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रामायण - बालकाण्ड (भाग -3)

Ramayan
बालकाण्ड (भाग -3) दो0 देखरावा मातहि निज अद्भुत रूप अखण्ड। रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मांड।।201।। व्याख्या : सुष्मना नाड़ी में ही ध्यान की अवस्था में परमात्मा अपना अद्भुत अखण्ड रूप प्रेरणा द्वारा समझा देते हैं। उस अवस्था में समझ में आ जाता है और आभास होने लगता है कि मानो रोम-रोम में ही करोड़ों ब्रह्माण्ड बसे हुए हैं। अगनित रबि ससि सिव चतुरानन। बहु गिरि सरित सिंधु महि कानन।। काल कर्म गुन ग्यान सुभाऊ। सोउ देखा जो सुना न काऊ।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में शरीर रूपी पृथ्वी और वन में अनगिनत सूर्य, चन्द्रमा, शिव, चतुरानन (गुणों की चार अवस्था) पर्वत, नदियाँ व समुद्रों का आभास होने लगता है तथा काल, कर्म, गुण व ज्ञान की मूल अवस्था भी समझ में आने लग जाती है, जिसके बारे में कभी सुना व देखा भी नहीं था। देखी माया सब बिधि गाढ़ी। अति सभीत जोरें कर ठाढ़ी।। देखा जीव नचावइ जाही। देखी भगति जो छोरइ ताही।। व्याख्या : उस अवस्था में माया के भावों की गहराई भी समझ में आ जाती है तथा परमात्मा के सामने माया भयभीत होकर रहती है, यह भी समझ में आ जाता है। जीव को माया कैसे नचाती है, वह अवस्था भी समझ में आ जाती है तथा भक्ति का प्रभाव भी समझ में आ जाता है, जो माया से जीव को छुड़ाती है। तन पुलकित मुख बचन न आवा। नयन मूदि चरननि सि डिग्री नावा।। बिसमयवंत देखि महतारी । भय बहुरि सिसुरूप खरारी।। व्याख्या : उस ध्यान की अवस्था में जब परमात्मा का आभास होता है, तो शरीर पुलकित हो उठता है और मुख में वाणी मौन हो जाती है और साधक आँखें बन्द करके मन ही मन समर्पण करते हुए परमात्मा के चरणों में सिर झूकाता है। उस अवस्था में सुष्मना नाड़ी रूपी कौसल्या माता को आश्चर्यचकित सा देखकर खरारी अर्थात् अज्ञान के शत्रु परमात्मा बालरूप में आभासित होने लगते हैं अर्थात् कामादि भाव मिटने लग जाते हैं। अस्तुति करि न जाइ भयमाना। जगत पिता मैं सुत करि जाना।। हरि जननी बहुबिधि समुझाई। यह जनि कतहुँ कहसि सुनुमाई।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में स्तुति भी नहीं हो पाती है क्योंकि वाणी तो मौन सी हो जाती है और माया का निवारण सा होता देखकर भय सा पैदा होने लग जाता है तथा साधक को लगने लग जाता है कि जगत के पिता परमात्मा को बालक रूप में आभासित करने से भ्रम का सा भय पैदा हो जाता है। तब परमात्मा सुष्मना नाड़ी में ही भावों की प्रेरणा करके समझाते हैं कि इस रहस्य को कभी किसी को मत बताना। यहाँ किसी को नहीं बताने से तात्पर्य यह है कि परमात्मा की अनुभूति को तो साधक स्वयं ही कर सकता है और उस अनुभूति को किसी को वाणी द्वारा बताया भी नहीं जा सकता है। अगर बताया भी जायेगा तो सुनने वाला सत्य नहीं मानेगा, तो उससे उल्टा भ्रम की अवस्था ही पैदा होगी। दो0 बार बार कौसल्या बिनय करइ कर जोरि। अब जनि कबहूँ ब्यापै प्रभु मोहि माया तोरि।।202।। व्याख्या : तब सुष्मना रूपी कौसल्या बार-बार प्रार्थना करने लगती है अर्थात् सुष्मना नाड़ी में बार-बार प्रार्थना के भाव उमड़ने लगते हैं कि हे प्रभु! अब ऐसी क्षमता दे दीजिए, जिससे मुझे कभी आपकी माया नहीं सताए। बाल चरित हरि बहु बिधि कीन्हा। अति अनंद दासन्ह कहँ दीन्हा।। कछुक काल बीतें सब भाई। बड़े भए परिजन सुखदाई।। व्याख्या : परमात्मा का जब हृदय में अवतरण हो जाता है तो माया का हरण हो जाता है और बाल चरित करते हुए परमात्मा साधक को बहुत आनन्द देने लगते हैं। इस प्रकार साधक का कुछ समय आनन्द में निकलता चला जाता है और साधक के अन्त:करण में परमात्मा की चारों अवस्था अर्थात् राम, भरत, लक्ष्मण व शत्रुघ्न रूपी वृतियाँ बलवती होती चली जाती हैं, जो अन्य भावों को भी सुख देने वाली होती हैं। उसी को चारों भाइयों का बड़ा होना बोलकर लिखा गया है। चूड़ाकरन कीन्ह गुरु जाई। बिप्रन्ह पुनि दछिना बहु पाई।। परम मनोहर चरित अपारा। करत-फिरत चारिउ सुकुमारा।। व्याख्या : गुरु वसिष्ठ ने फिर जाकर चूड़ाकरन संस्कार किया अर्थात् विशिष्ट ज्ञान के भाव ने परमात्मा में साधक की आस्था को प्रबल कर दिया, जिससे विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश के भाव और भी बलवान हो गए। उस अवस्था में परमात्मा की चारों वृतियाँ (राम, भरत, लक्ष्मन व शत्रुघ्न) मन को हरण करने वाली हो जाती हैं और साधक इन चारों वृतियों में आनन्द मग्न होकर विचरण करने लगता है। मन क्रम बचन अगोचर जोई। दसरथ अजिर बिचर प्रभु सोई।। भोजन करत बोल जब राजा। नहिं आवत तजि बाल समाजा।। व्याख्या : जो परमात्मा मन, वचन, कर्म व इन्द्रियों से परे होता है, वो ही जब अन्तरात्मा में अवतरित हो जाता है तोसहज होकर दस इन्द्रियों में प्रकृति से मुक्त होकर विचरण करने लगता है। अर्थात् जो परमात्मा इन्द्रियों से परे बताया गया है, वो ही जब अन्त:करण में उतर आता है, तो इन्द्रियों के द्वारा ही आभासित होने लग जाता है। इसलिए जब जीवात्मा रूपी राजा भावों का भोजन करने लगता है, तो परमात्मा अपने बाल स्वरूप में ही दृढ़ होकर भावों के बन्धन में नहीं पड़ता है। उसी को बाल समाज को नहीं छोड़ना बोलकर लिखा गया है। कौसल्या जब बोलन जाई। ठुमुक ठुमुक प्रभु चलहिं पराई।। निगम नेति शिव अंत न पावा। ताहि धरै जननी हठि धावा।। व्याख्या : जब कौसल्या रूपी सुष्मना नाड़ी में परमात्मा को बुलाने के भाव उठने लगते हैं, तो परमात्मा मानो ठुमुक-ठुमुक दूर चलने लगते हैं। जिस परमात्मा को वेदों ने "ऐसा भी नहीं"" ""ऐसा भी नहीं"" बोला है और विश्वास रूपी शिव भी जिसका अन्त नहीं जान पाते हैं, उन्हीं परमात्मा को सुष्मना नाड़ी रूपी कौसल्या भाव द्वारा पकड़ना चाहती है। धूसर धूरि भरें तनु आए। भूपति बिहसि गोद बैठाए।। व्याख्या : जब भावों द्वारा परमात्मा रूपी बालक को बुलाया जाता है, तो वह दूर जाने का आभास कराता है परन्तु वास्तव में वह दूर जाता नहीं है। परन्तु जब साधक की दृढ़ता देख लेता है, तो नाना ऋद्धि-सिद्धियों सहित परमात्मा साधक की गोद में आ जाते हैं और साधक आनन्दित होकर अपनी गोदी में बैठा लेते हैं। धूसर धूरि वैभव, सम्पन्नता व सिद्धियों का प्रतीक होता है। दो0 भोजन करत चपल चित इत उत अवस डिग्री पाइ। भाजि चले किलकत मुख दधि ओदन लपटाइ।।203।। व्याख्या : साधक का चंचल चित अवसर पाकर इधर-उधर भावों का भोजन करने लगता है और कभी-कभी भावों का भोजन करते हुए भावों की कल्पना में वैभव व भोग रूपी दही व माखन लगा कर दौड़ने लगता है। बाल चरित अति सरल सुहाए। सारद सेष संभु श्रुति गाए।। जिन्ह कर मन इन्ह सन नहिं राता। ते जन बंचित किए बिधाता।। व्याख्या : हृदय में परमात्मा के अवतरण के बाल चरित बहुत सहज व सरल होते हैं, जिनका वर्णन सरस्वती, शेष स्वयं साधक (शंभु) और वेद भी नहीं कर सकते हैं। जिनका मन परमात्मा के गुणगान में नहीं लगता है, वे लोग विधाता ने आनन्द से वंचित कर दिए हैं। भए कुमार जबहिं सब भ्राता। दीन्ह जनेऊ गुरु पितु माता।। गुरगृहँ गए पढ़न रघुराई। अलप काल विद्या सब आई।। व्याख्या : जब परमात्मा अवतरण की चारों वृतियाँ परिपक्व हो जाती हैं, तो विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु और जीवात्मा और सुष्मना, पिंगला व ईड़ा रूपी माताओं ने जनेऊ धारण करा दिया अर्थात् परमात्मा की वृतियाँ सहज होकर दृढ़ होने लग गयी, जिससे परमात्मा में लीनता बढ़ने लग गयी। तब उस अवस्था में सहज वृतियाँ विशिष्ट ज्ञान रूपी गुरु के सम्पर्क में आकर शिक्षा ग्रहण करने लगती हैं और अल्प काल में ही सहज में ही साधक के अन्त:करण में समस्त विद्याएँ आने लग जाती हैं अर्थात् साधक सर्वज्ञ की अवस्था को प्राप्त करने लग जाता है। जाकी सहज स्वास श्रुति चारी। सो हरि पढ़ यह कौतुक भारी।। बिद्या बिनय निपुन गुन सीला। खेलहिं खेल सकल नृप लीला।। व्याख्या : जिसकी श्वास सहज होती है अर्थात् प्राण निर्मल होते हैं, उसको चारों वेदों की अनुभूति हो जाती है और उस अवस्था में माया के हरण (हरि) की युक्ति समझ में आ जाती है। यह बहुत बड़ा खेल होता है। उस अवस्था में विद्या, विनय, निपुणता व गुणों की शीलता आ जाती है, जिससे साधक सहज होकर जीवन रूपी खेल को खेलने लगता है और उस समय नर की धड़कन से उठने वाले भावों का रहस्य भी समझ में आ जाता है। करतल बान धनुष अति सोहा। देखत रूप चराचर मोहा।। जिन्ह बीथिन्ह बिहरहिं सब भाई। थकित होहिं सब लोग लुगाई।। व्याख्या : परमात्मा के अवतरण की अवस्था में सद्वृतियाँ प्रबल हो जाती हैं और इच्छाएँ वश में आ जाती हैं। उसी अवस्था को करतल धनु अर्थात् इच्छाएँ वश में आ जाना कहा गया है। जब इच्छाएँ वश में आ जाती है तो साधक की सद्वृतियों को देखकर समस्त चरा चर मोहित अर्थात् आकर्षित होने लग जाता है। तब उस अवस्था में जिन-जिन नाड़ियों रूपी गलियों में राम, भरत, लक्ष्मण व शत्रुघ्न रूपी सद्वृतियाँ विचरण करने लगती हैं, उन नाड़ियों से उत्पन्न होने वाले नर-मादा भाव मोहित हो जाते हैं और सद्भावों की वृतियों को देखकर थम से जाते हैं। दो0 कोसलपुर बासी नर नारि बृद्ध अ डिग्री बाल। प्रानहु ते प्रिय लागत सब कहुँ राम कृपाल।।204।। व्याख्या : उस अवस्था में सुष्मना नाड़ी से उत्पन्न सभी नर-मादा भावों को परमात्मा का अवतरण प्राणों से भी प्रिय लगने लग जाता है। अर्थात् सुष्मना नाड़ी से उत्पन्न समस्त भाव परमात्मा में लीन होने लग जाते हैं। बंधु सखा संग लेहिं बोलाई। बन मृगया नित खेलहिं जाई।। पावन मृग मारहिं जियँ जानी। दिन प्रति नृपहि देखावहिं आनी।। व्याख्या : परमात्मा के अवतरण की अवस्था में आत्मा रूपी राम अपने बंधु और मित्रों को बुलाकर अर्थात् सद्वृतियों और सद्गुणों को बुलाकर शरीर रूपी वन में वासना रूपी हिरणों का शिकार करने लगते हैं। उस अवस्था में इच्छाओं का मूल समझ में आने लग जाता है क्योंकि कुछ इच्छाओं की वासना ऊपर से तो बहुत पवित्र लगती है परन्तु गहराई में जाकर देखने पर बन्धन कारक होती है। अत: साधक पवित्र सी दिखने वाली इच्छाओं को भी मारने का प्रयास करने लगता है। जब वासनाओं का दमन या समन हो जाता है, तो उसका प्रभाव नर की धड़कन पर भी पड़ता है इसलिए ""नृप दिखावहिं आनी"" बोलकर लिखा गया है। जे मृग राम बान के मारे। ते तनु तजि सुरलोक सिधारे।। अनुज सखा सँग भोजन करहीं। मातु पिता अग्या अनुसरहीं।। व्याख्या : जो इच्छा रूपी मृग आत्मा रूपी राम के संयम रूपी बाण से मारे जाते हैं, वे इच्छाएँ शान्त होकर सहज हो जाती हैं। अर्थात् संयम द्वारा इच्छाओं को शान्त कर देने पर वे जीव को फिर बन्धन में नहीं डालती हैं। उस अवस्था में आत्मा रूपी राम सद्गुण व वृतियों रूपी बन्धु व सखाओं के साथ भाव रूपी भोजन करते हैं और सहज हो जाने के कारण नाड़ियों रूपी माताओं व दसरथ रूपी पिता की आज्ञा का पालन करते हैं, अर्थात् पूरी तरह सहज हो जाते हैं। जेहि बिधि सुखी होहिं पुर लोगा। करहिं कृपानिधि सोइ संजोगा।। बेद पुरान सुनहिं मन लाई। आपु कहहिं अनुजन्ह समुझाई।। व्याख्या : परमात्मा के अवतरण की अवस्था में शरीर रूपी नगर के भाव रूपी लोग जैसे सुखी होते हैं, वैसे ही परमात्मा संयोग कर देते हैं। वेद व पुराण उस अवस्था में मन लगाकर सुनते हैं तथा स्वयं आत्मारूपी राम वेद-पुराण का रहस्य बताने लगते हैं और भरत, लक्ष्मण व शत्रुघ्न रूपी सद्वृतियों को समझाने का प्रयास करते हैं। वेद यानी निज अनुभव व पुराण यानी प्राण की गति का अनुभव करना ही वेद पुराण पढ़ना कहलाता है। प्रातकाल उठि कै रघुनाथा। मातु पिता गुरु नावहिं माथा।। आयसु मागि करहिं पुर काजा। देखि चरित हरषइ मन राजा।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम नित्य प्रात:काल उठकर माता-पिता व गुरु को शीश झूकाकर आज्ञा लेकर शरीर रूपी नगर के सब कार्य करने लगते हैं। जिससे आत्मा रूपी राम के सुखद चरित को देखकर मन रूपी राजा प्रसन्न होने लगता है। जब आत्मा का परमात्मा में रमण होने लग जाता है, तो उसी अवस्था को माता-पिता व गुरु को शीश झुकाना कहा जाता है। ज्योंे-ज्यों परमात्मा में लीनता बढ़ती है, त्यों-त्यों मन में उमंग व उत्साह बढ़ने लग जाता है। अत: उसी को मन रूपी राजा का प्रसन्न होना बताया गया है। दो0 ब्यापक अकल अनीह अज निर्गुन नाम न रूप। भगत हेतु नाना बिधि करत चरित्र अनूप।।205।। व्याख्या : जो परमात्मा सर्वब्यापक, अकल, अखण्ड, अजन्मा, निर्गुण तथा नाम व रूप से परे होते हैं, वे परमात्मा भक्त की भावना को देखकर नाना प्रकार के चरित्र करने लगता है। यह सब चरित कहा मैं गाई। आगिलि कथा सुनहु मन लाई।। बिस्वामित्र महामुनि ग्यानी। बसहिं बिपिन सुभ आश्रम जानी।। व्याख्या : परमविवेकी रूपी याज्ञवलक्य कहते हैं कि यह अनुभूति का चरित तो मैंने बता दिया है। अब आगे की अनुभूति को मन लगाकर सुनो। जब परमात्मा के अवतरण की परिपक्वता आ जाती है, तो जीव के काम, क्रोध मदादि के भाव शान्त हो जाते हैं और विश्वामित्र अर्थात् विश्व मैत्री का भाव पैदा हो जाता है। विश्व की मित्रता का भाव महा मन में प्रकट होता है अर्थात् मन जब मेरे-तेरे की संकीर्णता से मुक्त हो जाता है, तो विश्व की मित्रता का भाव पैदा हो जाता है। विश्व की मित्रता का भाव विशुद्धता रूपी शुभ आश्रम में निवास करता है। जहँ जप जग्य जोग मुनि करहीं। अति मारीच सुबाहुहि डरहीं।। देखत जग्य निसाचर धावहिं। करहिं उपद्रव मुनि दुख पावहिं।। व्याख्या : जब मन के भाव परमात्मा का जप करने लगते हैं और यज्ञ अर्थात् अपान का पान में हवन करने लगते हैं, तो अति मारीच अर्थात् वासना की अति सूक्ष्म सूक्ष्म तरंगे उठने लगती हैं और वासना के भाव उठकर भय पैदा कर देते हैं। जब भी साधक अपान का पान में हवन करने लगता है, तो वासनारूपी निशाचर मन में उपद्रव पैदा करने लग जाते हैं, जिससे मन में कष्ट होने लग जाता है। गाधितनय मन चिंताब्यापी। हरि बिनु मरहिं न निसिचर पापी।। तब मुनिबर मन कीन्ह बिचारा। प्रभु अवतरेउ हरन महि भारा।। व्याख्या : गाधितनय अर्थात् कौशिकाओं से उत्पन्न विश्वामित्र के भाव के मन को जब चिन्ता हुई कि बिना माया के भावों का हरण किए बिना ये वासना रूपी निशाचर नहीं मरेंगे। तब विश्व की मित्रता रूपी मुनि ने मन में विचार किया कि जब परमात्मा का अवतरण हो ही चुका है, तो परमात्मा ही शरीर रूपी पृथ्वी के भार को दूर करेंगे। एहूँ मिस देखौं पद जाई। करि बिनती आनौं दोउ भाई।। ग्यान बिराग सकल गुन अयना। सो प्रभु मैं देखब भरि नयना।। व्याख्या : विश्व की मित्रता रूपी मन के भाव ने सोचा कि इसी बहाने से मैं परमात्मा के चरणों का दर्शन कर पाऊँगा। इसलिए दशरथ रूपी राजा के पास जाकर अर्थात् इन्द्रियों के भाव में बरत कर आत्मा रूपी राम और लक्षण रूपी लक्ष्मण के भावों को साथ ले लूँगा, तो ज्ञान और वैराग्य के सब गुणों की खान बन जायेंगे और इस प्रकार मैं परमात्मा को अपनी आँखों से देख सकूँगा। दो0 बहुबिधि करत मनोरथ जात लागि नहिं बार। करि मज्जन सरऊ जल गए भूप दरबार।।206।। व्याख्या : इस प्रकार विश्वमित्र रूपी विश्व की मित्रता के भाव यानी समता के भाव को मन रूपी रथ पर चढ़कर अवधपुरी रूपी शरीर की नगरी में पहुँचने में देर नहीं लगी और सरयू के जल में पान करके अर्थात् चन्द्र नाड़ी के भावों को पार करके विश्वामित्र रूपी समता का भाव दशरथ रूपी राजा के दरबार में पहुँचा। मुनि आगमन सुना जब राजा। मिलन गयउ लै बिप्र समाजा।। करि दंडवत मुनिहि सनमानी। निज आसन बैठारेन्हि आनी।। व्याख्या : विश्वामित्र रूपी समता के भाव के आगमन की बात सुनकर दस इन्द्रियों रूपी दशरथ विशुद्ध प्रकाश वाले ज्ञान के भावों को लेकर समता रूपी विश्वामित्र से मिलने के लिए आया और समता के भाव के सामने दंडवत अर्थात् पूरी तरह समर्पण करते हुए दस इन्द्रियों रूपी दशरथ ने समता के भाव को स्वयं के आसन पर बैठाया। अर्थात् जहाँ से दस इन्द्रियों का आभास होता है यानी चित प्रदेश में समता के भाव को बैठाया क्योंकि चित से ही इन्द्रियों का आभास होता है और चित में ही समता का भाव पैदा होता है। चरन पखारि कीन्हि अति पूजा। मो सम आजु धन्य नहिं दूजा।। बिबिध भाँति भोजन करवावा। मुनिबर हृदयँ हरष अति पावा।। व्याख्या : तब दस इन्द्रियों रूपी दशरथ के भाव ने समता रूपी विश्वामित्र के भाव के चरण पखारे अर्थात् समर्पण कर दिया और अपने आपको धन्य मान लिया क्योंकि समता का भाव आ जाने पर इन्द्रियाँ भी सहज हो जाती हैं और बन्धन ढीले पड़ जाते हैं। उस अवस्था में नाना प्रकार के ज्ञान-वैराग्य के भाव उठने लगते हैं, उन्हीं भावों के उठने की प्रक्रिया को ही भोजन कराना बताया गया है। ज्ञान-वैराग्य रूपी भोजन पाकर समता रूपी विश्वामित्र का भाव प्रसन्न हो जाता है। पुनि चरनन मेले सुत चारी। राम देखि मुनि देह बिसारी।। भए मगन देखत मुख सोभा। जनु चकोर पूरन ससि लोभा।। व्याख्या : दस इन्द्रियों रूपी दशरथ आत्मा रूपी राम, भावरत रूपी भरत, लक्षण रूपी लक्ष्मण और कामादि नाशक शत्रुघ्न के भावों को समता रूपी विश्वामित्र के सामने समर्पित कर दिया तो समता रूपी विश्वामित्र के भाव ने आत्मारूपी राम को देखकर अपनी सुध-बुध खो दी। आत्मा रूपी राम की शोभा को देखकर समता रूपी विश्वामित्र का भाव उसी प्रकार मुग्ध हो गया जैसे पूर्ण चन्द्रमा को देखकर चकोर हो जाता है। तब मन हरषि बचन कह राऊ। मुनि अस कृपा न कीन्हिहु काऊ।। केहि कारन आगमन तुम्हारा। कहहु सो करत न लावउँ बारा।। व्याख्या : तब दस इन्द्रियों रूपी दशरथ हर्षित होकर कहने लगा कि हे समता रूपी मुनि! आप के समान किसी ने कृपा नहीं की है। आपका किस कारण से आगमन हुआ है। आप मुझे बताइये, मैं करने में देर नहीं करूँगा। आपके समान किसी ने कृपा नहीं की है का तात्पर्य यह है कि समता के भाव के समान और कोई दूसरा भाव हो ही नहीं सकता है क्योंकि जब समता का भाव हृदय में आ जाता है, तो आत्म तत्व बलवान होकर निखर आता है। समता का भाव ही आत्मा का सबसे बड़ा बल होता है। क्योंकि समता का भाव आते ही कामादि माया के विकार स्वत: मिट जाते हैं। असुर समूह सतावहिं मोही। मैं जाचन आयउँ नृप तोही।। अनुज समेत देहु रघनाथा। निसिचर बध मैं होब सनाथा।। व्याख्या : तब समता रूपी विश्वामित्र का भाव बोला कि हे दस इन्द्रियों रूपी राजा! मुझे आसुरी भावों के समूह सताते हैं। अत: मैं तुमसे आत्मा रूपी राम और लक्षणों को पहचानने वाले लक्ष्मण को माँगने आया हूँ, जिससे आसुरी भावों का वध हो सके और मैं निश्चिंत हो सकूँ। वास्तव में समता का भाव और आत्म बल दोनों एक दूसरे के पूरक होते हैं। क्योंकि बिना आत्म बल के समता का भाव स्थिर नहीं रह पाता है और बिना समता के भाव के आत्म बल प्रबल नहीं हो पाता है। आत्म बल और समता का सामंजस्य तभी रह सकता है जब भावों से उत्पन्न लक्षणों को पहचानने की क्षमता हो। अत: लक्षणों को पहचानने के लिए लक्ष्मण रूपी भाव का साथ में होना जरूरी होता है। दो0 देहू भूप मन हरषित तजहु मोह अग्यान। धर्म सुजस प्रभु तुम्ह कौं इन्ह कहँ अति कल्यान।।207।। व्याख्या : समता रूपी विश्वामित्र दस इन्द्रियों रूपी दशरथ को समझाते हैं कि आप मोह के अज्ञान का त्याग करके आत्मा रूपी राम और लक्षण रूपी लक्ष्मण को दे दीजिए। जिससे तुम्हारी धारणा दृढ़ हो जायेगी और सुयश की प्राप्ति होगी तथा आत्मा रूपी राम और लक्षण रूपी लक्ष्मण का कल्याण होगा। आत्मा और सद्लक्षणों रूपी भावों का कल्याण तभी हो सकता है जब इन्द्रियों से इनका मोह मिट जाता है तथा समता का भाव पैदा हो जाए। अत: उसी अनुभूति को यहाँ अति सूक्ष्म प्रतीकों के माध्यम से लिखा गया है। सुनि राजा अति अप्रिय बानी। हृदय कंप मुख दुति कुमुलानी।। चौथेपन पायउँ सुत चारी। बिप्र बचन नहिं कहेहु बिचारी।। व्याख्या : इन्द्रियों के भाव को मोह के त्याग की बात अप्रिय ही लगती है क्योंकि इन्द्रियों का सुख तो मोह में ही मिलता है। अत: उसी अनुभूति को यहाँ दस इन्द्रियों रूपी राजा के मुख की चमक चली जाना बताया गया है, जब वह मोह के त्याग की बता सुनता है। दस इन्द्रियों रूपी दशरथ का तर्क होता है कि चौथेपन अर्थात् वृद्धावस्था में आत्मा रूपी राम, भरत, लक्ष्मण व शत्रुघ्न की झलक मिली है और अब इनका त्याग कैसे सम्भव है। क्योंकि जब साधक के हृदय में परमात्मा के अवतरण के लक्षण आने लगते हैं, तो कहीं न कहीं साधक के मन में वैभव भोग की इच्छा छुपी रहती है और साधक वैभव का भोग करना चाहता है। अत: दशरथ रूपी राजा को आत्मा रूपी राम से मोह का त्याग नहीं किया जा रहा है। मागहु भूमि धेनु धन कोसा। सर्बस देउँ आजु सहरोसा।। देह प्रान ते प्रिय कछु नाहीं। सोउ मुनि देउँ निमिष एक माहीं।। व्याख्या : दस इन्द्रियों रूपी दशरथ समता रूपी विश्वामित्र के भाव से कहते हैं कि आप भूमि, गाय, धन सब कुछ माँग लीजिए, मैं सहरोषा अर्थात् इच्छाओं का दमन करके दे दूँगा। शरीर और प्राणों से प्रिय तो कुछ भी नहीं होता है परन्तु वो भी एक क्षण में दे दूँगा। सब सुत प्रिय मोहि प्रान कि नाईं। राम देत नहिं बनइ गोसाईं।। कहँ निसिचर अति घोर कठोरा। कहँ सुंदर सुत परम किसोरा।। व्याख्या : मुझे मेरे सभी पुत्र प्राणों के समान प्रिय हैं परन्तु आत्मा रूपी राम को तो देना सम्भव नहीं है। क्योंकि आसुरी भाव तो कठोर होते हैं और आत्मा रूपी राम सुंदर व परम किशोर हैं। दस इन्द्रियों रूपी दशरथ को लगता है कि कहीं आत्मा रूपी राम आसुरी भावों के सम्पर्क में आने पर दोबारा विकारों से आच्छादित नहीं हो जाए क्योंकि आत्मा का स्वभाव तो कोमल होता है। सुनि नृप गिरा प्रेम रस सानी। हृदयँ हरष माना मुनि ग्यानी।। तब बसिष्ट बहुबिधि समुझावा। नृप संदेह नास कहँ पावा।। व्याख्या : दस इन्द्रियों रूपी दशरथ की प्रेममय वाणी को सुनकर समता रूपी विश्वामित्र के भाव को बहुत हर्ष हुआ। तब उस अवस्था में विशिष्ट ज्ञान रूपी वसिष्ठ भाव जागृत हो उठता है तथा नाना प्रकार से दस इन्द्रियों रूपी दशरथ को समझाया, जिससे दशरथ रूपी राजा का संशय दूर हो गया। अति आदर दोउ तनय बोलाए। हृदयँ लाइ बहु भाँति सिखाए।। मेरे प्रान नाथ सुत दोऊ। तुम्ह मुनि पिता आन नहिं कोऊ।। व्याख्या : तब दस इन्द्रियों रूपी दशरथ ने अपने दोनों पुत्र आत्मा रूपी राम और लक्ष्मण को बुलाया और हृदय से लगा कर बहुत प्रकार से समझाया। यहाँ दशरथ के रहस्य को और गहराई से समझने की जरूरत है। दशरथ वास्तविकता में स्थूल शरीर का प्रतीक है, जिसमें दसों इन्द्रियों का आभास होता है। परन्तु जब साधक की साधना परिपक्व होती चली जाती है, तो स्थूलता का आभास धीरे-धीरे कम होने लग जाता है और साधक का सूक्ष्म शरीर ज्यादा स्पष्ट होने लग जाता है। यहाँ पर आत्मा रूपी राम और लक्ष्मण का समता रूपी विश्वामित्र के पास जाने का तात्पर्य भी यही है कि स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर में प्रवेश होना। स्थूल शरीर का मोह परन्तु आसानी से नहीं छूटता है, इसलिए स्थूल शरीर रूपी दशरथ बार-बार आत्मा रूपी राम, लक्ष्मण व समता रूपी विश्वामित्र को समझाने की कोशिश करता है। स्थूल शरीर रूपी दस इन्द्रियों रूपी दशरथ कहता है कि हे समता रूपी विश्वममित्र ! मेरे दोनों पुत्र अर्थात् आत्मा रूपी राम और लक्षण रूपी लक्ष्मण मेरे प्राण के ही दो रूप हैं और आप अर्थात् समता का भाव ही इन दोनों को पैदा करने वाला पिता है, इसके अलावा दूसरा कोई नहीं है। दो0 सौंपे भूप रिषिहि सुत बहुबिधि देइ असीस। जननी भवन गए प्रभु चले नाइ पद सीस।।208(क)।। व्याख्या : जब साधना की परिपक्वता में भाव स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर में जाने लगते हैं तो उसी अनुभूति को दशरथ रूपी स्थूल शरीर द्वाता समता रूपी विश्वामित्र को आत्मा रूपी राम व लक्ष्मण को सौंपना बताया गया है। ज्योंहि आत्मा रूपी राम स्थूल भाव से ऊपर उठते हैं त्योंहि सुष्मना नाड़ी रूपी कौसल्या के पास पहुँच जाते हैं। उसी को आत्मा रूपी राम का कौसल्यारूपी माता को शीश झुकाना बताया गया है। सो0 पुरुष सिंह दोउ बीर हरषि चले मुनि भय हरन। कृपासिंधु मति धीर अखिल बिस्व कारन करन।।208(ख)।। व्याख्या : जब आत्म भाव स्थूल भाव से ऊपर उठता है, तो सुष्मना नाड़ी में प्राण का प्रवाह शु डिग्री हो जाता है, जिससे हृदय में हर्ष छा जाता है। उसी को आत्मा रूपी राम और लक्षणों रूपी लक्ष्मण को मन के भय को दूर करने के लिए हर्षित होकर जाना बताया गया है। आत्मा रूपी राम कृपा का समुद्र व धैर्यवान बुद्धि वाला होता है और समस्त विश्व का कारण होता है। अर्थात् आत्मा के भावों से ही समस्त विश्व का विस्तार व आभास होता है। यहाँ पर सुष्मना नाड़ी में ध्यान चढ़ जाने पर होने वाली अनुभूति को ही प्रतीकों के माध्यम से लिखा गया है। आगे भी सुष्मना नाड़ी के ध्यान में होने वाले अनुभव का ही नाना प्रतीकों के माध्यम से वर्णन किया गया है। अरून नयन उर बाहु बिसाला। नील जलज तनु स्याम तमाला।। कटि पट पीत कसें बर भाथा। रूचिर चाप सायक दुहुँ हाथा।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम जब लक्षण रूपी लक्ष्मण के साथ समता रूपी विश्वामित्र सहित सुष्मना नाड़ी में पहुँच जाता है, तो अरून नयन अर्थात् ज्ञान रूपी आँखें खुलना शु डिग्री हो जाती हैं और साधक का हृदय विशाल होता चला जाता है और सूक्ष्म शरीर का आभास नीले कमल के समान होने लग जाता है। उस अवस्था में कुण्डलिनि शक्ति का आभास भी होने लग जाता है और ऐसा लगने लग जाता है जैसे कमर से रेशम की धागे के समान तार सिर तक आ रहा है और इच्छाओं रूपी धनुष और बाण दोनों हाथों में हों। स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। बिस्वामित्र महानिधि पाई ।। प्रभु ब्रह्मन्य देव मैं जाना। मोहि निति पिता तजेउ भगवाना।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम और लक्षणों रूपी लक्षण दोनों सुंदर भावों को पाकर समता रूपी विश्वामित्र को लगा कि मानो महानिधि को प्राप्त कर लिया हो। आत्मा रूपी राम ही ब्रह्म हैं। यह समता रूपी विश्वामित्र ने जान लिया और मन में सोचा कि मेरे लिए आत्मा रूपी राम ने स्थूल रूपी दशरथ (पिता) को छोड़ा है। चले जात मुनि दीन्हि देखाई। सुनि ताड़का क्रोध करि धाई।। एकहिं बान प्रान हरि लीन्हा। दीन जानि तेहि निज पद दीन्हा।। व्याख्या : जब ध्यान सुष्मना नाड़ी में चढ़ता चला जाता है तो समता रूपी विश्वामित्र आत्मा रूपी राम-लक्ष्मण के साथ चलते रहते हैं। उस अवस्था में कभी-कभी अचानक ताड़का रूपी वासना पैदा हो जाती है, जो समता रूपी विश्वामित्र को क्रोध से भरकर खाने दौड़ती है। तब आत्मा रूपी राम प्रेरणा रूपी संयम बाण से वासना का हरण कर लेते हैं और वासना को निर्मल करके स्वयं में लीन कर लेते हैं। अर्थात् जब वासना अचानक पैदा होती है तो आत्मा निर्मल होने पर वासना को भी निर्मल कर देती है, जिससे वासना शान्त हो जाती है। तब रिषि निज नाथहि जियँ चीन्ही। विद्या निधि कहुँ बिद्या दीन्ही।। जाते लाग न छुधा पिपासा। अतुलित बल तनु तेज प्रकासा।। व्याख्या : तब समता रूपी विश्वामित्र ने आत्मा रूपी राम को पहचान लिया और समस्त विधाओं के ज्ञाता आत्मा रूपी राम को विधा प्रदान कर दी अर्थात् स्वत: ऐसी अवस्था आ गयी, जिसमें समता रूपी भाव से जो रसायन निकलना शु डिग्री होता है, उसके सेवन से साधक को भूख व प्यास लगना बन्द हो जाती है और शरीर में अतुल्य बल और तेज बना रहता है। दो0 आयुध सर्ब समर्पि कै प्रभु निज आश्रम आनि। कंद मूल फल भोजन दीन्ह भगति हित जानि।।