ॐ परमात्मने नम:
अरण्य काण्ड
श्लोक मूलं धर्मतरोर्विवेक जलधे: पूर्णेन्दुमानन्ददं
वैराग्याम्बुज भास्करं ह्यघघनध्वान्तापहं तापहम्।
मोहाम्भोधरपूगपाटन विधौ स्व: सम्भवं शंकरं
वन्दे ब्रह्मकुलं कलंकशमनं श्रीराम भूप प्रियम्।।1।।
व्याख्या : जब साधक स्वयं के संशयों का नाश करके शंकर की अवस्था को प्राप्त कर लेता है तो उसकी धारणा का मूल, विवेक रूपी समुद्र को आनन्द देने के लिए पूर्ण चन्द्रमा के समान हो जाता है और वैराग्य रूपी कमल को विकसित करने के लिए सूर्य के समान हो जाता है तथा पाप (चिन्ता) रूपी अन्धकार का निश्चित रूप से निराकरण करने वाला होता है। इस विधि (क्रिया) द्वारा मोह रूपी बादल छिन्न भिन्न हो जाते हैं और साधक जीवात्मा के भावों से उत्पन्न बन्धन रूपी कलंकों का नाश करने वाला होकर परमात्मा को प्रिय हो जाता है।
सान्द्रानन्दपयोदसौभगतनुं पीताम्बरं सुन्दरं
पाणौ बाणशरासनं कटिलसत्तूणीरभारं वरम्।
राजीवायतलोचनं धृत जटाजूटेन संशोभितं
सीतालक्ष्मणसंयुतं पथिगतं रामाभिरामं भजे।।2।।
व्याख्या : उस अवस्था में साधक के तन में सौभाव अर्थात प्रकृति के सौ भाव आनन्द देने वाले होकर मेघ के समान छा जाते हैं। अर्थात् साधक शुभ प्रकृति वाला होकर आनन्द में समा जाता है। उस अवस्था में साधक की आत्मा निर्मल होकर सुन्दर स्वरूप हो जाती है। उसी को पीताम्बरं सुन्दरं बोलकर लिखा गया है। उस अवस्था में साधक की आत्मा नियम संयम रूपी धनुष बाणों को धारण किए और परमात्मा में दृढ़ लग्न रूपी तरकश कमर में बाँधे हुए सुशोभित होने लगती है। उस अवस्था में साधक के नेत्र दिव्यदृष्टि से युक्त हो जाते हैं और साधक क्षमा व धैर्य रूपी जटाजूट से सुशोभित होने लगता है। उस अवस्था में लखन भाव, सुरता व आत्मा की गति एक होकर परमात्मा के पथ पर अग्रसर होने लगती है।
सो0 उमा राम गुन गूढ़ पंडित मुनि पावहिं बिरति।
पावहिं मोह बिमूढ़ जे हरि बिमुख न धर्म रति।।1।।
व्याख्या : विश्वास रूपी शंकर श्रद्धा रूपी पार्वती से कहते हैं कि हे पार्वती! आत्मा के गुणों का मर्म बहुत गूढ़ होता है, इसलिये जो विद्वान व मुनि लोग गूढ़ रहस्य को जान लेते हैं, उन्हें वैराग्य हो जाता है। परन्तु जो लोग मूर्ख होते हैं और परमात्मा से विमुख होकर विपरीत धारणा रखते हैं, वे लोग मोह में पड़
जाते हैं।
पुर नर भरत प्रीति मैं गाई। मति अनुरूप अनूप सुहाई।।
अब प्रभु चरित सुनहु अति पावन। करत जे बन सुर नर मुनि भावन।।
