सुनकर लगने लगा कि प्राण रूपी जनक की तो प्रेम ही सम्पत्ति होता है। बहुत प्रकार से चित रूपी राजा व यशोगान वाले भावों ने विवाह (मिलन) का वर्णन किया, जिसे सुनकर समस्त नाड़ियों में प्रसन्नता का संचार हो उठा।
दो0 सुतन्ह समेत नहाइ नृप बोलि बिप्र गुर ग्याति।
भोजन कीन्ह अनेक बिधि घरी पंच गइ राति।।354।।
व्याख्या : चित की चारों अवस्थाओं सहित चित रूपी दसरथ ने विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश, गुरु भावों को बुलाकर नाना प्रकार से भाव रूपी भोजन किया अर्थात् चित में वृतियों व अवस्थाएँ मिलने से विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश वाले भावों का उद्भव हो गया। उस अवस्था में सात्विक भावों में भी नाना प्रकार का वार्तालाप होने लगता है, जिससे अज्ञान रूपी रात्रिकी पाँच घड़ी गुजर गयी।
मंगलगान करहिं बर भामिनि। भै सुखमूल मनोहर जामिनि।।
अँचइ पान सब काहूँ पाए। स्रग सुगंध भूषित छबि छाए।।
व्याख्या : उस अवस्था में भावों की भावना मंगलकारी हो जाती है, जो समस्त सुखों का मूल व मन का हरण करने वाली अवस्था होती है। उस समय भावों के प्रभाव के कारण नाड़ियों से निकलने वाला सात्विक रसायन (हार्मोन्स) सभी भावों को मिलने लगता है, जो सुखदायक, सुगन्धित व सद्गुणों से भूषित होता है। अर्थात् उस समय जो हार्मोन शरीर में पैदा होता है, वो बहुत ही लाभकारी व सुखदायक होता है।
रामहि देखि रजायसु पाई। निज निज भवन चले सिर नाई।।
प्रेम प्रमोदु बिनोदु बड़ाई। समउ समाजु मनोहरताई।।
व्याख्या : उस अवस्था में आत्मा रूपी राम को देखकर सभी भाव आत्मा की आज्ञा पाकर अर्थात् आत्मा का रूख जानकर सब अपने अपने घरों को चले। उस समय का प्रेम, आनन्द, विनोद व भावों की व्यवस्था सब मन को हरने वाली थी। अर्थात् परम सात्विक अवस्था थी।
कहि न सकहिं सत सारद सेसू। बेद बिरंचि महेस गनेसू।।
सो मैं कहौं कवन बिधि बरनी। भूमि नागु सिर धरइ कि धरनी।।
व्याख्या : उस परम सुखद अवस्था का वर्णन तो सैकड़ों सरस्वती व शेषनाग, वेद, ब्रह्मा, महेश व गणेश भी नहीं कर सकते हैं। फिर मैं कैसे वर्णन कर सकता हूँ? क्या केंचुआ कभी पृथ्वी को अपने सिर पर धारण कर सकता है?