209।। व्याख्या : समता रूपी विश्वामित्र ने आत्मा रूपी राम को समस्त अस्त्र-शस्त्र सौंप कर अर्थात् समता के भाव से आत्मा का कोई अपना व पराया नहीं रह पाता है। अत: आत्मा रूपी राम के लिए समता का भाव सब प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों के समान होता है। समता का भाव तब आत्मा रूपी राम को निज आश्रम में ले आता है अर्थात् आत्मा रूपी राम समता की अवस्था में दृढ़ होने लगते हैं तथा उस अवस्था में कंद मूल अर्थात् सहज अवस्था के भावों का भोजन मिलने लग जाता है, जिससे भक्त का कल्याण हो जाता है। प्रात कहा मुनि सन रघुराई। निर्भय जग्य करहु तुम्ह जाई।। होम करन लागे मुनि झारी। आपु रहे मख की रखवारी।। व्याख्या : जब आत्मा रूपी राम व लक्षण रूपी लक्ष्मण समता के भाव के साथ सुष्मना नाड़ी में स्थिर होने लग जाते हैं, तब आत्मा रूपी राम समता रूपी विश्वामित्र से कहते हैं कि आप निर्भय होकर यज्ञ कीजिए अर्थात् अपान का पान में हवन कीजिए। तब उस समता की अवस्था में अपान का पान में हवन होने लग जाता है, तब आसुरी भावों का आना स्वत: बन्द हो जाता है। उस अवस्था में यज्ञ (यजन) की रक्षा स्वयं आत्म तत्व करने लग जाता है। उसी अनुभूति को यहाँ प्रतीकों के माध्यम से लिखा गया है। सुनि मारीच निसाचर क्रोही। लै सहाय धावा मुनि द्रोही।। बिनु फर बान राम तेहि मारा। सत जोजन गा सागर पारा।। व्याख्या : जब यजन की क्रिया अर्थात् अपान का पान में हवन चलता रहता है, तो अचानक आसुरी भाव तरंग के रूप में उठ कर प्रकट हो जाता है और उसके साथ अन्य आसुरी भाव भी अचानक पैदा हो जाते हैं, जो मन की शान्ति को भंग करने वाले होते हैं। परन्तु जब आत्मा रूपी राम सजग होता है, तो आसुरी भाव को उठता हुआ देखकर संयम रूपी बाण चला देता है, जिससे मारीच रूपी आसुरी भाव सत योजन अर्थात् मन की सौ वृतियों से परे हो जाता है और भावों से परे हो जाता है। पावक सर सुबाहु पुनि मारा। अनुज निसाचर कटकु सँघारा।। मारि असुर द्विज निर्भयकारी। अस्तुति करहिं देव मुनि झारी।। व्याख्या : जब मारीच रूपी आसुरी भाव मन की सौ वृतियों से परे हो जाता है, तब आत्मा रूपी राम सुबाहु रूपी आसुरी भाव को ज्ञान रूपी अग्नि बाण से मार देते हैं और लक्ष्मण रूपी भाव आसुरी भावों के लक्षणों को जानकर आसुरी भावों के सहायक भावों का संहार कर देते हैं। आसुरी भावों की यह एक विशेषता होती है कि जब इनके लक्षण समझ में आ जाते हैं, तो इनका तुरन्त समन भी हो जाता है। आसुरी भावों के मर जाने पर ज्ञान के भाव निर्भय हो जाते हैं और दैवीय भावों में स्तुति करने की भावना पैदा हो जाती है। तहँ पुनि कछुक दिवस रघुराया। रहे कीन्हि बिप्रन्ह पर दाया।। भगति हेतु बहु कथा पुराना। कहे बिप्र जद्यपि प्रभु जाना।। व्याख्या : उस अवस्था में कुछ समय के लिए आत्मा रूपी राम अवस्थित रहे, जिससे विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश (विप्र) के भावों को बल मिला। तब विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश वाले ने भाव वासनाओं के भय को दूर करने के लिए (भगति उ भय अ गति अर्थात् जिससे भय चला जाए) नाना प्रकार की कथा कही अर्थात् चिन्तन चलने लगा। हालाँकि आत्मा रूपी राम तो एकरस व ज्ञान मय होते हैं। तब मुनि सादर कहा बुझाई। चरित एक प्रभु देखिअ जाई।। धनुष जग्य सुनि रघुकुल नाथा। हरषि चले मुनिबर के साथा।। व्याख्या : जब आत्मा रूपी राम एक रस व ज्ञानमय अवस्था में अवस्थित होकर निर्भय हो जाते हैं, तब समता रूपी विश्वामित्र आदरपूर्वक समझाते हुए धनुष यज्ञ के चरित्र को देखने के लिए प्रेरित करते हैं। धनुष यज्ञ का तात्पर्य भावों से उत्पन्न इच्छाओं धनु अ इष अर्थात् इच्छाओं की ऐषणा से होता है। अत: ध्यान की अवस्था में समतारूपी विश्वामित्र आत्मारूपी राम को प्रेरित करते हैं कि ध्यान में आगे चलकर इच्छाओं के अज्ञान से उत्पन्न ऐषणाओं के रहस्य को चलकर देखिए। इसलिए धनुष यज्ञ की बात सुनकर आत्मा रूपी राम मन के समता रूपी विश्वामित्र के साथ हर्षित होकर चले। आश्रम एक दीख मग माहीं। खग मृग जीव जंतु तहँ नाहीं।। पूछा मुनिहि सिला प्रभु देखी। सकल कथा मुनि कहा बिसेषी।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम जब समता रूपी विश्वामित्र के साथ ध्यान अवस्था में आगे बढ़ते हैं, तो सुष्मना नाड़ी में आगे जाकर एक ऐसी अवस्था आ जाती है जहाँ भावहीन अवस्था आ जाती है। उसी भावहीन अवस्था को खग, मृग, जीव व जंतुओं से रहित अवस्था के प्रतीक के रूप में बताया गया है। तब उस जड़वत अवस्था को देखकर आत्मा रूपी राम के भाव ने समता रूपी विश्वामित्र से पूछा तो मन के समता रूपी भाव ने सारी कथा बतायी। यहाँ पाठकों के लिए गौतम ऋषि और अहिल्या की कथा के रहस्य को बता देना चाहता हूँ। गौतम का तात्पर्य गो अ उत्तम अर्थात् इन्द्रियों में जब पवित्रता का भाव आ जाता है, तो इन्द्रियाँ अहि अ ल्या अर्थात् सर्प रूपी वासनाओं का त्याग कर देती हैं और वासनाएँ दमित होकर कुण्ठित होकर पत्थर की तरह हो जाती हैं। उसी को प्रतीक के रूप में अहिल्या का शिला होना बताया गया है। दो0 गौतम नारि श्राप बस उपल देह धरि धीर। चरण कमल रज चाहति कृपा करहु रघुबीर।।210।। व्याख्या : समता रूपी विश्वामित्र कहते हैं कि गौतम अर्थात् इन्द्रियों (गो अ उत्तम) के पवित्र होने पर वासनाओं की ग्लानि होने के कारण कुण्डलिनि शक्ति रूपी अहिल्या ने जड़ रूप धारण कर लिया है। कुण्डलिनि को अनेक साधना पंथों में सर्पिणी की संज्ञा दी गयी है। जब यम-नियम द्वारा इन्द्रियाँ पवित्र हो जाती हैं, तो सर्प रूपी वासनाओं का दमन हो जाता है। दमन होने की अवस्था में वासनाएँ जड़ बनकर दब कर रह जाती हैं परन्तु उनकी मूल आसक्ति बनी की बनी रह जाती है। वासनाओं से मुक्ति तो पूर्ण ज्ञान होने पर आत्म भाव में अवस्थित होने पर ही सम्भव होता है। यहाँ पर दमित वासनाओं के प्रतीक के रूप में ही अहिल्या को पत्थर की शिला के रूप में बताया गया है। दूसरे शब्दों में अगर कहें तो अहिल्या सोई हुई कुण्डलिनि शक्ति का प्रतीक है। अत: समता रूपी विश्वामित्र कहते हैं कि हे आत्मा रूपी राम! अहिल्या रूपी कुण्डलिनि शक्ति तुम्हारे चरणों की धूल चाहती है अर्थात् आत्मतत्व के सम्पर्क से जागृत होना चाहती है, इसलिए कृपा करके इसे जागृत कर लीजिए। आगे आने वाले छन्द में कुण्डलिनि जागरण की अनुभूति का ही वर्णन किया गया है। कुण्डलिनि शक्ति को वैसे तो समझाने के लिए नाभी मण्डल पर साढ़े तीन लपेटे मार कर बैठा रहना बताया गया है। परन्तु वास्तविकता तो यह है कि कुण्डलिनि शक्ति समस्त शरीर में ही नख से शिख तक व्याप्त होती है और आत्मतत्व के सम्पर्क में आने पर यह कहीं से भी जागृत हो जाती है। आत्म तत्व और कुण्डलिनि के मिलन को ही कुछ साधना पंथों में शिव-शिवा का मिलन बताया गया है, तो कुछ साधना पंथों में कुण्डलिनि जागरण को कमल खिलने के रूप में बताया गया है, तो कुछ पंथों में अमृत धार बहना बताया गया है। छ0 परसत पद पावन शोक नसावन प्रगट भई तपपुंज सही। देखत रघुनायक जन सुखदायक सनमुख होइ कर जोरि रही।। अति प्रेम अधीरा पुलक सरीरा मुख नहिं आवइ बचन कही। अतिसय बड़भागी चरनन्हि लागी जुगल नयन जलधार बही।। व्याख्या : यहाँ पर कुण्डलिनि जागरण की अनुभूति को ही बताया है। जब परमात्मा रूपी राम के पवित्र चरणों को अहिल्या रूपी कुण्डलिनि शक्ति स्पर्श कर लेती है तो तप का प्रकाशपुँज प्रकट हो जाता है और आत्मा रूपी राम को देखकर कुण्डलिनि शक्ति दोनों हाथ जोड़ कर अर्थात् पूरी तरह समर्पण करती हुई खड़ी हो जाती है। उस अवस्था में साधक प्रेम में अधीर हो जाता है और शरीर पुलकित हो उठता है तथा वाणी मौन हो जाती है। उस अवस्था में कुण्डलिनि शक्ति अर्थात् शिवा का शिव से मेल हो जाता है और साधक के लिए यह अवस्था बड़े भाग्यवाली हो जाती है तथा साधक की दोनों नयनों से प्रेम के आँसू बह उठते हैं। धीरजु मन कीन्हा प्रभु कहुँ चीन्हा रघुपति कृपाँ भगति पाई। अति निर्मल बानी अस्तुति ठानी ग्यानगम्य जय रघुराई।। मैं नारि अपावन प्रभु जग पावन रावण रिपु जन सुखदाई। राजीव बिलोचन भव भय मोचन पाहि पाहि सरनहिं आई।। फिर उसने मन में धीरज धरकर प्रभुको पहचाना और श्रीरघुनाथजीकी कृपा से भक्ति प्राप्त की। तब अत्यन्त निर्मल वाणी से उसने (इस प्रकार) स्तुति प्रारम्भ की - हे ज्ञान से जानने योग्य श्रीरघुनाथजी! आपकी जय हो! मैं ( (सहज ही) अपवित्र स्त्री हूँ; और हे प्रभो! आप जगत् को पवित्र करनेवाले, भक्तचों को सुख देनेवाले और रावण के शत्रु हैं। हे कमलनयन! हे संसार (जन्म-मृत्यु) के भय से छुड़ानेवाले ! मैं आपकी शरण आयी हूँ, (मेरी) रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये।।2।। मुनि श्राप जो दीन्हा अति भल कीन्हा परम अनुग्रह मैं माना। दखेउँ भरि लोचन हरि भव मोचन इहइ लाभ संकर जाना।। बिनती प्रभु मोरी मैं मति भोरी नाथ न मागऊँ बर आना। पद कमल परागा रस अनुरागा मम मधुप करै पाना।। मुनिने जो मुझे शाप दिया, सो बहुत ही अच्छा किया। मैं उसे अत्यन्त अनुग्रह मानती हूँ कि जिसके कारण मैंने संसार से छुड़ानेवाले श्रीहरि (आप) को देख लिया है। हे प्रभु! मेरी बुद्धि तो भोली है और मुझे दूसरा कोई वर भी नहीं चाहिए। बस मेरा मन रूपी भँवरा आपके चरण कमलों के पराग का रस पान करें।।213।। छ0 जेहिं पद सुरसरिता परम पुनीता प्रगट भई सिव सीस धरी। सोई पद पंकज जेहि पूजत अज मम सिर धरेउ कृपाल हरी।। एहि भाँति सिधारी गौतम नारी बार बार हरि चरन परी। जो अति मन भाव सो ब डिग्री पावा गै पति लोक अनंद भरी।। व्याख्या : जो कुण्डलिनि जागरण की अनुभूति शिव को हुई और शिव के सिर पर सुर सरिता अर्थात् अमृत की धारा बह उठी थी और ब्रह्मा ने भी उसी परमात्मा के चरण कमलों की पूजा करके जो अवस्था प्राप्त की वही कृपा माया को दूर करने वाले परमात्मा ने मुझ पर की है। इस प्रकार पवित्र इन्द्रियों रूपी गौतम की नारी अर्थात् कुण्डलिनि शक्ति परमात्मा के चरणों में पड़ गयी अर्थात् शिव शिवा का मिलन हो गया। उस अवस्था में जो मन को अच्छा लगा वह वर प्राप्त हो गया और कुण्डलिनि शक्ति आनन्द में भरकर अपने पति लोक अर्थात् परमात्मा में लीन हो गयी। दो0 अस प्रभु दीन बंधु हरि कारन रहित दयाल। तुलसीदास सठ तेहि भजु छाड़ि कपट जंजाल।।211।। व्याख्या : परमात्मा तो दीनबंधु और माया को हरण करने वाले कारण से रहित दयालु हैं। अत: तुलसीदास कहते हैं कि कपट का जंजाल छोडकर ऐसे दयालु प्रभु का भजन करना चाहिये। ।। मासपरायण, सातवाँ विश्राम।। चले राम लछिमन मुनि संगा। गए जहाँ जग पावनि गंगा।। गाधिसूनु सब कथा सुनाई। जेहि प्रकार सुरसरि महि आई।। व्याख्या : कुण्डलिनि शक्ति के जागृत हो जाने पर ध्यान गहरा होता हुआ सुष्मना नाड़ी से सहस्रसार चक्र पर चढ़ने लगता है। उसी अनुभूति को प्रतीक रूप में आत्मा रूपी राम व लक्षण रूपी लक्ष्मण समता रूपी विश्वामित्र के साथ सहस्रसार की और आगे बढ़ते हुए बताया गया है, जहाँ रास्ते में आनन्द की सुरसरि आती हैं तथा अमृत रस का स्राव शु डिग्री हो जाता है, जो समस्त भावों को निर्मल (पवित्र) कर देती है। तब कोशिकाओं से उत्पन्न समता के भाव ने सब कुछ समझ कर आत्मा रूपी राम व लक्ष्मण को आनन्द की सुरसरि के रहस्य को बताया कि गंगा रूपी अमृत धार कैसे शरीर रूपी पृथ्वी में पैदा होती है। तब प्रभु रिषिन्ह समेत नहाए। बिबिध दान महिदेवन्हि पाए।। हरषि चले मुनि बृंद सहाया। बेगि बिदेह नगर निअराया।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम आनन्द के रस में समता के भाव सहित नहाए तथा शरीर के भावों ने तब विविध प्रकार से आनन्द भोग किया। तब मन के भावों का समूह हर्षित होकर आगे चले। जब मन के भाव भी आनन्द रस में नहाकर निर्मल हो जाते हैं, तो विदेह भाव आना शु डिग्री हो जाता है अर्थात् धीरे-धीरे शरीर का आभास मिटना शु डिग्री हो जाता है। उसी को विदेह नगर का नजदीक आना बताया गया है। पुर रम्यता राम जब देखी। हरषे अनुज समेत बिसेषी।। बापीं कूप सरित सर नाना। सलिल सुधा सम मनि सोपाना।। व्याख्या : जब आत्मा रूपी राम ने विदेह नगर की रम्यता देखी अर्थात् विदेह भाव का आभास किया तो लक्षणों रूपी लक्ष्मण सहित बहुत हर्षित हुए। क्योंकि विदेह का आभास सहस्रसार चक्र के जागृत होने पर शु डिग्री हो जाता है। सहस्रसार चक्र में भाव रूपी कुआँ, बावड़ी, नदियाँ व तालाब होते हैं, जिनमें अमृत रूपी जल भरा रहता है और ज्ञान रूपी मणियों की सीढ़ियाँ लगी रहती हैं। गुंजत मंजु मत्त रस भृंगा। कूजत कल बहुबरन बिहंगा।। बरन बरन बिकसे बन जाता। त्रिबिध समीर सदा सुख दाता।। व्याख्या : ब्रह्मरन्ध्र रूपी विदेह नगर में अमृत रूपी रस के मतवाले भ्रमर गूँजते रहते हैं और नाना प्रकार के भाव रूपी पक्षी बोलते रहते हैं। ब्रह्मरन्ध्र में ध्यान पहुँचने पर नाना रंगों के कमल खिलने लगते हैं तथा तीनों गुणों की मन्द-मन्द सहज सुख देने वाली हवा चलने लगती है। जब ध्यान ब्रह्मरन्ध्र में पहुँचने लगता है, तब भ्रमरों की आवाज, पक्षियों की आवाज आने लगती है। अत: उसी अनुभूति को प्रतीकात्मक दृष्टि से लिखा गया है। दो0 सुमन बाटिका बाग बन बिपुल बिहंग निवास। फूलत फलत सुपल्लवत सोहत पुर चहुँ पास।।212।। व्याख्या : ब्रह्मरन्ध्र में ध्यान पहुँचने पर मन सु अ मन अर्थात् अच्छा निर्मल मन हो जाता है और नाना भाव रूपी उपवन में सात्विक भाव रूपी पक्षी निवास करते रहते हैं। उस अवस्था में अच्छे सात्विक भाव फूलने-फलने लगते हैं और ब्रह्मरन्ध्र के चारों तरफ ये सात्विक भाव छाए हुए रहते हैं। बनइ न बरनत नगर निकाई। जहाँ जाइ मन तहँइँ लोभाई ।। चा डिग्री बजा डिग्री बिचित्र अँबारी। मनिमय बिधि जनु स्वकर सँवारी।। व्याख्या : ब्रह्मरन्ध्र रूपी विदेह नगर की सुन्दरता का वर्णन करने में नहीं आता है, क्योंकि वहाँ पर तो मन जिस भी कोष में जाता है, वहीं लुभा जाता है। ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर में सुन्दर भावों रूपी बाजार होता है तथा विचित्र प्रकार के छज्जे लगे हुए हैं। ब्रह्मरन्ध्र नगर का निर्माण जीवात्मा स्वयं के मन के भावों से करता है अर्थात् साधक की क्रिया (विधि) द्वारा ही ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर का निर्माण व साज सज्जा होती है। धनिक बनिक बर धनद समाना। बैठे सकल वस्तु लै नाना।। चौहट सुंदर गलीं सुहाई। संतत रहहिं सुगंध सिंचाई।। व्याख्या : ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर में रिद्धियाँ व सिद्धियाँ रूपी वरदान के रूप में भण्डारी बनकर बैठे रहती हैं और वे वहाँ नाना प्रकार की विभूतियों को लेकर बैठी रहती हैं। ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर में सत, रज, तम व गुणातीत रूपी सुन्दर चौराहे व ईड़ा, पिंगला व सुष्मना रूपी सुन्दर-सुन्दर गलियाँ होती हैं। वहाँ पर निरन्तर निर्मल भावों रूपी सुगन्ध छायी रहती है। मंगलमय मंदिर सब केरें। चित्रित जनु रतिनाथ चितेरें।। पुर नर नारि सुभग सुचि संता। धरमसील ग्यानी गुनवंता।। व्याख्या : ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर में मंगल भावों रूपी सुन्दर घर बने हुए हैं, जो ऐसे लगते हैं मानो सात्विक आनन्द (रतिनाथ) ने स्वयं बनाए हों। ब्रह्मरन्ध्र में ध्यान की अवस्था में शरीर रूपी पुर (नगर) की नर और नाड़ियाँ पवित्र व निर्मल प्रकृति वाले हो जाते हैं, जिससे सब संशयों का अन्त होने लग जाता है। उस समय धारणा में शीलता आ जाती है और ज्ञान के गुणों का उद्भव हो जाता है। अति अनूप जहँ जनक निवासू। बिथकहिं बिबुध बिलोकि बिलासू।। होत चकित चित कोट बिलोकी। सकल भुवन सोभा जनु रोकी।। व्याख्या : ब्रह्मरन्ध्र रूपी विदेह नगर में जहाँ पर प्राण रूपी जनक का निवास होता है, उस भवन की शोभा तो अनुपम होती है। ब्रह्मरन्ध्र के आनन्द को देखकर तो दैवीय भाव भी थक जाते हैं अर्थात् वहाँ के आनन्द में मग्न होकर शान्त होने लग जाते हैं। उस अवस्था में साधक का चित भी अर्थात् चेतना भी ब्रह्मरन्ध्र की अतुल्यनीय शोभा को देखकर आश्चर्य चकित हो जाती है क्योंकि उस समय ऐसा लगने लगता है, जैसे समस्त भवनों की अर्थात् समस्त भावों की शोभा यहीं (ब्रह्मरन्ध्र) पर ही टिकी हुई है। दो0 धवल धाम मनि पुरट पट सुघटित नाना भाँति। सिय निवास सुंदर सदन सोभा किमि कहि जाति।।213।। व्याख्या : ब्रह्मरन्ध्र में ध्यान लगने पर परमशान्ति का अनुभव होने लगता है। उसी परम शान्ति को प्रतीकात्मक रूप से धवन धाम बताया गया है। उस समय ऐसा लगता है जैसे मन के भाव माला में पिरोए हुए हों और जीवात्मा और परमात्मा के बीच पर्दे के रूप में हों। उस अवस्था में प्राण रूपी जनक और प्राण से उत्पन्न शक्ति रूपी सीता का सुंदर घर समझ में आने लगता है, जिसका वर्णन किसी भी प्रकार करना सम्भव नहीं है। सुभग द्वार सब कुलिस कपाटा। भूप भीर नट मागध भाटा।। बनी बिसाल बाजि गज साला। हय गय रथ संकुल सब काला।। व्याख्या : ब्रह्मरन्ध्र में सुभग उ सु अ भग अर्थात् निर्मल प्रकृति के द्वार बने हुए हैं, जहाँ पर कठोर भावों रूपी दरवाजे लगे हुए हैं तथा वहाँ पर भावरूपी राजाओं, नट, मागध व भाटों के भावों की भीड़ लगी रहती है। अर्थात् समस्त भाव व वृतियाँ ब्रह्मरन्ध्र से उत्पन्न होती हैं। वहाँ पर विशाल सुख व वैभव रूपी हाथी - घोड़ों की शाला बनी हुई है तथा मन रूपी घोड़ा, इन्द्रियों रूपी गाय व इच्छाओं रूपी रथ सब समय तैयार रहते हैं। अर्थात् मन, इन्द्रियों व इच्छाओं की उत्पत्ति ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर से निरन्तर होती रहती है। सूर सचिव सेनप बहुतेरे। नृपगृह सरिस सदन सब केरे।। पुर बाहेर सर सरित समीपा। उतरे जहँ तहँ बिपुल महीपा।। व्याख्या : ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर में ज्ञान, वैराग्य व धैर्य रूपी बहुत से योद्धा, मंत्री व सेनापति होते हैं, जिनके घर नृप गृह अर्थात् भावों की उत्पत्ति जैसे नर की धड़कन से होती है, वैसे ही इन भावों की उत्पत्ति भी ब्रह्मरन्ध्र में उठने वाली नर की धड़कन से ही होती है। अत: इनके घरों को भी प्राण रूपी जनक के महल के समान ही बताया गया है। ब्रह्मरन्ध्र की बाहरी दीवार पर सूक्ष्म-सूक्ष्म नाड़ियों रूपी नदियाँ व तालाब होते हैं, जिनसे नाना प्रकार के भाव रूपी राजा पहुँच जाते हैं। जब ब्रह्मरन्ध्र में ध्यान लगने लग जाता है, तो ब्रह्मरन्ध्र के बाहरी आवरण पर समस्त भाव आकर जमा होने लग जाते हैं। उन्हीं भावों को राजाओं के प्रतीक के रूप में बताया गया है। देखि अनूप एक अँवराई । सब सुपास सब भाँति सुहाई।। कौसिक कहेउ मोर मनु माना। इहाँ रहिअ रघुबीर सुजाना।। व्याख्या : जब ध्यान सुष्मना नाड़ी से ब्रह्मरन्ध्र पर पहुँचने लगता है, तो ब्रह्मरन्ध्र के पास एक दिव्य कोष होता है, जो बहुत मनमोहक व आकर्षक होता है। वह कोष समस्त सिद्धियों को देने वाला होता है। अत: जब ध्यान उस कोष में पहुँचता है तो कौशिका पुत्र विश्वामित्र का भाव वहाँ मोहित हो जाता है। अत: वह आत्मा रूपी राम से कहता है कि यहाँ रूकना ठीक होगा। समता रूपी विश्वामित्र का भाव अब इसी कोष में रमण करना चाहता है। भलेहिं नाथ कहि कृपानिकेता। उतरे तहँ मुनिबृंद समेता।। बिस्वामित्र महामुनि आए। समाचार मिथिलापति पाए।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने भी कहा कि बहुत अच्छा है अर्थात् आत्मा रूपी राम को भी वह अनुपम अवँराई अच्छी लगी। अत: मन के बहुत से भावों सहित विश्वामित्र रूपी समता का भाव और आत्मा रूपी राम वहाँ रूक गए। जब ब्रह्मरन्ध्र स्थित प्राण रूपी जनक ने समता रूपी विश्वामित्र के आगमन के समाचार सुने अर्थात जब समता का भाव प्रकट हो जाता है, तो विदेह भाव रूपी जनक भी समता के भाव से मिलने को दौड़ पड़ता है। समता के भाव को महाभाव कहा जाता है, इसलिए विश्वामित्र को महामुनि का प्रतीक दिया गया है। दो0 संग सचिव सुचि भूरि भट भूसुर बर गुर ग्याति। चले मिलन मुनि नायकहि मुदित राउ एहि भाँति।।214।। व्याख्या : समता रूपी विश्वामित्र महामुनि के आगमन की सूचना पाकर प्राण रूपी विदेह जनक अपने साथ पवित्र भावों रूपी मंत्रियों, भाटों, योद्धाओं, ज्ञान के भावों व गुरु शतानन्द (अर्थात् सौ भावों के आनन्द लेने वाले) सहित समता रूपी विश्वामित्र से मिलने के लिए चले। ध्यानावस्था में ही ये भावों की सूक्ष्म अनुभूतियाँ व भावों के आपसी सम्बन्ध व वार्तालाप अच्छी तरह से समझ में आ सकते हैं। कीन्ह प्रनामु चरन धरि माथा। दीन्हि असीस मुदित मुनिनाथा।। बिप्रबृंद सब सादर बंदे। जानि भाग्य बड़ राउ अनंदे।। व्याख्या : तब प्राण रूपी विदेह जनक ने समता रूपी भाव के सामने सीस झुकाया और प्रणाम किया तथा समता रूपी भाव ने प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया। विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश वाले भावों की भी विदेह रूपी जनक ने वन्दना की और अपने आपको भाग्यशाली मानकर आनन्द में भर गए। कुसल प्रश्न कहि बारहिं बारा। बिस्वामित्र नृपहि बैठारा।। तेहि अवसर आए दोउ भाई। गए रहे देखन फुलवाई।। व्याख्या : विदेह जनक बार-बार समता रूपी भाव से कुशलक्षेम पूछने लगते हैं। तब समता रूपी भाव ने प्राण रूपी जनक को अपने पास बैठाया अर्थात् प्राण तत्व में भी समता के भाव का प्रभाव हो आया। जब प्राण के अन्दर समता का भाव समा जाता है, तभी आत्मा रूपी राम और लक्षणों रूपी लक्ष्मण को अन्य भाव देख पाते हैं। उसी को ""तेहि अवसर आए दोउ भाई"" कहकर लिखा है, जो सद्भावों रूपी फुलवाड़ी देखने गए थे। स्याम गौर मृदु बयस किसोरा। लोचन सुखद बिस्व चित चोरा।। उठे सकल जब रघुपति आए। बिस्वामित्र निकट बैठाए ।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम श्याम वर्ण और लक्षणों रूपी लक्ष्मण गोरे वर्ण के मधुर स्वभाव वाले व किशोर अवस्था वाले लगते हैं, जो आँखों को सुख देने वाले व विश्व अर्थात् संसार से चित को हटाने वाले होते हैं। जब अन्यभावों को आत्मा रूपी राम का आभास होता है तो सभी भाव खड़े हो जाते हैं अर्थात् आत्मा रूपी राम की तरफ आकर्षित हो उठते हैं। उसी अनुभूति को यहाँ ""उठे सकल जब रघुपति आए"" बोलकर लिखा है। तब समता रूपी भाव आत्मा रूपी राम को भी अपने पास बैठा लेता है क्योंकि आत्मा का सहज स्वभाव समता का लक्षण ही होता है। भए सब सुखी देखि दोउ भ्राता। बारि बिलोचन पुलकित गाता।। मूरति मधुर मनोहर देखी। भयउ बिदेहु बिदेहु बिसेषी।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम और लक्षण रूपी लक्ष्मण को देखकर सभी भाव (विदेह, समता व ज्ञान आदि के) बहुत सुखी हुए और आँखों में पानी आ गया तथा शरीर पुलकित हो उठा। आत्मा रूपी राम और लक्षण रूपी लक्ष्मण की मनोहर मूर्ति को देखकर प्राण रूपी विदेह का भाव और विदेह हो गया अर्थात् निर्मल प्राण और निर्मल हो गया। दो0 प्रेम मगन मनु जानि नृपु कर बिबेकु धरि धीर। बोलेउ मुनि पद नाइ सि डिग्री गदगद गिरा गभीर।।215।। व्याख्या : नर की धड़कन से निकलने वाला विशुद्ध प्राण रूपी विदेह जनक मन को आत्मारूपी राम के प्रेम में मग्न जानकर धैर्य धारण करते हुए तथा समता रूपी विश्वामित्र के चरणों में सिर झुकाते हुए गदगद वाणी में गम्भीर बातें बोले। कहहु नाथ सुंदर दोउ बालक। मुनिकुल तिलक कि नृप कुल पालक।। ब्रह्म जो निगम नेति कहि गावा। उभय बेष धरि की सोइ आवा।। व्याख्या : हे समता रूपी भाव! ये दोनों आत्मा रूपी राम और लक्षण रूपी लक्ष्मण कौन हैं? ये मन से उत्पन्न भाव हैं या फिर नर की धड़कन को संचालित करने वाले हैं। वास्तविकता में यह होता है जब साधक साधना द्वारा आत्मा को जानना शु डिग्री करता है, तो प्रारम्भ में उसके सामने अनेक प्रश्न उठते रहते हैं कि आत्मा क्या मन है या फिर मन को पैदा करने वाली शक्ति है या फिर नर की धड़कन है या फिर नर की धड़कन को संचालित करने वाली शक्ति है। या फिर जिस ब्रह्म को वेदों ने ""ऐसा भी नहीं"" ""ऐसा भी नहीं"" बोलकर लिखा है। क्या आत्मा वही ब्रह्म है, जो आत्मा और लक्षणों के रूप में प्रकट हुई है। सहज बिरागरूप मनु मोरा। थकित होत जिमि चंद चकोरा।। ताते प्रभु पूछउँ सति भाऊ। कहहु नाथ जनि करहु दुराऊ।। व्याख्या : प्राण रूपी विदेह जनक का भाव सोचता है कि मेरा मन तो सहज में ही वैराग्यवान होता है, फिर भी आत्मा रूपी राम को देखकर वैसे ही अनुरागी हो रहा है, जैसे चन्द्रमा को देखकर चकोर पक्षी होता है। इसलिए जनक रूपी भाव के मन में जिज्ञासा उठती है कि हे समता रूपी विश्वामित्र! मुझे सत्य बताइये ये आत्मा रूपी राम कौन हैं? इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा। बरबस ब्रह्म सुखहि मन त्यागा।। कह मुनि बिहसि कहेहु नृप नीका। बचन तुम्हार न होइ अलीका।। व्याख्या : प्राण रूपी जनक बोलते हैं कि आत्मा रूपी राम को देखकर मेरे मन में बहुत अनुराग हो रहा है और मेरे मन ने इनको देखकर ब्रह्म सुख का भी त्याग कर दिया है। तब समता रूपी विश्वामित्र के भाव ने हँसकर कहा कि आपने सही कहा है क्योंकि आपके वचन कभी मिथ्या नहीं हो सकते हैं। ए प्रिय सबहि जहाँ लगि प्रानी। मन मुसुकाहिं रामु सुनि बानी।। रघुकुल मनि दसरथ के जाए। मम हित लागि नरेस पठाए।। व्याख्या : समता रूपी विश्वामित्र भाव बोलते हैं कि जहाँ तक प्राणी होते हैं, वहाँ तक ये आत्मा रूपी राम सभी को प्रिय होते हैं। भावों के आपसी वार्तालाप को सुनकर आत्मारूपी राम मुस्कुराने लगते हैं। तब समता रूपी भाव प्राण रूपी जनक को समझाते हुए कहते हैं कि आत्मा रूपी राम जीव के कुल की मणि के समान होते हैं अर्थात् मन के भावों के अनुसार ही आत्मा के शरीर का रूपान्तरण होता रहता है। मेरे (समता) कल्याण के लिए दस इन्द्रियों रूपी दसरथ ने इन्हें यहाँ भेजा है। अर्थात् आत्मा रूपी राम इन्द्रियों रूपी दसरथ से उत्पन्न है, क्योंकि दस इन्द्रियों से जब जीव विमुख होकर परमात्मा की तरफ चल देता है, तब उसी अवस्था में दस इन्द्रियाँ आत्मा को परमात्मा की तरफ जाने के लिए छोड़ देती हैं। अत: आत्मा का आभास दस इन्द्रियों के कारण ही होता है, वरना आत्म तत्व तो एक रस है। दो0 रामु लखनु दोउ बंधुबर रूप सील बल धाम। मख राखेउ सबु साखि जगु जिते असुर संग्राम।।216।। व्याख्या : समता रूपी विश्वामित्र कहते हैं कि आत्मा रूपी राम और लक्षणों को लखने वाला लक्ष्मण भाव दोनों भाई हैं, जो रूप, शील व बल के घर हैं। इन्होंने ने यज्ञ (अर्थात् पान का अपान में और अपान का पान में हवन) की रक्षा करके समस्त आसुरी भावों को जीत लिया है। समस्त भाव रूपी संसार इसका साक्षी है। मुनि तव चरन देखि कह राऊ। कहि न सकउँ निज पुन्य प्रभाऊ।। सुंदर स्याम गौर दोउ भ्राता। आनँदहू के आनँद दाता ।। व्याख्या : प्राण रूपी जनक समता रूपी मुनि के चरण देखकर अर्थात् समर्पित होते हुए बोला कि मैं मेरे पुण्य के प्रभाव का वर्णन नहीं कर सकता हूँ कयोंकि मैंने सुंदर श्याम व गौर वर्ण के आत्मारूपी राम और लक्षणों को लखने वाले लक्ष्मण रूपी दोनों भाइयों को देख लिया। ये दोनों आनन्द को भी आनन्द देने वाले हैं। इन्ह के प्रीति परसपर पावनि। कहि न जाइ मन भाव सुहावनि।। सुनहु नाथ कह मुदित बिदेहू। ब्रह्म जीव इव सहज सनेहू ।। व्याख्या : इन दोनों की अर्थात् आत्मा रूपी राम और लक्षणों को लखने वाले लक्ष्मण रूपी भाव की आपस में सहज प्रेम है, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। इनकी प्रीत तो मन के भावों को अच्छी लगने वाली है। प्राण रूपी जनक बोले कि हे नाथ! इनका प्रेम तो ब्रह्म और जीव का प्रेम जैसा है। पुनि पुनि प्रभुहि चितव नर नाहू। पुलक गात उर अधिक उछाहू।। मुनिहि प्रसंसि नाइ पद सीसू। चलेउ लवाइ नगर अवनीसू।। व्याख्या : उस अवस्था में नर की धड़कन से उत्पन्न प्राण (नर नाहू) बार-बार आत्मा रूपी राम को देखने लगता है और शरीर में पुलकावलि छाने लग जाती है तथा हृदय में उत्साह छा जाता है। तब समता रूपी भाव को सीस झुकाकर प्राण रूपी विदेह प्रशंसा करते हैं और ध्यान में अब समता रूपी विश्वामित्र को ब्रह्मरन्ध्र रूपी विदेह नगर में ले जाते हैं। अर्थात् अब ध्यान समता, आत्मा, व लक्षण लखने के भावों सहित प्राण रूपी जनक के साथ ब्रह्मरन्ध्र रूपी विदेह नगर में जाने लगता है। सुंदर सदन सुखद सब काला। तहाँ बासु लै दीन्ह भुआला।। करि पूजा सब बिधि सेवकाई। गयउ राउ गृह बिदा कराई।। व्याख्या : ब्रह्मरन्ध्र रूपी विदेह नगर में प्राण रूपी जनक ने सब समय सुंदर व सुखदायक निवास दिया अर्थात् ध्यान सुखद व सुंदर कोष में प्रवेश कर गया। उस अवस्था में प्राण रूपी जनक समता व आत्मा रूपी राम की नाना प्रकार से सेवा करके अपने घर गए अर्थात् प्राण सहज अवस्था में स्थिर हो गए। जब ध्यान ब्रह्मरन्ध्र में पहुँच जाता है, तो नर की धड़कन भी शिथिल होकर भावों की उत्पत्ति कम कर देती है तथा सहज प्रेम व अनुराग के भावों को बढ़ा देती है। अत: यहाँ उसी अनुभूति का वर्णन किया गया है। दो0 रिषय संग रघुबंस मनि करि भोजनु बिश्रामु। बैठे प्रभु भ्रात सहित दिवसु रहा भरि जामु।।217।। व्याख्या : ध्यान की उस गहन अवस्था में आत्मा रूपी राम समता रूपी विश्वामित्र के साथ प्रेम व प्रीति रूपी भावों का भोजन करके विश्राम करके लक्षणों को लक्षणों वाले लक्ष्मण के साथ बैठे रहते हैं अर्थात् ध्यान में सहज अवस्था का अनुभव करते हैं। अब दिन एक पहर भर बचा हुआ लगता है अर्थात् साधक को ध्यान में लगने लगता है कि अभी थोड़ी देर और ध्यान करें परन्तु बार-बार ध्यान से बाहर आने का भी भाव आता रहता है। उसी अनुभूति को यहाँ बहुत सूक्ष्मता के साथ लिखा गया है। लखन हृदयँ लालसा बिसेषी। जाइ जनकपुर आइअ देखी।। प्रभु भय बहुरि मुनिहि सकुचाहीं। प्रकट न कहहिं मनहिं मुसुकाहीं।। व्याख्या : ध्यान में जब आत्मा रूपी राम, समता रूपी विश्वामित्र भाव, प्राण रूपी जनक व ज्ञान रूपी शतानन्द आदि भाव ब्रह्मरन्ध्र में पहुँच जाते हैं, तो लक्ष्मण का भाव ब्रह्मरन्ध्र रूपी विदेह नगर के लक्षणों को जानने के लिए उत्सुक हो उठता है। परन्तु आत्मा रूपी राम से भय लगता है कि कहीं लक्षणों का अवलोकन करते हुए आत्मारूपी राम दूर नहीं हो जाएँ। उस समय लक्ष्मण रूपी लक्षणों को लखने (जानने) वाला भाव समता रूपी विश्वामित्र के भाव से भी संकोच करता है क्योंकि लक्षणों की साम्यता ही तो समता को बल देती है। अत: लक्ष्मण को संकोच हो रहा है कि कहीं लक्षणों के प्रभाव से समता रूपी विश्वामित्र विचलित नहीं हो जाएँ। लक्ष्मण रूपी भाव अपने इस संकोच को प्रकट नहीं कर पाता है और मन ही मन मुस्कुराने लगता है। राम अनुज मन की गति जानी। भगत बछलता हियँ हुलसानी।। परम बिनीत सकुचि मुसुकाई। बोले गुर अनुसासन पाई।