व्याख्या : मैंने यहाँ शरीर रूपी नर और भाव रत भरत भाव की प्रीति का वर्णन किया जो मेरी बुद्धि के अनुसार अनुपम थी। अब मैं आत्मा के पवित्र चरित्र का वर्णन करूँगा, जो वे चित्रकोश रूपी वन में कर रहे हैं अर्थात् चित्रकोश में आत्मा ध्यानस्थ होने पर जो अनुभूति होती है उसका वर्णन करूँगा जो स्वरों, नर व मन की एकाग्रता के भावों को प्रिय लगेगा।
एक बार चुनि कुसुम सुहाए। निज कर भूषन राम बनाए।।
सीतहि पहिराए प्रभु सादर। बैठे फटिक सिला पर सुंदर।।
व्याख्या : जब आत्मा, सुरता व लखन भाव सहित चित्रकोश रूपी चित्रकूट में स्थिर होते हैं, तो जो अनुभूति होती है, उसी को प्रतीकों का सहारा लेकर लिखने का प्रयास किया गया है। आत्मा में कभी-कभी सहज इच्छा की तरंग उठ आती है। उसी को एक बार शुभ इच्छा रूपी फूलों का चुनना बोलकर लिखा गया है। कुछ इच्छाएँ होती हैं जो आत्मा की तरंग से ही उठती हैं। उसी अनुभूति को ""निज कर भूषन राम बनाए"" बोलकर लिखा गया है। जब आत्मा की तरंग से कोई भी शुभ इच्छा पैदा होती है तो उसका असर सुरता पर पड़ जाता है। उसी को सीता को पहनाना बोलकर लिखा गया है। फटिक शिला दृढ़ता का प्रतीक होती है। इसलिए आत्मा की तरंग से शुभ इच्छा उठकर सुरता को प्रभावित करती है परन्तु आत्मा रूपी राम दृढ़ लग्न लगाकर परमात्मा के ध्यान में लीन रहते हैं। उसी भाव अवस्था को फटिक शिला पर सहज (सुंदर) होकर बैठना बोलकर लिखा गया है।
सुरपति सुत धरि बायस बेषा। सठ चाहत रघुपति बल देखा।।
जिमि पिपीलिका सागर थाहा। महा मंदमति पावन चाहा।।
व्याख्या : सुरपति अर्थात् इन्द्रियों के सुख भोग रूपी इन्द्र भाव से उत्पन्न वासना रूपी पुत्र जयन्त ने भोग रूपी कौए का रूप धारण करके आत्मा रूपी राम की क्षमता को देखना चाहा अर्थात् भोग रूपी कौए ने जानना चाहा कि भोगों का आत्मा पर कितना प्रभाव पड़ता है। आत्मा के बल को जानने का यह प्रयास ठीक वैसे ही होता है, जैसे कोई चींटी समुद्र की थाह जानने का प्रयास करती है।
सीता चरन चोंच हति भागा। मूढ़ मंदमति कारन कागा।।
चला रूधिर रघुनायक जाना। सींक धनुष सायक संधाना।।
व्याख्या : वह मूढ़ मति भोग वासना रूपी कौआ सुरता रूपी सीता के चरणों में चोंच मारकर भागा अर्थात् भोग वासना की तरंग सुरता में जाकर मिलकर पुन: देह भावों में बरतने को लौट गयी। जब आत्मा रूपी राम ने देखा कि भोग वासना रूपी कौए की चोंच से सुरता रूपी सीता के चरणों में से खून बह रहा है अर्थात् सुरता से भोगवासना की लालसा रूपी खून बहने लगा है अर्थात् सुरता का चिन्तन भोग वासना की तरंगों से विचलित हो गया है तो आत्मा रूपी राम ने निरासक्ति रूपी बाण का संधान किया अर्थात् निरासक्ति की प्रेरणा की।
दो0 अति कृपाल रघुनायक सदा दीन पर नेह।
ता सन आइ कीन्ह छलु मूरख अवगुन गेह।।1।।