नृप सब भाँति सबहि सनमानी। कहि मृदु बचन बोलाईं रानी।।
बधू लरिकनीं पर घर आईं। राखेहु नयन पलक की नाईं।।
व्याख्या : नृप अर्थात् चित रूपी दसरथ राजा ने सभी का सम्मान किया और मधुर वाणी बोलकर नाड़ियों रूपी रानियों को बुलाकर बोला कि वृति रूपी बहुएँ पराए घर से आयी हैं अर्थात् ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर से अवधी रूपी नगर में आयी हैं। अत: इन्हें आँखों के पलकों के समान रखना।
दो0 लरिका श्रमित उनीद बस सयन करावहु जाइ।
अस कहि गे बिश्राम गृहँ राम चरन चितु लाइ।।355।।
व्याख्या : अब चित की अवस्था रूपी लड़के भी नींद के वश में हैं। अत: जाकर इन्हें सयन करवाओ अर्थात सुसुप्ति अवस्था हावी हो रही है। ऐसा कहकर दसरथ रूपी राजा आत्मा रूपी राम को हृदय में रखकर विश्राम करने चले गए।
भूप बचन सुनि सहज सुहाए। जरित कनक मनि पलंग डसाए।।
सुभग सुरभि पय फेन समाना। कोलम कलित सुपेतीं नाना।।
व्याख्या : चित रूपी राजा के सहज बचनों को सुनकर नाड़ियों रूपी रानियों ने आत्मा रूपी राम को माया रूपी सोने से जड़े हुए मन के भाव रूपी पलंग पर लेटा दिया। अर्थात् ध्यान शरीर में उतर कर आ जाता है, तो धीरे-धीरे माया के भाव आत्मा को आच्छादित करने लगते हैं। उसी भाव अवस्था का यहाँ वर्णन किया गया है। उस समय माया के भाव सुभग अर्थात् अच्छी प्रकृति के लगते हैं और दूध के झागों के समान कोमल तकिए व बिछौना की तरह लगते हैं अर्थात् माया रूपी बिस्तर सज जाता है।
उपबरहन बर बरनि न जाहीं। स्रग सुगंध मनिमंदिर माहीं।।
रतनदीप सुठि चा डिग्री चँदोवा। कहत न बनइ जान जेहिं जोवा।।
व्याख्या : उस समय माया के सुखद भावों के साथ जो उपभाव पैदा होते हैं, उनका वर्णन नहीं किया जा सकता है। मन रूपी मंदिर में भोगों की सुगंध छा जाती है। रतनदीप अर्थात् भोग रूपी सुन्दर दीपक में चँदोवा यानी चारों तरफ भोग की लालसा छा जाती है, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। वास्तव में ध्यान उतरकर जब शरीर में आता है, तो सुखद अनुभूति होने लगती है और भोग इच्छाएँ बहुत सुन्दर रूप धारण करके प्रकट होने लगती हैं। उन्हीं को नाना प्रतीकों का सहार लेकर लिखा गया है।
सेज रूचिर रचि रामु उठाए। प्रेम समेत पलँग पौढ़ाए।।
अग्या पुनि पुनि भाइन्ह दीन्ही। निज निज सेज सयन तिन्ह कीन्ही।।
व्याख्या : माया रूपी सुन्दर सेज बनाकर आत्मा रूपी राम को नाड़ियों रूपी माताओं ने प्रेमपूर्वक लेटा दिया और फिर बार-बार चित की अवस्था रूपी अन्य भाईयों को आज्ञा दी। तब उन्होंने अपनी-अपनी शय्याओं पर जाकर सयन किया।
देखि स्याम मृदु मंजुल गाता। कहहिं सप्रेम बचन सब माता।।
मारग जात भयावनि भारी। केहि बिधि तात ताड़का मारी।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम के कोमल, सुन्दर व श्याम अंगों को देखकर नाड़ियाँ रूपी माताएँ आपस में प्रेमपूर्वक कहने लगीं कि आसुरी वन में रास्ता ही भयानक लगता है। फिर कैसे ताड़का रूपी आसुरी इच्छा को मारा अर्थात् कैसे आसुरी इच्छा का दमन किया?
दो0 घोर निसाचर बिकट भट समर गनहिं नहिं काहु।
मारे सहित सहाय किमि खल मारीच सुबाहु।।356।।
व्याख्या : तब नाड़ियों रूपी रानियाँ विचार करती हैं कि घोर वासना रूपी विशाल आसुरी भावों, जो भाव युद्ध में किसी को कुछ समझते ही नहीं हैं, को बिना किसी की सहायता के कैसे मारीच व सुबाहु सहित आत्मा रूपी राम ने मार गिराया? मारीच वासना का एक रूप होता है, जो कभी प्रकट तो कभी अप्रकट होकर जीव को वासना की तरफ आकर्षित करता रहता है। सुबाहु भी वासना का ही रूप होता है, जो ऊपर से अच्छापन लिए होता है परन्तु भीतर घोर आसक्ति छुपी रहती है। अत: नाड़ियाँ रूपी रानियाँ विचार करती हैं कि ऐसे विकट व विशाल आसुरी भावों को कैसे आत्मा रूपी राम ने मार दिया?