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम तब लक्ष्मण रूपी भाव के मन की गति को पहचान गए और भक्तवत्सल स्वभाव के कारण हृदय में उल्लास आ गया। तब आत्मा रूपी राम विनयपूर्वक व संकोच करते हुए समता रूपी गुरु से बोले। नाथ लखनु पुरु देखन चहहीं। प्रभु सकोच डर प्रगट न कहहीं।। जौं राउर आयसु मैं पावौं। नगर देखाइ तुरत लै आवौं।। व्याख्या : हे प्रभु! लक्षणों को जानने का भाव लक्ष्मण ब्रह्मरन्ध रूपी विदेह नगर के भावों के लक्षणों को जानना चाह रहा है, परन्तु संकोच के कारण बोल नहीं पा रहा है। अत: आपकी अगर आज्ञा हो तो मैं ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर को तुरन्त दिखा कर वापिस आ जाऊँगा। आत्मा रूपी राम भी लक्ष्मण रूपी भाव के साथ ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर को देखना चाहते हैं, इसलिए जब ध्यान ब्रह्म रन्ध्र के द्वार तक पहुँच जाता है, तो ब्रह्मरन्ध्र के मर्म को जानने की लालसा प्रबल हो जाती है और आत्म तत्व व लक्ष्मण रूपी भाव ध्यान में ब्रह्मरन्ध्र में पहुँचना चाहते हैं। सुनि मुनीसु कह बचन सप्रीती। कस न राम तुम्ह राखहु नीति।। धरम सेतु पालक तुम्ह ताता। प्रेम बिबस सेवक सुखदाता ।। व्याख्या : समता रूपी विश्वामित्र का भाव आत्मा रूपी राम की बात सुनकर प्रेमपूर्वक बोले कि हे आत्मा रूपी राम! तुम नीति का पालन कैसे नहीं करोगे? क्योंकि तुम तो धारणा को धारण करने के सेतु हो और प्रेम के वश में होकर सुख को देने वाले हो। यहाँ साधना का बहु गहरा रहस्य है। वह रहस्य यह है कि लक्ष्मण रूपी भाव अच्छे-बुरे भावों के लक्षणों का अवलोकन तो कर सकता है परन्तु लक्षणों की धारणा को धारण करने की क्षमता आत्मा में ही होती है। इसलिए राम को ""धरम सेतु पालक"" कहा गया है। दो0 जाइ देखि आवहु नग डिग्री सुख निदान दोउ भाइ। करहु सुफल सब के नयन सुंदर बदन देखाइ।।218।। व्याख्या : तब ध्यान की गहन अवस्था में समता रूपी विश्वामित्र के भाव कहते हैं कि हे सुख के कारण आत्मा रूपी राम व लक्ष्मण! तुम दोनों ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर को देखकर आ जाओ और वहाँ रहने वाले समस्त भावों को अपना सुन्दर स्वरूप दिखाकर धन्य कर दो। मुनि पद कमल बंदि दोउ भ्राता। चले लोक लोचन सुख दाता।। बालक बृंद देखि अति सोभा। लगे संग लोचन मनु लोभा।। व्याख्या : समता रूपी विश्वामित्र के चरण कमलों में सीस नवा कर दोनों भाई अर्थात् आत्मा रूपी राम और लक्षणों को लखने वाला लक्ष्मण भाव ब्रह्मरन्ध्र के लोक को सुख देने के लिये चले। तब ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर के बालक रूपी भावों ने आत्मा रूपी राम व लक्ष्मण की शोभा को देखा तो सभी बाल रूपी भाव इनके साथ लग गए। पीत बसन परिकर कटि भाथा। चा डिग्री चाप सर सोहत हाथा।। तन अनुहरत सुचंदन खोरी। स्यामल गौर मनोहर जोरी।। व्याख्या : ध्यान में जब आत्मा रूपी राम ब्रह्मरन्ध्र में जाते हैं, तो उन पर पीले वसन (अर्थात् जब वासनाओं के त्याग की अवस्था आ जाती है, तो उसको पीत वसन के प्रतीक द्वारा समझाया जाता है) शोभा पा रहे हैं। जब साधक वासनाओं से विरक्त होने लग जाता है, तो वह अवस्था साधक की शोभा पाने वाली होती है। वासनाओं के त्याग करने पर जीवात्मा के चारों तरफ कर्म के बन्धन कट जाते हैं। उसी को ""परिकर कटि भाथा"" कहा गया है। उस समय सहज संयम की अवस्था आ जाती है, उसे ही ""चा डिग्री चाप सर सोहत हाथा"" कहा गया है। उस समय साधक के शरीर में चन्दन जैसी खुशबू आने लग जाती है तथा आत्मा रूपी राम की श्याम व लक्ष्मण रूपी भाव की गौरवर्ण की जोड़ी बहुत शोभा पाने लगती है। ध्यान की उस अवस्था में एक विशेष सुख मिलने लगा जाता है। केहरि कंधर बाहु बिसाला। उर अति रूचिर नागमनि माला।। सुभग सोन सर सीरूह लोचन। बदन मयंक ताप त्रय मोचन।। व्याख्या : ब्रह्मरन्ध्र में जब आत्मा रूपी राम पहुँचने लगता है तो केहरि कंधर अर्थात् के अ हरि यानी माया के समस्त भावों का हरण होने लग जाता है। उसी अवस्था को सिंह के कंधों से उपमा दी गयी है। उस समय आत्मभाव प्रबल हो जाता है और हृदय में नाग प्राणवायु से उठने वाले आनन्द के भावों की माला सी बन जाती है तथा भावों की प्रकृति निर्मल हो कर शरीर में आनन्द की सिरहन सी उठने लगती हैं तथा शरीर में दैहिक, दैविक व भौतिक तापों का नाश होना शु डिग्री हो जाता है तथा शरीर चन्द्रमा की तरह शीतल होने लग जाता है। कानन्हि कनक फूल छबि देहीं। चितवत चितहि चोरि जनु लेहीं।। चितवनि चा डिग्री भृकुटि बर बाँकी। तिलक रेख सोभा जनु चाँकी।। व्याख्या : ब्रह्मरन्ध्र में ध्यान प्रवेश करने पर ऐसा लगता है मानों स्वर्ण कमल खिल रहा हो। उस समय उस अवस्था को देखते ही चित स्थिर हो जाता है तथा चित की चेतना भी स्थिर हो जाती है। उस समय चित की चेतना अर्थात् तरंगे भी भृकुटि से ऊपर स्थिर हो जाती हैं और तीनों गुणों की (तिलक) एकता रूपी रेखा भृकुटि पर शोभा पाने लगती है। जब तीन गुण ध्यान में साम्य होकर एक हो जाते हैं, उसे ही तिलक की रेखा कहा जाता है। दो0 रूचिर चौतनीं सुभग सिर मेचक कुंचित केस। नख सिख सुंदर बंधु दोउ सोभा सकल सुदेस।।219।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में चेतना रूचिकर व निर्मल प्रकृति (सु अ भग उ निर्मल प्रकृति) की हो जाती है और आनन्द से रोएँ खड़े होने लग जाते हैं। इस प्रकार नख से शिख तक आत्मा रूपी राम व लक्ष्मण रूपी भाव की शोभा छा जाती है। देखन नगर भूप सुत आए। समाचार पुरबासिन्ह पाए ।। धाए धाम काम सब त्यागी। मनहुँ रंक निधि लूटन लागी।। व्याख्या : जब आत्मा रूपी राम और लक्ष्मण रूपी लखन भाव के ब्रह्मरन्ध्र रूपी विदेह नगर में आने के समाचार नगर में रहने वाले भावों ने पाया, तो सब काम (इच्छाओं ) का त्याग करके आत्मा की तरफ आकर्षित हुए, मानों भिखारियों को खजाना लूटने का अवसर मिल गया हो। निरखि सहज सुंदर दोउ भाई। होहिं सुखी लोचन फल पाई।। जुबतीं भवन झरोखन्हि लागी। निरखहिं राम रूप अनुरागी।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम और लक्ष्मण के भावों को देखकर ब्रह्मरन्ध्र के सभी भावसुखी हो गए तथा उनकी आँखों को तृप्ति मिल गयी। उस अवस्था में सात्विक इच्छाओं रूपी युवतियाँ ब्रह्मरन्ध्र के झरोखों से आत्मा रूपी राम को देखकर अनुरागित हो उठती हैं। अर्थात् सात्विक इच्छाओं के भाव भी आत्मा रूपी राम से अनुराग करने लग जाते हैं। कहहिं परसपर बचन सप्रीती। सखि इन्ह कोटि काम छबि जीती।। सुर नर असुर नाग मुनि माहीं। सोभा असि कहुँ सुनिअति नाहीं।। व्याख्या : सात्विक इच्छाओं के भाव आपस में बातें करने लगते हैं कि आत्मा रूपी राम की शोभा करोड़ों काम भावों से भी बढ़कर है। सुर, नर, असुर, नाग व मुनियों में किसी की भी शोभा आत्मा रूपी राम के बराबर नहीं सुनी है। सुर अर्थात् दैवीय भाव जो स्वरों से पैदा होते हैं, नर की धड़कन से पैदा होने वाले भाव, आसुरी भाव, नाग प्राणवायु से पैदा होने वाले आनन्द के भाव व मन के भाव, इन सबकी शोभा आत्म भाव के बराबर नहीं होती है। बिष्नु चारि भुज बिधि मुख चारी। बिकट बेष मुख पंच पुरारी।। अपर देउ अस कोउ न आही। यह छबि सखी पटतरिअ जाही।। व्याख्या : विष्णु अर्थात् सृष्टि के अणु-अणु में गुणों की चार अवस्थाओं की सत्ता होती है। तामसिक, राजसिक, सात्विक व गुणातीत रूपी चार भुजाएँ होती हैं और इन गुणों की चार अवस्थाओं से ही विधि अर्थात् क्रिया की चार मुख रूपी वृतियाँ बनती हैं। इन्हें प्रतीक रूप में विष्णु की चार भुजाएँ और ब्रह्मा के चार मुख बताया गया है। पाँच तत्वों से निर्मित जीव के शरीर को विकट भेष के रूप में शिव के पंच मुख के प्रतीक के रूप में बताया गया है। अत: जब ब्रह्मरन्ध्र में ध्यान लगता है, तो आत्म भाव के समान दूसरा कोई भाव दिखायी नहीं देता है। अत: आत्मा रूपी राम के साथ दूसरे किसी भी भाव की तुलना नहीं की जा सकती है। दो0 बय किसोर सुषमा सदन स्याम गौर सुख धाम। अगं अंग पर वारिअहिं कोटि-कोटि सत काम।।220।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम और लक्ष्मण के भाव की किशोर अवस्था है। अर्थात् प्रारम्भ में जब ब्रह्मरन्ध्र में ध्यान लगता है, तो आत्म भाव किशोर ही लगता है और ज्यों-ज्यों ध्यान में प्रगाढ़ता बढ़ती जाती है, त्यों-त्यों आत्म तत्व निखरता चला जाता है। आत्मा रूपी राम व लक्ष्मण के भाव श्याम व गौर वर्ण के होते हैं तथा सुंदरता के व सुख के घर होते हैं। इसलिए उनके अंग-अंग पर करोड़ों काम न्यौछावर हो जाते हैं अर्थात् जब आत्मा रूपी राम और लखन रूपी लक्ष्मण ध्यान में ब्रह्म रन्ध्र में प्रवेश करते हैं, तो करोड़ों इच्छाएँ अपने-आप शान्त होने लग जाती हैं। कहहु सखी अस को तनु धारी। जो न मोह यह रूप निहारी।। कोउ सप्रेम बोली मृदु बानी। जो मैं सुना सो सुनहु सयानी।। व्याख्या : ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर में रहने वाली सात्विक इच्छाएँ आपस में बातें करने लगती हैं कि ऐसी कौन-सी इच्छाएँ होंगी, जो आत्मा रूपी राम के रूप को निहार कर मोहित नहीं होंगी अर्थात् आकर्षित नहीं होंगी। तब कुछ सात्विक इच्छाएँ प्रेमपूर्वक मधुर भाषा में बोलने लगती है कि जो हमने सुना है, वो सुनिए अर्थात् जो हमें समझ में आया है वो बताती हैं। वास्तव में जब ध्यान में गहनता आती है तो सात्विक इच्छाओं के भाव आपस में बातें करने लगते हैं और यह घटना इतनी सूक्ष्मता से घटित होती है कि बहुत सावधानी रखने पर ही समझ में आती है। उस समय सात्विक भावों को आत्मा का रहस्य समझ में आने लग जाता है। उसी अनुभूति को यहाँ प्रतीकों के माध्यम से लिखा गया है। ए दोऊ दसरथ के ढोटा । बाल मरालन्हि के कल जोटा।। मुनि कौसिक मख के रखवारे। जिन्ह रन अजिर निसाचर मारे।। व्याख्या : कुछ सात्विक इच्छाओं को आभास होता है कि आत्मा रूपी राम दस इन्द्रियों रूपी दसरथ के पुत्र हैं और ये दोनों हंस के जोड़े हैं। आत्मा को कुछ साधना पंथों में हंस कहा गया है। हंस का मर्म यह कि शरीर में निर्मल प्राण की गति हकार व सकारमय होती है और जब ध्यान में प्राण की गति उर्ध्वगामी होकर स्थिर होने लग जाती है, तो आत्मा हकार के रूप में व आत्मा के लक्षणों को लखने की शक्ति सकारमय हो जाती है और ये दोनों हंसाकार अर्थात् हकार-सकार रूपी जोड़े में हो जाते हैं। आत्मा रूपी राम व लक्ष्मण के भाव कोशिकाओं से उत्पन्न मन के यज्ञ अर्थात् पान का अपान में हवन की क्रिया के ये रक्षा करने वाले हैं। यह वैज्ञानिक सत्य है कि जब प्राण हकार सकार अर्थात् हँसाकार में चलेगा तो स्वत: यज्ञ की क्रिया घटित ही जायेगी अर्थात पान में अपान का हवन स्वत: शु डिग्री हो जायेगा। यही समता रूपी विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा का रहस्य है। स्याम गात कल कंज बिलोचन। जो मारीच सुभुज मदु मोचन।। कौसल्या सुत सो सुख खानी। नामु रामु धनु सायक पानी।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम के श्याम अंग व कमल जैसे नेत्र होते हैं। वास्तविकता में ध्यान की अवस्था में जब भाव शान्त होते चले जाते हैं, तो भावों के अभाव में श्यामता सी छाने लगती है। इसलिए आत्मा रूपी राम को श्यामवर्ण बताया जाता है। ध्यान ज्यों-ज्यों गहरा होता जाता है, त्यों-त्यों सहस्रकमल खिलना शु डिग्री हो जाता है और दिव्य ज्ञान आने लग जाता है, इसलिए उसी अवस्था को कमल नयन के प्रतीक के माध्यम से लिखा गया है। जब दिव्य ज्ञान आना शु डिग्री हो जाता है, तो सुबाहु रूपी आसुरी भाव और वासना रूपी मारीच का स्वत: दमन हो जाता है। ये ध्यान की अवस्था सुष्मना नाड़ी के माध्यम से ही प्राप्त होती है, इसलिए आत्मा रूपी राम को कौसल्या रूपी सुष्मना नाड़ी का सुत व सब सुखों की खान बताया गया है। परमात्मा का नाम ही असुरों व वासनाओं का दमन करने के लिए धनुष बाण का कार्य करता है। गौर किसोर बेषु बर काछें। कर सर चाप राम के पाछें।। लछिमनु नामु राम लघु भ्राता। सुनु सखि तासु सुमित्रा माता।। व्याख्या : ध्यान में लक्षणों को लखने का भाव गौर वर्ण व किशोर अवस्था वाला लगता है जो आत्मा रूपी राम के पीछे-पीछे रहता है। इसलिए उसे आत्मा रूपी राम का भाई लक्ष्मण कहा गया है। सात्विक इच्छा रूपी सखीं कहती हैं कि लक्ष्मण की माता सुमित्रा हैं। लक्ष्मण का भाव अर्थात् लक्षणों का अवलोकन करने का भाव ईड़ा नाड़ी द्वारा पैदा होता है। अत: उसी को सुमित्रा माता के प्रतीक के रूप में बताया गया है। दो0 बिप्र काजु करि बंधु दोउ मग मुनि बधू उधारि। आए देखन चाप मख सुनि हरषीं सब नारि।।221।। व्याख्या : सात्विक इच्छाओं के भावों को ध्यान में समझ आने लगता है कि आत्मा रूपी राम और लक्ष्मण रूपी लखन भाव विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश को प्राप्त कर अहिल्या रूपी कुण्डलिनि शक्ति का जागरण करके ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर में चाप मख अर्थात् भावों के रहस्य को जानने के लिए आए हैं। आत्मा रूपी राम का यह रहस्य जानकर सब सात्विक इच्छाएँ हर्षित हो उठी। देखि राम छबि कोउ एक कहई। जोगु जानकिहि यह ब डिग्री अहई।। जौं सखि इन्हहि देख नर नाहू। पन परिहरि हठि करइ बिबाहू।। व्याख्या : कोई आत्मा रूपी राम की छवि देखकर कहती हैं कि यह प्राण की शक्ति रूपा जानकी के लिए उचित वर हैं। जो इनको प्राण रूपी जनक देखेंगे तो प्राण के माया के भावों को दूर करके इनका विवाह अर्थात प्राणशक्ति और आत्मा का मिलन करा देंगे। कोउ कह ए भूपति पहिचाने। मुनि समेत सादर सनमाने।। सखि परंतु पनु राउ न तजई। बिधि बस हठि अबिबेकहि भजई।। व्याख्या : कुछ सात्विक इच्छाओं के भाव कहते हैं कि प्राण रूपी जनक ने इन्हें पहचान लिया है और समता रूपी विश्वामित्र मुनि सहित इनका आदर-सत्कार किया है। परन्तु फिर भी प्राण रूपी जनक ने अपना प्रण नहीं छोड़ा है क्योंकि विधि अर्थात् क्रिया के कारण अविवेक को भजते हैं। आत्मा रूपी राम और प्राण शक्ति रूपा जानकी का मिलन क्रिया के वश में होता है वरना माया के भावों का अविवेक इन दोनों का मिलन नहीं होने देता है। यहाँ साधना का गहरा रहस्य छुपा हुआ है। क्योंकि प्राण ही जनक हैं और जनक ही जानकी अर्थात् प्राण शक्ति के पिता हैं। आत्मा रूपी राम भी प्राण स्वरूपा है तथा लक्ष्मण अर्थात् लक्षणों का आभास भी प्राण के द्वारा ही सम्भव हो पाता है। माया के भाव भी प्राण से ही पैदा होते हैं। अत: प्राण के रहस्य को समझना बहुत गम्भीर विषय है। ये सभी एक ही प्राण से जुड़े हुए हैं परन्तु फिर भी अलग-अलग आभासित होते हैं। अत: क्रिया (विधि) के द्वारा प्राण को निर्मल करके ही इन सबको समझा जा सकता है। कोउ कह जौं भल अहइ बिधाता। सब कहँ सुनिअ उचित फल दाता।। तौ जानकिहि मिलिहि ब डिग्री एहू। नाहिन आलि इहाँ संदेहू।। व्याख्या : कुछ सात्विक इच्छाएँ कहती हैं कि अगर विधाता अर्थात् क्रिया को करने का भाव अच्छा है, तो अच्छे फल की ही प्राप्ति होती है। अत: हे सखियों! प्राणशक्ति रूपी जानकी को आत्मा रूपी राम ही वर के रूप में मिलेंगे, इसमें संदेह नहीं है। जौं बिधि बस अस बनै संजोगू। तौ कृतकृत्य होइ सब लोगू।। सखि हमरें आरति अति तातें। कबहुँक ए आवहिं एहि नातें।। व्याख्या : अगर क्रिया की साधना द्वारा ऐसा संयोग बन जाए जिससे प्राणशक्ति और आत्मा का मिलन हो जाए तो सभी भाव कृतकृत्य अर्थात बन्धन से मुक्त होकर सहज हो जायेंगे तथा कुछ सात्विक भावों की तो आतुरता बनी रहती है कि आत्मा रूपी राम प्राणशक्ति से मिलने के बहाने ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर में आते रहें। जिससे समय समय पर आनन्द की प्राप्ति होती रहे। दो0 नाहिं त हम कहुँ सुनहु सखि इन्ह कर दरसन दूरि। यह संघटु तब होइ जब पुन्य पुराकृत भूरि।।222।। व्याख्या : कुछ सात्विक भाव रूपी इच्छाएँ कहती हैं कि इनके अर्थात् आत्मा रूपी राम के दर्शन मुश्किल होते हैं। इनका दर्शन का योग तो तब बनता है, जब शरीर द्वारा पुण्य के बहुत से कार्य किए जाएँ। बोली अपर कहेहु सखि नीका। एहिं बिआह अतिहित सबही का।। कोउ कह संकर चाप कठोरा। ए स्यामल मृदु गात किसोरा।। व्याख्या : दूसरी सात्विक इच्छा रूपी सखि बोली कि इनका मिलन अर्थात् आत्मा रूपी राम और प्राण शक्ति रूपी सीता का मिलन सभी भावों के लिए कल्याणकारी है। परन्तु कुछ सात्विक इच्छाओं के भाव कहते हैं कि शंकर का अज्ञान रूपी धनुष बहुत कठोर है और ये तो श्यामल व कोमल अंगों वाले किशोर हैं। अर्थात् आत्म भाव तो निर्मल है और अज्ञान रूपी धनुष कठोर है। अत: सात्विक भावों को संशय होता है कि ये कैसे सम्भव होगा? चाप शब्द को आसक्ति के प्रतीक के रूप में लिखा गया है और धनुष का तात्पर्य वासनाओं से युक्त इच्छाओं से होता है। अत: वासनाओं की आसक्ति बहुत कठोर होती है। उस कठोर अवस्था को तोड़ना कठिन होता है। सबु असमंजस अहइ सयानी। यह सुनि अपर कहि मृदु बानी।। सखि इन्ह कहँ कोउ कोउ अस कहहीं। बड़ प्रभाउ देखत लघु अहहीं।। व्याख्या : जब कुछ सात्विक इच्छाओं को असमंजस हो आता है, तो दूसरी सात्विक इच्छा मधुर वाणी में कहती है कि इनके बारे में कुछ भाव ऐसा कहते हैं कि आत्मा रूपी राम देखने में छोटे लगते हैं परन्तु इनका प्रभाव बहुत गहरा होता है। परसि जासु पद पंकज धूरी। तरी अहल्या कृत अघ भूरी।। सो कि रहहि बिनु सिवधनु तोरें। यह प्रतीति परिहरिअ न भोरें।। व्याख्या : जिनकी कमल चरणों की धूल का स्पर्श करने से जड़ रूपी कुण्डलिनि शक्ति जागृत हो गयी। वो क्या बिना शंकाओं का नाश किए रह सकते हैं अर्थात् जब कुण्डलिनि शक्ति जागृत हो गयी है, तो शंकाओं का समाधान तो स्वत: ही हो जायेगा। अत: मेरा यह विश्वास भूल कर भी नहीं मिटता है। अर्थात् मुझे पूरा विश्वास है। जेहिं बिरंचि रचि सीय सँवारी। तेहिं स्यामल ब डिग्री रचेउ बिचारी।। तासु बचन सुनि सब हरषानीं। ऐसेइ होउ कहहिं मृदु बानीं।। व्याख्या : जिसने प्राण शक्ति रूपी सीता को बनाया है, उसे ही आत्मा रूपी राम को सीता के वर के रूप में विचार कर रचा है। उस सात्विक इच्छा की बात को सुनकर सभी सात्विक इच्छाएँ हर्षित हो उठी और मधुर वाणी में कहने लगी ""ऐसा ही हो""। दो0 हियँ हरषहिं बरषहिं सुमन सुमुखि सुलोचिनि बृंद। जाहिं जहाँ जहँ बंधु दोउ तहँ तहँ परमानन्द।।223।। व्याख्या : ब्रह्मरन्ध्र में आत्मा रूपी राम व लक्ष्मण रूपी भाव जिस जिस भी कोष में जाते हैं, वहाँ भावों के हृदय में हर्ष छा जाता है और आनन्द रूपी पुष्प वर्षा होने लग जाती है और सात्विक इच्छाओं के भाव हर्षित होने लग जाते हैं तथा चारों तरफ परमानन्द छा जाता है। पुर पूरब दिसि गे दोउ भाई। जहँ धनुमख हित भूमि बनाई।। अति बिस्तार चा डिग्री गच ढारी। बिमल बेदिका रूचिर सँवारी।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम और लक्ष्मण दोनों ब्रह्मरन्ध्र के पूर्व दिशा वाले कोष में प्रवेश किए, जहाँ पर धनुमख अर्थात् इच्छाएँ पैदा होना शु डिग्री होती हैं। वह इच्छाओं को पैदा करने वाला कोष बहुत सुन्दर व सुदृढ़ होता है। उस कोष में निर्मल भावों की उत्पत्ति करने वाला कोष भी भली-भाँति सँवारा हुआ रहता है। अर्थात् ब्रह्मरन्ध्र से ही सब प्रकार के सात्विक, राजसिक व तामसिक भावों का उद्भव होता है। ब्रह्मरन्ध्र में अनन्त कोष होते हैं और प्रत्येक कोष में भिन्न-भिन्न प्रकार के भाव पैदा होते हैं। अत: आत्मा रूपी राम और लखन रूपी भाव ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर को सूक्ष्मता के साथ देखने लगते हैं। चहुँ दिसि कंचन मंच बिसाला। रचे जहाँ बैठहिं महिपाला।। तेहि पाछें समीप चहुँ पासा। अपर मंच मंडली बिलासा।। व्याख्या : ब्रह्मरन्ध्र के चारों ओर कंचन मंच अर्थात् ब्रह्मरन्ध्र के चारों तरफ से माया के भाव (कंचन मंच) पैदा होते रहते हैं और वहीं माया रूपी मंच पर भावों के प्रधान भाव बैठते हैं अर्थात् सत, रज व तम वृति के अनुसार प्रधान भाव रहते हैं। ब्रह्मरन्ध्र के पीछे एकदम नजदीक चारों तरफ दूसरे सामान्य वृति के भावों को पैदा करने वाला कोष होता है। कछुक ऊँचि सब भाँति सुहाई। बैठहिं नगर लोग जहँ जाई।। तिन्ह के निकट बिसाल सुहाए। धवल धाम बहुबरन बनाए।। व्याख्या : ब्रह्मरन्ध्र के सहस्रकमल में थोड़ी ऊँचाई पर सब प्रकार के भाव पैदा होते हैं। उन्हें ही नगर निवासी के प्रतीक के रूप में लिखा गया है। उसी कोष के पास एक विशाल कोष होता है, जिसमें श्वेत धाम होता है। जहाँ पर नाना प्रकार के शान्ति के भाव पैदा होते हैं। इसी श्वेत धाम को श्वेत द्वीप, शान्ति का परमधाम व शान्ताकारम आदि नामों के प्रतीकों के माध्यम से समझाया जाता है। जहँ बैठें देखहिं सब नारी। जथा जोगु निज कुल अनुहारी।। पुर बालक कहि कहि मृदु बचना। सादर प्रभुहि देखावहिं रचना।। व्याख्या : भिन्न-भिन्न कोषों के भाव रूपी मंचों पर भाव रूपी इच्छाएँ अपनी-अपनी वृति व योग्यता के अनुसार ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर की धनु यज्ञ को देखते हैं। आत्मा रूपी राम व लक्ष्मण को ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर के भाव रूपी बालक मधुर वाणी बोल बोलकर ब्रह्मरन्ध्र की भाव रचना को दिखाने लगते हैं। दो0 सब सिसु एहि मिस प्रेम बस परसि मनोहर गात। तन पुलकहिं अति हरषु हियँ देखि देखि दोउ भ्रात।।224।। व्याख्या : ब्रह्मरन्ध्र की रचना दिखाने के बहाने से ही बाल रूपी निर्मल भाव आत्मा रूपी राम को प्रेमवश स्पर्श करने लगते हैं, जिससे शरीर पुलकित हो उठता है तथा हृदय में विशेष हर्ष छा जाता है। सिसु सब राम प्रेम बस जाने। प्रीति समेत निकेत बखाने।। निज निज रूचि सब लेहिं बोलाई। सहित सनेह जाहिं दोउ भाई।। व्याख्या : बाल भावों ने जब आत्मा रूपी राम को अपने प्रेम के वश में जाना तो सब भाव अपना-अपना प्रेम सहित परिचय देने लगे। उस समय सभी भाव अपनी-अपनी रूचि के अनुसार आत्मा रूपी राम को अपनी तरफ आकर्षित करने लगते हैं और उन भावों के प्रेम वश होकर आत्मा रूपी राम व लखन वहाँ उनकी तरफ जाने भी लगते हैं। राम देखावहिं अनुजहि रचना। कहि मृदु मधुर मनोहर बचना।। लव निमेष महुँ भुवन निकाया। रचइ जासु अनुसासन माया।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम तब लक्ष्मण रूपी भाई को ब्रह्मरन्ध्र की अनुपम रचना को दिखाने लगते हैं तथा मधुर व मनोहर वाणी में बताते हैं, जिस आत्मा रूपी राम के द्वारा लव-निमेष अर्थात् क्षण मात्र में माया की रचना हो जाती है अर्थात् आत्मा रूपी राम की क्षण मात्र की चेतना से अनन्त भाव पैदा हो जाते हैं। भगति हेतु सोइ दीन दयाला। चितवत चकित धनुष मखसाला।। कौतुक देखि चले गुरु पाहीं। जानि बिलंबु त्रास मन माहीं।। व्याख्या : जब ध्यान में आत्मा रूपी राम भयहीन अवस्था को प्राप्त कर लेता है तो आत्मा का स्वरूप निर्मल होकर दीनदयाल हो जाता है और स्थिर होकर ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर की यज्ञशाला को आश्चर्य चकित होकर देखने लगता है। यह ध्यान की अवस्था जब हिल जाती है, तो ध्यान उतरने लगता है और आत्मा रूपी राम व लखन समतारूपी विश्वामित्र रूपी गुरु के पास चले जाते हैं। कभी-कभी ध्यान में बहुत आनन्द आने लगता है परन्तु बीच-बीच में यह भी आभासित होता रहता है कि कहीं ज्यादा देर तो नहीं हो गयी। ऐसे भाव बीच-बीच में उठकर मन में भय सा पैदा कर देते हैं। उसी अनुभूति को "त्रास मन माहीं"" बोलकर लिखा है। जासु त्रास डर कहुँ डर होई। भजन प्रभाउ देखावत सोई।। कहि बातें मृदु मधुर सुहाई। किए बिदा बालक बरिआई।। व्याख्या : जिसके भय से डर को भी डर लगता है, वही आत्मा रूपी राम भाव जनों के भावों से प्रभावित हो जाते हैं। तब भावों के प्रभाव के कारण बाल रूपी भावों से मृदु व मधुर बातें की और जोर देकर बाल भावों को विदा कर दिया। अर्थात् जो बाल भाव आत्मा रूपी राम को प्रेम में वश करके ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर में भ्रमण करा रहे थे, उन्हें जोर देकर विदा कर दिया और आत्मा रूपी राम समता रूपी भाव के पास चल दिए। दो0 सभय सप्रेम बिनीत अति सकुच सहित दोउ भाइ। गुर पद पंकज नाइ सिर बैठे आयसु पाइ।।225।। व्याख्या : जब ध्यान ब्रह्मरन्ध्र में गहनता से लग जाता है तो कभी-कभी शरीर छूटने का भय या संसार छूटने का भय सा लग आता है। अत: जब ध्यान उतर कर वापिस समता रूपी विश्वामित्र के पास आता है, तो आत्मा रूपी राम व लखन सभय, सप्रेम, विनय व संकोच के साथ समता रूपी गुरु के चरण कमलों में शीश झूकाकर बैठ जाते हैं। निसि प्रबेस मुनि आयसु दीन्हा। सबहीं संध्या बंदनु कीन्हा।। कहत कथा इतिहास पुरानी। रूचिर रजनि जुग जाम सिरानी।। व्याख्या : जब ब्रह्मरन्ध्र की झलक पाकर ध्यान उतर कर भृकुटि पर आ कर समता रूपी गुरु से आत्मा रूपी राम व लखन मिलते हैं, तो माया की धीरे-धीरे रात्रि होने लग जाती है। उस अवस्था में आत्मा रूपी राम माया और ज्ञान के मिलन स्थान पर होते हैं अर्थात् संध्या वंदन करते हैं। संध्या बंदन को ज्ञान व माया के मिलन के प्रतीक के रूप में लिखा गया है। उस अवस्था में आत्मा रूपी राम व लखन को समता रूपी विश्वामित्र ध्यान की अनुभूति की रूचिकर बातें समझाते हैं। इस प्रकार माया रूपी सुंदर रात्रि की दो याम गुजर जाती हैं। अर्थात् साधक को बहुत कुछ माया का रहस्य समझ में आ गया। जहाँ तक माया का रहस्य समझ में आ जाता है, वहाँ तक माया का निवारण हो जाता है, अत: उसी को माया रूपी रात्रि के दो याम गुजरना बताया गया है। मुनिबर सयन कीन्हि तब जाई। लगे चरन चापन दोउ भाई।। जिन्ह के चरन सरोरूह लागी। करत बिबिध जप जोग बिरागी।। व्याख्या : तब समता रूपी विश्वामित्र सोने चले गए अर्थात् समता का भाव सहज होकर विश्राम करने लगता है और आत्मा रूपी राम व लखन समतारूपी भाव के पैर दबाने लगे अर्थात् आत्मा रूपी राम व लखन ने समता रूपी भाव के प्रति पूर्ण श्रद्धा व विश्वास प्रकट कर दिया। आत्मा रूपी राम के चरण कमलों को पाने के लिए जहाँ योगी लोग नाना प्रकार से जप, तप व वैराग्य की क्रियाएँ करते हैं। वही आत्मा रूपी राम समता रूपी विश्वामित्र के भाव के चरणों में समर्पित हो जाते हैं। अर्थात् समता का भाव साधना में बहुत महत्वपूर्ण होता है। तेइ दोऊ बंधु प्रेम जनु जीते। गुर पद कमल पलोटत प्रीते।। बार बार मुनि अग्या दीन्ही। रघुबर जाइ सयन तब कीन्ही।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम व लखन गुरु के चरण कमलों में प्रेमवश होकर पूरी तरह समर्पित हो रहे होते हैं। तब समता रूपी भाव बार-बार सहज विश्राम में जाने के लिए आज्ञा देते हैं। तब जाकर आत्मा रूपी राम सहज होकर विश्राम करने लगते हैं। चापत चरन लखनु उर लाएँ। सभय सप्रेम परम सचु पाएँ।। पुनि पुनि प्रभु कह सोवहु ताता। पौढ़े धरि उर पद जल जाता।। व्याख्या : जब आत्मा रूपी राम का भाव विश्राम करने लगता है, तो लक्ष्मण रूपी लखन भाव आत्मा रूपी राम के चरणों को प्रेमपूर्वक दबाने लगे अर्थात् प्रेमपूर्वक लखन भाव समर्पित हो गए। तब बार-बार आत्मा रूपी राम ने सोने के लिए कहा अर्थात् लक्ष्मण रूपी लखन को सहज होकर लक्षणों को जानने की बात कही तो लखन रूपी भाव आत्मा रूपी राम के चरण कमलों को हृदय में धारण करके सो गए। अर्थात् आत्मा की चेतना को लखन भाव ने हृदय में धारण कर लिया और सहज हो गया। दो0 उठे लखनु निसि बिगत सुनि अरून सिखा धुनि कान। गुर तें पहिलेहिं जगतपति जागे रामु सुजान ।।226।। व्याख्या : जब तक पूर्ण अवस्था की प्राप्ति नहीं हो जाती है, तब तक साधना में ध्यान का चढ़ना व उतरना चलता रहता है। उसी अनुभूति को यहाँ लिखा गया है। जब माया रूपी रात्रि का नाश हो जाता है, तो ज्ञान रूपी मुर्गा बोलने लग जाता है, जिसे सुनकर लखन भाव तुरन्त जाग उठता है और जब लक्ष्मण रूपी लखन भाव जाग उठता है तो आत्मा रूपी राम भी समता रूपी गुरु से पहले जाग उठते हैं। अर्थात् आत्मा रूपी राम व लखन भाव पुन: ब्रह्मरन्ध्र में ध्यानस्थ होने के लिए जाग उठते हैं। सकल सौच करि जाइ नहाए। नित्य निबाहि मुनिहि सिर नाए।। समय जानि गुर आयुस पाई। लेन प्रसून चले दोउ भाई।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम सब प्रकार से निर्मल होकर समता रूपी मुनि को शीश नवाए और समता रूपी गुरु की आज्ञा लेकर ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर के उपवन में आनन्द रूपी फूल लेने के लिए चल दिए। अर्थात् ब्रह्मरन्ध्र में पुन; ध्यान की लग्न लग गई। भूप बागु बर देखेउ जाई। जहँ बसन्त रितु रही लोभाई।। लागे बिटप मनोहर नाना। बरन बरन बर बेलि बिताना।। व्याख्या : प्राण रूपी जनक के भावों रूपी उपवन को जाकर जब दोनों भाइयों ने देखा तो पाया कि वहाँ पर बसन्त ऋतु अर्थात् भावों की साम्य व सुखद अवस्था छायी हुई है। भावों रूपी उपवन में नाना भावों रूपी पेड़ों पर नाना प्रकार की इच्छाएँ रूपी बेल लगी हुई हैं। नव पल्लव फल सुमन सुहाए। निज संपत्ति सुर रूख लजाए।। चातक कोकिल कीर चकोरा। कूजत बिहग नटत कल मोरा।। व्याख्या : वहाँ पर भावों से नए भाव पैदा होकर पत्तों की तरह फैले हुए हैं तथा इच्छा रूपी फल व यश भाव रूपी फूल खिले हुए हैं। वहाँ भाव रूपी उपवन की भाव अवस्था रूपी सम्पत्ति को देखकर कल्पत डिग्री अर्थात् कल्पना के भाव भी लज्जित हो जाते हैं। अर्थात् भाव रूपी उपवन की भाव अवस्था की कल्पना द्वारा भी वर्णन नहीं किया जा सकता है। भाव रूपी उपवन में प्रेम रूपी चातक, मधुरता रूपी कोयल, सुख भाव रूपी तोता और प्रीत रूपी चकोर आदि के नाना पक्षी मीठी बोली बोल रहे हैं और आनन्द रूपी मोर नाच रहे हैं। मध्य बाग स डिग्री सोह सुहावा। मनि सोपान बिचित्र बनावा।। बिमल सलिलु सरसिज बहुरंगा। जलखग कूजत गुंजत भृंगा।। व्याख्या : प्राण रूपी उपवन के बीच में आनन्द रूपी सरोवर सुशोभित होता है, जहाँ पर मन के सुखद भावों की सीढ़ियाँ विचित्र प्रकार से लगी हुई हैं। उस आनन्द रूपी सरोवर में सात्विक भाव रूपी निर्मल जल भरा हुआ है, जिसमें प्रसन्नता रूपी कमल खिले हुए हैं। वहाँ सात्विक भावों रूपी जल में नाना प्रकार के भाव कलरव कर रहे हैं तथा भ्रमर गूँज रहे हैं। दो0 बागु तड़ागु बिलोकि प्रभु हरषे बंधु समेत। परम रम्य आरामु यहु जो रामहि सुख देत।।227। व्याख्या : आत्मा रूपी राम भावों रूपी उपवन व जलाशय को देखकर लखन सहित हर्षित हो उठे। क्योंकि प्राण रूपी उपवन के भावों में परम रम्यता होती है, जो आत्मा रूपी राम को भी आराम देने वाले होते हैं। जब भाव निर्मल हो जाते हैं, तो आत्मा को स्वत: आराम मिल जाता है। अत: यहाँ ब्रह्मरन्ध्र के निर्मल भावों के कारण आत्मा रूपी राम को सुख मिलने लगता है। चहुँ दिसि चितइ पूँछि मालीगन। लगे लेन दल फूल मुदित मन।। तेहि अवसर सीता तहँ आई। गिरिजा पूजन जननि पठाई।