व्याख्या : इस दोहे में आत्मा के सहज स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा गया है कि आत्मा तो सहज कृपाल व दीनों पर सहज प्रेम करने वाली होती है। उस परम सहज आत्मा के साथ भोगवासना रूपी मूढ़ कौए ने छल किया अर्थात् सहज आत्मा को इन्द्र रूपी सुख भोग से उत्पन्न भोगवासना रूपी पुत्र ने भोगों में ललचाने का प्रयास किया।
प्रेरित मंत्र ब्रह्मसर धावा। चला भाजि बायस भय पावा।।
धरि निज रूप गयउ पितु पाहीं। राम बिमुख राखा तेहि नाहीं।।
व्याख्या : आत्मा की प्रेरणा से सहजता रूपी बाण भोगवासना रूपी कौए के पीछे दौड़ा तो भोगवासना रूपी कौआ भयभीत होकर दौड़ने लगा। तब वह निज स्वरूप अर्थात् भोग का प्रकट रूप धारण करके इन्द्रिय सुख भोग रूपी इन्द्रभाव के पास गया परन्तु आत्मा से विमुख होने के कारण इन्द्र भाव (भोग भाव) ने भी शरण नहीं दी अर्थात् असहज भोग भाव को इन्द्र भाव ने नकार दिया।
भा निरास उपजी मन त्रासा। जथा चक्र भय रिषि दुर्बासा।।
ब्रह्मधाम सिवपुर सब लोका। फिरा श्रमित ब्याकुल भय सोका।।
व्याख्या : जब भोगवासना के भाव को इन्द्र (चित का भोग भाव) का सहारा नहीं मिलता है तो वह निरास होकर भयभीत हो जाता है। जैसे चक्रों की जागृति से दुर्वासना के भाव भयभीत हो जाते हैं। वह भोग वासना का भाव ब्रह्मधाम, शिवलोक व सब लोकों में घूमने लगता है फिर भी परिश्रम व्यर्थ ही चला जाता है और भोगवासना का भाव भय व शोक से व्याकुल हो उठता है। वास्तव में ध्यान के अभ्यास से जब इन्द्र भाव (चित) निर्मल हो जाता है और सभी चक्र निर्मल हो जाते हैं तो भोग वासना के उठने वाले भाव को कहीं भी जगह नहीं मिल पाती है। उसी सूक्ष्म अनुभूति को यहाँ प्रतीकों के माध्यम से लिखा गया है।
काहूँ बैठन कहा न ओही। राखि को सकइ राम कर द्रोही।।
मातु मृत्यु पितु समन समाना। सुधा होइ बिष सुनु हरिजाना।।
व्याख्या : किसी ने भोगवासना रूपी जयन्त को बैठने को नहीं कहा क्योंकि आत्मा के विमुख भाव को निर्मलता व सहजता की अवस्था आ जाने पर कोई भी भाव सहारा नहीं देता है। उसके लिए इच्छा रूपी माता मृत्यु के समान व पिता दम के समान अर्थात् दमन करने वाले के समान होता है तथा उसके लिए साधना की क्रिया से उत्पन्न अमृतमय रस ही जहर का काम करता है।
मित्र करइ सत रिपु कै करनी। ता कहँ बिबुध नदी बैतरनी।।
सब जगु ताहि अनलहु ते ताता। जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता।।