मुनि प्रसाद बलि तात तुम्हारी। ईस अनेक करवरें टारी।।
मख रखवारी करि दुहुँ भाईं। गुरु प्रसाद सब विद्या पाईं।।
व्याख्या : नाड़ियाँ रूपी रानियाँ फिर विश्वामित्र रूपी मुनि का आभार प्रकट करती हुई कहती हैं कि हे मुनि! हम आपके आभारी हैं क्योंकि आपकी कृपा से ईश्वर ने बहुत सी बाधाओं को दूर कर दिया। इन दोनों भाईयों ने (आत्मा रूपी राम व लखन रूपी लक्ष्मण) ने तो यज्ञ की रखवाली की अर्थात् पान में अपान का हवन की क्रिया की रक्षा करी और गुरु की कृपा से समस्त विद्याओं को प्राप्त कर लिया। यहाँ पर तो साधना का रहस्य स्पष्ट खोल ही दिया है कि जब पान में अपान का हवन होने लगता है, तो नाना आसुरी इच्छाओं के भाव पैदा होकर व्यवधान करने लगते हैं। परन्तु जब आसुरी भावों के लक्षणों को जानकर साधक दृढ़ होकर यज्ञ क्रिया। (पान में अपान का हवन) में लगा रहता है, तो आसुरी भाव स्वत: मरना शु डिग्री हो जाते हैं और साधक को समस्त विद्याओं का ज्ञान होने लग जाता है।
मुनि तिय तरी लगत पग धूरी। कीरति रही भुवन भरि पूरी।।
कमठ पीठि पबि कूट कठोरा। नृप समाज महुँ सिव धनु तोरा।।
व्याख्या : जब पान में अपान का हवन की क्रिया सफल हो जाती है, तो आत्मा निर्मल होती चली जाती है, जिससे मन के भावों से उत्पन्न त्रिगुणों से युक्त अहिल्या रूपी कुण्डलिनि शक्ति भी जागृत हो उठती है और तीनों लोकों में यश छा जाता है। जब अहिल्या रूपी कुण्डलिनि शक्ति जागृत हो जाती है तो आत्मा और बलवान हो जाती है, जिससे कछुए की पीठ के समान कठोर अज्ञान रूपी धनुष भी आत्मा की धड़कन से टूट जाता है।
बिस्व बिजय जसु जानकि पाई। आए भवन ब्याहि सब भाई।।
सकल अमानुष करम तुम्हारे। केवल कौसिक कृपाँ सुधारे।।
व्याख्या : जब अज्ञान रूपी कठोर धनुष टूट जाता है, तो समस्त विश्व का जय हो जाता है और सुरता रूपी सीता आत्मा में लीन हो जाती है। इस प्रकार सुरता व आत्मा रूपी राम का भाईयों सहित विवाह हो जाता है। आत्मा जब निर्मल हो जाती है, तो समस्त कर्म सहज (मन की सीमा से बाहर) होने लगते हैं। ये सब कौशिकाओं के जागृत होने पर ही सम्भव हो पाता है। उसी को कौशिक पुत्र विश्वामित्र की कृपा बताया गया है।
आजु सुफल जग जनमु हमारा। देखि तात बिधुबदन तुम्हारा।।
जे दिन गए तुम्हहि बिनु देखें। ते बिरंचि जनि पारहिं लेखें।।
व्याख्या : नाड़ियाँ रूपी रानियाँ कहती हैं कि आज अर्थात् साधना की पराकाष्ठा के बाद हमारा जन्म सफल हुआ है अर्थात् अब सात्विक भावों का संचार होने लगा है। हे आत्मा रूपी राम! तुम्हारे चन्द्रमा के समान शीतल शरीर को देखकर परमशान्ति मिल रही है। इसलिए तुम्हें देखे बिना जो दिन गुजर गये हैं, ब्रह्मा जी उनका लेखा नहीं रखें अर्थात् अब हम प्रारब्ध के जाल में नहीं फँसें।
दो0 राम प्रतोषीं मातु सब कहि बिनीत बर बैन।
सुमिरि संभु गुर बिप्र पद किए नीद बस नैन।।357।।