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में आत्मा रूपी राम प्राण के भावों रूपी उपवन में चारों तरफ को देखकर वृति रूपी माली से पूँछ कर प्रसन्न होकर निर्मल भाव रूपी फूलों को लेने लगे अर्थात् निर्मल भाव आत्मा रूपी राम की तरफ आने लगे। उस अवस्था में साधक को प्राण की शक्ति का भी आभास हो जाता है। उसी अनुभूति को प्राण शक्ति रूपी सीता का भाव रूपी उपवन में आना बताया गया है, जो श्रद्धा रूपी पार्वती की पूजा करने के लिए सुनयना रूपी माता ने भेजी थी। संग सखीं सब सुभग सयानीं। गावहिं गीत मनोहर बानी।। सर समीप गिरिजा गृह सोहा। बरनि न जाइ देखि मनु मोहा।। व्याख्या : प्राणशक्ति रूपी सीता के साथ बुद्धि, स्मृति, क्षमा आदि रूपी सखियाँ थी, जो मन को हर लेने वाली मधुर भाषा में गीत गा रहीं थी। अर्थात् प्राण शक्ति रूपी सीता के साथ सात्विक भाव रूपी सखियाँ सात्विकता को बढ़ा रहीं थी। भाव रूपी उपवन के नजदीक ही ब्रह्मरन्ध्र में श्रद्धा रूपी पार्वती का घर होता है अर्थात् ब्रह्मरन्ध्र स्थित प्राण के भाव रूपी उपवन के नजदीक ही श्रद्धा का भाव पैदा होता है। उस भाव अवस्था का वर्णन नहीं किया जा सकता है क्योंकि उसका स्मरण आते ही तो मन का हरण हो जाता है अर्थात् मन के सब भाव मुग्ध होकर शान्त हो जाते हैं। मज्जनु करि सर सखिन्ह समेता। गई मुदित मन गौरि निकेता।। पूजा कीन्हि अधिक अनुरागा। निज अनुरूप सुभग ब डिग्री मागा।। व्याख्या : तब प्राणशक्ति रूपी सीता क्षमा, स्मृति व बुद्धि आदि सखियों सहित सात्विक भावों के जल में स्नान करके प्रसन्न मन से श्रद्धा रूपी पार्वती के मन्दिर में गयीं। अर्थात् जब प्राण शक्ति व प्राण शक्ति के संग रहने वाली क्षमा, स्मृति व बुद्धि आदि के भाव निर्मल हो जाते हैं, तो स्वत: ही श्रद्धा भाव पैदा हो जाता है। उसे ही पार्वती के प्रतीक के रूप में लिखा गया है। तब प्राणशक्ति रूपी सीता के हृदय में अनुराग पैदा हो जाता है और प्राणशक्ति रूपी सीता अपने अनुरूप वर प्राप्त करने की इच्छा करने लगती है। एक सखी सिय संगु बिहाई। गई रही देखन फुलवाई।। तेहिं दोउ बंधु बिलोके जाई। प्रेम बिबस सीता पहिं आई।। व्याख्या : प्राणशक्ति रूपी सीता की एक दृष्टि रूपी सखी भाव रूपी फुलवारी देखती रह गयी, तो उसने आत्मा रूपी राम व लखन को देख लिया, जिससे उसके हृदय में प्रेम पैदा हो गया और वह प्रेम विवश होकर प्राणशक्ति रूपी सीता के पास आ गयी। दो0 तासु दसा देखी सखिन्ह पुलक गात जलु नैन। कहु कारनु निज हरष कर पूछहिं सब मृदु बैन।।228।। व्याख्या : दृष्टि रूपी सखी की पुलकित होने व आँखों में जल आने की दशा को देखकर सभी मधुर वाणी में उससे इसका कारण पूछने लगी। दृष्टि का ही दूसरा रूप निरति होता है और जब निरति आत्मा पर टिक जाती है तो स्वत: ही अंग-अंग में पुलकावलि छा जाती है। देखन बाग कुँवर दुइ आए। बय किसोर सब भाँति सुहाए।। स्याम गौर किमि कहौं बखानी। गिरा अनयन नयन बिनु बानी।। व्याख्या : तब निरति रूपी सखी कहने लगी कि भाव रूप उपवन को देखने के लिए दो आत्मा व लक्षण रूपी राजकुमार आए हैं, जिनकी किशोर अवस्था है तथा सब प्रकार से सुन्दर हैं। उनका श्याम व गौर वर्ण है, जिसका कैसे बखान किया जा सकता है क्योंकि जिसने देखा है अर्थात् निरति के तो वाणी नहीं होती है और वाणी के आँखें नहीं होती हैं। अत: कैसे वर्णन किया जा सकता है। सुनि हरषीं सब सखीं सयानी। सिय हियँ अति उत्कंठा जानी।। एक कहइ नृपसुत तेइ आली। सुने जे मुनि संग आए काली।। व्याख्या : ऐसी बात सुनकर प्राणशक्ति की क्षमा, मैत्री, दया, करूणा, बुद्धि व स्मृति आदि सखियाँ बहुत हर्षित हो उठी और प्राणशक्ति रूपी सीता के हृदय में भी उनको देखने की उत्कंठा पैदा हो गयी। उनमें से एक बुद्धि रूपी सखी बोली कि ये दस इन्द्रियों रूपी दशरथ के पुत्र हैं, जो कल समता रूपी विश्वामित्र के साथ आए हैं। अर्थात् पहले ध्यान की अवस्था में जो आत्मा रूपी राम समता रूपी भाव के साथ आए हैं। ये वही हैं। जिन्ह निज रूप मोहनी डारी। कीन्हे स्वबस नगर नर नारी।। बरनत छबि जहँ तहँ सब लोगू। अवसि देखिअहिं देखन जोगू।। व्याख्या : जिन आत्मा रूपी राम व लखन रूपी भावों ने ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर के सब नर-नारी रूपी भाव व इच्छाओं को मोहित कर लिया था तथा जिनकी सुन्दरता का भाव रूपी लोग जहाँ-तहाँ वर्णन कर रहे हैं। ये वही देखने योग्य हैं, अत: अवश्य ही इन्हें देखना चाहिये। तासु बचन अति सियहि सोहाने। दरस लागि लोचन अकुलाने।। चली अग्र करि प्रिय सखि सोई। प्रीति पुरातन लखइ न कोई।। व्याख्या : सात्विक बुद्धि रूपी सखी की बातें प्राणशक्ति रूपी सीता को बहुत प्रिय लगी तथा सुनकर आत्मारूपी राम के दर्शन हेतु नयन ललचाने लगे। अत: सात्विक बुद्धि रूपी सखी को आगे करके प्राणशक्ति रूपी सीता आत्मा रूपी राम को देखने चली। प्राणशक्ति का आत्मा से पुरानी प्रीत होती है, इस रहस्य को कोई सखी जान नहीं पा रही हैं। वास्तविकता में आत्मा से ही प्राण पैदा होकर प्राणशक्ति का रूप धारण करते हैं और प्राणशक्ति से आत्मा बलवती होती है। इनकी इस परस्पर प्रीत को अन्य भाव नहीं जान पाते हैं। दो0 सुमिरि सीय नारद बचन उपजी प्रीति पुनीत। चकित बिलोकति सकल दिसि जनु सिसु मृगी सभीत।।229।। व्याख्या : प्राण शक्ति रूपी सीता द्वारा मन के नारद रूपी भाव (नारद भाव परम वैराग्य, ज्ञान व भक्ति का मिश्रण होता है) के वचनों को याद करने से परमात्मा के प्रति पवित्र प्रेम पैदा हो गया। जब प्राणशक्ति में परमात्मा के प्रति प्रेम पैदा हो जाता है तो, ध्यान अवस्था में प्राणशक्ति रूपी सीता आश्चर्य चकित होकर हिरणी के बच्चे की तरह भयभीत सी होकर चारों तरफ को देखने लगती है। वास्तव में जब ध्यान में प्राणशक्ति उर्ध्वगामी होकर परमात्मा के प्रेम से स्थिर होने लग जाती है, तो उस क्षण साधक की चेतना भयभीत सी हो जाती है। भयभीत होने का कारण संसार की आसक्ति के भाव होते हैं। परन्तु धीरे-धीरे अभ्यास से भय की भावना दूर होती चली जाती है और परमात्मा के प्रति प्रेम प्रगाढ़ होता चला जाता है। कंकन किंकनि नूपुर धुनि सुनि। कहत लखन सन रामु हृदयँ गुनि।। मानहुँ मदन दुंदुभी दीन्ही। मनसा बिस्व बिजय कहँ कीन्ही।। व्याख्या : जब प्राणशक्ति रूपी सीता उर्ध्वगामी होने लगती हैं, तो ध्यान में कंकण, करधनी और पायजेब की सी ध्वनि की सी ध्वनि सुनाई पड़ने लग जाती है। तब आत्मा रूपी राम हृदय में विचारकर लखन रूपी भाव से कहते हैं कि ऐसा लग रहा है जैसे कामदेव अर्थात् सात्विक काम के भावों (अर्थात् ज्ञान, वैराग्य व भक्ति आदि के भाव) ने विश्व को जीतने के लिए अर्थात् माया के भावों से मुक्त होने के लिए डंके पर चोट मारी है। जब प्राणशक्ति में परमात्मा के प्रति निश्छल प्रेम पैदा हो जाता है तो आत्मा रूपी राम भी अनुरागित हो उठते हैं और प्राणशक्ति को अपनी ओर आकर्षित करने लगते हैं। अस कहि फिरि चितए तेहि ओरा। सिय मुख ससि भए नयन चकोरा।। भए बिलोचन चा डिग्री अचंचल। मनहुँ सकुचि निमि तजे दिगंचल।। व्याख्या : ऐसा कहकर आत्मारूपी राम ने उस ओर देखा जिधर से प्राणशक्ति रूपी सीता आ रही थी। तब चन्द्रमा की तरह शीतल प्राणशक्ति रूपी सीता को देखकर आत्मा रूपी राम की आँखें चकोर पक्षी की तरह हो गयी। सीता के मुख की उपमा चन्द्रमा से दी गयी है क्योंकि जब प्राणशक्ति निर्मल होकर उर्ध्वगामी हो जाती है, तो माया का ताप मिट जाता है और प्राणशक्ति चन्द्रमा की तरह शीतल हो जाती है इसलिए चन्द्रमा के साथ सीता रूपी प्राणशक्ति की तुलना की जाती है। आत्मा रूपी राम के नेत्र प्राणशक्ति रूपी सीता को देखकर स्थिर हो जाते हैं और उस अवस्था में मन भी सूक्ष्म हो जाता है क्योंकि भाव तो प्राणशक्ति की चंचलता से पैदा होते हैं और जब प्राणशक्ति स्थिर हो जाती है तो मन स्वत: ही सूक्ष्म होता चला जाता है और जब भाव नहीं उठते हैं, तो आँखों की पलके भी स्थिर हो जाती है। यह भाव विज्ञान है कि भावों की चंचलता से ही आँखों की पलके चलती हैं। अगर भाव नहीं होते हैं, तो पलकें भी स्थिर हो जाती हैं। पलकों के चलने से ही प्राण चंचल होते हैं इसलिए निमि (पलकों) को प्राण अर्थात् जनक के पिता माना गया है। यह बहुत गहरा भाव विज्ञान है, जिसे ध्यान साधना द्वारा गुरु कृपा से समझा जा सकता है। देखि सीय सोभा सुख पावा। हृदयँ सराहत बचनु न आवा।। जनु बिरंचि सब निज निपुनाई। बिरचि बिस्व कहँ प्रगटि देखाई।। व्याख्या : प्राणशक्ति की शोभा को देखकर आत्मा रूपी राम को बहुत सुख मिला। जिसे आत्मा रूपी राम केवल हृदय में सराहने लगे और कुछ बोल नहीं पा रहे थे। कुछ नहीं बोल पाना भी वैज्ञानिक सत्य है क्योंकि जब प्राण शक्ति स्थिर हो जाती है, तो कोई भाव ही पैदा नहीं होंगे और बिना भावों के तो वाणी निकल ही नहीं पाती है। उस समय स्पष्ट समझ में आ जाता है कि प्राणशक्ति से ही समस्त भावों की सृजना होती है। अत: यही अर्थात् प्राणशक्ति ही ब्रह्म की निपुणता का मूल रहस्य है। सुंदरता कहुँ सुंदर करई। छबिगृहँ दीपसिखा जनु बरई।। सब उमा कबि रहे जुठारी। केहिं पटतरौं बिदेहकुमारी।। व्याख्या : प्राणशक्ति ही भावों की सुंदरता को सुन्दर बनाती है और शरीर रूपी घर में यह प्राणशक्ति दीपक की लौ की तरह जलती हुई प्रकाश करती है। इसलिए सभी कवियों की उपमा झूठी हो जाती है क्योंकि प्राण रूपी विदेह जनक से उत्पन्न प्राणशक्ति का तो कोई आकार ही नहीं होता है। दो0 सिय सोभा हियँ बरनि प्रभु आपनि दसा बिचारि। बोले सुचि मन अनुज सन बचन समय अनुहारि।।230।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम अपनी दशा का विचार करके प्राणशक्ति रूपी सीता की शोभा का हृदय में वर्णन करने लगे और निर्मलतापूर्वक लखन रूपी भाव को समय के अनुसार प्राणशक्ति रूपी सीता के बारे में बताने लगे। यहां पर साधना का गहरा रहस्य छुपा हुआ है। जब प्राणशक्ति निर्मल होकर आत्मा रूपी राम के प्रति प्रेममय हो जाती है, तो उस समय भाव शान्त हो जाते हैं और भावों के शान्त होने पर लखन रूपी भाव प्राणशक्ति के लक्षणों को नहीं देख पाता है। इसलिए उस समय केवल आत्मा की अनुभूति ही सम्भव हो पाती है। उसी को यहाँ प्रतीकों के माध्यम से लिखा है। तात जनकतन्या यह सोई। धनुष जग्य जेहि कारन होई।। पूजन गौरि सखीं लै आई। करत प्रकासु फिरइ फुलवाई।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम बोलते हैं कि हे तात्! ये प्राण रूपी जनक से उत्पन्न प्राणशक्ति हैं, जिनके कारण ही धनुष यज्ञ हो रहा है। धनुष यज्ञ का कारण प्राणशक्ति रूपी सीता ही है क्योंकि प्राणशक्ति से ही माया के भाव पैदा होकर अज्ञान की शंका पैदा कर देते हैं और प्राण शक्ति से उत्पन्न निर्मल ज्ञान व वैराग्य के भाव ही अज्ञान की शंका का समाधान करते हैं। अत: प्राणशक्ति रूपी सीता ही धनुष यज्ञ का मूल कारण होती है। ये श्रद्धा रूपी पार्वती को पूजने के लिए क्षमा, धात्री, करूणा, मैत्री व बुद्धि आदि रूपी सखियों को लेकर आयी हैं और ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर के प्राण रूपी राजा के भाव रूपी उपवन में निर्मल भाव रूपी फूलवाड़ी को देख रही हैं तथा ज्ञान रूपी भाव पैदा करके प्रकाश कर रही हैं। जासु बिलोकि अलौकिक सोभा। सहज पुनीत मोर मनु छोभा।। सो सबु कारन जान बिधाता। फरकहिं सुभद अंग सुनु भ्राता।। व्याख्या : जिसकी अलौकिक शोभा को देखकर मेरे पवित्र मन में भी क्षोभ अर्थात् चंचलता आ रही है। उसका कारण तो विधि (क्रिया) को करने वाला विधाता ही जान पाता है अर्थात् साधक स्वयं ही अनुभव कर सकता है। परन्तु उस अवस्था में शुभकारी दाहिने अंग फड़कने लग जाते हैं। रघुबंसिन्ह करसहज सुभाऊ। मन कुपंथ पगु धरइ न काऊ।। मोहि अतिसय प्रतीति मन केरी। जेहिं सपनेहुँ परनारि न हेरी।। व्याख्या : आत्मरत साधक का यह सहज स्वभाव होता है कि उसका मन विषयों के पथ पर कभी नहीं चलता है। आत्मा रूपी राम कहते हैं कि मुझे मेरे मन पर पूर्ण विश्वास है क्योंकि मेरा मन सपने में भी पर नारी अर्थात् माया में नहीं फँसता है। जिन्ह कै लहहिं न रिपु रन पीठी। नहिं पावहिं परतिय मनु डीठी।। मंगन लहहिं न जिन्ह कै नाहीं। ते नरबर थोरे जग माहीं।। व्याख्या : जिनकी पीठ को भी कभी काम, क्रोध, मद व लोभादि शत्रु नहीं देख पाते हैं। उनका मन कभी भी माया की तरफ आकर्षित नहीं हो सकता है। जिनके अन्दर त्याग का भाव प्रबल रहता है अर्थात् माँगने वाला कोई भाव नहीं रहता है, ऐसे पुरुष संसार में बहुत थोड़े होते हैं। दो0 करत बतकही अनुज सन मन सिय रूप लोभान। मुख सरोज मकरंद छबि करि मधुप इव पान।।231।। व्याख्या : इस प्रकार लखन रूपी भाव से बातें करते हुए आत्मारूपी राम का मन प्राणशक्ति रूपी सीता के रूप पर आकर्षित होने लग गया और प्राणशक्ति के कमल रूपी मुख के मकरंद का मन रूपी भ्रमर पान करने लगा। चितवत चकित चहूँ दिसि सीता। कहँ गए नृप किसोर मनु चिंता।। जहँ बिलोक मृग सावक नैनी। जनु तहँ बरिस कमल सित श्रेनी।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में प्राणशक्ति रूपी सीता स्थिर होकर चित में समाने लगती हैं, तो प्राणशक्ति की चेतना आश्चर्य चकित होकर चारों तरफ देखने लगती है और चित स्वरूप अर्थात् आत्मा रूपी राम कहाँ गए की चिन्ता मन में सताने लगती है। शरीर स्थित नर की धड़कन ही नृप का प्रतीक होती है इसलिए आत्मा रूपी राम को नृप किशोर अर्थात् नर की धड़कन से उत्पन्न बताया गया है। यहाँ पाठकों को स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि जब नर की धड़कन स्थिर हो जाती है, तब वह चित की अवस्था होती है और चित ही परमात्मा कहलाता है। जब चितवत अवस्था में साधक प्रवेश कर जाता है, तब वह समष्टि के परमात्मा से मिल जाता है और समष्टि व व्यष्टि का मिलन हो जाता है। जहाँ पर प्राणशक्ति रूपी दृष्टि पड़ती हैं, वहाँ पर निर्मल भाव रूपी सफेद कमलों की कतार सी लग जाती है। लता ओट तब सखिन्ह लखाए। स्यामल गौर किसोर सुहाए।। देखि रूप लोचन ललचाने। हरषे जनु निज निधि पहिचाने।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम और प्राणशक्ति का जब मिलन हो जाता है, तो वह साधना की पूर्णता कहलाती है। इसलिए इनका मिलना सहज भी हो तो कठिन ही होता है। क्योंकि माया के भावों रूपी लताएँ इनके बीच में ओट बनकर रहती हैं। तब दया, करूणा, मैत्री व बुद्धि आदि रूपी सखियाँ ही प्राणशक्ति रूपी सीता को आत्मा रूपी राम को दिखाती हैं। तब आत्मा रूपी राम श्याम व लक्षण रूपी लक्ष्मण गौर वर्ण के आभासित होते हैं। आत्मा रूपी राम व लखन के रूप को देखकर प्राणशक्ति रूपी सीता के नेत्र दर्शन करने के लिए ललचाने लगते हैं और वे हर्षित हो उठते हैं, मानों अपना खजाना अर्थात् सहज परमपद को पा लिया हो। थके नयन रघुपति छबि देखें। पलकन्हिहूँ परिहरीं निमेषें ।। अधिक सनेहँ देह भै भोरी। सरद ससिहि जनु चितव चकोरी।। व्याख्या : प्राणशक्ति रूपी सीता के नेत्र आत्मा रूपी राम की छवि को देखकर स्थिर से हो गए और पलकों ने भी क्षण भर के लिए झपकना छोड़ दिया। आत्मा रूपी राम के प्रति अधिक प्रेम पैदा हो जाने से प्राणशक्ति रूपी सीता ने अपने शरीर की सुध-बुध खो दी और आत्मा रूपी राम को वैसे ही देखने लगी जैसे चकोरी शरद ऋतु के चन्द्रमा को देखती है। यह वैज्ञानिक सत्य है कि जब पलक झपकना बन्द हो जाती हैं, तो प्राणशक्ति स्थिर होकर चितवत होने लग जाती है। लोचन मग रामहि उर आनी। दीन्हे पलक कपाट सयानी।। जब सिय सखिन्ह प्रेम बस जानी। कहि न सकहिं कछु मन सकुचानी।। व्याख्या : ध्यान में जब प्राणशक्ति स्थिर हो जाती है, तो आत्मा रूपी राम के प्रति प्रेम पैदा हो जाता है और पलकें झपकना स्वत: बन्द हो जाती हैं क्योंकि आँखों में तो आत्मा रूपी राम की छवि समा जाती है। इसलिए प्राणशक्ति रूपी सीता नयन बन्द करके आत्मा रूपी राम को याद करने लगती हैं और पलकों को बन्द करके किवाड़ लगा लेती है ताकि संसार की माया दिखायी ही नहीं दे। प्राणशक्ति रूपी सीता को प्रेम के वश में देखकर दया, मैत्री, करूणा, क्षमा आदि सखियों ने संकोच के कारण प्राणशक्ति रूपी सीता से कुछ नहीं कहा क्योंकि मन में संकोच हो रहा था। मन में संकोच का कारण यही होता है कि उस समय प्राणशक्ति स्थिर हो जाने से भाव शान्त होना शु डिग्री हो जाते हैं और भावों का शान्त होना ही मन का संकोच अर्थात् सिमट जाना होता है। दो0 लता भवन तें प्रगट भे तेहि अवसर दोइ भाइ। निकसे जनु जुग बिमल बिधु जलद पटल बिलगाइ।।232।। व्याख्या : प्राणशक्ति रूपी सीता जब स्थिर हो जाती हैं, तो निश्छल प्रेम पैदा हो जाता है, जिससे माया के विकार मिट जाते हैं और माया के भावों की बेलें छट जाती हैं, जिससे आत्मा रूपी राम व लखन भाव स्वत: प्रकट हो जाते हैं। तब दोनों भाई आत्मा रूपी राम व लखन भाव माया रूपी बादलों के पर्दे को हटाकर युगल चन्द्रमा की तरह प्रकट हो जाते हैं। सोभा सीवँ सुभग दोउ बीरा। नील पीत जलजाय सरीरा।। मोरपंख सिर सोहत नीके। गुच्छ बीच बिच कुसुम कली के।। व्याख्या : दोनों भाई सुन्दरता की सीमा हैं और नीले व पीले कमल के समान उनके शरीर हैं और सिर पर मोर पंख शोभा पा रहे हैं तथा बालों में फूलों की कलियाँ लगी हुई हैं। आत्मा का वैसे तो कोई रंग नहीं होता है, इसलिए उसे श्याम व नीले रंग के प्रतीकों द्वारा बताया जाता है तथा आत्मा के लक्षण सदैव शुभकारी व सद्गुणों वाले होते हैं इसलिये गौर या पीत वर्ण के द्वारा लक्ष्मण की उपमा दी जाती है। भाल तिलक श्रमबिंदु सुहाए। श्रवन सुभग भूषन छबि छाए।। बिकट भृकुटि कच घूघरवारे। नव सरोज लोचन रतनारे।। व्याख्या : ध्यान की अवस्था में जब प्राणशक्ति रूपी सीता व आत्मा रूपी राम का मिलन होने वाला होता है, तो कपाल में ऐसा लगता है कि तीनों गुण (सत, रज व तम) एक हो गए हैं। तीनों गुणों का एक होना ही तिलक कहलाता है। तीनों गुण तब एक सूक्ष्म बिन्दु की चेतना में समा जाते हैं, जिससे कानों में अच्छी प्रकृति (सुअभग) अर्थात् निर्मल भाव ही सुनायी देते हैं और निर्मल भाव रूपी भूषणों की शोभा बढ़ जाती है। ध्यान की उस अवस्था में भृकुटि में बि अ कट उ बिकट अर्थात् विषयों के विकार मिट जाते हैं और बाल घुंघरालु अर्थात् सात्विक वृतियाँ दृढ़ हो जाती हैं। तब भाव रूपी कमल खिल उठता है और नेत्र सुदृश्य वाले हो जाते हैं। चा डिग्री चिबुक नासिका कपोला। हास बिलास लेत मनु मोला।। मुखछबि कहि न जाइ मोहिं पाहीं। जो बिलोकि बहु काम लजाहीं।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था के गुणों की चारों अवस्था अर्थात् सत, रज, तम व गुणातीत चि अ बुक उ चिबुक अर्थात् चित में समा जाती हैं और नासिका के सुष्मना स्वर से कपाल से होकर प्राण ब्रह्मरन्ध्र में पहुँच जाता है। उस समय साधक का मन मस्त होकर आनन्द में विलास करने लगता है। उस समय आत्मा रूपी राम की सुन्दरता का वर्णन नहीं किया जा सकता है, क्योंकि उस को देखकर तो बहुत सी काम इच्छाएँ लज्जित हो जाती हैं अर्थात् काम इच्छाएँ शान्त हो जाती हैं। उर मनि माल कंबु कल गीवा। काम कलभ कर भुज बलसींवा।। सुमन समेत बाम करदोना। सावरँ कुअँर सखी सुठि लोना।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम के हृदय पर मणियों की माला अर्थात् ज्ञान के प्रकाश के भावों की माला है और कण्ठ अर्थात् विशुद्धि चक्र से गर्दन शंख के समान सुन्दर है। जब ज्ञान रूपी मणि का प्रकाश छाती पर हो जाता है, तब विशुद्धि चक्र से निकलने वाली ध्वनि शंख की ध्वनि के समान कल्याणकारी हो जाती है। उसी को गर्दन का शंख के समान होना बताया गया है। उस अवस्था में काम भावना शान्त हो जाती है। अत: उसे काम कलभ की उपमा दी गयी है और सात्विक भावों का बल बढ़ जाता है। अर्थात् हाथी के समान विशालकाय दिखने वाला काम शान्त हो जाता है और सात्विक भावों रूपी भुजाएँ बलवान हो जाती हैं। उस अवस्था में शरीर के बाएँ अंगों में भी सु अ मन उ सुमन अर्थात् अच्छे मन के भाव पैदा होने लग जाते हैं। वैसे साधारणत: बाएँ अंगों में आसुरी भावों का निवास होता है परन्तु ध्यान में जब आत्मा व प्राणशक्ति का मिलन होने लगता है, तो बाएँ तरफ भी सु अ मन उ अच्छा मन की अवस्था छा जाती है। तब प्राणशक्ति रूपी सीता की दया, करूणा, मैत्री, क्षमा, बुद्धि आदि रूपी सखियों को आत्मा रूपी राम का श्याम वर्ण बहुत आकर्षक लगने लगता है। दो0 केहरि कटि पट पीत धर सुषमा सील निधान। देखि भानुकूल भूषनहि बिसरा सखिन्ह अपान।।233।। व्याख्या : माया के भावों का हरण करने वाले व सद्गुण रूपी पीले वस्त्रों को धारण किए हुए सुन्दरता व शीलता के कारण आत्मसूर्य रूपी राम को देखकर दया, क्षमा, करूणा, मैत्री आदि प्राणशक्ति रूपी सीता की सखियों के भाव अपान वायु से मुक्त होकर निर्मल हो गए अर्थात् दया, क्षमा, करूणा आदि के भावों का आभास भी धीरे-धीरे मिटने लग गया। धरि धीरजु एक आलि सयानी। सीता सन बोली गहि पानी।। बहुरि गौरि कर ध्यान करेहू। भूप किसोर देखि किन लेहू।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में बुद्धि रूपी सयानी सखी प्राणशक्ति रूपी सीता को बोली कि आप श्रद्धा रूपी पार्वती की पूजा तो बाद में कर लेना अर्थात् श्रद्धा के भावों का ध्यान तो बाद में कर लेना। अभी तो आत्मा रूपी राम व लखन रूपी लक्ष्मण को देख क्यों नहीं लेती हो? जब प्राणशक्ति और आत्मा का मिलन होने वाला होता है, तब बुद्धि का भाव हमेशा श्रद्धा से परे होकर आत्मा में लीन होने पर ही जोर देने लगता है ताकि अनुभव द्वारा आत्मा रूपी राम को समझा जा सके। सकुचि सीयँ तब नयन उघारे। सनमुख दोउ रघुसिंघ निहारे ।। नख सिख देखि राम कै सोभा। सुमिरि पिता पनु मनु अति छोभा।। व्याख्या : तब बुद्धि रूपी सखी की बातें सुनकर प्राणशक्ति रूपी सीता ने नयन खोले और सामने आत्मा रूपी राम व लखन रूपी लक्ष्मण को देखा। नख से शिख तक आत्मा रूपी राम की शोभा को देखकर प्राणशक्ति रूपी सीता के मन में प्राण रूपी विदेह जनक के प्रण को याद करके क्षोभ पैदा हो गया। यहाँ क्षोभ पैदा होने का गम्भीर रहस्य छुपा हुआ है क्योंकि प्राण से अज्ञान के भाव भी पैदा होते हैं और प्राण से ही ज्ञान के भाव भी पैदा होते हैं। सीता के मन में क्षोभ का कारण यह है कि जब तक प्राण निर्मल होकर अज्ञान रूपी भावों से मुक्त नहीं हो जाता, तब तक आत्मा रूपी राम से मिलन नहीं हो सकता है। अत: प्राणशक्ति रूपी सीता के मन में अज्ञान रूपी भावों के कारण क्षोभ पैदा हो जाता है। परबस सखिन्ह लखी जब सीता। भयउ गह डिग्री सब कहहिं सभीता।। पुनि आउब एहि बेरिआँ काली। अस कहि मन बिहसी एक आली।। व्याख्या : जब प्राणशक्ति रूपी सीता को परबस अर्थात् प्रेम प्रकृति के वश में देखा तो भयभीत होकर कहने लगी कि बहुत देर हो गयी है। वास्तविकता में ध्यान की अवस्था में यही होता है कि जब परमात्मा में ध्यान दृढ़ होने लगता है, तो प्रकृति के भाव प्राणशक्ति को भयभीत सा कर देते हैं कि बहुत देर हो गयी है। उसी अनुभूति को बहुत ही सूक्ष्मता से यहाँ लिखा गया है। तब लग्न रूपी सखी कहने लगती है कि कल फिर इसी समय आयेंगी और ऐसा कहकर हँसने लगती है। गूढ़ गिरा सुनि सिय सकुचानी। भयउ बिलंबु मातु भय मानी।। धरि बड़ि धीर रामु उर आने। फिरी अपनपउ पितु बस जाने।। व्याख्या : प्राणशक्ति रूपी सीता अपनी लग्न रूपी सखी की रहस्यमय बातें सुनकर सकुचा गयी और देर हुई जानकर प्रकृति रूपी सुनयना माता का भय करने लगी। प्रकृति के अनन्त रूप होते हैं और प्रकृति ही भय पैदा करने वाली होती है। तब हृदय में धैर्य धारण करके प्राणशक्ति रूपी सीता आत्मा रूपी राम को हृदय में याद करती हुई अपने आपको प्राणरूपी पिता के वश में जानकर चली। प्राणशक्ति से चेतना बनती है और चेतना से ही सुरता बनती है। अत: सुरता ही सीता होती है। अब सुरता रूपी सीता ध्यान से बाहर आने लगती है। उसी को नाना प्रतीकों के माध्यम से लिखा गया है। दो0 देखन मिस मृग बिहग त डिग्री फिरइ बहोरि बहोरि। निरखि निरखि रघुबीर छबि बाढ़इ प्रीति न थोरि।।234।। व्याख्या : जब ध्यान से सुरता रूपी सीता बाहर आने लगती है, तो बार-बार ध्यान में सुरता जाने लगती है। अत: उसी अनुभूति को यहाँ लिखा गया है कि सुरता रूपी सीता भाव इच्छा रूपी मृग, पक्षी व पेड़ों को देखने के बहाने बार-बार आत्मा रूपी राम को देखती हैं। उस समय आत्मा रूपी राम को देखने से प्रेम बढ़ने लगता है। जानि कठिन सिव चाप बिसूरति। चली राखि उर स्यामल मूरति।। प्रभु जब जात जानकी जानी। सुख सनेह सोभा गुन खानी।। व्याख्या : अज्ञान रूपी धनुष जो बहुत कठिन होता है को भुलाती हुई व हृदय में आत्मा रूपी राम का स्मरण करती हुई सूरता रूपी सीता चली। जब सुरता परमात्मा में लग जाती है और प्रेम पैदा हो जाता है तो फिर सुरता में ज्ञान-अज्ञान के भावों का चिन्तन ही नहीं रहता है क्योंकि सुरता तो परमात्मा के प्रेम में डूबने लगती है। अत: उस समय शिव चाप अर्थात अज्ञान रूपी धनुष की याद ही नहीं रहती है। उसे ही बिसूरति बोलकर लिखा है। उस ध्यान अवस्था में जब आत्मा रूपी राम भी सुरता रूपी सीता को वापिस प्रकृति रूपी माता के पास जो सुख, स्नेह, शोभा व गुणों की खान हैं, को जाते देखते हैं। परम प्रेममय मृदु मसि कीन्ही। चा डिग्री चित भीतीं लिखि लीन्ही।। गई भवानी भवन बहोरी। बंदि चरन बोली कर जोरी।। व्याख्या : तो आत्मा रूपी राम ने प्रेम की मधुर स्याही बनाकर चित की चारों अवस्था रूपी दीवार पर अच्छी तरह चित्रित कर लिया। तब सुरता रूपी सीता श्रद्धा रूपी पार्वती के मन्दिर में गयीं और चरण पकड़कर बोली अर्थात् श्रद्धा के भावों में पूरी तरह डूबने लगी। जय जय गिरबर राज किसोरी। जय महेश मुख चंद चकोरी।। जय गजबदन षड़ानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता।। व्याख्या : जब सुरता रूपी सीता श्रद्धा के भावों में डूबने लगती हैं, तो स्वत: ही स्तुति के भाव हिलोरें लेने लगते हैं। उसी अनुभूति को यहाँ लिखा गया है। सुरता रूपी सीता श्रद्धा रूपी पार्वती की स्तुति करती हुई कहती हैं कि हे गिरिवर अर्थात् नर की धड़कन से उत्पन्न निर्मल रूप माँ श्रद्दा रूपी पार्वती आपकी जय हो, जय हो। हे महाऐश्वर्य के मुख रूपी चन्द्रमा की चकोरी! आपकी जय हो। हे गुणों रूपी गणेश की माता! आपकी जय हो। काम-क्रोध, मत्सर, मद, लोभ व मोह रूपी विकारों को मिटाने वाले षड़ानन रूपी भाव की माता! आपकी जय हो। आप संसार की माता हैं। श्रद्धा ही जगत जननी होती है क्योंकि जैसी श्रद्धा होती है, वैसा ही संसार दिखायी देती है। आप बिजली के समान चमकने वाली हैं। नहिं तव आदि मध्य अवसाना। अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना।। भव-भव बिभव पराभव कारिनि। बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि।। व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी माता! आपका न आरम्भ, मध्य व अन्त है। आपके प्रभाव को ते वेद भी नहीं जान पाए हैं। आप भावों से भाव पैदा करने वाली और फिर भावों से मुक्त कराने वाली व प्रकृति से पार कराने वाली हैं। आपसे समस्त संसार मोहित हो रहा है और आप सदैव स्ववश होकर विचरण करती हो। दो0 पतिदेवता सुतीय महुँ मातु प्रथम तव रेख। महिमा अमित न सकहिं कहि सहस सारदा सेष।।235।। व्याख्या : श्रद्धा रूपी भवानी के भाव की सब भावों में प्रधानता होती है क्योंकि प्रत्येक भाव श्रद्धा पर ही निर्भर करता है। इसलिए तीन गुणों से उत्पन्न प्रदान भावों में भी श्रद्धा का भाव ही प्रधान होता है। श्रद्धा के भाव की महिमा अपरम्पार होती है, जिसका वर्णन हजारों शारदा और शेष भी नहीं कर सकते हैं। सेवत तोहि सुलभ फल चारी। बरदायनी पुरारि पिआरी।। देबि पूजि पद कमल तुम्हारे। सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे।। व्याख्या : सुरता रूपी सीता कहती हैं कि हे श्रद्धा रूपी पार्वती! आपकी सेवा करने पर अर्थात् हृदय में श्रद्धा का भाव आ जाने पर धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष के चारों फल प्राप्त हो जाते हैं। श्रद्धा का भाव वर देना वाला होता है तथा विश्वास रूपी शिव को अति प्रिय होता है। इसलिए हे श्रद्धा रूपी देवी! आपके चरण कमलों की पूजा करने पर मन के सात्विक भाव व नर की धड़कन सुखी हो जाते हैं अर्थात् सहज हो जाते हैं। मोर मनोरथ जानहु नीकें। बसहु सदा उर पुर सबही कें।। कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं। अस कहि चरन गहे बैदेहीं।। व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी माता! आप मेरे मन की इच्छा को तो अच्छी तरह जानती हैं क्योंकि आप तो सबके हृदय में निवास करती हैं। इसलिए सुरता रूपी सीता ने अपने मन की बात को प्रकट नहीं किया और श्रद्धा रूपी भाव के चरणों में गिर पड़ी अर्थात् पूर्ण रूप से समर्पण कर दिया। जब परमात्मा के प्रति पूर्ण श्रद्धा हो जाती है तो मन की इच्छा को प्रकट करने की आवश्यकता नहीं होती है। उस अवस्था में तो सहज में ही सब इच्छाएँ पूर्ण होती रहती हैं। बिनय प्रेम बस भई भवानी। खसी माल मूरति मुसुकानी।। सादर सियँ प्रसादु सिर धरेऊ। बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ।। व्याख्या : सुरता रूपी सीता के हृदय में जब श्रद्धा भाव के प्रति प्रेम पैदा हो जाता है तो श्रद्धा का भाव प्रेम के वश में हो जाता है और तब श्र्दधा का भाव अन्त:स्थल में मनोवांचित फल देन के लिए बाध्य हो जाता है। उस अवस्था में सुरता रूपी सीता को भी विश्वास हो जाता है। अत: उसे ही आदर पूर्वक प्रसाद के रूप में सिर पर धरना कहा गया है। तब श्रद्धा का भाव अन्त:करण में ही प्रेरणा के रूप में बोलने लगता है। उसी को ""बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ"" कहा गया है। क्योंकि उस समय हर्ष से हृदय स्वत: ही भर जाता है। सुनु सिय सत्य असीस हमारी। पूजिहि मन कामना तुम्हारी।। नारद बचन सदा सुचि साचा। सो ब डिग्री मिलिहि जाहिं मनु राचा।। व्याख्या : तब श्रद्धा रूपी पार्वती बोल उठती हैं कि हे सुरता रूपी सीता मेरी सत्य अशीष सुनो, तुम्हारी मन की कामना पूर्ण होगी। मन के नारद रूपी भाव के वचन सदैव सत्य होते हैं। अत: तुम्हें तुम्हारी मन पसंद का वर मिलेगा। छ0 मनु जाहिं राचेउ मिलिह सो ब डिग्री सहज सुंदर साँवरो। करूना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो।। एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली। तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली।। व्याख्या : श्रद्धा रूपी पार्वती कहती हैं के हे सुरता रूपी सीता! तुम्हारा मन जिस आत्मा रूपी राम में अनुरक्त हो रहा है, वही तुम्हें सुंदर व श्यामल स्वरूप वर प्राप्त होगा। वह आत्मा रूपी राम करूणा के धाम, सब कुछ जानने वाले, शील व स्नेह को जानने वाला है। इस प्रकार श्रद्धा रूपी भवानी के आशीर्वाद को सुनकर सुरता रूपी सीता सहित सभी करूणा, मैत्री, दया व बुद्धि आदि रूपी सहेलियाँ बहुत हर्षित हुई और श्रद्धा रूपी पार्वती की पूजा करके प्रसन्नचित होकर सुरता रूपी सीता मन्दिर अर्थात् मन अ अन्दर उ मन के अन्दर चली गयी। सो0 जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि। मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे ।।