व्याख्या : उस अवस्था में वासनाओं के मैत्री भाव भी वासनाओं के लिए शत्रु जैसा कार्य करने लगते हैं। उस परम सहज अवस्था में तो देवगंगा भी वासनाओं के लिए वैतरणी अर्थात् वासनाओं से मुक्त करने वाली हो जाती है। उस अवस्था में वासना भोग भाव के लिए सब संसार ही अग्नि से गर्म लगने लगता है। हे भाई! जो आत्मा रूपी राम से विमुख होता है, उसकी ऐसी दशा होती है।
नारद देखा बिकल जयंता। लागि दया कोमल चित संता।।
पठवा तुरत राम पहिं ताही। कहेसि पुकारि प्रनत हित पाही।।
व्याख्या : मन के नारद भाव ने जब भोगवासना रूपी जयंत भाव को दु:खी देखा तो दया आ गयी क्योंकि संत का चित कोमल होता है अर्थात् जब मन में संशय नहीं रहती है तो सहजता रहती है और सहजता ही चित की कोमलता होती है। तुरन्त जयंत भाव (भोग वासना के भाव को) को आत्मा रूपी राम के पास जाने की प्रेरणा की। तब भोगवासना का भाव आत्मा रूपी राम के पास जाकर पुकार-पुकार कहने लगा कि हे शरणागत के हितकारी! मेरी रक्षा कीजिए। अर्थात् भोगवासना के भाव ने आत्मा के सामने पूर्ण रूप से समर्पण कर दिया।
आतुर सभय गहेसि पद जाई। त्राहि त्राहि दयाल रघुराई।।
अतुलित बल अतुलित प्रभुताई। मैं मतिमंद जानि नहिं पाई।।
व्याख्या : भोगवासना रूपी जयन्त भयभीत और आतुर होकर आत्मा रूपी राम के चरणों में गिर पड़ा और हे दयालु! रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए, कहने लगा। हे प्रभु! मैं भोग वासना रूपी मंदबुद्धि आपकी अतुलित क्षमता व अतुल्य प्रभुता को जान नहीं सका।
निज कृत कर्म जनित फल पायउँ। अब प्रभु पाहि सरन तकि आयउँ।।
सुनि कृपाल अति आरत बानी। एकनयन करि तजा भवानी।।
व्याख्या : भोगवासना रूपी जयंत बोला कि मैंने मेरे किए का फल पा लिया है और अब मैं सब कुछ छोड़कर आपकी शरण में आया हूँ अर्थात् वासना का त्याग करके शरण में आया हूँ। तब आत्मा रूपी राम भोगवासना रूपी जयंत को एक आँख का करके छोड़ दिए। जयंत का एक आँख का हो जाने का साधना की दृष्टि से बहुत गहरा रहस्य है। वास्तव में अज्ञानता वश ही भोगवासना का भाव पैदा होता है और प्रत्येक भोगवासना का दो मत होता है कि ये करूँ या वो करूँ। दो मत की अवस्था से ही असहजता पैदा होती है और असहजता ही संताप को पैदा करती है। अत: ध्यान में आत्मा रूपी राम भोगवासना रूपी जयन्त को एक आँख का कर देते हैं यानी सहज कर देते हैं, जिससे भोगों की आसक्ति भी नहीं रहे और भोगों की सहज अवस्था बनी रहे।
सो0 कीन्ह मोह बस द्रोह जद्यपि तेहि कर बध उचित।
प्रभु छाड़ेउ करि छोह को कृपाल रघुबीर सम।।2।।
व्याख्या : भोगवासना रूपी जयंत ने मोह में पड़कर ही आत्मा के साथ द्रोह किया। अत: वैसे तो भोगवासना का शमन करना ही उचित होता। परन्तु आत्मा द्रवित होकर क्षमा कर देती है क्योंकि आत्मा के समान कृपालु कौन होता है?