व्याख्या : तब सब नाड़ियाँ रूपी रानियों ने आत्मा रूपी राम की प्रशंसा करके विनय पूर्वक शंभू, गुरु और विशुद्ध प्रकाश के भावों का स्मरण करके आत्मा रूपी राम को माया रूपी नींद के वश में कर दिया अर्थात् माया के भावों का आच्छादन हो गया। परन्तु साधना की पराकाष्ठा के बाद जब माया का आच्छादन होता है, तो गुरु, विशुद्ध ज्ञान व निज स्वरूप का ज्ञान बना रहता है। उसी को यहाँ लिखा गया है।
नीदउँ बदन सोह सुठि लोना। मनहुँ साँझ सरसीरूह सोना।।
घर घर करहिं जागरन नारीं। देहिं परसपर मंगल गारीं।।
व्याख्या : माया रूपी नींद का आच्छादन होने पर भी आत्मा की निर्मलता सुन्दर बनी रहती है, मानों संध्या के समय में कमल सो रहा हो। उस अवस्था में जब माया का प्रभाव बढ़ने लगता है, तो प्रत्येक कोष की नाड़ियाँ धड़कने लग जाती हैं और परस्पर मंगल भावना का संचार करने लगती है।
पुरी बिराजति राजति रजनी। रानीं कहहिं बिलोकहु सजनी।।
सुंदर बधुन्ह सासु लै सोईं। फनिकन्ह जनु सिरमनि उर गोईं।।
व्याख्या : देह रूपी पुरी में माया रूपी रात्रि छा गयी, जिसे देखकर नाड़ियों रूपी रानियाँ बोली कि माया रूपी रात्रि को देखो। चित की वृति रूपी बहुओं को लेकर नाड़ियाँ रूपी रानियाँ लेकर सोयी अर्थात् वृतियाँ नाड़ियों की धड़कन में समा गयी जैसे मणि धारी सर्प अपनी मणि को हृदय में छुपा लेता है। अर्थात् जब माया का प्रभाव बढ़ता है, तो ज्ञान रूपी मणि नाड़ियों की धड़कन में समा जाती है।
प्रात पुनीत काल प्रभु जागे। अरून चूड़ बर बोलन लागे।।
बंदि मागधन्हि गुनगन गाए। पुरजन द्वार जोहारन आए।।
व्याख्या : ज्ञान रूपी सुन्दर प्रात: काल में पुन: आत्मा रूपी राम जागे तथा चेतावनी रूपी मुर्गे बोलने लगे। तब वन्दना व चाह के भाव आत्मा रूपी राम के गुण गान करने लगे तथा पुरजन अर्थात् देह के भाव आत्मा रूपी राम को जोहार करने आए। जब ज्ञान रूपी सवेरा हो जाता है, तो माया रूपी रात्रि का अवसान हो जाता है।
बंदि बिप्र सुर गुर पितु माता। पाइ असीस मुदित सब भ्राता।।
जननिन्ह सादर बदन निहारे। भूपति संग द्वार पगु धारे।।
व्याख्या : तब वन्दना के भावों, विशुद्ध ज्ञान के भावों, सात्विक स्वरों, गुरु, माता (नारी) व पिता (नर) का आशीर्वाद पाकर अर्थात् बल पाकर सभी चित की अवस्था रूपी भाई प्रसन्न हो गए। तब नाड़ियों रूपी माताओं ने देखा कि चित रूपी राजा दसरथ के साथ द्वार पर आ गए हैं।
दो0 कीन्हि सौच सब सहज सुचि सरित पुनीत नहाइ।
प्रातक्रिया करि तात पहिं आए चारिउ भाइ।।358।।
व्याख्या : तब चित की अवस्था रूपी चारों भाई पवित्रता रूपी नदी में स्नान करके व नित्य क्रिया करके चित रूपी दसरथ के पास आए। अर्थात् जब चित की अवस्था निर्मल हो पाती हैं, तभी वे चित के पास यानी चित में समाहित हो पाती है।
।। नवाह्न्य पारायण, तीसरा विश्राम।।
भूप बिलोकि लिए उर लाई। बैठे हरषि रजायसु पाई।।