236।। व्याख्या : सुरता रूपी सीता श्रद्धा रूपी पार्वती को अपने अनुकूल जानकर बहुत हर्षित हुई, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। जब श्रद्धा का भाव अनुकूल हो जाता है, तब बाएँ अंग फड़कने लग जाते हैं, जो सुख व मंगल के मूल होते हैं। हृदयँ सराहत सीय लोनाई। गुर सपीप गवने दोउ भाई।। राम कहा सबु कौसिक पाहीं। सरल सुभाउ छुअत छल नाहीं।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम और लखन के भाव हृदय में सुरता रूपी सीता की सुन्दरता को सराहते हुए समता रूपी गुरु विश्वामित्र के पास गए और आत्मा रूपी राम ने सुरता रूपी सीता के बारे में सब कुछ बता दिया क्योंकि आत्मा रूपी राम का तो सरल स्वभाव होता है और छल तो छू भी नहीं पाता है। सुमन पाइ मुनि पूजा कीन्ही। पुनि असीस दुहु भाइन्ह दीन्ही।। सुफल मनोरथ होहुँ तुम्हारे। रामु लखनु सुनि भए सुखारे।। व्याख्या : सुमन उ सु अ मन अर्थात् निर्मल भावों से समता रूपी गुरु की पूजा की तो समता रूपी गुरु ने दोनों भाइयों (आत्मा रूपी राम व लखन) को आशीर्वाद दिया की तुम्हारी मन की इच्छाएँ पूर्ण हों। यह आशीर्वाद सुनकर राम व लखन दोनों बहुत प्रसन्न हुए। करि भोजनु मुनिबर बिग्यानी। लगे कहन कछु कथा पुरानी।। बिगत दिवसु गुरु आयसु पाई। संध्या करन चले दोउ भाई।। व्याख्या : समता रूपी विश्वामित्र ने निर्मल भाव रूपी भोजन करके कुछ पुरानी कथाएँ अर्थात् निज अनुभूति की बातें कहने लगे। तब ऐसी बातें करते हुए दिन बीत गया अर्थात् ध्यान की अवस्था से बाहर आ गाए, तो दोनों भाई आत्मा रूपी राम व लखन संध्या करने को चले। वास्तविकता में साधक का ध्यान बार-बार लगने लगता है और बार-बार बाहर आने लगता है। अत: उसी अनुभूति को नाना प्रतीकों के माध्यम से बताया गया है। प्राची दिसि ससि उयउ सुहावा। सिय मुख सरिस देखि सुखु पावा।। बहुरि बिचार कीन्ह मन माहीं। सीय बदन सम हिमकर नाहीं।। व्याख्या : ध्यान उतरने पर भी परमशान्ति का अनुभव होता रहता है। उसी को पूर्व दिशा में चन्द्रमा का उदित होना बताया गया है। जिसे देखकर अर्थात् विषयों के शान्त होने की अवस्था देखकर आत्मा रूपी राम को बहुत सुख मिला। परन्तु मन में बहुत विचार किया कि यह शीतलता फिर भी सुरता रूपी सीता के मुख के समान नहीं है। दो0 जनमु सिंधु पुनि बंधु बिषु दिन मलीन सकलंक। सिय मुख समता पाव किमि चंदु बापुरो रंक।।237।। व्याख्या : फिर आत्मा रूपी राम विचार करते हैं कि बेचारा चन्द्रमा तो विषयों रूपी समुद्र से उत्पन्न हैं अर्थात् विषयों के शान्त होने की अवस्था तो भाव रूपी समुद्र से उत्पन्न हुई है और विषय रूपी विकार बढ़ने पर यह चन्द्रमा रूपी सीता पुन: मलीन हो जाती है तथा विषयों के विकार रूपी जहर का संग भी बना रहता है। अत: यह चन्द्रमा रूपी शीतलता सुरता रूपी सीता के समान कैसे हो सकती है। क्योंकि जब सुरता परमात्मा में लगती है, तो पूर्ण शीतलता का अनुभव होता है। घटइ बढ़इ बिरहिनि दुखदाई। ग्रसइ राहु निज संधिहिं पाई।। कोक सोकप्रद पंकज द्रोही। अवगुण बहुत चन्द्रमा तोही।। व्याख्या : विषयों रूपी शीतलता तो घटती-बढ़ती रहती है अर्थात् कभी विषय शान्त हो जाते हैं, तो कभी पुन: जागृत हो उठते हैं। अत: चन्द्रमा रूपी शीतलता तो घटती-बढ़ती रहती है, जो आत्मा रूपी विरहणि को दु:ख देने वाला होता है। समय-समय पर अर्थात् विषयों का मेल (सन्धि) होने पर इसे आसक्ति रूपी राहू भी ग्रस लेता है अर्थात् विषयों की आसक्ति से भी मन की शीतला मिट जाती है। यह चन्द्रमा रूपी शीतलता तो चकोर रूपी विषयों को दु:ख देने वाला और ज्ञान रूपी कमल को मुर्झाने वाली होती है। इस प्रकार चन्द्रमा रूपी शीतला में तो बहुत से दोष होते हैं। बैदेही मुख पटतर दीन्हे । होइ दोषु बड़ अनुचित कीन्हे।। सिय मुख छबि बिधु ब्याज बखानी। गुर पहिं चले निसा बड़ि जानी।। व्याख्या : अत: आत्मा रूपी राम विचार करते हैं कि सुरता रूपी सीता के मुख से चन्द्रमा रूपी शीतलता की उपमा देना दोषपूर्ण होगा क्योंकि सुरता रूपी सीता की सुन्दरता अर्थात् विषयों को शीतल कराने की क्षमता के सामने चन्द्रमा की शीतलता ब्याज के समान भी नहीं होती है। ऐसा विचार करते हुए और विषय रूपी रात्रि बढ़ती देखकर आत्मा रूपी राम समता रूपी गुरु के पास गए। करि मुनि चरन सरोज प्रनामा। आयसु पाइ कीन्ह बिश्रामा।। बिगत निसा रघुनायक जागे। बंधु बिलोकि कहन अस लागे।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम व लखन समता रूपी विश्वामित्र के चरण कमलों में प्रणाम करके और आज्ञा लेकर विश्राम करने लगे। जब विषय रूपी रात्रि चली गयी तो आत्मा रूपी राम जागे और लखन रूपी लक्ष्मण भाई से कहने लगे। उयउ अरून अवलोकहु ताता। पंकज कोक लोक सुखदाता।। बोले लखनु जोरि जुग पानी। प्रभु प्रभाउ सूचक मृदु बानी।। व्याख्या : हे लक्षणों को जानने वाले लक्ष्मण! देखो ज्ञान रूपी कमल, भक्ति रूपी चक्रवाक व त्याग-वैराग्य रूपी भावों को सुख देने वाला अरूणोदय हुआ है। तब लखन रूपी लक्ष्मण दोनो हाथ जोड़करबोला कि ये सब आप अर्थात् आत्मा रूपी राम के उदित होने का प्रभाव है अर्थात् आत्मा में आत्मा का रमण होने पर यह अवस्था आती है। दो0 अरूनोदयँ सकुचे कुमुद उडगन जोति मलीन। जिमि तुम्हार आगमन सुनि भए नृपति बलहीन।।238।। व्याख्या : ज्ञान रूपी प्रात:काल के सूर्य का उदय हो जाने पर विषय रूपी कुमुदिनि व भोग रूपी तारों की ज्योति मलीन पड़ गयी है। जिससे आपका आगमन सुनकर अर्थात् आत्मा रूपी राम का उदय सुनकर नर की धड़कन से उठने वाले आसुरी भाव बलहीन हो जाते हैं। यहाँ साधना का गम्भीर रहस्य छुपा हुआ है। जब आत्मा का आत्मा में रमण होना शु डिग्री हो जाता है, तो प्राणशक्ति स्थिर होकर चित में समाने लगती है, जिससे चित की धड़कन अर्थात् नर-नारी की धड़कन शान्त होने लग जाती है और आसुरी भावों की उत्पत्ति भी रूक जाती है। उसी अनुभूति को यहाँ प्रतीकों के माध्यम से लिखा गया है। नृप सब नखत कहिं उजिआरी। टारि न सकहिं चाप तम भारी।। कमल कोक मधुकर खग नाना। हरषे सकल निसा अवसाना।। व्याख्या : नृप अर्थात् नर की धड़कन से निकलने वाले भाव रूपी तारे तो केवल थोड़ा सा प्रकाश करते हैं, इसलिए अज्ञान रूपी धनुष को हिला भी नहीं सकते हैं। जैसे अज्ञान रूपी रात्रि को गया हुआ देख कर ज्ञान रूपी कमल, भक्ति रूपी चक्रवाक व लग्न रूपी भ्रमर हर्षित हो रहे हैं। ऐसेहिं प्रभु सब भगत तुम्हारे। होइहहिं टूटें धनुष सुखारे।। उयउ भानु बिनु श्रम तम नासा। दूरे नखत जग तेजु प्रकासा।। व्याख्या : वैसे ही प्रभु! आपके भक्त सुखी होंगे जब आप अज्ञान रूपी धनुप को तोड़ेंगे। तब अन्धकार का ज्ञान रूपी सूर्य के उदय हो जाने पर बिना परिश्रम के ही नाश हो जायेगा और भोग रूपी तारे छुप जायेंगे तथा ज्ञान के प्रकाश से समस्त संसार प्रकाशित हो जायेगा। रबि निज उदय ब्याज रघुराया। प्रभु प्रतापु सब नृपन्ह दिखाया।। तव भुज बल महिमा उदघाटी। प्रगटी धनु बिघटन परिपाटी।। व्याख्या : ज्ञान रूपी सूर्य का उदय होने पर आपका अर्थात् आत्मा रूपी राम के प्रभाव को सभी भाव रूपी राजा देख पाते हैं। उस अवस्था में आत्मा रूपी सूर्य के भाव रूपी भुजाओं के बल का प्रकटीकरण हो जाता है, जिससे अज्ञान रूपी धनुष टूट जाता है। बंधु बचन सुनि प्रभु मुसुकाने। होइ सुचि सहज पुनीत नहाने।। नित्यक्रिया करि गुरु पहिं आए। चरन सरोज सुभग सिर नाए।। व्याख्या : लखन रूपी लक्ष्मण के वचनों को सुनकर आत्मा रूपी राम मुस्कुराने लगे अर्थात् आत्म बल में दृढ़ता बढ़ने लग गयी। फिर निर्मल होकर आत्मा रूपी राम पवित्रता रूपी स्नान करके समता रूपी गुरु के पास आए और गुरु के चरण कमलों में सीस नवाए। सतानंदु तब जनक बोलाए। कोसिक मुनि पहिं तुरत पठाए।। जनक बिनय तिन्ह आइ सुनाई। हरषे बोलि लिए दोउ भाई।। व्याख्या : जब आत्मा रूपी राम निर्मलता रूपी जल में पवित्र स्नान करके गुरु रूपी समता भाव के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित हो जाते हैं, तो प्राण रूपी जनक सतानंदु अर्थात् सत्य के आनन्द रूपी भाव को कोशिकाओं से उत्पन्न समता रूपी विश्वामित्र के पास भेजते हैं। तब सत्य के आनन्द का भाव (सतानंद) प्राण रूपी जनक की विनती को समता रूपी भाव को आकर सुनाते हैं, जिससे कोशिकाओं से उत्पन्न समता रूपी विश्वामित्र हर्षित हो जाते हैं और आत्मा रूपी राम व लक्ष्मण रूपी भाव को अपने पास बुला लेते हैं। जब आत्मा रूपी राम समता रूपी गुरु के चरणों में समर्पित हो जाते हैं, तो विषय विकार स्वत: मिट जाते हैं। और विषय विकार मिट जाना ही सत्य के आनन्द अर्थात् सतानंद की अवस्था होती है। दो0 सतानंद पद बंदि प्रभु बैठे गुर पहिं जाइ। चलहु तात मुनि कहेउ तब पठवा जनक बोलाइ।।239।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम सत्य के आनन्द रूपी सतानंद के चरणों की वंदना करके समता रूपी गुरु के पास जाकर बैठ गए। तब समता रूपी विश्वामित्र मुनि ने कहा कि हे तात! चलिए प्राण रूपी विदेह जनक ने बुलावा भेजा है। अर्थात् समता रूपी गुरु की प्रेरणा से अब दोबारा सभी भाव ध्यान में ब्रह्मरन्ध्र रूपी विदेह नगर में जाने लगते हैं। पहले आत्मा रूपी राम और लखन भाव ही ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर में गए थे, परन्तु इस बार सभी भाव ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर में जाने लगते हैं। ध्यान के नित्य अभ्यास से भावों की यह सूक्ष्मता स्पष्ट रूप से समझ में आने लग जाती है। ।। मासपरायण, आठवाँ विश्राम।। ।। नवाह्न परायण, दूसरा विश्राम।। सीय स्वयंब डिग्री देखिअ जाई। ईसु काहि धौं देइ बढ़ाई।। लखन कहा जस भाजनु सोई। नाथ कृपा तव जापर होई।। व्याख्या : समता रूपी विश्वामित्र ने कहा कि चलिए चलकर सुरता रूपी सीता के स्वयंवर को देखते हैं। चलो देखते हैं, ईश्वर किसको बड़ाई देते हैं। तब लखन रूपी लक्ष्मण ने कहा कि हे नाथ! जिस पर आपकी कृपा होगी वही श्रेय को प्राप्त करेगा। हरषे मुनि सब सुनि बर बानी। दीन्हि असीस सबहिं सुखु मानी।। पुनि मुनिबृंद समेत कृपाला। देखन चले धनुषमख साला।। व्याख्या : ऐसी पवित्र वाणी को सुनकर मन के सभी भाव बहुत हर्षित हो उठे और सब सुख मान कर आशीर्वाद देने लगे अर्थात् सभी भावों में आत्मकल्याण की भावना जाग गयी। तब उस अवस्था में आत्मा रूपी राम भाव सभी मन के भावों के साथ ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर में अज्ञान रूपी धनुष के यज्ञ को देखने के लिए चले। रंग भूमि आए दोउ भाई। असि सुधि सब पुरबासिन्ह पाई।। चले सकल काज बिसारी। बाल जुबान जरठ नर नारी।। व्याख्या : मन के सभी भाव जब आत्म कल्याण की भावना से भर जाते हैं, तो आत्मा रूपी राम व लखन के साथ ध्यान में ब्रह्मरन्ध्र में पहुँच जाते हैं। जब ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर में रहने वाले भावों को यह मालूम चलता है कि आत्मा रूपी राम और लखन रूपी लक्ष्मण रंग भूमि अर्थात् ब्रह्मरन्ध्र में भाव उत्पन्न होने के स्थान पर आए हैं, तो सभी भाव अपना-अपना कार्य छोड़कर अर्थात् सभी भाव आत्मा की तरफ आकर्षित हो गए, चाहे वे बाल भाव, युवा भाव या जड़ भाव ही क्यों न हो, क्योंकि सब नर नारियों से उत्पन्न भाव ध्यान की उस अवस्था में आत्मा रूपी राम की तरफ आकर्षित हो जाते हैं। देखी जनक भीर भै भारी। सुचि सेवक सब लिए हँकारी।। तुरत सकल लोगन्ह पहि जाहू। आसन उचित देहु सब काहू।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में जब प्राण रूपी जनक ने देखा कि बहुत से भावों की भीड़ लग गयी है, तब जनक रूपी राजा ने वृति रूपी सेवकों को बुला लिया और सभी भावों को उनकी वृति के अनुसार स्थान देने को कहा। वास्तविकता में यह होता कि जब ब्रह्मरन्ध्र में ध्यान चढ़ने लगता है, तो सभी भाव भी वहाँ पहुँच जाते हैं और अपनी-अपनी वृत्ति के कोषों में जाकर बैठ जाते हैं। उसी को यहाँ प्रतीकों के माध्यम से लिखा है। दो0 कहि मृदु बचन बिनीत तिन्ह बैठारे नर नारि। उत्तम मध्यम नीच लघु निज निज थल अनुहारि।। 240।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में वृति रूपी मधुर वाणी से नर-मादा वृति के भाव उत्तम, मध्यम व नीच वृति के अनुसार अपने-अपने स्थानों पर बैठ जाते हैं अर्थात् भाव अपनी वृति के अनुसार ब्रह्मरन्ध्र के कोषों में शान्त होकर बैठने लग जाते हैं। राजकुँअर तेहि अवसर आए। मनहुँ मनोहरता तन छाए।। गुन सागर नागर बर बीरा। सुंदर स्यामल गौर सरीरा।। व्याख्या : जब सारे भाव ब्रह्मरन्ध्र में पहुँचकर शान्त होने लग जाते हैं, तब आत्मा रूपी राम व लखन रूपी लक्ष्मण आते हैं। उनके आने पर ऐसा लगता है जैसे पूरे शरीर में ही मनोहरता छा गयी हो अर्थात् समस्त शरीर के मन के भाव ही शान्त हो जाते हैं। आत्मा रूपी राम व लखन दोनों गुणों के सागर चतुर व वीर हैं तथा उनका आभास सुन्दर, श्यामल व गौर वर्ण के रूप में होता है। राज समाज बिराजत रूरे। उडगन महुँ जनु जुग बिधु पूरे।। जिन्ह कें रही भावना जैसी। प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी।। व्याख्या : सभी भाव रूपी समाज में आत्मा रूपी राम वैसी ही शोभा पाते हैं, जैसे तारा गणों के समूह के बीच में पूर्ण चन्द्रमा शोभा पाता है। जिस भाव की जैसी भावना होती है, वो आत्मा रूपी राम को उसी रूप में देखता है। आत्म तत्व की यही विशेषता होती है कि वो भावों के अनुरूप दिखायी पड़ने लगता है। देखहिं रूप महा रनधीरा। मनहुँ बीर रसु धरें सरीरा।। डरे कुटिल नृप प्रभुहि निहारी। मनहुँ भयानक मूरति भारी।। व्याख्या : जो महा योद्धा रूपी भाव होते हैं, वे आत्मा रूपी राम को वीर रस के शरीर धारण करने के समान देखते हैं और जो कुटिल वृति के भाव होते हैं, वे आत्मा रूपी राम को देखकर भयभीत हो जाते हैं। रहे असुर छल छोनिप बेषा। तिन्ह प्रभु प्रगट काल सम देखा।। पुरबासिन्ह देखे दोउ भाई। नर भूषन लोचन सुखदाई।। व्याख्या : जो आसुरी भाव छल करके राजसिक व सात्विक होने का भेष बनाकर बैठे थे, उनके लिए तो आत्मा रूपी राम काल के समान दिखायी देते हैं। क्योंकि आत्म तत्व तो सहज निर्मल होता है और सहज प्रकाशक भी होता है। अत: आत्मा के सामने छल, छिद्र व कपट के भाव टिक ही नहीं पाते हैं। इसलिए ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर में रहने वाले भावों ने जब आत्मा रूपी राम व लखन रूपी लक्ष्मण को देखा, तो सभी भावों को सुख की अनुभूति हुई। क्योंकि आत्मा नर रूपी धड़कन की शोभा होती है। दो0 नारि बिलोकहिं हरषि हियँ निज निज रूचि अनुरूप। जनु सोहत सिंगार धरि मूरति परम अनूप।।241।। व्याख्या : ध्यान की गहन अवस्था में माया के भाव भी अपनी-अपनी रूचि के अनुसार हर्षित होने लगते हैं। माया के भाव भी आत्मा रूपी राम पर मोहित हो जाते हैं और उनको आत्मा रूपी राम परम अनुपम लगने लगते हैं। बिदुषन्ह प्रभु बिराटमय दीसा। बहु मुख कर पग लोचन सीसा।। जनक जाति अवलोकहिं कैसें। सजन सगे प्रिय लागहिं जैसे।। व्याख्या : जो ज्ञान के भाव होते हैं, उन्हें आत्मा रूपी भाव विराटमय दिखायी देते हैं और उनके बहुत से मुँह, हाथ, पैर, नेत्र व सिर दिखाई देते हैं। प्राण रूपी जनक जाति के भावों को आत्मा रूपी राम बहुत प्रिय लगते हैं, जैसे सगे-सम्बन्धी हों। सहित बिदेह बिलोकहिं रानी। सिसु सम प्रीति न जाति बखानी।। जोगिन्ह परम तत्वमय भासा। सांत सुद्ध सम सहज प्रकासा।। व्याख्या : प्राण रूपी जनक सहित सुनयना अर्थात् सुदृष्टि रूपी रानी आत्मा रूपी राम को देखती हैं, तो पुत्रवत प्रेम पैदा हो जाता है, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। जबकि योगियों रूपी भावों को आत्मा रूपी राम परम तत्व के रूप में आभासित होते हैं, जो परम शान्त, सम व सहज में ही ज्ञान का प्रकाश करने वाले होते हैं। वास्तविकता यह है कि ध्यान में साधक को आत्म तत्व नाना प्रकार से समझ में आने लगता है। जैसे भावों का प्रभाव होता है, साधक को वैसे ही आत्मा की अनुभूति होने लगती है। नाना साधना पंथों की उत्पत्ति का कारण भी यही है। हरि भगतन्ह देखे दोउ भ्राता। इष्टदेव इव सब सुख दाता।। रामहि चितव भायँ जेहि सीया। सो सनेहु सुखु नहिं कथनीया।। व्याख्या : जो भाव माया के हरण होने के कारण भयमुक्त हो गए हैं, उनको आत्मारूपी राम व लखन रूपी लक्ष्मण अपने इष्टदेव के रूप में दिखायी पड़ते हैं, जो सब सुखों को देने वाले हैं। सुरता रूपी सीता जिस भाव से आत्मा रूपी राम को देखती हैं, उस परम स्नेह के सुख का वर्णन नहीं किया जा सकता है। उर अनुभवति न कहि सक सोऊ। कवन प्रकार कहै कबि कोऊ।। एहि बिधि रहा जाहि जस भाऊ। तेहिं तस देखेउ कोसलराऊ।। व्याख्या : आत्म तत्व की अनुभूति का वर्णन कोई भी नहीं कर सकता है क्योंकि कोई कवि उसका वर्णन भी कैसे कर सकता है? आत्मा रूपी राम को तो भावना के अनुसार ही समझा जा सकता है। अत: जैसे भाव होते हैं वैसे ही कोसलराऊ अर्थात् सुष्मना रूपी कौशल्या से उत्पन्न आत्मा रूपी राम को समझा जा सकता है। दो0 राजत राज समाज महुँ कोसलराज किसोर। सुंदर स्यामल गौर तन बिस्ब बिलोचन चोर।।242।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम व लखन भाव रूपी समाज में शोभायमान होते हैं और उनका श्याम व गौर वर्ण वाला शरीर जगत की दृष्टि को आकर्षित करने वाला होता है। अर्थात् आत्मा रूपी राम के प्रति सभी सांसारिक भाव भी आकर्षित होकर चले आते हैं और शांत हो जाते हैं। सहज मनोहर मूरति दोऊ। कोटि काम उपमा लघु सोऊ।। सरद चंद निंदक मुख नीके। नीरज नयन भावते जी के।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम व लखन रूपी लक्ष्मण दोनों सहज व मन को हरने वाले होते हैं, अत: उनके सामने करोड़ों काम की उपमा भी छोटी हो जाती है। उनके मुख की शोभा शरद के चन्द्रमा को भी लजाने वाली होती है और कमल के समान नेत्र मन को अच्छे लगने वाले होते हैं। अर्थात् आत्म तत्व से मिलने वाली शान्ति की शीतलता शरद के चन्द्रमा से भी ज्यादा होती है और आत्म ज्ञान से दिव्य नेत्र खुल जाते हैं, जो मन को मोहित कर लेते हैं। चितवनि चा डिग्री मार मनु हरनी। भावति हृदय जाति नहिं बरनी।। कल कपोल श्रुति कुंडल लोला। चिबुक अधर सुंदर मृदु बोला।। व्याख्या : जब ध्यान की गहन अवस्था में चित की चारों अवस्थाओं का मरण हो जाता है अर्थात् चित की चारों अवस्थाएँ मिट जाती हैं, तो मन का हरण हो जाता है। जब मन का हरण हो जाता है, तो हृदय में भाव अ इति उ भावति अर्थात् भावों की समाप्ति हो जाती है। अत: उस अवस्था का वर्णन नहीं किया जा सकता है। उस अवस्था में कल अर्थात् देह भाव कपोल यानी ब्रह्मरन्ध्र में समा जाता है और शब्दों का आभास वैसे ही नहीं होता जैसे कानों में कुण्डलों का नहीं होता है। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि वह अवस्था में दिव्य श्रवण की अवस्था आ जाती है, जैसे सुन्दर कुण्डल कानों को शोभित कर रहे हों। उस समय चिबुक अर्थात् चित एक अवस्था में स्थित होकर अधर अर्थात् प्रकृति से परे हो जाता है। वह अवस्था परम सौन्दर्य व मधुर वाणी की होती है। प्रकृति से परे जब सहज वाणी की अवस्था आ जाती है, तो वह मृदु वाणी ही कहलाती है। कुमुदबंधु कर निंदक हाँसा। भृकुटि बिकट मनोहर नासा।। भाल बिसाल तिलक झलकाहीं। कच बिलोकि अलि अवलि लजाहीं।। व्याख्या : ध्यान की अवस्था में आत्मा रूपी राम की हँसी अर्थात् सहज प्रसन्नता चन्द्रमा की हँसी को भी लजाने वाली होती है अर्थात् चन्द्रमा की सहज शीतलता से भी ज्यादा शीतल होती है। उस अवस्था में भृकुटि मेें विशुद्धता का प्रकाश छा जाता है और नासिका की सुष्मना नाड़ी में मन का हरण हो जाता है अर्थात् मन शान्त हो जाता है। उस समय तीनों गुणों का एकीरण होने से विशाल ललाट पर तिलक सा झलकने लग जाता है। अर्थात् ललाट पर चित की धड़कन इतनी स्पष्ट होने लग जाती है कि तिलक का सा आभास होने लग जाता है और प्राण की धारा एक बाल के आकार की होकर उर्ध्वगामी हो जाती है। तब ऐसा लगने लगता है जैसे भ्रमरों की पंक्तियाँ झूम रही हों। पीत चौतनीं सिरन्हि सुहाईं। कुसुम कलीं बिच बीच बनाईं।। रेखें रूचिर कंबु कल गीवाँ। जनु त्रिभुवन सुषमा की सीवाँ।। व्याख्या : ध्यान में ही ऐसा आभास होने लगता है, मानों चारों गुणावस्था रूपी (सत्, रज, तम व गुणातीत) टोपियाँ सिर पर शोभा पा रहीं हों और निर्मल भावों रूपी कलियाँ बीच-बीच में बनाई हुई हों। शंख के समान गले में तीन गुणों रूपी तीन रेखाएँ शोभा पाती हैं और ऐसा लगता है, ये तीनों प्रकार के भाव (अर्थात् त्रिभुवन यानी त्रि अ भाव) ही ऊर्जा पैदा कर रहे हों। दो0 कुंजर मनि कंठा कलित उरन्हि तुलसिका माल। बृषभ कंध केहरि ठवनि बल निधि बाहु बिसाल।।243।। व्याख्या : जब ध्यान ब्रह्मरन्ध्र में गहराने लगता है, तब विशुद्धि चक्र अर्थात् गले में दिव्य भावों की माला उतर आती है और हृदय में पवित्र भावों की माला बन जाती है। उस अवस्था में विषयों से विरक्ति हो आती है और माया के हरण की अवस्था में दृढ़ता आ जाती है तथा दिव्य भावों रूपी भुजाओं का बल विशाल हो जाता है। कुंजर मनि का तात्पर्य हाथी की सूँड़ जैसे दिव्य भावों की माला बन जाना और तुलसिका माल का तात्पर्य पवित्र भावों की चिन्तनमाला से होता है। बृषभ का तात्पर्य विषयों को वश में कर लेने से होता है तथा केहरि ठवनि का मतलब के अ हरि अर्थात् माया के हरण की अवस्था में दृढ़ हो जाना। इस प्रकार प्रतीकों का सहारा लेकर ध्यान की सूक्ष्म अनुभूति को लिखने का प्रयास किया गया है। कटि तूनीर पीत पट बाँधें। कर सर धनुष बाम बर काँधें।। पीत जग्य उपबीत सुहाए। नख सिख मंजु महाछबि छाए।। व्याख्या : कमर पर तरकश और पीला वस्त्र बाँधें हुए अर्थात् ध्यान में जब चेतना ब्रह्मरन्ध्र में पहुँच जाती है, तो साधक को कुण्डलिनि शक्ति के जागरण का आभास हो जाता है और उस समय समझ में आना शु डिग्री होता है कि कमर से अर्थात् कुण्डलिनि शक्ति के मूल में संयम रूपी बाणों का तरकश बँधा हुआ है और त्याग रूपी पीले वस्त्र बँधे हुए हैं अर्थात् साधक को संयम व त्याग रूपी भावों से कुण्डलिनि शक्ति के जाग्रत होने की अनुभूति हो पाती है। हाथ में अंकुश रूपी बाण व धनुष अर्थात् धनु अ इष यानी इच्छा रूपी वासना होती है। अर्थात् उस समय साधक का विषय वासनाओं पर संयम व अंकुश हो जाता है। जब त्याग (पीत), यज्ञ अर्थात् पान में अपान का हवन व उपबीत यानी तीन गुणों में गुण गुणों में बरतने की अवस्था आ जाती है, तो नख से शिख तक परम शान्ति छा जाती है। देखि लोग सब भए सुखारे। एकटक लोचन चलत न तारे।। हरषे जनकु देखि दोउ भाई। मुनि पद कमल गहे तब जाई।। व्याख्या : जब ध्यान में परमशान्ति की अवस्था आ जाती है, तो ब्रह्मरन्ध्र रूपी नगर के सभी भाव रूपी लोग सुखी हो जाते हैं और उस अवस्था में आँखें एकटक हो जाती हैं तथा आँखों के तारे भी स्थिर हो जाते हैं। जब आँखों के तारे स्थिर हो जाते हैं, तो भाव भी स्वत: शान्त हो जाते हैं। आँखों की पलकों को जब स्थिर कर लिया जाता है तो शान्ति उमड़ना शु डिग्री हो जाती है। तब उस अवस्था में प्राण रूपी जनक आत्मा रूपी राम व लखन को देखकर बहुत हर्षित हो उठते हैं तथा विश्वामित्र रूपी मुनि के चरण कमलों को पकड़ लेते हैं। विश्वामित्र के चरण पकड़ने का तात्पर्य प्राण रूपी जनक का ब्रह्मरन्ध्र में समस्त भावों से मुक्त होकर समता के भाव की अवस्था में स्थित हो जाने से है। करि बिनती निज कथा सुनाई। रंग अवनि सब मुनिहि देखाई।। जहँ जहँ जाहिं कुँअर बर दोऊ। तहँ तहँ चकित चितव सबु कोऊ।। व्याख्या : तब प्राण रूपी जनक ने अपनी बात बतायी अर्थात् प्राण की व्यवस्था का आभास हुआ, जिससे मन के भावों की उत्पत्ति समझ में आ गयी। उसी को रंग अवनि अर्थात् भाव उत्पत्ति की प्रक्रिया की जानकारी होना बताया गया है। भाव भूमि के जिस भी कोष में आत्मा रूपी राम और लखन जाते हैं अर्थात् प्रवेश करते हैं, तो सभी भाव आश्चर्य चकित होकर देखने लगते हैं। निज निज रूख रामहि सबु देखा। कोउ न जान कछु मरमु बिसेषा।। भलि रचना मुनि नृप सन कहेऊ। राजाँ मुदित महासुख लहेऊ।। व्याख्या : ध्यान की अवस्था में आत्मा रूपी राम भावों को उनकी भावना के अनुरूप ही दिखायी पड़ते हैं, इसलिए आत्मा के विशेष रहस्य को कोई भाव नहीं जान पाते हैं। तब समता रूपी भाव नर की धड़कन (नृ अ प उ नर की धड़कन से उत्पन्न प्राण) से उत्पन्न प्राण रूपी जनक से भावों की सुन्दर रचना के बारे में बताते हैं, तो प्राण रूपी राजा बहुत प्रसन्न होते हैं। दो0 सब मंचन्ह तें मंचु एक सुंदर बिसद बिसाल। मुनि समेत दोउ बंधु तहँ बैठारे महिपाल।।244।। व्याख्या : जब ध्यान की अवस्था में आत्मा रूपी राम सब कोषों को देख लेते हैं, तो एक दिव्य कोष जो परमानन्द के भावों को पैदा करने वाला होता है, उसमें जाकर मन के समता रूपी भाव सहित बैठ जाते हैं। अर्थात् ब्रह्मरन्ध्र में स्थित परमानन्द कोष में आत्मा रूपी राम समता रूपी भाव सहित स्थिर हो जाते हैं। क्योंकि आत्मा का सहज स्वभाव तो परमानन्द ही होता है। प्रभुहि देखि सब नृप हियँ हारे। जनु राकेस उदय भएँ तारे।। असि प्रतीति सब के मन माहीं। राम चाप तोरब सक नाहीं।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम को परमानन्द रूपी कोष में स्थिर हुआ देखकर सभी भाव शान्त होने लग जाते हैं जैसे चन्द्रमा के उदित होने पर तारे शान्त हो जाते हैं। परन्तु सब भावों को ऐसा विश्वास होता है कि आत्मा रूपी राम अज्ञान रूपी धनुष को नहीं तोड़ पायेंगे। बिनु भंजेहु भव धनुष बिसाला। मेलिहि सीय राम उर माला।। अस बिचारि गवनहु घर भाई। जसु प्रतापु बलु तेजु गवाँई।। व्याख्या : ब्रह्मरन्ध्र में जब ध्यान स्थिर होने लग जाता है तो प्राण शक्ति रूपी सीता का आत्मा रूपी राम के प्रति आकर्षण बढ़ जाता है। इसलिए सभी भाव उस समय सोचने लगते हैं कि अगर अज्ञान रूपी धनुष भंग भी नहीं होगा, तब भी प्राणशक्ति रूपी सीता आत्मा रूपी राम को वरमाला पहना देगी अर्थात् प्राणशक्ति आत्मा रूपी चित में समाहित हो जायेगी। इसलिए हे भाव रूपी राजाओं! अपने-अपने घर चले जावो अर्थात् सहज हो जावो, वरना यश, प्रताप, बल व तेज खोना पड़ जायेगा। वास्तविकता में कुछ भाव ऐसे होते हैं, जो अपना अस्तित्व बनाये रखना चाहते हैं परन्तु जब प्राणशक्ति स्थिर होकर चितवत होने लग जाती है, तो सारे भाव धीरे-धीरे अपना प्रभाव खोने लग जाते हैं। अत: उस अवस्था में भावों का सहज होना ही उत्तम होता है। बिहसे अपर भूप सुनि बानी। जे अबिबेक अंध अभिमानी।। तोरेहुँ धनुष ब्याहु अवगाहा। बिनु तोरें को कुअँरि बिआहा।। व्याख्या : परन्तु उस अवस्था में जो प्रकृति के वश में रहने वाले भाव रूपी राजा होते हैं, जो अविवेक, अज्ञान व अभिमान रूपी भाव होते हैं, वे सात्विक भावों की बाते सुनकर हँसने लगते हैं। वे कहने लगते हैं कि अज्ञान रूपी धनुष को तोड़ने पर ही विवाह अर्थात् आत्मा व प्राणशक्ति का मिलन सम्भव हो सकता है। उसके बिना कौन प्राणशक्ति से विवाह कर सकता है। अर्थात् आसुरी भावों को लगता है कि बिना अज्ञान के निवारण के कैसे आत्मा व प्राणशक्ति का मिलन हो सकता है। एक बार कालउ किन होऊ। सिय हित समर जितब हम सोऊ।। यह सुनि अवर महिप मुसुकाने। धरमसील हरि भगत सयाने।। व्याख्या : आसुरी भाव कहने लगे कि चाहे काल ही क्यों न हो परन्तु प्राणशक्ति रूपी सीता को हम युद्ध में जीत लेंगे अर्थात् आसुरी भावों को लगता है कि प्राणशक्ति को वे अपने वश में कर लेंगे। आसुरी भावों की इन बातों को सुनकर सात्विक भाव रूपी राजा मुस्कराने लगे, जो धर्मशील, परमात्मा के भक्त व चतुर वृति के थे। सो0 सीय बिआहबि राम गरब दूरि करि नृपन्ह के। जीति को सक संग्राम दसरथ के रन बाँकुरे।।