रघुपति चित्रकूट बसि नाना। चरित किए श्रुति सुधा समाना।।
बहुरि राम अस मन अनुमाना। होइहि भीर सबहिं मोहि जाना।।
व्याख्या : चित्रकूट रूपी प्राणकोश में ध्यान की अवस्था में आत्मा रूपी राम ने नाना चरित किए अर्थात् उस अवस्था में नाना प्रकार की अनुभूतियाँ हुईं, जो सुनने में अमृत के समान मधुर हैं। जब ध्यान परमात्मा में स्थिर होने लग जाता है तो किसी भी प्रकार के भावों का आगमन आत्मा को सुहाता नहीं है। इसलिए आत्मा रूपी राम ने मन में अनुमान किया कि मेरे चित्रकोश में रहने से बहुत से भावों का आना जाना रहेगा। वास्तव में चित्रकोश की यह विशेषता होती है कि उसमें दृश्यों का चित्रांकन होता रहता है और चित्रांकन होते ही भावों का आना जाना शु डिग्री हो जाता है। अत: अब आत्मा रूपी राम परमात्मा में लीन होने के लिए चित्रकोश का भी त्याग करना चाहते हैं।
सकल मुनिन्ह सन बिदा कराई। सीता सहित चले दौ भाई।।
अत्रि के आश्रम जब प्रभु गयऊ। सुनत महामुनि हरषित भयऊ।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में आत्मा रूपी राम सुरता व लखन भाव सहित मन के भावों से विदा करा करके चित्रकोश रूपी चित्रकूट को छोड़कर आगे बढ़े अर्थात् परमात्मा के ध्यान में और लीनता बढ़ गयी। जब ध्यान और गहरा होता चला जाता है तो इत्र के रस जैसा सुगन्धित रसायन का स्राव होना शु डिग्री हो जाता है। उसी को आत्मा रूपी राम का अत्रि ऋषि के आश्रम पर जाना बोलकर लिखा गया है। जब इत्र रस के स्राव की अवस्था आ जाती है, तो मन का विशाल भाव हर्षित हो उठता है। उसी को अत्रि महामुनि का आत्मा रूपी राम को देखकर हर्षित होना बोलकर लिखा गया है।
पुलकित गात अत्रि उठि धाए। देखि रामु आतुर चलि आए।।
करत दंडवत मुनि उर लाए। प्रेम बारि दौ जन अन्हवाए।।
व्याख्या : इत्र रस रूपी अत्रि ऋषि के अंग-अंग पुलकित हो उठे और उधर को आत्मा रूपी राम भी शीघ्रतापूर्वक इत्र रस की तरफ आकर्षित हो उठे। ध्यान की इस अवस्था में आत्मा भी और इत्र रस रूपी अत्रि ऋषि भी एक दूसरे की तरफ आकर्षित हो उठते हैं। आत्मा रूपी राम ने दण्डवत प्रणाम किया अर्थात् प्राण के माध्यम से समर्पण किया तो इत्र रस रूपी अत्रि ऋषि ने गले से लगा लिया और दोनों प्रेम के जल में स्नान करने लगे अर्थात् असीम प्रेम पैदा हो गया।
देखि राम छबि नयन जुड़ाने। सादर निज आश्रम तब आने।।
करि पूजा कहि बचन सुहाए। दिए मूल फल प्रभु मन भाए।।
व्याख्या : इत्र कोश में पहुँचने पर अत्रि ऋषि ने आत्मा रूपी राम को एकटक लगाकर देखा और आदरपूर्वक इत्रकोश रूपी अपने आश्रम में ले गया। इत्रकोश में ले जाकर वचन सुनाए और सहजता रूपी मूल फल आत्मा रूपी राम को दिए, जो आत्मा को बहुत प्रिय होते हैं। अर्थात् उस अवस्था में सहजता का आभास हुआ।
सो0 प्रभु आसन आसीन भरि लोचन सोभा निरखि।
मुनिबर परम प्रबीन जोरि पानि अस्तुति करत।।3।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम की शोभा देखकर इत्र रस रूपी अत्रि मुनि के नेत्र शीतल हो गए। फिर ध्यान की उस अवस्था में इत्र रस रूपी अत्रि ऋषि के मन में परमात्मा की स्तुति के भाव उमगने लगते हैं। उन्हीं स्तुति के भावों को आगे लिखा गया है।