देखि रामु सब सभा जुड़ानी। लोचन लाभ अवधि अनुमानी।।
व्याख्या : तब चित रूपी राजा ने अवस्था रूपी पुत्रों को देखकर अपनी छाती से लगा लिया। तब सभी चित की अवस्था रूपी भाई चित रूपी राजा की आज्ञा पाकर प्रसन्न होकर बैठे। तब आत्मा रूपी राम को देखने के लिए भीड़ लग गयी और अवधी रूपी शरीर के भावों ने आत्मा रूपी राम के दर्शन को ही नेत्रों का लाभ मान लिया। अर्थात् आत्म तत्व को देखकर देह रूपी अयोध्या के भाव संतुष्ट हो गए।
पुनि बसिष्ट मुनि कौसिकु आए। सुभग आसनन्हि मुनि बैठाए।।
सुतन्ह समेत पूजि पद लागे। निरखि रामु दोउ गुर अनुरागे।।
व्याख्या : तब उस अवस्था में जब चित में चित की अवस्थाएँ समाने लगती हैं, तो विशिष्ट ज्ञान व समता रूपी विश्वामित्र का भाव स्वत: ही प्रकट हो जाते हैं। उसी को गुरु वसिष्ठ व विश्वामित्र का आना बोलकर लिखा गया है। तब चित रूपी राजा दसरथ ने अपनी अवस्था रूपी पुत्रों सहित पूजा करके सुभग अर्थात् अच्छी प्रकृति के आसन दिए। तब दोनों गुरु (वसिष्ठ व विश्वामित्र) भाव आत्मा रूपी राम को देखकर अनुराग से भर गए।
कहहिं बसिष्ठ धरम इतिहासा। सुनहिं महीसु सहित रनिवासा।।
मुनि मन अगम गाधि सुत करनी। मुदित बसिष्ठ बिपुल बिधि बरनी।।
व्याख्या : तब उस अवस्था में विशिष्ट ज्ञान रूपी वसिष्ठ गुरु धारणा के इतिहास को समझाते हैं अर्थात् जीवात्मा को किन-किन भावों को धारण करना चाहिये। जिसे चित रूपी राजा व नाड़ियों रूपी रानियाँ सुनने लगते हैं। तब प्रसन्न होकर विशिष्ट ज्ञान रूपी वशिष्ठ ने कोशिकाओं से उत्पन्न (गाधि सुत) भावों के विशाल प्रभाव का वर्णन किया। अर्थात् उस समय साधक को समझ में आने लग जाता है कि कोशिकाओं के जागृत होने पर भावों का क्या प्रभाव होता है?
बोले बामदेउ सब साँची। कीरति कलित लोक तिहुँ माची।।
सुनि आनंदु भयउ सब काहू। राम लखन उर अधिक उछाहू।।
व्याख्या : विशिष्ट ज्ञान रूपी भाव बोले की कोशिकाओं से उत्पन्न बाएँ आंगों के देव भाव भी सत्य होते हैं, जिनकी कीर्ति व करणी शरीर रूपी ब्राह्मण्ड के तीनों लोकों में फैली होती है। अर्थात् शरीर के सब अंगों में बाएँ अंगों के भावों का प्रभाव रहता है। यह सुनकर सभी को बहुत आनन्द हुआ। विशेषकर आत्मा रूपी राम व लखन रूपी लक्ष्मण के हृदय में उत्साह छा गया।
दो0 मंगल मोद उछाह नित जाहिं दिवस एहि भाँति।
उमगी अवध अनंद भरि अधिक अधिक अधिकाति।।359।।
व्याख्या : इस प्रकार नित्य मंगल, प्रसन्नता व उत्साह के भाव पैदा होकर शरीर रूपी अयोध्या में अधिक से अधिक आनन्द पैदा करने लगते हैं। अर्थात् उत्साह व आनन्द की अवस्था आ जाती है।
सुदिन सोधि कल कंकन छोरे। मंगल मोद बिनोद न थोरे।।
नित नव सुखु सुर देखि सिहाहीं। अवध जन्म जाचहिं बिधि पाहीं।।