245।। व्याख्या : सात्विक भाव विचार करने लगे कि प्राणशक्ति रूपी सीता का आसुरी भावों के घमण्ड को दूर करके आत्मा रूपी राम से मिलन (विवाह) हो जायेगा और दस इन्द्रियों रूपी दसरथ से उत्पन्न आत्मा रूपी राम को भावों के युद्ध में कौन जीत सकता है। ब्यर्थ मरहु जनि गाल बजाई। मन मोदकन्हि कि भूख बुताई।। सिख हमारि सुनि परम पुनीता। जगदंबा जानहु जियँ सीता।। व्याख्या : सात्विक भावों को लगता है कि आसुरी भाव व्यर्थ में ही गाल बजाते हैं। क्या कभी मन के लड्डुओं से भूख मिट सकती है? इसलिए सात्विक भाव आपस में समझाते हैं कि जगत को पैदा करने वाली जगदम्बा अर्थात् समस्त भावों को पैदा करने वाली प्राणशक्ति ही सीता हैं। इसलिए जब प्राणशक्ति आत्मा में समाहित हो जायेंगी, तो बाकी भाव अपना अस्तित्व कैसे बचा सकते हैं? इसलिए आसुरी भावों द्वारा अपना अस्तित्व बचाये रखने की इच्छा को ही यहाँ व्यर्थ में गाल बजाना बताया गया है। जगत पिता रघुपतिहि बिचारी। भरि लोचन छबि लेहुनिहारी।। सुंदर सुखद सकल गुन रासी। ए दोउ बंधु संभु उर बासी।। व्याख्या : तब सात्विक भाव कहने लगते हैं कि प्राणशक्ति जगतमाता हैं, तो आत्मा रूपी राम जगत पिता हैं। अत: ऐसा विचार करके आत्मा रूपी राम को अच्छी तरह देख लो क्योंकि आत्मा रूपी राम सुंदर, सुखदायक व सब गुणों की राशि होते हैं और ये आत्मा रूपी राम व लखन रूपी लक्ष्मण सदैव साधक के स्वयं के हृदय में निवास करते हैं। सुधा समुद्र समीप बिहाई। मृग जलु निरखि मरहु कत धाई।। कहु जाइ जा कहुँ जोइ भावा। हम तौ आजु जनम फलु पावा।। व्याख्या : इसलिए सात्विक भाव कहते हैं कि अमृत रूपी समुद्र को छोड़कर अर्थात् आत्मा रूपी राम को छोड़कर मृग जलु अर्थात् माया के भावों की तरफ क्यों दौड़ते हो? जिसको जो भाव अच्छा लगे वो करो। हमें तो आज आत्मारूपी राम के दर्शन प्राप्त हो जाने से जन्म की सफलता मिल गयी है। अर्थात् सात्विक भाव आत्मा व प्राणशक्ति के मिलन की बेला पर परम आनन्द व शान्ति का अनुभव करते हैं। अस कहि भले भूप अनुरागे। रूप अनूप बिलोकन लागे।। देखहिं सुर नभ चढ़े बिमाना। बरषहिं सुमन करहिं कल गाना।। व्याख्या : ऐसा कहकर अर्थात् शान्ति का अनुभव करते हुए सात्विक भाव रूपी राजा आत्मा रूपी को देखने लगे। ध्यान की उस अवस्था में समस्त स्वर (सुर) आकाश में चढ़ जाते हैं और वि अ माना अर्थात् बिना मन की अवस्था यानी उनमनी अवस्था आ जाती है, जिससे सुमन उ सु अ मन अर्थात् अच्छे सात्विक भाव बरसने लगते हैं और अच्छे सात्विक भावों का नसों में प्रवाह शु डिग्री हो जाता है। दो0 जानि सुअवस डिग्री सीय तब पठई जनक बोलाइ। चतुर सखीं सुंदर सकल सादर चलीं लवाइ।।246।। व्याख्या : ध्यान की अवस्था में जब सात्विक भाव प्रबल हो उठते हैं और उनमनी अवस्था आ जाती है, तो वह समय प्राणशक्ति व आत्मा के मिलन के लिए सुअवसर माना जाता है। अत: सुअवसर को देखकर प्राणरूपी जनक ने प्राणशक्ति रूपी सीता को बुला लिया अर्थात् प्राणशक्ति उर्ध्वगामी होकर आत्मा में समाहित होने के लिए चली आयी। उस समय प्राणशक्ति के साथ दया, मैत्री, करूणा, क्षमा, बुद्धि आदि भाव भी साथ में चले आते हैं, जो प्राणशक्ति को आत्मा में समाहित होने के लिए बल प्रदान करने लगते हैं. उसी को ""चतुर सखीं सुंदर सकल सादर चलीं लवाइ"" बोलकर लिखा गया है। सिय सोभा नहिं जाइ बखानी। जगदंबिका रूप गुन खानी।। उपमा सकल मोहि लघु लागीं। प्राकृत नारि अंग अनुरागी।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में प्राणशक्ति एकदम निर्मल हो जाती है। अत: प्राणशक्ति रूपी सीता की शोभा का वर्णन नहीं किया जा सकता है। क्योंकि प्राणशक्ति ही जगत के समस्त भावों को पैदा करने वाली होने के कारण जगदम्बा हैं और समस्त गुणों का मूल होती हैं। उस समय प्राणशक्ति रूपी सीता की किसी भी वस्तु से उपमा नहीं दी जा सकती है क्योंकि निर्मल होकर प्राणशक्ति सहज में ही नाड़ी में अनुराग के भावों का प्रवाह करने लगती है। सिय बरनिअ तेइ उपमा देई। कुकबि कहाइ अजसु को लेई।। जौं पटतरिअ तीय सम सीया। जग अस जुबति कहाँ कमनीया।। व्याख्या : प्राणशक्ति की उपमा कैसे किसी से की जा सकती है क्योंकि प्राणशक्ति पूरी तरह निर्मल हो जाने पर भावहीन अवस्था में आ जाती है और बिना भाव के कैसे किसी से तुलना की जा सकती है। अत: कौन कुकवि का कलंक ले। अगर प्राणशक्ति रूपी सीता की तुलना ईड़ा, पिंगला व सुष्मना रूपी तीनों नाड़ियों से की जाए तो कौन-सी नाड़ी सुन्दर व कमनीय है। अर्थात् प्राणशक्ति तीनों नाड़ियों में प्रवाहित होने वाली प्राण से भी भिन्न व निर्मल होती है। गिरा मुखर तन अरध भवानी। रति अति दुखित अतनु पति जानी।। बिष बारूनी बंधु प्रिय जेही। कहिअ रमासम किमि बैदेही।। व्याख्या : क्योंकि इन नाड़ियों से प्रवाहित होने वाला प्राण तो वाणी द्वारा प्रकट हो जाता है अर्थात् वाणी पैदा हो जाती है और आधे प्राण से भाव पैदा हो जाते हैं और काम के भाव पैदा होकर अनुराग पैदा करके दु:खी कर देते हैं। अत: जो प्राण शरीर में रमन कर रहा है, उससे कैसे तुलना की जा सकती है क्योंकि शरीर में रमण करने वाला प्राण तो विषय रूपी मद को पसन्द करने वाला होता है। अर्थात् प्राणशक्ति के निर्मल स्वरूप की तुलना किसी भी प्रकार से शरीर में प्रवाहित होने वाले प्राण से नहीं की जा सकती है। जौं छबि सुधा पयोनिधि होई। परम रूप मय कच्छपु सोई।। सोभा रजु मंद डिग्री सिंगारू। मथै पानि पंकज निज मारू।। व्याख्या : यहाँ शरीर स्थित प्राण के निर्मल होने की शोभा का वर्णन किया गया है। जब प्राण निर्मल हो जाता है, तो अमृत के समुद्र के समान शोभायमान हो जाता है और जब कश्छप की तरह साधक अपनी इन्द्रियों को संसार से खींच लेता है, तो प्राण का रूप निखरने लग जाता है। तब सद्गुण रूपी रस्सी के लक्षणों से युक्त होकर मन के अन्दर शोभा रूपी श्रृंगार करके स्वयं साधक अहंकार का त्याग करके प्राण का मंथन करता है, तो उससे सद्गुणों के लक्षणों से युक्त प्राण पैदा होता है। दो0 एहि बिधि उपजै लच्छि जब सुंदरता सुख मूल। तदपि सकोच समेत कबि कहहिं सीय समतूल।।247।। व्याख्या : इस प्रकार जब सुंदरता व सुख के मूल लक्षणों से युक्त प्राणशक्ति पैदा होती है, तो भी संकोच के कारण कवि लोग ब्रह्मरन्ध्र स्थित प्राणशक्ति रूपी सीता से तुलना नहीं करते हैं। अर्थात् शरीर स्थित प्राणशक्ति से ब्रह्मरन्ध्र में स्थित प्राणशक्ति अति निर्मल व अतुलनीय होती है। चलीं संग लै सखीं सयानी। गावत गीत मनोहर बानी ।। सोह नवल तनु सुंदर सारी। जगत जननि अतुलित छबि भारी।। व्याख्या : तब ध्यान की अवस्था में सुरता रूपी सीता दया, करूणा, मैत्री, क्षमादि चतुर सखियों के साथ ब्रह्मरन्ध्र के परमानन्द रूपी कोष में चली। उस समय मन को हरण करनेवाले भाव उठ रहे थे। उसी को मनोहर वाणी में गीत गाना बोल कर लिखा गया है। सुरता रूपी सीता की दया, मैत्री, करूणा व क्षमादि सखियाँ नए-नए सुंदर शरीरों वाली थी, जिनसे सुरता रूपी जगत जननी बहुत शोभायमान हो रही थी। भूषन सकल सुदेस सुहाए। अंग अंग रचि सखिन्ह बनाए।। रंगभूमि जब सिय पगु धारी। देखि रूप मोहे नर नारी।। व्याख्या : सुरता रूपी सीता की सखियों द्वारा बनाए गए सद्गुण रूपी भूषण सुरता रूपी सीता पर शोभायमान हो रहे थे अर्थात जब सुरता परमात्मा में लग जाती है, तो दया, करूणा, मैत्री, क्षमादि के भाव सुरता के साथ लग जाते हैं, जो आभूषणों की तरह सुरता को सुशोभित कर देते हैं। जब ध्यान की अवस्था में सुरता ब्रह्मरन्ध्र के परमानन्द रूपी कोष में पहुँचती है, तो समस्त भाव रूपी नर-नारी मोहित हो जाते हैं अर्थात् समस्त भाव स्वत: शान्त होना शु डिग्री हो जाते हैं। हरषि सुरन्ह दुंदुभीं बजाईं। बरषि प्रसून अपछरा गाईं।। पानि सरोज सोह जयमाला। अवचट चितए सकल भुआला।। व्याख्या : जब सुरता और आत्मा का मिलन होने वाला होता है या मिलने की परिस्थितियाँ बन जाती हैं, तो स्वरों से दुंदुभी बजने लग जाती हैं। दुंदुभी बजने का वैज्ञानिक कारण यह है कि जब सुरता परमात्मा में लीन होने लग जाती है, तो समस्त भावों की उत्पत्ति रूक जाती है, जिससे स्वरों में चलने वाली प्राण वायु की आवाज ढोल, नगाड़ों की तरह आने लग जाती है। उसी को दुंदुभी बजना बताया जाता है। उस समय आनन्द रूपी फूल बरसने लग जाते हैं और वृतियाँ गाने लग जाती हैं। ध्यान की उस अवस्था में ऐसा लगने लगता है, जैसे सुरतारूपी सीता के हाथों में जयमाला हो अर्थात् प्राणशक्ति रूपी सीता ने आत्मा रूपी राम को मानो वश में कर लिया हो। ऐसी अवस्था देखकर भाव रूपी राजा एकटक लगाकर देखने लगे अर्थात् समस्त भाव स्वत: ही शान्त होने लग गए। सीय चकित चित रामहि चाहा। भए मोहबस सब नर नाहा।। मुनि समीप देखे दोउ भाई। लगे ललकि लोचन निधि पाई।। व्याख्या : ध्यानावस्था में सूरता रूपी सीता का आश्चर्यचकित चित आत्मा रूपी राम को चाहने लगा, जिससे नर की धड़कन से उत्पन्न सभी भाव मोहित हो उठे अर्थात् सब भाव भी चित में समाहित होने लगे। तब सुरता रूपी सीता ने समता रूपी मुनि के पास में आत्मा रूपी राम व लखन को देखा तो सुरता रूपी सीता के नेत्र उन्हें देखने के लिए ललचा उठे, मानो उन्हें कोई खजाना मिल गया हो। दो0 गुरजन लाज समाजु बड़ देखि सीय सकुचानि। लागि बिलोकन सखिन्ह तन रघुबीरहि उर आनि।।248।। व्याख्या : जब ध्यान में सुरता आत्मा को देखती है तो संसार के कुछ भावों के कारण संकोच करने लग जाती है। ध्यान की अवस्था में यह ज्यादा स्पष्ट तरीके से समझ आ पाता है क्योंकि जब सुरता लीन होने लगती है, तो इच्छाओं के कुछ भाव सुरता को वापस खींचने का प्रयास करते हैं। उसी अवस्था को ""गुरजन लाज समाजु"" कहा गया है। तब सुरता पुन; दया, करूणा, मैत्री आदि सखियों रूपी भावों को परमात्मा का स्मरण करती हुई देखने लगती है अर्थात् सात्विक भावों का सहारा लेकर सुरता परमात्मा में लीन होने लगती है। राम रूपु अ डिग्री सिय छबि देखें। नर नारिन्ह परिहरीं निमेषें।। सोचहिं सकल कहत सकुचाहीं। बिधि सन बिनय करहिं मन माहीं।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम और सुरता रूपी सीता को देखने पर नर-नाड़ी की धड़कन स्थिर होने लग जाती है क्योंकि उस अवस्था में भाव शान्त होने लग जाते हैं और भावों के शान्त होने पर नर-नारी की धड़कन भी स्थिर हो जाती है। तब उस अवस्था में सभी भाव आपस में कहने में संकोच करने लगते हैं और विधि अर्थात् क्रिया से प्रार्थना करते हैं अर्थात् सुरता के परमात्मा में लीन होने की क्रिया को बनाए रखना चाहते हैं, जिससे आनन्द की अवस्था बनी रहे। ह डिग्री बिधि बेगि जनक जड़ताई। मति हमारि असि देहि सुहाई।। बिनु बिचार पनु तजि नर नाहू। सीय राम कर करै बिबाहू।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में प्रार्थना का भाव उठने लगता है कि हमारी बुद्धि ऐसी हो जाए, जिससे ऐसी क्रिया बन जाए, जो प्राण रूपी जनक की जड़ता को दूर कर दे। जिससे नर-नाड़ी की धड़कन से उत्पन्न भाव शान्त हो जाएँ और सुरता रूपी सीता व आत्मा रूपी राम का विवाह अर्थात् मिलन हो जाए। जगु भल कहिहि भाव सब काहू। हठ कीन्हें अंतहुँ उर दाहू।। एहिं लालसाँ मगन सब लोगू। ब डिग्री साँवरो जानकी जोगू।। व्याख्या : ध्यान की अवस्था में जब सुरता परमात्मा से मिलने के लिए रंगभूमि अर्थात् भावों के उत्पत्ति के स्थान पर आ जाती है और एकदम विशुद्ध होकर स्थिर होने लग जाती है, तो सभी भावों को परमात्मा से मिलने की परिस्थिति अच्छी लगने लग जाती है। अत: उसी अनुभूति को प्रतीकों का सहारा लेकर यहाँ लिखा गया है कि सभी भाव सुरता रूपी सीता का आत्मा रूपी राम से मिलने को अच्छा ही कहेंगे। अत: प्राण रूपी जनक को धनुष भंग अर्थात् अज्ञान निवारण की हठ को छोड़ देना चाहिए और सुरता रूपी सीता और आत्मा रूपी राम का मिलन कर देना चाहिए। परन्तु वास्तविकता यह होती है कि जब तक प्राण से संशय के भाव पैदा होते रहते हैं अर्थात् अज्ञान के भाव पैदा होते रहते हैं, तब तक सुरता रूपी सीता का आत्मा रूपी राम से मिलन नहीं हो सकता है। परन्तु सारे भाव तो इसी चाह में मग्न रहते हैं कि सुरता रूपी सीता को आत्मा रूपी राम वर के रूप में मिल जाए। तब बंदीजन जनक बोलाए। बिरिदावली कहत चलि आए।। कह नृप जाइ कहहु पन मोरा। चले भाट हियँ हरषु न थोरा।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में भावों में आपसी द्वन्द्व शु डिग्री रहता है। उसी को प्राण रूपी जनक द्वारा बन्दीजनों को बुलाना बोलकर बताया गया है। बन्दीजन अर्थात् प्राण से उत्पन्न भाव नाना प्रकार से भावों के मर्म का तब बखान करने लगते हैं, उसीको बिरिदावली गाना बताया गया है। तब प्राण रूपी जनक कहते हैं कि मेरा प्रण अर्थात् मेरा स्वभाव बता दीजिए कि बिना अज्ञान रूपी धनुष को भंग किए सुरता रूपी सीता का विवाह नहीं हो सकता है। तब प्राण का मर्म बताने वाले भाव हर्षित होकर प्रण बताने के लिए चले। दो0 बोले बंदी बचन बर सुनहु सकल महिपाल। पन बिदेह कर कहहिं हम भुजा उठाइ बिसाल।।249।। व्याख्या : तब प्राण रूपी जनक की महिमा को गाने वाले भाव बोले कि हे शरीर में पलने वाले (महि अ पाल)! सभी भाव सुनो। हम प्राण रूपी विदेह जनक के प्रण अर्थात् स्वभाव को खुलकर बताते हैं। नृप भुजबलु बिधु सिवधन राहू। गरुअ कठोर बिदित सब काहू।। रावनु बानु महाभट भारे। देखि सरासन गँवहिं सिधारे।। व्याख्या : बन्दीजन प्राण के मर्म को समझाते हुए कहते हैं कि नर की धड़कन से उत्पन्न भाव चन्द्रमा की तरह होते हैं और अज्ञान रूपी धनुष राहू ग्रह की तरह होता है, जो बहुत कठोर और भारी होता है। अज्ञान रूपी धनुष को काम रूपी रावण और बाणासुर रूपी वासना के भाव भी हिला नहीं पाते हैं, इसलिए अज्ञान रूपी धनुष को देखकर वे भी चुपके से चले गए अर्थात् अज्ञान के आगे हार मान ली। सोइ पुरारि कोदंडु कठोरा। राज समाज आजु जोइ तोरा।। त्रिभुवन जय समेत बैदेही। बिनइ बिचार बरइ हठि तेही।। व्याख्या : वही शरीर के शत्रु अज्ञान का धनुष बहुत कठोर होता है। अत: जो भाव रूपी राजाओं के समाज में आज इस अज्ञान रूपी धनुष को तोड़ेगा, वही त्रिभुवन अर्थात् सत, रज व तम गुणों रूपी तीनों प्रकार के भावों को जीतकर सुरता रूपी सीता को जीतेगा और सुरता रूपी सीता बिना ही विचार के उसी का वरण करेंगी। जब अज्ञान रूपी धनुष टूट जाता है, तब भावहीन अवस्था आ जाती है। उसी को ""बिनइ विचार"" कहा गया है। सुनि पन सकल भूप अभिलाषे। भटमानी अतिसय मन माखे।। परिकर बाँधि उठे अकुलाई। चले इष्टदेवन्ह सिर नाई।। व्याख्या : प्राण रूपी जनक के प्रण को सुनकर सभी भावों की लालसा हो उठी और अपने आपको बली मानकर मन में उत्साहित हो उठे। अर्थात् सभी भावों को लगने लगा कि वे अज्ञान के जाल को काटकर सुरता रूपी सीता को जीत लेंगे अर्थात् सुरता को अपनी वृति के अनुसार प्रयोग कर लेंगे। प्रत्येक भाव चाहता है कि उसके अनुसार सभी भाव चलें और सुरता जिस भाव के साथ हो लेती है, वो ही भाव बाकी सभी भावों से बलवान हो जाता है। इसलिए सभी व्याकुल होकर कमर कस करके अज्ञान रूपी धनुष को तोड़ने के लिए अपने-अपने इष्ट देवों को मना कर चले। तमकि ताकि तकि सिवधनु धरहीं। उठइ न कोटि भाँति बलु करहीं।। जिन्ह के कछु बिचा डिग्री मन माहीं। चाप समीप महीप न जाहीं।। व्याख्या : कुछ भाव तमक कर अज्ञान रूपी धनुष की तरफ देखते हैं और फिर ताक कर अज्ञान रूपी धनुष को पकड़ते हैं परन्तु बहुत प्रकार से प्रयास करने पर भी अज्ञान रूपी धनुष को हिला भी नहीं पाते हैं। परन्तु जिन भाव रूपी राजाओं के थोड़ा सा भी विवेक होता है, वे तो अज्ञान रूपी धनुष के पास भी नहीं जाते हैं। दो0 तमकि धरहिं धनु मूढ़ नृप उठइ न चलहिं लजाइ। मनहुँ पाइ भट बाहुबलु अधिकु अधिकु गरूआइ।।250।। व्याख्या : मूर्ख वृति के भाव तमतमा कर अज्ञानरूपी धनुष को पकड़ते हैं परन्तु हिला भी नहीं पाने के कारण लज्जित होकर चले जाते हैं। जब अज्ञान को भावों द्वारा जीता नहीं जाता है, तो वह और अधिक बढ़ जाता है उसी को ""अधिकु अधिकु गरूआइ"" बोलकर लिखा गया है। भूप सहस दस एकहि बारा। लगे उठावन टरइ न टारा।। डगइ न संभु सरासनु कैसें। कामी बचन सती मनु जैसें।। व्याख्या : दस इन्द्रियाँ और इन्द्रियों से उत्पन्न हजारों भाव सब एक साथ मिलकर के भी अज्ञान रूपी धनुष को हिला नहीं पाते हैं। अर्थात् इन्द्रियों को वश में करने और भावों को निर्मल करने से भी अज्ञान का निवारण नहीं हो पाता है। स्वयं के अज्ञान का धनुष वैसे ही नहीं हिल पाता है, जैसे कामी पुरुष के वचन सुनकर सती स्त्री का चित विचलति नहीं होता है। सब नृप भए जोगु उपहासी। जैसें बिनु बिराग संन्यासी।। कीरति बिजय बीरता भारी। चले चाप कर बरबस हारी।। व्याख्या : जैसे बिना वैराग्य के संन्यासी उपहास का पात्र बन जाता है, वैसे ही सब भाव रूपी राजा उपहास के पात्र बन गए क्योंकि वे सब कीर्ति, विजय व वीरता के गुणों को अज्ञान रूपी धनुष के सामने हार गए अर्थात् सब भाव अज्ञान के सामने निष्प्रभावी हो गए। श्रीहत भए हारि हियँ राजा। बैठे निज निज जाइ समाजा।। नृपन्ह बिलोकि जनकु अकुलाने। बोले बचन रोष जनु साने।। व्याख्या : सभी भाव रूपी राजा अज्ञान के सामने हारकर श्री हीन हो गए अर्थात् निष्प्रभावी होकर अपने-अपने स्थानों पर जाकर बैठ गए। नर की धड़कन से उत्पन्न भावों को देखकर प्राण रूपी जनक व्याकुल हो गए अर्थात् जब नर की धड़कन से भाव पैदा होते हैं, तो प्राण की गति में हलचल हो जाती है, उसी को जनक का व्याकुल होना बताया गया है। तब प्राण रूपी जनक रोषपूर्वक बोले अर्थात् प्राण ने विचलन को रोकने की कोशिश करी। दीप दीप के भूपति नाना। आए सुनि हम जो पनु ठाना।। देव दनजु धरि मनुज सरीरा। बिपुल बीर आए रनधीरा।। व्याख्या : प्राण रूपी जनक बोले कि विभिन्न कोषों से उत्पन्न प्रधान-प्रधान भाव हमारे प्रण (अर्थात् प्राण के स्वभाव) को सुनकर यहाँ आए हैं। दैवीय व दानवी भाव भी मन के सूक्ष्म स्वरूप में आए हैं और बहुत से वीर व भाव युद्ध में रनधीर वृति के भाव भी आए हैं। दो0 कुअँरि मनोहर बिजय बड़ि कीरति अति कमनीय। पावनिहार बिरंचि जनु रचेउ न धनु दमनीय।।251।। व्याख्या : परन्तु मन का हरण करने वाली सुरता रूपी कन्या, को विजय व कीर्ति को प्राप्त करने वाला कोई भाव शायद ब्रह्मा ने रचा ही नहीं है, जो अज्ञान रूपी धनुष को तोड़ सके। अर्थात् बहुत से नाना वृतियों से उत्पन्न भाव तो आए हैं परन्तु बिरंचि अर्थात् परमात्मा में विशुद्ध रूचि वाला कोई भाव (वि अ रंचि उ विशुद्ध रूचि) पैदा नहीं हुआ है, जो अज्ञान रूपी धनुष को तोड़ सके। कहहु काहि यहु लाभु न भावा। काहुँ न संकर चाप चढ़ावा।। रहउ चढ़ाउब तोरब भाई। तिलु भरि भूमि न सके छड़ाई।। व्याख्या : प्राण रूपी जनक बोले कि किसी को भी सुरता रूपी सीता को प्राप्त करने का सौभाग्य नहीं मिला क्योंकि किसी भी भाव ने अज्ञान रूपी धनुष को नहीं चढ़ाया अर्थात् अज्ञान का निवारण नहीं किया। अरे चढ़ाना और तोड़ना तो दूर की बात कोई तिल भर भी हिला नहीं सका। अर्थात् अज्ञान के निवारण की बात तो दूर है, कोई भी भाव अज्ञान के मर्म को भी नहीं समझ सका। अब जनि कोउ भाखै भटमानी। बीर बिहीन मही मैं जानी।। तजहु आस निज निज गृह जाहू। लिखा न बिधि बैदेहि बिबाहू।। व्याख्या : अब कोई भी भाव अपने आपको मन में योद्धा मत मानना क्योंकि अज्ञान रूपी धनुष को नहीं तोड़ सकने के कारण मैंने इस शरीर रूपी पृथ्वी को वीरता के भावों से रहित मान लिया है। अत: सभी भाव अपनी-अपनी वृतियों रूपी घर में चले जाइये क्योंकि ऐसा लग रहा है कि क्रिया (विधि) द्वारा सुरता रूपी सीता का आत्मा रूपी राम से मिलन (विवाह) नहीं होगा। ध्यान की अवस्था में कई बार साधक को अपनी ध्यान क्रिया पर संशय हो आता है कि पता नहीं इस क्रिया से साधना पूर्ण होगी कि नहीं। उसी अनुभूति को यहाँ लिखा गया है। सुकृतु जाइ जौं पनु परिहरऊँ। कुअँरि कुआरि रहउ का करऊँ।। जौं जनतेउँ बिनु भट भुबि भाई। तौ पनु करि होतेउँ न हँसाई।। व्याख्या : प्राण रूपी जनक कहते हैं कि अगर मैं मेरा प्रण (अर्थात् सहज स्वभाव निर्मलता) का त्याग कर दूँ तो मैं सु अ कृत उ अच्छी शुभ क्रियाओं से वंचित हो जाऊँगा, इसलिए भले ही सुरता रूपी सीता कुँवारी ही रह जाए परन्तु मैं मेरे प्रण का त्याग नहीं करूँगा। अगर मुझे ऐसा पता होता कि शरीर रूपी भूमि वीरों से रहित है अर्थात् अज्ञान निवारण के भावों से रहित है, तो मैं प्रण का पालन नहीं करता, जिससे जगत में हँसी तो नहीं होती। जनक बचन सुनि सब नर नारी। देखि जानकिहि भए दुखारी।। माखे लखनु कुटिल भइँ भौंहें। रदपट फरकत नयन रिसौंहें।। व्याख्या : प्राण रूपी जनक के वचन सुनकर अर्थात् प्राण में जब हलचल हो जाती है, तो शरीर के सब नर-नाड़ी सुरता रूपी सीता को देखकर दु:खी हो गए अर्थात् जब सुरता परमात्मा में लीन होने वाली होती है और प्राण में विचलन आ जाता है, तो नर-नाड़ियाँ तब असहज हो जाती हैं। उसी को दु:खी होना कहा गया है। परन्तु तभी भावों के लक्षणों को जानने वाला लक्ष्मण रूपी भाव तमतमा उठता है और उस समय भौंहों, होठों और नयनों में उसका प्रभाव आने लग जाता है अर्थात् लखन भाव अज्ञान सहित सभी भावों के मर्म को जानने की क्षमता रखता है। दो0 कहि न सकत रघुबीर डर लगे बचन जनु बान। नाइ राम पद कमल सि डिग्री बोले गिरा प्रमान।।252।। व्याख्या : लखन रूपी भाव को प्राण रूपी जनक के वचन बाण की तरह लगे, परन्तु आत्मा रूपी राम के भय से कुछ बोल नहीं पा रहा था। वास्तविकता में यह होता है कि प्राण से उठने वाली तरंग भावों को प्रभावित करती है। अत: लक्षणों को जानने वाला लक्ष्मण भाव प्राण की तरंग जो बाण के समान लग रही थी, से प्रभावित होकर तमतमा उठा, परन्तु आत्मा रूपी राम शान्त होने के कारण कुछ बोल नहीं पा रहा था। इसलिए लखन रूपी भाव ने आत्मा रूपी राम की आज्ञा लेकर कहा। रघुबंसिन्ह महुँ जहँ कोउ होई। तेहिं समाज अस कहइ न कोई।। कही जनक जसि अनुचित बानी। बिद्यमान रघुकुलमनि जानी।। व्याख्या : अगर आत्मवत भावों में से कोई भी भाव होता है तो उस भाव समाज में ऐसी बात नहीं कही जाती है कि अज्ञान रूपी धनुष को कोई तोड़ नहीं सकता है। क्योंकि आत्मवत भाव सहज में ही अज्ञान का निवारण करने की क्षमता से युक्त होते हैं। इसलिए लखन भाव कहता है कि प्राण रूपी जनक ने आत्मारूपी राम को विद्यमान जानकर भी ऐसा कहा है, तो अनुचित है। सुनहु भानुकुल पंकज भानू। कहउँ सुभाउ न कछु अभिमानू।। जौं तुम्हारि अनुसासन पावौं। कंदुक इव ब्रह्मांड उठावौं।। व्याख्या : हे सूर्य कुल रूपी कमल के सूर्य अर्थात् ज्ञान को भी ज्ञान का प्रकाश कराने वाले! मैं बिना अभिमान के सहज स्वभाव वश कहता हूँ कि अगर आपकी आज्ञा हो तो अर्थात् आत्मा रूपी राम चितवत हो जाएँ तो समस्त ब्रह्माण्ड रूपी शरीर को मैं गेंद की तरह उठा डालूँ। यहाँ आत्मा रूपी राम के अनुशासन से तात्पर्य आत्मा का पूरी तरह चित में समा जाने से है क्योंकि ज्योहिं चित स्थिर होता है, त्योंहि अज्ञान रूपी धनुष टूट जाता है। काचे घट जिमि डारौं फोरी। सकउँ मे डिग्री मूलक जिमि तोरी।। तव प्रताप महिमा भगवाना। को बापुरो पिनाक पुराना।। व्याख्या : मैं इस अज्ञान रूपी धनुष को कच्चे घड़े की तरह तोड़ सकता हूँ और अज्ञान की मे डिग्री अर्थात् अज्ञान के मूल को भी मूली की तरह तोड़ सकता हूँ। क्योंकि आपके प्रताप के आगे अर्थात् आत्मा के तेज के सामने अज्ञान रूपी पुराने धनुष का क्या चलता है? नाथ जानि अस आयसु होऊ। कौतुक करौं बिलोकिअ सोऊ।। कमल नाल जिमि चाप चढ़ावौं। जोजन सत प्रमान लै धावौं।। व्याख्या : हे आत्मा रूपी स्वामी! इसलिए मुझे आज्ञा दीजिए जिससे मैं अज्ञान रूपी धनुष को तोड़ने का खेल करूँ और आप देख सकें। यहाँ पर कुण्डलिनि शक्ति के द्वारा अज्ञान रूपी धनुष को तोड़ने की अनुभूति का वर्णन किया गया है। वास्तविकता में हमारा शरीर ही धनुष की तरह होता है और कुण्डलिनि शक्ति उस धनुष में चढ़ने वाली प्रत्यंचा की तरह होती है। जब प्रत्यंचा ढीली होती है तो उसी को कुण्डलिनि शक्ति का सुप्त अवस्था में होना बताया जाता है। हमारी रीड़ की हड्डी कमल दण्डी की तरह होती है, इसलिए उसी को यहाँ बताया गया है कि कमलदण्डी रूपी रीढ़ की हड्डी पर कुण्डलिनि शक्ति रूपी प्रत्यंचा को चढ़ाकर सत योजन अर्थात् भावों की सौ वृतियों को पार कर लूँगा। जब भावों की सौ वृतियाँ वश में आ जाती हैं, तब स्वत: ही अज्ञान रूपी धनुष टूट जाता है। दो0 तोरौं छत्रक दंड जिमि तव प्रताप बल नाथ। जौं न करौं प्रभु पद सपथ कर न धरौं धनु भाथ।।253।। व्याख्या : लखन रूपी भाव कहते हैं कि हे आत्मा रूपी राम! आपके तेज के बल से अज्ञान रूपी धनुष को मैं बरसाती छाते (कुकुरमुत्ते) की तरह तोड़ दूँ और अगर नहीं तोड़ पाऊँ तो फिर कभी हाथ में धनुष धारण नहीं करूँगा अर्थात् कभी धनु यानी इच्छाओं की कामना नहीं करूँगा। ध्यान के अभ्यास में कई बार कुण्डलिनि शक्ति जागृत होने लगती है और उस समय नाना प्रकार की अनुभूतियाँ होने लगती हैं। उन्हीं को नाना प्रकार के प्रतीकों के माध्यम से यहाँ लिखा गया है। लखन सकोप बचन जे बोले। डगमगानि महि दिग्गज डोले।। सकल लोग सब भूप डेराने। सिय हियँ हरषु जनकु सकुचाने।। व्याख्या : जब लक्षणों को लखने का भाव कुण्डलिनि शक्ति को धारण करके बोला तो शरीर रूपी पृथ्वी के सभी दिक्पाल हिल गए। अर्थात् कुण्डलिनि शक्ति के जागृत होने की अवस्था में शरीर में कम्प होने लगते हैं। उसे ही दिग्पालों का हिलना कहा जाता है। जिससे सभी भाव रूपी राजा डरने लग गए अर्थात् भावों में भय आ गया। परन्तु कुण्डलिनि के उर्ध्वगामी होने से सुरता रूपी सीता के हृदय में हर्ष छा गया और प्राण रूपी जनक संकोच करने लग गए। जब कुण्डलिनि शक्ति जागृत होने लगती है, तो प्राण की गति भी निर्मल होकर विराट से सूक्ष्म होती चली जाती है। उसे ही प्राण रूपी जनक का संकोच करना बताया गया है। गुर रघुपति सब मुनि मन माहीं। मुदित भए पुनि पुनि पुलकाहीं।। सयनहिं रघुपति लखनु नेवारे। प्रेम समेत निकट बैठारे।। व्याख्या : कुण्डलिनि के उर्ध्वगामी होने पर समता रूपी विश्वामित्र का भाव, आत्मा रूपी राम व मन के सभी सात्विक भाव प्रसन्न होकर बार-बार पुलकित होने लगते हैं अर्थात् सात्विक भावों को बल मिलने लगता है। तब आत्मा रूपी राम लखन भाव को आँखों के इशारे से समझाकर स्वयं के निकट बैठा लेते हैं। अर्थात् आत्मा रूपी राम लक्षण लखने वाले भाव को भी अपने में समाहित कर लेते हैं। बिस्वामित्र समय सुभ जानी। बोले अति सनेहमय बानी।। उठहु राम भंजहु भव चापा। मेटहु तात जनक परितापा।। व्याख्या : तब समता रूपी विश्वामित्र भाव ने अनकुलू समय जानकर प्रेमपूर्वक बोले कि हे आत्मा रूपी राम! तुम उठो अर्थात् अपने तेज को सँवारो और भावों से उत्पन्न अज्ञान रूपी धनुष को तोड़ डालो। जिससे प्राण रूपी जनक के कष्टों का निवारण हो जाए। अज्ञान ही प्राण के लिए ताप का काम करता है इसलिए अज्ञान के निवारण होने से ही प्राण रूपी जनक का परिताप मिट पाता है। सुनि गुरु बचन चरन सि डिग्री नावा। हरषु बिषादु न कछु उर आवा।। ठाढ़े भए उठि सहज सुभाएँ। ठवनि जुबा मृगराजु लजाएँ।। व्याख्या : तब विश्वामित्र रूपी गुरु के वचन सुनकर चरणों में सिर झुकाया और बिना ही हर्ष व विषाद के सहज होकर खड़े हो गए। जिनके खड़े होने को देखकर सिंह भी लज्जा पा जाए। अर्थात् आत्मारूपी राम गुरुशक्ति से प्रेरणा पाकर सहज में ही प्रकाशित हो उठता है। उसी को खड़ा होना बताया गया है। दो0 उदित उदय गिरि मंच पर रघुबर बालपतंग। बिकसे संत सरोज सब हरषे लोचन भृंग।।254।। व्याख्या : ज्ञान रूपी मंच पर आत्मा रूपी सूर्य के उदित होने पर संशयों का अन्त करने वाले संत रूपी कमल खिल जाते हैं, जिन्हें देखने के लिए दिव्य दृष्टि रूपी भ्रमर हर्षित हो उठते हैं। नृपन्ह केरि आसा निसि नासी। बचन नखत अवली न प्रकासी।। मानी महिप कुमुद सकुचाने। कपटी भूप उलूक लुकाने।। व्याख्या : उस अवस्था में नर की धड़कन से उत्पन्न होने वाले भावों की आशा रूपी रात्रि मिटने लग जाती है, जिससे भाव मौन हो जाते हैं और जिससे वाणी भी शान्त हो जाती है। तब मान आदि के भावों रूपी कुमुद भी संकुचित होने लग जाता है और छल व कपट रूपी उल्लू भी छुपने लग जाते हैं। अर्थात् जब आत्मा रूपी सूर्य अपने तेज से प्रकाशित होने लगता है, तो भावों की आशा-अभिलाषा शान्त हो जाती है और वाणी में मौनता आने लग जाती है। जिससे मान, अभिमान, छल व कपट आदि के भाव भी मिटने लग जाते हैं। भए बिसोक कोक मुनि देवा। बरिसहिं सुमन जनावहिं सेवा।। गुर पद बंदि सहित अनुरागा। राम मुनिन्ह सन आयसु मागा।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में मन के सात्विक भाव रूपी देवता व मुनि रूपी चकवे शोकरहित हो गए और सुमन अर्थात् अच्छे भावों की वर्षा होने लग गयी अर्थात् सात्विक भाव तेजी से बढ़ने लगे। तब आत्मा रूपी राम अनुराग सहित गुरु शक्ति के चरणों की वन्दना करके मन के सात्विक भावों से अज्ञान रूपी धनुष को तोड़ने की आज्ञा माँगते हैं। सहजहिं चले सकल जग स्वामी। मत्त मंजु बर कुंजर गामी।। चलत राम सब पुर नर नारी। पुलक पूरि तन भए सुखारी।। व्याख्या : जब ध्यान में सारे सात्विक भाव अनुकूल हो जाते हैं, तो आत्मा अपने तेज का प्रकाश करती हुई अज्ञान का निवारण करना शु डिग्री कर देती है। यह अवस्था ही कुछ साधना पंथों में कुण्डलिनि जागरण के नाम से जानी जाती है। जब कुण्डलिनि शक्ति जागृत होकर प्रकाश करने लगती है, तो वह मदमस्त हाथी की तरह हो जाती है। जिसे देखकर शरीर स्थित नर-नाड़ियों में पुलकावलि छाने लग जाती है और सब भाव परमात्मा में लीन होने के लिए उत्साहित हो उठते हैं। बंदि पितर सुर सुकृत सँभारे। जौं कछु पुन्य प्रभाउ हमारे।। तौ सिवधनु मृनाल की नाईं। तोरहुँ रामु गनेस गोसाईं।। व्याख्या : सब भाव रूपी नर-नारी मन ही मन वन्दना करे लगते हैं कि हमारे अगर कुछ पुण्य हैं, तो यह शिव धनुष अर्थात् विश्वास से उत्पन्न अज्ञान रूपी धनुष को गुणों के ईश्वर आत्मा रूपी राम तोड़ दें। दो0 रामहि प्रेम समेत लखि सखिन्ह समीप बोलाइ। सीता मातु सनेह बस बचन कहइ बिलखाइ।।