व्याख्या : जब सद्गुणों के भावों की अवस्था आ जाती है अर्थात् अच्छे दिन आ जाते हैं, तो कल कंकन अर्थात माया के बंधन टूट जाते हैं, जिससे मंगल, मोद व विनोद की अवस्था आ जाती है। उस अवस्था को देखकर स्वरों की गति निर्मल हो जाती है, जो नए-नए सुख की अनुभूति कराने लगते हैं। इस प्रकार शरीर रूपी अवधपुरी में दैवीय भाव जन्म लेने की चाह रखने लगते हैं। अर्थात् दैवीय भाव पैदा होने लग जाते हैं।
बिस्वामित्रु चलन नित चहहीं। राम सप्रेम बिनय बस रहहीं।।
दिन दिन सयगुन भूपति भाऊ। देखि सराह महामुनि राऊ।।
व्याख्या : कौशिकाओं से उत्पन्न विश्वामित्र भाव नित्य चलना चाहता है अर्थात् विश्वमैत्री का भाव जब शांत होने लगता है, तो आत्मा रूपी राम की विनय और प्रेम के कारण पुन: प्रबल हो उठता है। इस प्रकार चित से नित्य सद्गुण पैदा होने लगते हैं। जिन्हें देखकर महामुनि अर्थात् विश्वामित्र रूपी भाव प्रशंसा करने लगते हैं।
मागत बिदा राउ अनुरागे। सुतन्ह समेत ठाढ़ भे आगे।।
नाथ सकल संपदा तुम्हारी। मैं सेवकु समेत सुत नारी।।
व्याख्या : जब विश्वामित्र रूपी मुनि भाव ने चित रूपी राजा दसरथ से विदा माँगीं तो चित अनुराग से भर गया और अपनी चार अवस्था रूपी पुत्रों सहित सामने खड़ा हो गया। हे नाथ! यह समस्त सम्पदा आपकी ही है अर्थात् समस्त भाव व्यवस्था तो कोशिकाओं से ही पैदा होती है। मैं अर्थात् चित, चित की अवस्था व नाड़ियाँ तो केवल भावों का संचार करने वाले सेवक हैं।
करब सदा लरिकन्ह पर छोहू। दरसनु देत रहब मुनि मोहू।।
अस कहि राउ सहित सुत रानी। परेउ चरन मुख आव न बानी।।
व्याख्या : हे नाथ! आप सदैव चित की अवस्था रूपी लड़कों पर कृपा करते रहना और बीच-बीच में मुझे दर्शन देते रहना अर्थात् समता की भावना प्रकट करते रहना। इस प्रकार कहकर चित, चित की अवस्था रूपी पुत्र व नाड़ियों रूपी रानियों सहित विश्वामित्र रूपी मन के भाव के चरणों में पड़ गए अर्थात् पूरी तरह समता के भाव के सामने समर्पण कर दिया।
दीन्हि असीस बिप्र बहु भाँती। चले न प्रीति रीति कहि जाती।।
रामु सप्रेम संग सब भाई। आयसु पाइ फिरे पहुँचाई।।
व्याख्या : तब विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश के भाव ने बहुत प्रकार से आशीर्वाद दिया और विदा लेकर चल दिए। उस समय के प्रेम का वर्णन नहीं किया जा सकता है। आत्मा रूपी राम सहित सब भाई प्रेम से विदा करने साथ चले और विश्वामित्र रूपी मुनि को पहुँचाकर आज्ञा लेकर वापस आ गए।
दो0 राम रूपु भूपति भगति ब्याहु उछाहु अनंदु।
जात सराहत मनहिं मन मुदित गाधिकुलचंदु।।360।।
व्याख्या : जाते हुए विश्वामित्र का भाव मन ही मन आत्मा रूपी राम के रूप, चित रूपी राजा की भक्ति व सुरता व आत्मा के मिलन समारोह के आनन्द व उत्साह की प्रसन्न होते हुए सराहना करते हुए जा रहा था।
बामदेव रघुकुल गुर ग्यानी। बहुरि गाधिसुत कथा बखानी।।
सुनि मुनि सुजसु मनहिं मन राऊ। बरनत आपन पुन्य प्रभाऊ।।