255 ।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में जब कुण्डलिनि शक्ति उर्ध्वगामी होने लगती है तो सुरता रूपी सीता की दिव्यदृष्टि रूपी माता सुनयना प्रेमपूर्वक आत्मा रूपी राम को देखकर करूणा, मैत्री, दया व क्षमादि रूपी सहेलियों को नजदीक बुलाकर स्नेहपूर्व बिलख उ आई अ लख उ अर्थात् अच्छी तरह से समझकर बोली। सखि सब कौतुक देखनिहारे। जेउ कहावत हितू हमारे।। कोउ न बुझाइ कहइ गुर पाहीं। ए बालक असि हठ भलि नाहीं।। व्याख्या : ध्यान में कुण्डलिनि जागरण की अवस्था में दिव्य दृष्टि रूपी सुनयना को भावों का मर्म समझ में आने लगता है, उसी अनुभूति को यहाँ लिखा गया है। उस समय दिव्य दृष्टि रूपी सुनयना कहती हैं कि हे सखियों! भावों के इस खेल को देखो। जो भाव हमारे हितकारी लगते थे, वे भी हमें समझ में नहीं आते थे अर्थात् भावों का जाल इतना जटिल होता है कि सीधे-सीधे समझ में नहीं आता है। कुछ भाव गुरुत्व शक्ति वाले होते हैं, तो कुछ भाव बाल स्वभाव वाले, तो कुछ हठी और कुछ अच्छे नहीं होते हैं। रावन बान छुआ नहिं चापा। हारे सकल भूप करि दापा।। सो धनु राजकुअँर कर देहीं। बाल मराल कि मंदर लेहीं।। व्याख्या : काम रूपी रावण और वासना रूपी बाणासुर ने अज्ञान रूपी धनुष को छुआ तक नहीं अर्थात् काम व वासना के भावों को अज्ञान के रहस्य का लेश मात्र पता नहीं चल पाता है और बहुत से दम्भ वाले भाव भी अज्ञान के सामने हार गए। उस अज्ञान रूपी धनुष को तब ये सुकोमल आत्मा रूपी राजकुमार कैसे तोड़ पायेंगे? क्या हंस के बच्चे भी मंदराचल पर्वत को उठा पायेंगे? यहाँ पर साधना का बहुत गम्भीर रहस्य छुपा हुआ है। जब कुण्डलिनि शक्ति उर्ध्वगामी होने लगती है, तो प्राण की गति हकार सकार वाली हो जाती है। उसी को हंस कहा जाता है। अत: दिव्यदृष्टि रूपी सुनयना कहती हैं कि क्या हकार-सकार की (हंस) गति वाली प्राण मन के अन्दर चलने वाले (मंदराचल) भावों के रहस्य को जान पायेगी। क्योंकि बिना भावों के रहस्यों को जाने तो अज्ञान का निवारण नहीं हो सकता है। भूप सयानप सकल सिरानी। सखि बिधि गति कछु जाति न जानी।। बोली चतुर सखी मृदु बानी। तेजवंत लघु गनिअ न रानी।। व्याख्या : प्राण रूपी जनक का सयानापन समाप्त हो गया अर्थात् जब हँस गति से प्राण चलने लगती है तो धीरे-धीरे भावों के रहस्य से पर्दा उठना शु डिग्री हो जाता है। अत: उसी को प्राणरूपी राजा का सयानापन समाप्त होना कहा गया है। उस समय दिव्यदृष्टि रूपी सुनयना को लगने लगता है कि विधि अर्थात् हकार सकार की क्रिया की गति के प्रभाव को कोई नहीं जान पाता है। तब सुबुद्धि रूपी चतुर सखी बोली कि हँसा कार क्रिया बहुत तेज वाली होती है। इसे छोटा मत समझिए। कहँ कुंभज कहँ सिंधु अपारा। सोषेउ सुजसु सकल संसारा।। रबि मंडल देखत लघु लागा। उदयँ तासु त्रिभुवन तम भागा।। व्याख्या : सुबुद्धि रूपी सखी आगे कहती हैं कि कुंभज क्रिया के द्वारा भावों के अपार समुद्र को सुखा दिया जाता है, जिससे संसार का आभास ही मिट जाता है। अत: साधना की हँसाकार क्रिया का असर वैसे ही होता है जैसे सूर्य दिखने में छोटा लगता है परन्तु तीनों लोकों के अंधकार का नाश हो जाता है। अत: उसी प्रकार आत्मा रूपी सूर्य देखने में छोटा लगता है परन्तु उदित होने पर सत, रज व तम गुणों के अंधकार का नाश कर देता है। दो0 मंत्र परम लघु जासु बस बिधि हरि हर सुर सर्ब। महामत्त गजराज कहुँ बस कर अंकुस खर्ब।।256।। व्याख्या : यहाँ क्रिया (विधि) के महत्व पर बल दिया गया है कि मंत्र छोटा होता है परन्तु मंत्र की क्रिया (विधि) से माया का हरण हो जाता है तथा साधक स्वयं माया का हरण करने वाला बन जाता है तथा मंत्र के प्रभाव से भाव भी वश में आ जाते हैं। मंत्र का प्रभाव वैसे ही होता है जैसे एक विशालकाय हाथी को छोटा सा अंकुश वश में कर लेता है, वैसे ही छोटा सा मंत्र विशाल संसार सागर से पार लगा देता है। काम कुसुम धनु सायक लीन्हे। सकल भुवन अपने बस कीन्हे।। देबि तजिअ संसउ अस जानी। भंजब धनुष राम सुनु रानी।। व्याख्या : काम का भाव वासनारूपी फूलों के धनुष को हाथ में लेकर जब समस्त भावों को अपने वश में कर लेता है, तो ऐसा विचारकर हृदय में संशय मत कीजिए क्योंकि सूक्ष्म आत्मा रूपी राम निश्चित रूप से अपने तेज के प्रकाश से अज्ञान रूपी धनुष को तोड़ देंगे। सखी बचन सुनि भै परतीती। मिटा बिषादु बढ़ी अति प्रीती।। तब रामहि बिलोकि वैदेही। सभय हृदयँ बिनवति जेहि तेही।। व्याख्या : सद्बुद्धि रूपी चतुर सहेली की बात सुनकर दिव्यदृष्टि रूपी सुनयना को विश्वास हो गया कि आत्मा रूपी राम अज्ञान रूपी धनुष को तोड़ देंगे। जिससे सुनयना का दु:ख मिट गया और आत्मा रूपी राम के प्रति प्रेम बढ़ गया। उस अवस्था में सुरता रूपी सीता ने आत्मा रूपी राम को देखा और भयपूर्वक हृदय में प्रार्थना करने लगी। मनहीं मन मनाव अकुलानी। होहु प्रसन्न महेस भवानी।। करहु सफल आपनि सेवकाई। करि हितु हरहु चाप गरूआई।। व्याख्या : उस ध्यान की अवस्था में सुरता रूपी सीता व्याकुल होकर मन ही मन मनाने लगती है कि हे विश्वास रूपी महेश और श्रद्धा रूपी भवानी! आप प्रसन्न हुजिए। आप आज मेरी साधना को सफल कर दीजिए और अज्ञान रूपी धनुष के भार को दूर कर दीजिए। गननायक बर दायक देवा। आजु लगें कीन्हिउँ तुअ सेवा।। बार बार बिनती सुनि मोरी। करहु चाप गुरुता अति थोरी।। व्याख्या : हे गुणों के नायक व भावों को वर देने वाले! मैंने आज के दिन के लिए ही आपकी सेवा की है। अत: मेरी आपसे बार-बार प्रर्थना है कि अज्ञान रूपी धनुष के प्रभाव को कम कर दीजिए। दो0 देखि देखि रघुबीर तन सुर मनाव धरि धीर। भरे बिलोचन प्रेम जल पुलकावली सरीर।।257।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम को बार-बार देखकर सुरता रूपी सीता बार-बार देवताओं को मनाती है अर्थात् जब सुरता परमात्मा में लीन होने के लिए चलती है, तो स्वत: ही दैवीय वृतियाँ प्रबल होने लग जाती हैं और आँखों में आँसुओं की धारा बह उठती है तथा शरीर में रोमांच उठने लग जाता है। नीके निरखि नयन भरि सोभा। पितु पनु सुमिरि बहुरि मनु छोभा।। अहह तात दारूनि हठ ठानी। समुझत नहिं कछु लाभु न हानी।। व्याख्या : तब ध्यान में सुरता परमात्मा में स्थिर होने लगती है तो उस समय सुरता को जो सूक्ष्म अनुभूति होती है, उसी को यहाँ लिखा गया है कि सुरता रूपी सीता ने आत्मा रूपी राम की शोभा को अच्छी तरह देखा परन्तु प्राणरूपी जनक के प्रण (स्वभाव) को देखकर मन में क्षोभ पैदा हो गया। क्योंकि सुरता तो परमात्मा में लीन होना चाहती है परन्तु प्राण का स्वभाव (प्रण) होता है कि जब तक अज्ञान का नाश नहीं हो जाता तब तक सुरता परमात्मा में लीन नहीं हो सकती है। सुरता रूपी सीता को लगता है कि प्राण रूपी पिता कुछ भी लाभ व हानि को नहीं समझते हैं। सचिव सभय सिख देइ न कोई। बुध समाज बड़ अनुचित होई।। कहँ धनु कुलिसहु चाहि कठोरा। कहँ स्यामल मृदुगात किसोरा।। व्याख्या : सुरता रूपी सीता मन में विचार करती हैं कि प्राण रूपी पिता के सचिव अर्थात् कुछ प्रधान भाव भी नहीं समझा रहे हैं क्योंकि वे भी भयभीत हैं। क्योंकि उनको लगता है कि विद्वानों के समाज में यह अनुचित होगा। वास्तविकता में यह होता है कि जब सुरता आत्मा में लीन होना चाहती है तो प्राण से उत्पन्न भावों में भय सा पैदा हो जाता है और नाना विचार आने लगते हैं तथा कुछ विद्वान वृति के भावों को सुरता का लीन होना अनुचित लगने लगता है क्योंकि उनको लगता है कि इससे तो संसार का अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा और उन्हें यह भी लगने लगता है कि अज्ञान रूपी धनुष का टूटना सम्भव नहीं है। क्योंकि अज्ञान रूपी धनुष बहुत कठोर होता है और आत्मा का स्वभाव तो सरल व किशोर होता है। बिधि केहि भाँति धरौं उर धीरा। सिरस सुमन कन बेधिअ हीरा।। सकल सभा कै मति भै भोरी। अब मोहि संभुचाप गति तोरी।। व्याख्या : सुरता रूपी सीता विचार करती है कि किस क्रिया (विधि) से मैं हृदय में धैर्य धारण करूँ। सिरस सुमन अर्थात् वासनाओं के रस की चाह होने पर क्या अज्ञान रूपी कठोर हीरा का छेदन किया जा सकता है? इसलिए सभी भाव रूपी समाज की बुद्धि भ्रमित हो गयी है। अत: मुझे तो अब स्वयं के भ्रम से उत्पन्न अज्ञान की गति को ही समझना होगा। जीव स्वयं के भ्रमजाल में फँसा रहता है परन्तु जब सुरता परमात्मा में लीन होने लग जाती है तब यह भ्रम का जाल समझ में आने लग जाता है। निज जड़ता लोगन्ह पर डारी। होहि हरुअ रघुपतिहि निहारी।। अति परिताप सीय मन माहीं। लव निमेष जुग सय सम जाहीं।। व्याख्या : जीव जब तक भ्रम के जाल में फँसा रहता है, तब तक वह स्वयं के अज्ञान को दूसरों पर थोपता रहता है, परन्तु जब सुरता निर्मल हो जाती है तो आत्मा के प्रकाश को देखकर अज्ञानता का हरण करने लग जाती है। अज्ञान के भ्रम का सुरता रूपी सीता के मन में बहुत परिताप रहता है, इसलिए क्षण मात्र का समय भी युगों के बराबर लगने लग जाता है। दो0 प्रभुहि चितइ पुनि चितव महि राजत लोचन लोल। खेलत मनसिज मीन जुग जनु बिधु मंडल डोल।।258।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में सुरता कभी तो परमात्मा को देखने लगती है और कभी शरीर रूपी पृथ्वी को देखने लगती है। अर्थात् सुरता कभी तो परमात्मा में लीन होने लगती है और कभी पुन: संसार के चिन्तन में लग जाती है। यह अवस्था ध्यान में अच्छी तरह स्पष्ट हो पाती है। उस समय साधक के नयनों के तारे बहुत शोभा पाने लगते हैं और ऐसा लगने लगता है जैसे चन्द्रमा के आकार में अर्थात् भावों की शीतलता में मन के भाव खेल रहे हों। उस समय वासनाएँ शान्त होने के कारण भावों में चन्द्रमा के समान शीतलता बनी रहती है। गिरा अलिनि मुख पंकज रोकी। प्रगट न लाज निसा अवलोकी।। लोचन जलु रह लोचन कोना। जैसे परम कृपन कर सोना।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में वाणी रूपी भ्रमरी मुख रूपी कमल में मौन हो जाती है और अज्ञान रूपी रात्रि को देखकर प्रकट नहीं होती है। वाणी की मौनता ही परम ज्ञान की अवस्था होती है और ज्योंहि वाणी प्रस्फूटित होना शु डिग्री होती है, माया का आवरण आना शु डिग्री हो जाता है। उस अवस्था में जब वाणी मौन हो जाती है, तो नेत्रों में भी स्थिरता आ जाती है जैसे कृपण के पास सोना जमा होकर स्थिर हो जाता है। सकुची ब्याकुलता बड़ि जानी। धरि धीरजु प्रतीति उर आनी।। तन मन बचन मोर पनु साचा। रघुपति पद सरोज चितु राचा।। व्याख्या : सुरता जब कुछ भावों के प्रभाव के कारण व्याकुल हो जाती है, तो पुन: धैर्य धारण करके परमात्मा के प्रति हृदय में विश्वास पैदा करके तन, मन व वचन से परमात्मा के चरण कमलों में पुन: चित को अनुरक्त कर लेती है। उसी अनुभूति को यहाँ ""चितु राचा"" बोलकर लिखा है। तौ भगवानु सकल उर बासी। करिहि मोहि रघुबर कै दासी।। जेहि के जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू।। व्याख्या : तब सुरता रूपी सीता के मन में विचार आता है कि अगर परमात्मा सबके हृदय में निवास करने वाले हैं, तो मुझे अपनी दासी बना लेंगे अर्थात् सुरता को अपने-आप में लीन कर लेंगे। क्योंकि यह एक वैज्ञानिक सत्य होता है कि जिसका जिस पर सत्य स्नेह होता है, वो उसे निश्चित रूप से मिल जाता है। प्रभु तन चितइ प्रेम तन ठाना। कृपानिधान राम सबु जाना।। सियहिं बिलोकि तकेउ धनु कैसें। चितव ग डिग्री डिग्री लघु ब्यालहि जैसें।। व्याख्या : परमात्मा तो शरीर स्थित चित के स्वरूप हैं, जो प्रेमवश शरीर धारण करते हैं। परम कृपालु आत्मा रूपी राम तो सब कुछ जानने वाले होते हैं। इसलिए सुरता रूपी सीता को देखकर अज्ञान रूपी धनुष को ऐसे देखे जैसे गरूड़ पक्षी किसी बहुत छोटे सर्प को देखता है। दो0 लखन लखेउ रघुबंसमनि ताकेउ हर कोदंडु। पुलकि गात बोले बचन चरन चापि ब्रह्मांडु।।259।। व्याख्या : जब कुण्डलिनि शक्ति जागृत होकर ब्रह्माण्ड में पहुँचने लगती है, तो उसी अवस्था को लक्ष्मण रूपी भाव जान जाते हैं और तब लखन भाव को समझ में आने लग जाता है कि अब आत्मा के प्रकाश से अज्ञान रूपी धनुष टूट जायेगा। उस अवस्था में साधक के शरीर में कम्पन होने लग जाता है और शरीर पुलकित हो उठता है, इसलिए लक्षणों को जाननेवाला लखन रूपी भाव दृढ़ता ले आता है और अन्य भावों को बोलने लगता है कि -- दिसिकुंजरहु कमठ अहि कोला। धरहु धरनि धरि धीर न डोला।। रामु चहहिं संकर धनु तोरा। होहु सजग सुनि आयसु मोरा।। व्याख्या : हे दिग्गजों, कश्छप, शेष व वाराह! आप शरीर रूपी धरती को धैर्यपूर्वक धारण करो। जिससे हिले नहीं क्योंकि आत्मारूपी राम शंका के अज्ञान रूपी धनुष को तोड़ना चाह रहे हैं। अत: आप सब मेरी आज्ञा सुनकर सावधान हो जावो। शरीर में स्थित दस प्राण ही दस दिग्गज होते हैं और इन्द्रियों का चित में समा जाना ही कश्छप का प्रतीक है तथा कुण्डलिनि ही शेष का प्रतीक है तथा दस इन्द्रियाँ, मन व बुद्धि ये संसार के बाराह रास्ते हैं, जो वाराह का प्रतीक हैं। अत: लखन रूपी भाव कहता है कि दसों प्राण स्थिर हो जाओ, इन्द्रियाँ चित में समा जाओ, कुण्डलिनि शक्ति जागृत हो जावो और संसार के बारह रास्ते परमात्मोन्मुखी हो जावो, जिससे आत्मा रूपी राम प्रकाशित होकर अज्ञान के धनुष को तोड़ सकें। चाप समीप रामु जब आए। नर नारिन्ह सुर सुकृत मनाए।। सब कर संसउ अ डिग्री अग्यानू। मंद महीपन्ह कर अभिमानू।। व्याख्या : जब आत्मा रूपी राम अज्ञान रूपी धनुष के पास आए तो शरीर स्थित नर-नाड़ियों व स्वरों से सद्गुण के भाव पैदा होने लग गए। जिससे सब का संशय, अज्ञान व मंद भाव रूपी राजाओं का अभिमान मंद पड़ने लगा। भृगुपति केरि गरब गरूआई। सुर मुनि बरन्ह केरि कदराई।। सिय कर सोचु जनक पछितावा। रानिन्ह कर दारून दुख दावा।। व्याख्या : जब साधक को अपनी साधना व ज्ञान का अभिमान हो जाता है, तो वह अपने आपको प्रकृति का स्वामी व सिद्ध मानने लग जाता है, उसी को प्रतीक रूप में भृगु अ पति उ भग अ पति अर्थात् प्रकृति की वृतियों को वश में करने वाला कहा जाता है। प्रकृति को वश में करने का गर्व अज्ञान रूपी धनुष की गरूता अर्थात् जड़ता को और बढ़ा देता है। अत: आत्मा रूपी राम के प्रकाशित होने पर भृगुपति की गर्वता, स्वर व मन के भावों की कायरता, सुरता रूपी सीता की चिन्ता, प्राण रूपी जनक का पश्चाताप, दिव्यदृष्टि व बुद्धि रूपी रानियों का दु:ख। संभु चाप बड़ बोहितु पाई। चढ़े जाइ सब संगु बनाई।। राम बाहुबल सिंधु अपारू। चहत पा डिग्री नहिं कोउ कड़हारू।। व्याख्या : ये सब स्वयं के अज्ञान रूपी धनुष को पाकर उस पर समाज बनाकर चढ़ गए। अर्थात् स्वयं के अज्ञान के कारण ही दम्भ, गर्व, कायरता, चिन्ता व पश्चाताप के विकार पैदा होते हैं, जो सब एक दूसरे का सहयोग करते हुए अपना समाज बना लेते हैं। आत्मा रूपी राम के बल पर भाव रूपी अपार समुद्र को ये सब अज्ञान का समाज पार होना चाहता है परन्तु इनका कोई केवट नहीं है। दो0 राम बिलोके लोग सब चित्र लिखे से देखि। चितई सीय कृपायतन जानी बिकल बिसेषि।।260।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने सब भावों को देखा और फिर सुरता रूपी सीता को देखा, तो उन्हें विशेष व्याकुल जाना। देखी बिपुल बिकल बैदेही। निमिष बिहात कलप सम तेही।। तृषित बारि बिनु जो तनु त्यागा। मुएँ करइ का सुधा तड़ागा।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम ने सुरता रूपी सीता को बहुत व्याकुल देखा कि एक-एक क्षण कल्प के समान बीत रहे थे। तब आत्मा रूपी राम ने सोचा कि अगर कोई प्यासा बिना पानी के शरीर छोड़ देता है, तो मरने के बाद अमृत का सरोवर किस काम का अर्थात् समय पर अगर युक्ति नहीं प्रयोग की तो क्या लाभ होगा? का बरषा सब कृषी सुखानें। समय चुकें पुनि का पछितानें।। अस जियँ जानि जानकी देखी। प्रभु पुलके लखि प्रीति बिसेषी।। व्याख्या : जब खेती सूख जाए तब वर्षा होने का क्या लाभ है? इसलिए समय निकल जाने पर पश्चाताप करने से क्या फायदा है? अत: ऐसा विचार कर आत्मा रूपी राम ने सुरता रूपी (प्राणशक्ति) सीता को देखा और सुरता की विशेष प्रीत को देखकर आत्मा रूपी राम बहुत पुलकित हो गए। गुरहिं प्रनामु मनहिं मन कीन्हा। अति लाघवँ उठाइ धनु लीन्हा।। दमकेउ दामिनि जिमि जब लयऊ। पुनि नभ धनु मंडल सम भयऊ।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने मन ही मन में गुरुशक्ति को प्रणाम किया और अज्ञान रूपी धनुष को बहुत छोटा जानकर उठा लिया। यहाँ कुण्डलिनि जागृत होने की अवस्था की अनुभूति का वर्णन किया गया है। क्योंकि जब कुण्डलिनि शक्ति सहस्रसार चक्र में पहुँचती है, तो प्रकाश पुँज प्रकट हो जाता है और बिजली सी कौंध उठती है और फिर वह प्रकाश समस्त आकाश में मंडल के समान समा जाता है। उसी को ""दमकेउ दामिनि"" बोलकर लिखा गया है। लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़ें। काहुँ न लखा देख सबु ठाढ़ें।। तेहि छन राम मध्य धनु तोरा। भरे भुवन धुनि घोर कठोरा।। व्याख्या : जब कुण्डलिनि शक्ति ब्रह्मरन्ध्र में चढ़ती है, तो चढ़ता व खींचता हुआ कोई नहीं देख पाता है तथा किसी भी भाव को समझ में नहीं आता है। परन्तु ब्रह्मरन्ध्र में कुण्डलिनि शक्ति के चढ़ जाने पर आत्मा रूपी राम अज्ञान रूपी धनुष को बीच में से तोड़ देते हैं, जिसका प्रभाव समस्त भावों के कोषों में छा जाता है। उसी को ""धुनि घोर कठोरा"" बोलकर लिखा गया है। आगे के छन्द में कुण्डलिनि शक्ति के जागृत हो जाने की अनुभूति का वर्णन है। छ0 भरे भुवन घोर कठोर रव रबि बाजि तजि मारगु चले। चिक्करहिं दिग्गज डोल महि अहि कोल कुरूम कलमले।। सुर असुर मुनि कर कान दीन्हें सकल बिकल बिचारहीं। कोदंड खंडेउ राम तुलसी जयति बचन उचारहीं।। व्याख्या : कुण्डलिनि शक्ति के जागृत हो जाने पर सारे भावों के कोषों में जो माया का आवरण था, वह हट गया और सूर्य के घोड़े मार्ग छोड़कर चलने लगे अर्थात् साधक के ज्ञान रूपी सूर्य की वृतियाँ बदल गयी। दिग्गजों अर्थात् प्राणों में हलचल मच गयी, जिससे शरीर रूपी पृथ्वी हिल गयी और शेष, वाराह व कूर्म हिलने लगे अर्थात् चित की अवस्था में हलचल मच गयी। सुर-असुर अर्थात् दैवीय व आसुरी भावों में व्याकुलता छा गयी, परन्तु जब यह निश्चित हो गया कि आत्मा रूपी राम ने अज्ञान रूपी धनुष को तोड़ दिया है, तो सब आत्मा रूपी राम की जय जयकार बोलने लगे। सो0 संकर चापु जहाजु साग डिग्री रघुबर बाहुबलु। बूड़ सो सकल समाजु चढा जो प्रथमहिं मोह बस।।261।। व्याख्या : अत: अब कुण्डलिनि के जागृत हो जाने के कारण शंका रूपी अज्ञान के जहाज पर मोहवश चढ़ा हुआ समाज डूब गया क्योंकि आत्मा रूपी राम की ज्ञान रूपी भुजाओं का बल अथाह समुद्र है। अर्थात् शंका रूपी अज्ञान के धनुष के टूट जाने पर कायरता, गर्व, चिन्ता व मोह रूपी सभी भावों का भी नाश हो जाता है। प्रभु दोउ चापखंड महि डारे। देखि लोग सब भए सुखारे।। कौसिक रूप पयोनिधि पावन। प्रेम बारि अवगाहु सुहावन।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम ने अज्ञान रूपी धनुष के शंका व मोह रूपी दो टुकड़े कर दिए, जिसे देखकर सभी भाव रूपी लोग बहुत सुखी हुए। फिर कोशिकाओं रूपी पवित्र समुद्र में प्रेम रूपी अथाह जल भर गया अर्थात् कुण्डलिनि शक्ति के जागृत हो जाने से मस्तिष्क की समस्त कोशिकाओं में प्रेम के भाव पैदा हो गए। रामरूप राकेसु निहारी। बढ़त बीचि पुलकावलि भारी।। बाजे नभ गहगहे निसाना। देव बधू नाचहिं करि गाना।। व्याख्या : उस प्रेम रूपी जल में आत्मा रूपी चन्द्रमा को देखकर लहरें उठने लगती हैं और ब्रह्मरन्ध्र में अनहद नाद की ध्वनि उठने लगती है और सात्विक इच्छाएँ गाना गा-गा कर नाचने लगती हैं। ब्रह्मादिक सुर सिद्ध मुनीसा। प्रभुहिं प्रसंसहि देहिं असीसा।। बरिसहिं सुमन रंग बहु माला। गावहिं किन्नर गीत रसाला।। व्याख्या : सात्विक देवीय भाव, सिद्ध भाव व मन को वश में करने वाले भाव आत्मा रूपी राम की प्रशंसा करने लगते हैं और आशीष देने लगते हैं अर्थात् आत्म बल को बढ़ाने लगते हैं। उस अवस्था में सु अ मन उ सुमन अर्थात् मन के अच्छे भावों की वर्षा होने लग जाती है और बहुत प्रकार के अच्छे भाव पैदा होने लग जाते हैं। उस अवस्था में किन्नर प्राण वायु बहुत बलवान हो उठती है, जिससे परमात्मा की स्तुति गाने के भाव उठने लगते हैं। रही भुवन भरि जय जय बानी। धनुष भंग धुनि जात न जानी।। मुदित कहहिं जहँ तहँ नर नारी। भंजेउ राम संभुधनु भारी।। व्याख्या : सारे भावों के कोषों में परमात्मा की जय जयकार की ध्वनि भर गयी, जिससे अज्ञान रूपी धनुष टूटने की ध्वनि सुनाई देनी ही बन्द हो गयी अर्थात् अज्ञान का निवारण हो गया। यह आभास भी मिट गया। सहज में ही शरीर स्थित सब नर-नाड़ी प्रसन्न हो गए और कह रहे हैं कि आत्मा रूपी राम ने स्वयं के अज्ञान रूपी धनुष को तोड़ दिया। दो0 बंदी मागध सूतगन बिरूद बदहिं मतिधीर। करहिं निछावरि लोग सब हय गय धन मनि चीर।।262।। व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में समस्त बंदी भाव, धीर बुद्धि वाले, गुणों को सूत में पिरोनेवाले भाव आत्मा रूपी राम की कीर्ति का बखान करने लगते हैं और उस समय सभी भाव घोड़े, हाथी, धन, मणियों व वस्त्रों को निछावर करने लगते हैं। अर्थात् सभी भाव संग्रह, मोह, भोग व वासना की वृतियों से मुक्त होने लग जाते हैं। झाँझि मृदंग संख सहनाई। भेरि ढोल दुंदुभी सुहाई।। बाजहिं बहु बाजने सुहाए। जहँ तहँ जुबतिन्ह मंगल गाए।। व्याख्या : जब कुण्डलिनि शक्ति के दिव्य प्रकाश से अज्ञान का नाश हो जाता है, तो उस समय सभी भाव शान्त हो जाते हैं और भावों के शान्त हो जाने पर प्राण के निर्मल प्रवाह से नाना प्रकार की आवाजें आने लगती हैं। उन्हीं आवाजों को नाना साधकों ने झाँझ, मृदंग, शंख, शहनाई, बेरि, ढोल व सुहावने नगाड़े बजने के प्रतीकों के माध्यम से बताया है। उस समय मंगल कामना की नाना इच्छाएँ उठने लगती हैं। उसी को ""जुबतिन्ह मंगल गाए"" बोलकर लिखा गया है। सखिन्ह सहित हरषी अति रानी। सूखत धान परा जनु पानी।। जनक लहेउ सुखु सोचु बिहाई। तैरत थकें थाह जनु पाई।। व्याख्या : उस अवस्था में सद्बुद्धि आदि रूपी सहेलियों सहित दिव्य दृष्टि रूपी रानी सुनयना बहुत हर्षित हुई जैसे सूखते हुए धान पर पानी पड़ गया हो। प्राण रूपी जनक को भी बहुत सुख मिला और चिन्ता मिट गयी जैसे तैरते हुए थक जाने पर किनारा मिल गया हो। यह वैज्ञानिक तथ्य है कि जब कुण्डलिनि शक्ति जागृत हो जाती है तो प्राण उर्ध्वगामी हो जाती है और भाव शान्त हो जाते हैं, जिससे सब प्रकार की चिन्ता मिट जाती है। श्रीहत भए भूप धनु टूटे। जैसें दिवस दीप छबि छूटे।। सीय सुखहि बरनिअ केहि भाँती। जनु चातकी पाइ जलु स्वाती।। व्याख्या : अज्ञान रूपी धनुष के टूट जाने पर माया के भाव रूपी राजा श्री हीन हो गए जैसे दिन के आ जाने पर दीपक प्रभावहीन हो जाता है। सुरता रूपी सीता के सुख का तो वर्णन कैसे किया जा सकता है। वे तो ऐसी खुश थी जैसे स्वाति नक्षत्र के जल की बूँद पाकर चातकी प्रसन्न हो जाती है। रामहि लखनु बिलोकत कैसें। ससिहि चकोर किसोरकु जैसें।। सतानंद तब आयसु दीन्हा। सीताँ गमनु राम पहिं कीन्हा।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम को लक्षणों को लखने वाला भाव ऐसे देखने लगता है, जैसे चन्द्रमा को चकोर का बच्चा देखता है अर्थात् लखन भाव भी आत्मा में लीन हो गया। तब सतानंद अर्थात् सत्य के आनंद ने प्रेरणा की और सुरता रूपी सीता आत्मा रूपी राम के पास चली गयी। सो0 संग सखीं सुंदर चतुर गावहिं मंगलाचार। गवनी बाल मराल गति सुषमा अंग अपार।।263।। व्याख्या : सुरता रूपी सीता के साथ करूणा, दया, मैत्री व क्षमादि सुंदर सखियाँ मंगल आचरण के गीत गाने लगती हैं अर्थात् मंगलभावना की इच्छाएँ पैदा होने लगती हैं। जब सुरता आत्मा में लीन होने को चलती है, तो उसकी गति बाल हंस की तरह अर्थात् प्राणशक्ति हकार सकार की गति से चलने लगती है, जिससे समस्त अंगों में शोभा छा जाती है अर्थात् पूरी तरह से निर्विकार अवस्था आ जाती है। उसी को ""गवनी बाल मराल गति"" बोलकर लिखा है। सखिन्ह मध्य सिय सोहति कैसें। छबिगन मध्य महाछबि जैसें।। कर सरोज जयमाल सुहाई। बिस्व बिजय सोभा जेहिं छाई।। व्याख्या : दया, क्षमा, मैत्री व करूणादि सखियों के बीच में सुरता रूपी सीता ऐसे शोभा पा रही हैं, जैसे कोई महाछवि अनेक छवियों के बीच में पाती है। सुरता रूपी सीता के कर कमलों में जय माला सुशोभित हो रही है, जिसमें विश्व विजय की शोभा छा रही है। जब सुरता आत्मा में लीन होने लगती है, तो माया के सब भाव शान्त हो जाते हैं, जिससे संसारिकता मिट जाती है और संसारिकता मिट जाना ही विश्व विजय कहलाता है। तन सकोचु मन परम उछाहू। गूढ़ प्रेमु लखि परइ न काहू।। जाइ समीप राम छबि देखी। रहि जनु कुअँरि चित्र अवरेखी।। व्याख्या : सुरता के आत्मा में लीन होने पर तन सकोचु अर्थात् इन्द्रियाँ चित में समा जाती हैं और मन में परम उत्साह छा जाता है। उस समय जो परमात्मा के प्रति गूढ़ प्रेम पैदा होता है, उसको कोई नहीं जान पाता है। जब सुरता रूपी सीता आत्मा रूपी राम को नजदीक से देखती है अर्थात् जब सुरता आत्मा में लीन होती है, तो सुरता एकदम स्थिर हो जाती है। चतुर सखीं लखि कहा बुझाई। पहिरावहु जयमाल सुहाई।। सुनत जुगल कर माल उठाई। प्रेम बिबस पहिराइ न जाई।। व्याख्या : तब दया, क्षमा, मैत्री व करूणादि चतुर सहेलियों ने सुरता की गति को जान लिया और सुरता को आत्मा में लीन होने के लिए बल प्रदान किया। तब आत्मा रूपी राम व सुरता रूपी सीता दोनों ने जयमाल उठायी परन्तु प्रेम के वशीभूत होने के कारण पहना नहीं पा रहे हैं। वास्तविकता में यह होता है कि जब साधना में प्रेम भाव पैदा हो जाते हैं, तो सुरता जब लीन होना चाहती है, तो प्रेमाभक्ति के भाव सुरता को लीन होने में बाधा देने लगते हैं। उसी को यहाँ ""प्रेम विवश पहिराइ न जाई"" कहा गया है। सोहत जनु जुग जलज सनाला। ससिहि सभीत दे जयमाला।। गावहिं छबि अवलोकि सहेली। सियँ जयमाल राम उर मेली।। व्याख्या : ध्यान में सुरता जब ब्रह्मरन्ध्र स्थित परमानन्द कोष में पहुँच जाती है, तो आत्मा और सुरता दोनों कमल की तरह लगते हैं। इसलिए बहुत से साधना पंथों में ब्रह्मरन्ध्र के ध्यान को कमल खिलने के प्रतीक के रूप में बताया गया है। उसी अनुभूति को यहाँ ""जुग जलज सनाला"" कहकर लिखा गया है। उस समय ऐसा लगता है कि चन्द्रमा को अर्थात् विषय-वासनाओं को सभय जीता जा रहा हो अर्थात् जब ध्यान में ज्ञान की अनुभूति होने लगती है, तो विषय वासनाएँ चन्द्रमा की तरह शीतल होने लग जाती हैं परन्तु इच्छाओं का भय व्याप्त ही रहता है, इसलिए उसी अवस्था को ""ससिहि सभीत देत जयमाला"" कहा गया है। उस परमानन्द की अवस्था को देखकर मंगल भावना रूपी सहेलियाँ मंगल गीत गाने लगती हैं, जिससे सुरता रूपी सीता को बल व उत्साह मिलने लगता है और आत्मा में लीनता बढ़ जाती है। उसी को ""सियँ जयमाल राम उर मेली"" बोलकर लिखा गया है। सो0 रघुबर उर जयमाल देखि देव बरिसहिं सुमन। सकुचे सकल भुआल जनु बिलोकि रबि कुमुदगन।।264।। व्याख्या : सुरता रूपी सीता को आत्मा रूपी राम में लीन देखकर देव भाव प्रसन्न हो जाते हैं, जिससे सुमन उ सु अ मन अर्थात् मन के अच्छे भावों की अवस्था आ जाती है। तब उस परम अवस्था को देखकर समस्त माया के भाव संकुचित हो जाते हैं अर्थात् अज्ञान के भाव मिट जाते हैं जैसे सूर्य को देखकर कुमुदों के समूह सिकुड़ जाते हैं। पुर अ डिग्री ब्योम बाजने बाजे। खल भए मलिन साधु सब राजे।। सुर किन्नर नर नाग मुनीसा। जय जय जय कहि देहिं असीसा।। व्याख्या : जब सुरता आत्मा में लीन होने लगती है तो समस्त भाव शान्त हो जाते हैं, जिससे शरीर और मस्तिष्क में प्राण के प्रवाह की नाना आवाजें सुनाई पड़ने लगती हैं। उन्हीं आवाजों को ढोल-मृदंग, झाँझ आदि नामों के प्रतीकों से समझाने का प्रयास किया गया है। कुछ साधना पंथों में इसी को अनहद नाद बताया गया है। सुरता के आत्मा में लीन होने पर आसुरी भाव मलिन अर्थात् निष्प्रभावी हो जाते हैं और साधु भाव प्रबल होकर आसुरी भावों पर राज करने लगते हैं। उस अवस्था में समस्त स्वर, किन्नर व नाग प्राण तथा नर की धड़कन से उत्पन्न भाव सब परमात्मा की जय जय कार करने लगते हैं और उस अवस्था में साधक आशीर्वाद देने की अवस्था को प्राप्त कर लेता है। नाचहिं गावहिं बिबुध बधूटीं। बार बार कुसुमांजलि छूटीं।। जहँ तहँ बिप्र बेदधुनि करहीं। बंदी बिरिदावलि उच्चरहीं।। व्याख्या : उस अवस्था में परम ज्ञान की तरंगे उठने लगती हैं और बार-बार आनन्द की उमंग उठने लगती हैं। उस अवस्था में साधक के प्रत्येक चक्र पर वेदों की नाना अनुभूतियाँ होने लग जाती हैं तथा वन्दना के भाव अपने आप उच्चारित होने लग जाते हैं। महि पाताल नाक जसु ब्यापा। राम बरी सिय भंजेउ चापा।। करहिं आरती पुर नर नारी। देहिं निछावरि बित्त बिसारी।। व्याख्या : पृथ्वी, पाताल व स्वर्ग लोक अर्थात् नख से शिखर तक समस्त लोकों में यह यश फैल गया कि आत्मा रूपी राम ने अज्ञानता रूपी धनुष को तोड़कर सुरता रूपी सीता का वरण कर लिया। अर्थात् आत्मा में सुरता लीन हो गयी। उस अवस्था से शरीर स्थित समस्त नर-नाड़ियाँ विकारों से मुक्त हो गयी, इसलिए प्रारब्ध का त्याग करके विकारों का त्याग करने लग गयी। सोहति सीय राम कै जोरी। छबि सिंगा डिग्री मनहुँ एक ठोरी।। सखीं कहहिं प्रभु पद गहु सीता। करति न चरन परस अति भीता।। व्याख्या : उस ध्यान की परम अवस्था में सुरता रूपी सीता और आत्मा रूपी राम की जोड़ी ऐसे सुशोभित हो रही होती है जैसे मानो श्रृंगार और छवि दोनों एक ही हों। उस समय दया, करूणा, मैत्री व क्षमादि रूपी सहेलियाँ सुरता से कहती हैं कि आत्मा रूपी राम के पैर छुओ अथवा पूरी तरह समर्पण कर दो, परन्तु सुरता रूपी सीता भय के कारण नहीं कर पा रही है। वास्तव में ध्यान में जब सुरता आत्मा में लीन हो जाती है, तो वह निरन्तर परमात्मा में ही लीन रहना चाहती है और दया, मैत्री आदि के भाव भी निरन्तर लीन रहने के लिए बल प्रदान करने लगते हैं, परन्तु अति सूक्ष्म जग की कुछ इच्छाएँ सुरता को पुन: संसार में लाने का प्रयास करती रहती हैं। उन्हीं जागतिक इच्छाओं के कारण ही सुरता रूपी सीता को भय का आभास होता रहता है। दो0 गौतम तिय गति सुरति करि नहिं परसति पग पानि। मन बिहसे रघुबंसमनि प्रीति अलौकिक जानि।।265।। व्याख्या : ध्यान में सुरता रूपी सीता गौतम उ गौ अ उत्तम उ अर्थात् इन्द्रियों के पवित्र हो जाने पर अहिल्या उ अहि अ ल्या उ अर्थात् वासनाओं का उद्धार हो जाता है यानी वासनाएँ शान्त हो जाती हैं, इसलिए कुछ जागतिक इच्छाओं के मिट जाने के भय से आत्मा रूपी राम के सामने सुरता पूरी तरह समर्पण करने से डरती हैं। इस अलौकिक प्रेम को देखकर आत्मा रूपी राम मुस्कुराने लगते हैं। तब सिय देखि भूप अभिलाषे। कूर कपूत मूढ़ मन माखे।। उठि उठि पहिरि सनाह अभागे। जहँ जहँ गाल बजावन लागे।। व्याख्या : सुरता रूपी सीता की उस अवस्था को देखकर जिसमें आत्मा रूपी राम के सामने पूरी तरह समर्पण करने से डरती हैं अर्थात् सुरता का जागतिक इच्छाओं का थोड़ा मोह देखकर आसुरी भावों रूपी कुछ राजा सीता को प्राप्त करने के लिए ललचा उठे। तब आसुरी, दुष्टता, कपटी व मूढ़ता वाले भाव तमतमा उठे अर्थात् इन भावों को थोड़ा बल मिलने लगा। इसलिए ये आसुरी दुष्ट भाव वासना रूपी कवच लगाकर भोग लालसा रूपी गाल बजाने लगे। लेहु छड़ाइ सीय कह कोऊ। धरि बाँधहु नृप बालक दोऊ।। तोरें धनुषु चाड़ नहिं सरई। जीवत हमहि कुअँरि को बरई।। व्याख्या : जब माया के भावों को थोड़ा बल मिलने लग जाता है, तो वे तुरन्त उत्पात मचाना शु डिग्री कर देते हैं और सुरता को माया की तरफ खींचने का प्रयास करने लगते हैं। अत: उसी अनुभूति को प्रतीकों के माध्यम से यहाँ लिखा गया है कि सुरता रूपी सीता को जबरदस्ती माया जाल में फँसा लो और आत्मा रूपी राम व लखन भाव को भी माया के बंधन में बाँध लो। क्योंकि केवल अज्ञान रूपी धनुष को तोड़ने से काम नहीं चलेगा। हमारे (माया के भावों) रहते हुए सुरता रूपी सीता को कोई कैसे वर सकता है। जौं बिदेहु कछु करै सहाई। जीतहु समर सहित दोउ भाई।। साधु भूप बोले सुनि बानी। राज समाजहि लाज लजानी।। व्याख्या : माया के भाव कहते हैं कि अगर प्राण रूपी जनक आत्मा रूपी राम की सहायता करें, तो दोनों भाईयों सहित प्राण रूपी जनक को भी युद्ध में जीत लेंगे। ऐसी बातें सुनकर सात्विक भाव बोलने लगते हैं कि भाव रूपी समाज को आसुरी भावों की बातें सुनकर लज्जा आ रही है। बलु प्रतापु बीरता बड़ाई। नाक पिनाकहि संग सिधाई।। सोइ सूरता कि अब कहुँ पाई। असि बुधि तौ बिधि मुँह मसि लाई।। व्याख्या : सात्विक भाव कहते हैं कि तुम्हारा अर्थात् माया के भावों का बल, प्रताप, वीरता व यश तो अज्ञान रूपी धनुष के टूटने पर स्वत: ही चला गया। अब क्या उसी शूरता के बल पर बात कर रहे हो या और कहीं से पायी है। क्योंकि तुम्हारी ऐसी बुद्धि है, तभी तो बिधि अर्थात् क्रिया द्वारा यानी ब्रह्ररन्ध्र में ध्यान लगाने से तुम्हारे मुख पर कालिख लगा है अर्थात् तुम इसलिए ही तो निष्प्रभावी हो गए हो। दो0 देखहु रामहि नयन भरि तजि इरिषा मदु कोहु। लखन रोषु पावकु प्रबल जानि सलभ जनि होहु।।266।। व्याख्या : साधु भाव कहते हैं कि तुम लोग ईर्ष्या, मद व क्रोध आदि का त्याग करके आत्मा रूपी राम को देख लो यानी परमात्मा में लीन हो जावो, अन्यथा लक्षणों को जानने वाला भाव तुम्हारे लक्षणों को पहचान जायेगा और तब उसकी क्रोध रूपी अग्नि में तुम सब जल जावोगे। इसलिए तुम वासना रूपी पतंगे मत बनो। बैन तेय बलि जिमि चह कागू। जिमि ससु चहै नाग अरि भागू।। जिमि चह कुसल अकारण कोही। सब संपदा चहै सिवद्रोही।। व्याख्या : जैसे गरूड़ का भाग कौआ चाहे, सिंह का भाग खरगोश चाहे, बिना कारण के ही क्रोध करने वाला कुशलता चाहे और शिवजी का सब प्रकार से विरोध करने वाले बहुत सी सम्पदा चाहे। लोभी लोलुप कल कीरति चहई। अकलंकता कि कामी लहई।। हरि पद बिमुख परम गति चाहा। तस तुम्हार लालचु नरनाहा।। व्याख्या : लोभी और लालची सुन्दर गति चाहे, कामी पुरुष क्या कभी निष्कलंक रह सकता है? परमात्मा के चरणों में जिसका प्रेम नहीं हो, क्या वह परम गति प्राप्त कर पाता है? हे भाव रूपी राजाओं! ऐसा ही लालच तुम्हारा है। कोलाहल सुनि सीय सकानी। सखीं लवाइ गईं जहँ रानी।। रामु सुभायँ चले गुरु पाहीं। सिय सनेह बरनत मन माहीं।। व्याख्या : भावों के आपसी कोलाहल को सुनकर सुरता रूपी सीता शंकित हो गयी, इसलिए दया, मैत्री, करूणा व क्षमादि रूपी सहेलियाँ सुरता रूपी सीता को दिव्यदृष्टि रूपी रानी के पास ले गयीं और आत्मा रूपी राम सहज में ही सुरता रूपी सीता के स्नेह का मन में वर्णन करते हुए विश्वामित्र रूपी गुरु के पास चले। रानिन्ह सहित सोच बस सीया। अब धौं बिधिहि काह करनीया।। भूप बचन सुनि इत उत तकहीं। लखनु राम डर बोलि न सकहीं।। व्याख्या : अब दिव्यदृष्टि व सद्बुद्धि रूपी रानियों सहित सुरता रूपी सीता चिन्ता में में पड़ गयी कि पता नहीं अब विधि अर्थात् क्रिया क्या करने वाली है। माया के भाव रूपी राजाओं की बातें सुनकर लक्ष्मण रूपी भाव इधर-उधर देखने लगता है, परन्तु आत्मा रूपी राम के डर के कारण कुछ बोल नहीं पाता है। दो0 अरुन नयन भृकुटि कुटिल चितवत नृपन्ह सकोप। मनहुँ मत्त गजगन निरखि सिंघ किसोरहि चोप।।267।। व्याख्या : तब लखन अर्थात् लक्षणों को लखने (जानने) वाले भाव की आँखें लाल और भौंहे टेढ़ी हो गयी तथा नर की धड़कन से उठने वाले माया के भावों को देखने लगा, जैसे हाथियों के झुण्ड को देखकर मानो सिंह के बच्चे को उत्साह आ गया हो। खरभ डिग्री देखि बिकल पुर नारीं। सब मिलि देहिं महीपन्ह गारीं।। तेहि अवसर सुनि सिवधनु भंगा। आयउ भृगुकुल कमल पतंगा।। व्याख्या : ध्यान में जब भावों में द्वन्द्व शु डिग्री हो जाता है, तो शरीर में स्थित नर-नाड़ियों में खलबली मच जाती है और सब मिलकर माया के भाव रूपी राजाओं को कोसने लगते हैं। उसी समय अज्ञान रूपी धनुष का टूटा हुआ जानकर गर्व रूपी परशुराम का भाव प्रकट हो जाता है। वास्तव में साधना के दो मार्ग होते हैं -- एक तो सहज साधना और दूसरा कठोर साधना। परशुराम रूपी गर्व का भाव कठोर साधना मार्ग का प्रतीक होता है। अत: सहजता से अज्ञान का निवारण हुआ जानकर कठोर साधना रूपी गर्व का परशुराम भाव स्वत: प्रकट हो जाता है। देखि महीप सकल सकुचाने। बाज झपट जनु लवा लुकाने।। गौरि सरीर भूति भल भ्राजा। भाल बिसाल त्रिपुंड बिराजा।। व्याख्या : साधना के कठोर भाव रूपी परशुराम को देखकर सभी शरीर के भाव डरने लग गए जैसे बाज के झपटने पर बटेर छुपने का प्रयास करते हैं। साधना के गर्व रूपी परशुराम का शरीर गौ अ अरि उ गौरि अर्थात् इन्द्रियों के शत्रु यानी इन्द्रियों के दमन वाला होता है और ललाट पर त्रिपुण्ड लगा हुआ होता है अर्थात् तीनों गुणों को वश में करने का प्रयास करता हुआ होता है और सद्गुण रूपी भभूति लगाए होता है। सीस जटा ससि बदनु सुहावा। रिस बस कछुक अरुन होइ आवा।। भृकुटी कुटिल नयन रिस राते। सहजहुँ चितवत मनहुँ रिसाते।। व्याख्या : गर्व रूपी परशुराम के भाव के सिर पर जटाएँ और चन्द्रमा जैसा मुख है, जो वासनाओं के दमन करने के क्रोध के कारण थोड़ा लाल हो आया है। भृकुटि टेढ़ी व आँखें क्रोध से लाल हो रही हैं तथा सहज देखने पर भी ऐसे लगते हैं, मानों क्रोध कर रहे हों। कठोर साधना पथ वास्तव में ऐसा ही होता है, जो क्रोध करके ही वासनाओं का दमन करता है। बृषभ कंध उर बाहु बिसाला। चा डिग्री जनेउ माल मृग छाला।। कटि मुनिबसन तून दुइ बाँधे। धनु सर कर कुठा डिग्री कल काँधें।। व्याख्या : कठोर साधना भाव के कंधे बैल के समान चौड़े और हृदय विशाल होता है, जिस पर सत, रज, तम व गुणातीत रूपी सुन्दर जनेउ होती है और इच्छाओं रूपी मृगछाला बँधी होती है। मन के भाव रूपी वस्त्र कमर पर बँधे होते हैं और नियम व संयम रूपी दो तरकश बँधे हुए होते हैं। हाथ में वासना व इच्छा रूपी धनुष बाण होते हैं तथा साधना की कठोरता रूपी फरसा कँधे पर होता है। दो0 सांत बेषु करनी कठिन बरनि न जाइ सरूप। धरि मुनि तनु जनु बीर रसु आयउ जहँ सब भूप।।268।। व्याख्या : कठोर साधना के गर्व रूपी परशुराम के भेष का वर्णन करना कठिन होता है क्योंकि कठोर साधना का लक्ष्य तो शान्ति प्राप्त करना होता है परन्तु साधना का क्रिया मार्ग बहुत कठिन होता है। इसलिए कठोर साधना का गर्व रूपी परशुराम भाव मानों वीर रस ही शरीर धारण करके भाव रूपी राजाओं के बीच में आया हो, ऐसा लगता है। देखत भृगुपति बेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भुआला।। पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा।। व्याख्या : कठोर साधना के गर्व रूपी परशुराम के विकराल भेष को देखकर समस्त भाव उठ खड़े हुए और पिता का नाम ले लेकर अपना परिचय देकर दण्ड प्रणाम करने लगे। अर्थात् साधना की कठोरता के भाव को देखकर सारे भाव अपना-अपना परिचय देने लगते हैं और दण्ड प्रणाम यानी समर्पण करने लग जाते हैं। साधना की कठोरता के सामने भाव अपना अस्तित्व छोड़ देते हैं। जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी। सो जानइ जनु आइ खुटानी।। जनक बहोरि आइ सि डिग्री नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा।। व्याख्या : जिस भाव को भी गर्व रूपी परशुराम का भाव कल्याण की दृष्टि से भी देखते हैं, तो उस भाव को लगता है मानो उसकी मृत्यु आ गयी। तब प्राण रूपी जनक ने आकर गर्व रूपी परशुराम के सामने समर्पण किया और सुरता रूपी सीता को बुलाकर प्रणाम करवाया। वास्तविकता में यह होता है कि कठोर साधना का भाव जब प्रबल होता है, तो प्राण व सुरता दोनों साधना की कठोरता के सामने नतमस्तक हो जाते हैं। उसी को प्रतीक रूप में जनक व सीता द्वारा प्रणाम करना बताया गया है। आसिष दीन्हि सखीं हरषानीं। निज समाज लै गईं सयानीं।। बिस्वामित्रु मिले पुनि आई। पद सरोज मेले दोउ भाई।। व्याख्या : जब परशुराम रूपी कठोर साधना के भाव ने सुरता रूपी सीता को आशीर्वाद दिया, तो यह देखकर दया, मैत्री, करूणा व क्षमादि रूपी चतुर सहेलियाँ सुरता रूपी सीता को अपने समाज में ले गयीं अर्थात् सहजता में चली गयीं। तब ध्यान अवस्था में समता रूपी विश्वामित्र परशुराम रूपी कठोर साधना भाव के सामने आए और आत्मा रूपी राम व लखन को परशुराम रूपी कठोर साधना भाव के सामने समर्पित करवाया। उसी को परशुराम के चरण कमलों में राम व लक्ष्मण का नमस्कार करना बताया गया है। रामु लखनु दसरथ के ढोटा। दीन्हि असीस देखि भल जोटा।। रामहि चितइ रहे थकि लोचन। रूप अपार मार मद मोचन।। व्याख्या : तब समता रूपी भाव ने कहा कि ये आत्मा रूपी राम और लखन भाव दस इन्द्रियों रूपी दसरथ के भाव से पैदा हुए हैं। सुंदर जोड़ी देखकर साधना के कठोरता रूपी परशुराम भाव ने आशीर्वाद दिया। परन्तु वे आत्मा रूपी राम को निरन्तर देखने लगे क्योंकि राम का रूप तो कामदेव के मद को भी नष्ट करने वाला था। वास्तविकता में सहज साधना पथ में साधक विनय और प्रार्थना के माध्यम से परमात्मा को प्राप्त करता है और कठोर साधना पथ में क्रिया की प्रधानता होती है, जिसमें साधक साधना के बल पर परमात्मा को प्राप्त करता है। इसलिए यहाँ कठोरता रूपी परशुराम आत्मा रूपी राम को आशीर्वाद देते हैं ताकि आत्मा निर्मल होकर परमात्म रूप को प्राप्त कर ले। दो0 बहुरि बिलोकि बिदेह सन कहहु काह अति भीर। पूँछत जानि अजान जिमि ब्यापेउ कोपु सरीर।।269।। व्याख्या : तब प्राण रूपी जनक को अच्छी तरह से देखकर परशुराम रूपी कठोर साधना का गर्व रूपी भाव पूछता है कि यहाँ इतने भावों की भीड़ क्यों है? अर्थात् साधना के कठोर भाव की जिज्ञासा का कारण यह है कि जब मैंने (कठोर साधना) साधना के बल पर सभी भावों को शान्त कर दिया है, तो फिर ये भावों की भीड़ क्यों है? समाचार कहि जनक सुनाए। जेहि कारन महीप सब आए।। सुनत बचन फिरि अनत निहारे। देखे चापखंड महिडारे ।। व्याख्या : तब प्राण रूपी जनक ने सारी बात बतायी, जिसके कारण सब भाव रूपी राजा आए थे। तब परशुराम रूपी कठोर साधना के गर्व रूपी भाव ने प्राण रूपी जनक की बात सुनकर दूसरी तरफ देखा तो पाया कि अज्ञान रूपी धनुष के दो टुकड़े पड़े हुए हैं। अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा।। बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू।। व्याख्या : तब परशुराम रूपी भाव बहुत क्रोधित होकर बोले कि हे मूढ़ प्राण रूपी जनक! ये अज्ञान रूपी धनुष किसने तोड़ा है। मुझे उसे जल्दी दिखावो वरना मैं जहाँ तक तुम्हारी सत्ता है, शरीर में वहाँ की प्राणगति को उल्टा कर दूँगा। साधना का यहाँ गहरा रहस्य है, जिसे ध्यान की परिपक्वता के बाद ही समझा जा सकता है। प्राण की गति को क्रिया द्वारा उल्टा कर देने पर भावों की व्यवस्था बदल जाती है। अति ड डिग्री उत डिग्री देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं।। सुर मुनि नाग नगर नर नारी। सोचहिं सकल त्रास उर भारी।। व्याख्या : प्राण रूपी जनक डर के कारण उत्तर नहीं दे पा रहा है। ऐसी अवस्था देखकर माया के भाव रूपी कुटिल राजा बहुत प्रसन्न होने लगते हैं। साधना की कठोरता रूपी परशुराम को देखकर स्वर, मन, नाग प्राणवायु, शरीर के नर व नाड़ी बहुत सोच में पड़ जाते हैं और भय सा पैदा हो जाता है। मन पछिताति सीय महतारी। बिधि अब सँवरी बात बिगारी।। भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता। अरध निमेष कलप सम बीता।। व्याख्या : भावों की यह अवस्था देखकर सुरता रूपी सीता की दिव्य दृष्टि रूपी माता पश्चाताप करने लगती हैं कि कठोर साधना की क्रिया (विधि) अब बनी हुई बात को बिगाड़ देगी। उधर को कठोर साधना रूपी परशुराम के स्वभाव के बारे में सुनकर सुरता रूपी सीता को क्षणमात्र समय भी कल्पों के समान लगने लगा। दो0 सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरू। हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्री रघुबीरू।।270।। व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने समस्त भावों को भयभीत देखकर व सुरता रूपी सीता को डरा हुआ जानकर हर्ष व विषाद से मुक्त होकर वचन बोले। ।। मास परायण, नवाँ विश्राम ।। नाथ संभु धनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा।। आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही।। व्याख्या : आत्मा रूपी राम कहते हैं कि स्वयं से उत्पन्न अज्ञान रूपी धनुष को तो कोई तुम्हारा दास ही तोड़ सकता है अर्थात् जो साधना के कठोर नियम-संयमों में सहजता से आसीन होता है, वही अज्ञान रूपी धनुष को तोड़ सकता है। आप तो मुझे आज्ञा दीजिए क्या करना है? यह सुनकर परशुराम रूपी कठोर साधना का गर्व रूपी भाव क्रोधित हो उठा। सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई।। सुनहु राम जेहिं सिव धनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा।। व्याख्या : जो सेवा का कार्य करता है, वही सेवक होता है परन्तु शत्रु का काम करे, तो लड़ाई करनी चाहिए। हे आत्मा रूपी राम! जिसने विश्वास रूपी शिव के अज्ञान रूपी धनुष को तोड़ा है, वो तो मेरा सहस्रबाहु के समान शत्रु है। साधना का गर्व रूपी भाव को लगता है कि केवल कठोर साधना यानी जप, तप, व्रत, नियम, संयम, उपवास आदि का पालन नहीं करने वाला तो पथ भ्रष्ट साधक है, इसलिए वो तो हजारों भावों (सहस्रबाहु) के समान ही मेरा (गर्व रूपी परशुराम) शत्रु है। वास्तविकता में यह होता है कि साधना के गर्व रूपी भाव को लगता है कि जो परम्परागत मर्यादाओं का पालन नहीं करके साधना करते हैं, वे शत्रु के समान होते हैं। इसी आडम्बर की धारणा के कारण ही तो नाना पंथों का उद्भव हो गया है और एक दूसरे के विरोधी बन गए हैं। सहज ध्यान द्वारा जब सुरता का आत्मा में मिलन हो भी जाता है, तो भी कई बार मन में शंका बनी रहती है कि क्या यह सही मार्ग है या इसके अलावा और कोई भी रास्ता है? इसी भाव द्वन्द्व को परशुराम व राम के संवाद के प्रतीकों के माध्यम से लिखने का प्रयास किया गया है। सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न तो मारे जैहहिं सब राजा।। सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसु धरहि अपमाने।। व्याख्या : इसलिए उसे अर्थात् जिसने अज्ञान रूपी धनुष तोड़ा है, वो भाव समाज से अलग हो जाए वरना समस्त भाव रूपी राजा मारे जायेंगे। अर्थात् सुरता और आत्मा अगर लीन रहेंगे तो समस्त भाव स्वत: मर जायेंगे। भावों के मरने पर संसार का आभास ही मिट जायेगा और भावों के अभाव में सहजता आ जाती है, इसलिए कठोर साधना का भाव भी नहीं बचेगा। इसलिए परशुराम रूपी गर्व का भाव व्याकुल हो उठता है। परशुराम रूपी गर्व के भाव की बातें सुनकर लक्षणों को लखते हुए लक्ष्मण परशुराम रूपी गर्व भाव का अपमान करते हुए बोला। बहु धनुहीं तोरीं लरकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं।। एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृग कुल केतू।। व्याख्या : लखन भाव बोला कि भावों से उत्पन्न अज्ञान रूपी अनेक इच्छाएँ तो लड़कपन में अर्थात् शुरूआती साधना के समय बहुत तोड़ी हैं परन्तु हे गोसाईं अर्थात् इन्द्रियों को वश में करने (गो अ साईं उ गोसाईं) वाले! आपने कभी ऐसा क्रोध नहीं किया। परन्तु इस विश्वास रूपी शिव के अज्ञान रूपी धनुष पर आपकी ऐसी ममता क्यों है? वास्तव में जब किसी परम्परा या क्रिया पर विश्वास पैदा हो जाता है, तो उससे उत्पन्न अज्ञान ही शिव धनुष कहलाता है। शिव को ही विश्वास का प्रतीक माना जाता है। ऐसे वचन सुनकर परशुराम रूपी कठोर साधना का गर्व रूपी भाव बहुत गुस्सा हो गया। दो0 रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार। धनुही सम त्रिपुरारि धनु बिदित सकल संसार।।271।। व्याख्या : परशु रूपी गर्व का भाव बोला कि हे नर की धड़कन (नृप) से उत्पन्न बाल भाव! तुम कालवश अर्थात् समय देखकर ऐसा बोल रहे हो, तुम्हें भावों के मर्म का ज्ञान नहीं है। क्योंकि विश्वास से उत्पन्न धारणा क्या अन्य धारणाओं के समान हो सकती है? इसको समस्त संसार जानता है। लखन कहा हँसि हमरें जाना। सुनहु देव सब धनुष समाना।। का छति लाभु जून धनु तोरें। देखा राम नयन के भोरें।। व्याख्या : तब लखन रूपी भाव ने हँसकर कहा कि हे देव! हमारे जानने में तो सभी धनुष अर्थात् धारणाएँ समान ही होते हैं। आत्मा रूपी राम ने तो सहज होकर देखा मात्र था। परन्तु आत्मा रूपी राम के मणि रूपी प्रकाश के कारण विश्वास से उत्पन्न धनुष अर्थात् भ्रम की धारणा स्वत: ही टूट गयी। इसलिए आप तो व्यर्थ में ही रोष कर रहे हैं। छुअत टूट रघुपतिहु न दोसु। मुनि बिनु काज करिअ रोसू।। बोले चितइ परसु की ओरा। रे सठ सुनेहि सुभाउ न मोरा।। व्याख्या : परन्तु आत्मा रूपी राम के मणि रूपी प्रकाश के कारण विश्वास से उत्पन्न भ्रम की धारणा (धनुष) स्वत: ही टूट गयी। इसमें आत्मा रूपी राम का कोई दोष नहीं है क्योंकि आत्मा का तो सहज स्वभाव ही ज्ञान का प्रकाश करना होता है। अत: आप तो व्यर्थ में रोष कर रहे हैं। तब कठोर साधना के गर्व रूपी भाव अपने कठोर साधना रूपी फरसे को देखा अर्थात् अपने आपको कठोर साधना में स्थित करने का प्रयास करते हुए बोला कि रे सठ। तुमने मेरा स्वभाव नहीं जाना है। बालकु बोलि बधउँ नहिं तोही। केवल मुनि जड़ जानहि मोही।। बाल ब्रह्मचारी अति कोही। बिस्व बिदित छत्रियकुल द्रोही।। व्याख्या : परशु भाव बोला कि मैं तो तुम्हें बालक समझकर नहीं मार रहा हूँ। तुम मुझे केवल मन का भाव मत जानो। मैं बाल ब्रह्मचारी अर्थात् सदैव ब्रह्म में आचरण करने वाला व बहुत क्रोधी हूँ। यह समस्त संसार को पता है कि मैं क्षत्रिय कुल का नाश करने वाला हूँ अर्थात् मेरी कठोर साधना द्वारा त्रिगुणों से उत्पन्न भावों का क्षय हो जाता है। अर्थात् नाश हो जाता है। भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्ही। बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही।। सहस बाहु भुज छेदनिहारा। परसु बिलोकु महीप कुमारा।। व्याख्या : कठोर साधना का भाव कहता है कि मैंने कठोर साधना द्वारा कई बार शरीर रूपी भूमि को भाव रूपी राजाओं से हीन कर दिया और सात्विक भाव रूपी देवों को दे दी। मेरी कठोर साधना रूपी फरसा से मैंने सहस्रबाहु अर्थात् भावों से भाव फिर भावों से भाव फिर हजारों भाव रूपी भुजाओं को काट डाला है अर्थात् संयम - नियम की कठोरता से कई बार भावों को जीत लिया है। हे बालक राजकुमार! इस कठोर साधना रूपी फरसे को देख। साधना का कठोर भाव अपनी श्रेष्ठता स्थापित करना चाहता है। अत: उसी भावों के वार्तालाप की अनुभूति को यहाँ लिखा गया है। दो0 मातु पितहि जनि सोचबस करसि महीस किसोर। गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर।।272।। व्याख्या : अरे बाल राजकुमार! तुम अपने माता-पिता को सोचवश मत करो क्योंकि मेरे कठोर फरसे से तो गर्भ के बच्चे भी गिर जाते हैं अर्थात् कठोर साधना के द्वारा तो चाहे जैसे भाव वश में हो जाते हैं। बिहसिं लखनु बोले मृदुबानी। अहो मुनीसु महा भटमानी।। पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारू। चहत उड़ावन फूँकि पहारू।। व्याख्या : तब लखन भाव रूपी लक्ष्मण हँसते हुए मधुर वाणी बोला कि अहो मन के भाव तो अपने आपको महायोद्धा समझते हैं। इसलिए मुझे बार-बार कठोर साधना रूपी फरसा दिखा रहे हैं। ये तो फूँक देकर पहाड़ को उड़ाना चाहते हैं। यहाँ पर लखन भाव कठोर साधना के महत्व को नकार रहा है। उसी अनुभूति को परशुराम-लक्ष्मण संवाद के रूप में लिखा गया है। इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं। जे तरजनी देखि मरि जाहीं।। देखि कुठा डिग्री सरासन बाना। मैं कछु कहा सहित अभिमाना।। व्याख्या : लखन भाव कहता है कि यहाँ कुम्हड़े की बतिया कोई (कच्चा फल) नहीं है, जो अंगुली देखते ही मर जाता है। अर्थात् भाव कुम्हड़े की बतिया की तरह नहीं होते हैं जो तुरन्त मर जाएँ। मैंने तो आपके कठोरता रूपी फरसे व नियम-संयम रूपी बाणों को देखकर ही अभिमान के साथ कुछ कहा है। अर्थात् साधना की कठोरता को देखकर ही मैंने लक्षणों को लख (जानकर) कर कुछ कहा है। भृगसुत समुझि जनेउ बिलोकी। जो कछु कहहु सहउँ रिस रोकी।। सुर महिसुर हरिजन अ डिग्री गाई। हमरें कुल इन्ह पर न सुराई।। व्याख्या : मैंने आपको भृगसुत और जनेउ धारण किए हुए देखकर जो भी आपने कहा उसे क्रोध रोककर सहन किया है। भृगसुत का तात्पर्य है साधना के बल पर प्रकृति को वश में कर लेने वाला (भृग अ सुत उ अर्थात् प्रकृति से उत्पन्न कठोरता का भाव) होता है। प्रकृति जब वश में आ जाती है तो सत, रज व तम के तीन गुण भी वश में आ जाते हैं, उसे ही जनेउ धारण करने के प्रतीक के रूप में बताया गया है। तब लखन भाव कहता है कि हमारे कुल में अर्थात् आत्म कुल में ऐसी रीति होती है कि हम देवता अर्थात् दैवीय वृति, ब्राह्मण, भगवान के भक्त व इन्द्रियों पर वीरता नहीं दिखाते हैं। बधें पापु अपकीरति हारें। मारतहूँ पा परिअ तुम्हारें।। कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा। ब्यर्थ धरहु धनु बान कुठारा।। व्याख्या : क्योंकि इनको मारने पर पाप और हारने पर अपयश मिलता है, इसलिए मारें तो आपके पैर ही पड़ना चाहिये। तुम्हारे वचन ही करोड़ों वज्रों के समान होते हैं। अत: तुम तो व्यर्थ में धनुष बाण व फरसा धारण करते हो। यहाँ साधना का बहुत गहरा रहस्य छुपा हुआ है। लखन भाव कहता है कि दैवीय भाव, ब्रह्मभाव, भक्ति के भाव व इन्द्रियों के भावों का दमन नहीं करना चाहिये वरना कुण्ठा पैदा (पाप) हो जायेगी। इन्हें तो सहज होकर ही साधना चाहिये। भाव से वाणी पैदा होती है। अत: भाव की निर्मलता होनी चाहिये। अगर भाव कठोर है, तो जप-तप रूपी धनुष बाण व फरसा धारण करने से क्या लाभ? दो0 जो बिलोकि अनुचित कहेउँ छमहु महामुनि धीर। सुनि सरोष भृगुबंस मनि बोले गिरा गभीर।।273।। व्याख्या : लखन भाव बोला कि आपको देखकर अर्थात् साधना के कठोर भाव को देखकर अगर कुछ अनुचित कहा है, तो मुझे क्षमा करना। ये सब सुनकर परशुराम रूपी साधना का गर्व भाव क्रोधपूर्वक गम्भीर वाणी बोला। कौसिक सुनहु मंद यहु बालकु। कुटिल कालबस निज कुल घालकु।। भानु बंस राकेस कलंकू । निपट निरंकुस अबुध असंकू।। व्याख्या : हे कोशिकाओं से उत्पन्न समता रूपी विश्वामित्र! ये बालक बहुत कुबुद्धि, कुटिल व काल के वश में होने के कारण स्वयं के कुल का घातक बन रहा है। यह सूर्य वंश व चन्द्रमा का कलंक है तथा निरंकुश, अज्ञानी व निडर है। अर्थात् लक्षणों को लखने का भाव सूर्य स्वर व चन्द्र स्वर से उत्पन्न भावों के लिए कलंक है अर्थात् उनकी पोल खोलने वाला है। साधना के परशु रूपी कठोर भाव को लखन भाव अज्ञानी, कुटिल व निडर लगता है। काल कवलु होइहि छन माहीं। कहउँ पुकारि खोरि मोहि नाहीं।। तुम्ह हटकहु जौं चहहु उबारा। कहि प्रतापु बलु रोषु हमारा।। व्याख्या : यह क्षण मात्र में काल का ग्रास हो जायेगा। मैं यह सबको पुकार कर कह रहा हूँ। इसमें मेरा कोई खोट नहीं है। अगर समता रूपी विश्वामित्र तुम इसे बचाना चाहते हो तो हमारा प्रताप, बल व क्रोध इसे समझाकर बता दो। साधना की कठोरता रूपी परशु भाव लखन भाव को भी क्षणिक पैदा होने वाले भावों की तरह ही जानता है। वह सोचता है कि जैसे भाव पैदा होकर क्षण में मर भी जाते हैं, वैसे ही लक्षणों को लखने का भाव भी क्षण में मर जायेगा। परन्तु वास्तविकता यह है कि लक्षणों को लखने वाला भाव ही सब भावों में शेष बचता है, इसलिए लक्ष्मण को शेषनाग का अवतार भी कहा जाता है। लखन कहेउ मुनि सुजसु तुम्हारा। तुम्हहि अछत को बरनै पारा।। अपने मुँह तुम्ह आपनि करनी। बार अनेक भाँति बहु बरनी।। व्याख्या : तब लखन भाव बोला कि हे मुनि! आपके रहते आपके सुयश का वर्णन आपसे अच्छा कौन कर सकता है। आपने तो अपने मुख से ही बहुत बार अपनी करणी का बखान किया है। वास्तव में साधना के गर्व का भाव ऐसा ही होता है कि वह बार-बार स्वयं का यशोगान करने का प्रयास करता है। उसी अनुभूति को यहाँ लिखा गया है। नहिं संतोषु त पुनि कछु कहहू। जनि रिस रोकि दुसह दुख सहहू।। बीरब्रती तुम्ह धीर अछोभा। गारी देत न पावहु सोभा।। व्याख्या : तब लखन भाव बोला कि इतना स्वयं की करणी का बखान करके अगर संतोष नहीं मिला है तो और कह डालिए। क्रोध को रोककर आप असहनीय दु:ख मत सहिए। तुमने तो वीरता का व्रत धारण कर रखा है और क्षोभ रहित हो। अत: आपको गाली देना शोभा नहीं देता है। दो0 सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु। बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु।।274।। व्याख्या : यहाँ लखन भाव साधना के परशुराम रूपी गर्व के भाव पर कटाक्ष करते हैं कि शूरवीर तो युद्ध में करणी करते हैं और कहकर अपने को नहीं जनाते हैं। परन्तु कायर लोग ही युद्ध में अपने यश की डींग मारते रहते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि साधना करने वाला साधना का बखान नहीं करता है। वह तो चुपचाप साधना द्वारा भावों के युद्ध को जीत लेता है। तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा। बार-बार मोहि लागि बोलावा।। सुनत लखन के बचन कठोरा। परसु सुधारि धरेउ कर घोरा।। व्याख्या : आप तो काल को हाँक लगाकर मानो मेरे लिए बार-बार बुला रहे हैं। लखन भाव के ये वचन सुनकर परशुराम रूपी गर्व का भाव क्रोधित होकर कठोर फरसे को सुधार कर हाथ में ले लिया। अब जनि देइ दोसु मोहि लोगू। कटुबादी बालकु बध जोगू।। बाल बिलोकि बहुत मैं बाँचा। अब यहु मरनिहार भा साँचा।। व्याख्या : अब सब लोग मुझे दोष मत देना यह कटुवादी बालक मारने के लायक है। मैं तो इसे बालक देखकर बचा रहा था परन्तु अब इसका मरना निश्चित है। कौसिक कहा छमिअ अपराधू। बाल दोष गुन गनहिं न साधू।। खर कुठार मैं अकरून कोही। आगें अपराधी गुरुद्रोही ।। व्याख्या : तब समता रूपी विश्वामित्र के भाव ने कहा कि इसके अपराधों को क्षमा कर दो क्योंकि बाल देखकर साधु दोषों का विचार नहीं करते हैं। तब परशुराम रूपी गर्व का भाव बोला कि यह कठोर फरसा, मैं दया रहित क्रोधी हूँ और मेरे आगे अपराधी व गुरुद्रोही खड़ा है। वास्तविकता में साधना पद्धतियों की भिन्नता से एक प्रकार के भाव दूसरे साधना पंथ में गुरुद्रोही जैसे ही लगते हैं। उत्तर देत छोड़उँ बिनु मारें। केवल कौसिक सील तुम्हारें।। न त एहि काटि कुठार कठोरें। गुरहि उरिन होतेउँ श्रम थोरें।। व्याख्या : इसके उत्तर देने पर भी इसे हे कौशिक! तुम्हारे शील के कारण जिन्दा छोड़ रहा हूँ। वरना इसी कठोर फरसे से इसे काटकर गुरु ऋण से उऋण हो जाता।
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