व्याख्या : तब बामदेव अर्थात् बाएँ अंगों में रहने वाले दैवीय भावों व विशिष्ट ज्ञान के भाव रूपी गुरु ने बहुत प्रकार से कोशिकाओंे से उत्पन्न विश्वामित्र के भाव का गुणगान किया। विश्वामित्र रूपी भाव का सुयश सुनकर चित रूपी राजा दसरथ बहुत प्रसन्न हुआ और अपने स्वंय के पुण्यों के प्रभाव का वर्णन करने लगा।
बहुरे लोग रजायसु भयऊ। सुतन्ह समेत नृपति गृहँ गयऊ।।
जहँ तहँ राम ब्याहु सबु गावा। सुजसु पुनीत लोक तिहुँ छावा।।
व्याख्या : उस अवस्था में बहुत से रजोगुणी भाव पैदा हो गए तथा चित रूपी राजा, अवस्था रूपी पुत्रों सहित स्वयं के महल में चले गए। जहाँ-तहाँ रजोगुणी भाव आत्मा रूपी राम के विवाह का यश गाने लगे। जिससे सुयश, व पवित्रता तीनों लोकों में छा गयी। यह वह अवस्था होती है, जब साधक साधना की पराकाष्ठा को छू लेता है और फिर लौटकर देह भावों में आता है, तो उस पर रजोगुण का प्रभाव पड़ने लग जाता है, जिससे यश व सिद्धियों के जाल में फँसने लग जाता है। उस समय साधक का यश चारों तरफ फैलने भी लग जाता है।
आए ब्याहि रामु घर जब तें। बसइ अनंद अवध सब तब तें।।
प्रभु बिबाहँ जस भयउ उछाहू। सकहिं न बरनि गिरा अहिनाहू।।
व्याख्या : जब से आत्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता का मिलन हुआ है, तब से शरीर रूपी अयोध्या में नित्य नए-नए आनंद की अनुभूति होने लगती है। आत्मा व सुरता के मिलन के उत्साह व आनन्द का वर्णन सरस्वती व शेषनाग भी नहीं कर सकते हैं।
कबिकुल जीवनु पावन जानी। राम सीय जसु मंगल खानी।।
तेहि ते मैं कछु कहा बखानी। करन पुनीत हेतु निज बानी।।
व्याख्या : उन कवियों के जीवन को पवित्र जानना चाहिए, जिन्होंने आत्मा व सुरता (राम-सीता) के मिलन के यश, जो मंगल की खान है, का वर्णन किया है। इसलिए मैंने मेरी वाणी को पवित्र करने के लिए कुछ वर्णन किया है।
छ0 निज गिरा पावनि करन कारन राम जसु तुलसीं कह्यो।
रघुबीर चरित अपार बारिधि पा डिग्री कबि कौनें लह्यो।।
उपबीत ब्याह उछाह मंगल सुनि जे सादर गावहीं।
बैदेहि राम प्रसाद ते जन सर्बदा सुखु पावहीं।।
व्याख्या : स्वयं की वाणी को पवित्र करने के लिए ही तुलसीदास ने आत्मा रूपी राम के यश का वर्णन किया है। वरना परमात्मा का चरित तो अपरम्पार होता है, उसका वर्णन कौन कवि कर सकता है? इसलिए उपवीत, विवाह का उत्साह व मंगल भावों को जो आदरपूर्वक गायेंगे, वे परमात्मा व सुरता रूपी सीता की कृपा से सदैव सुख प्राप्त करेंगे।
सो0 सिय रघुबीर बिबाहु जे सप्रेम गावहिं सुनहिं।
तिन्ह कहुँ सदा उछाहु मंगलायतन राम जसु।।361।।
व्याख्या : जो लोग आत्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता के मिलन उत्सव (विवाह) को सप्रेम कहेंगे व सुनेंगे, उनका सदैव मंगल होगा और राम के यशोगान से जीवन में उत्साह व आनन्द बना रहेगा।
।। मास पारायण, बारहवाँ विश्राम।।
।। इति श्री मद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुष विध्वंसने प्रथम: सोपान: समाप्त:।।