छ0 नमामि भक्त वत्सलं। कृपालु शील कोमलं।।
भजामि ते पदांबुजं। अकामिनां स्वधामदं।।
व्याख्या : हे भक्त वत्सल! हे कृपालु! हे कोमल स्वभाव वाले! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। निष्काम साधकों को अपना परमधाम देनेवाले मैं आपके चरण कमलों को भजता हूँ।
निकाम श्याम सुन्दरं। भवांबुनाथ मंदरं।।
प्रफुल्ल कंज लोचनं। मदादि दोष मोचनं।।
व्याख्या : आप निष्काम अवस्था में सुन्दर श्याम व भाव रूपी समुद्र का मंथन करने के लिए मन्दराचल रूप हैं। आप फूले हुए कमल के समान नेत्रों वाले और मद आदि के दोषों को छुड़ाने वाले हैं।
प्रलंब बाहु विक्रमं। प्रभो%प्रमेय वैभवं।।
निषंग चाप सायकं। धरं त्रिलोक नायकं।।
व्याख्या : हे प्रलंब अर्थात् प्र अ लंब यानि प्रकृति के आधार प्रभु! आपकी भुजाओं का विशाल पराक्रम होता है। आपका ऐश्वर्य अप्रमेय अर्थात् बुद्धि से परे होता है। आप निषंग अर्थात् निरासक्त रूपी तरकश और धनुष-बाण रूपी इच्छाओं को धारण करने वाले तीनों लोकों के स्वामी हैं अर्थात् आप सत, रज, तम गुणों से निसंग रहकर समस्त इच्छाओं को धारण करके तीनों गुणों के लोकों को अपने वश में किए हुए हैं।
दिनेश वंश मंडनं। महेश चाप खंडनं।।
मुनींद्र संत रंजनं। सुरारि वृंद भंजनं।।
व्याख्या : आप आत्मा रूपी सूर्य वंश के भूषण हैं तथा महाऐश्वर्य के बन्धन (चाप) को तोड़ने वाले हैं। आप मुनियों और संतों के मन को आनन्द देने वाले तथा आसुरी भावों का नाश करने वाले हैं।
मनोज वैरि वंदितं। अजादि देव सेवितं।।
विशुद्ध बोध विग्रहं। समस्त दूषणापहं।।
व्याख्या : आप काम के शत्रु भावों द्वारा पूजित हैं तथा ब्रह्म आदि अर्थात् बुद्धि व बुद्धि से उत्पन्न देव भावों द्वारा सेवित हैं। आप विशुद्ध बोध अर्थात् विशुद्ध ज्ञान का स्वरूप हैं और समस्त दोषों का नाश करने वाले हैं।
नमामि इंदिरा पतिं। सुखाकरं सतां गतिं।।
भजे सशक्ति सानुजं। शची पति प्रियानुजं।।
व्याख्या : हे इन्द्रियों के स्वामी! आपको नमस्कार। हे सुख स्वरूप व सत्पुरुषों की एकमात्र गति! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। मैं निर्मल इन्द्रियों के द्वारा सशक्ति (सुरता) व लखन भाव सहित आपको भजता हूँ।
त्वदंघ्रि मूल ये नरा:। भजंति हीन मत्सरा:।।
पतंति नो भवार्णवे। वितर्क वीचि संकुले।।
व्याख्या : जो मनुष्य मत्सर रहित होकर आपके चरण कमलों का सेवन करते हैं, वे तर्क-वितर्क रूपी तरंगों से पूर्ण भाव रूप भव सागर में नहीं गिरते हैं।
विविक्त वासिन: सदा। भजंति मुक्तये मुदा।
निरस्य इंद्रियादिकं। प्रयांति ते गतिं स्वकं।।
व्याख्या : जो एकान्तवासी साधक इन्द्रियों आदि का निग्रह करके प्रसन्नतापूर्वक आपको भजते हैं, वे स्वकीय गति अर्थात् निज स्वरूप को प्राप्त होते हैं।
तमेकमद्भुतं प्रभुं। निरीहमीश्वरं विभुं।
जगद्गुरूं च शाश्वतं। तुरीयमेव केवलं।।
व्याख्या : हे प्रभु! आप एक अद्भुत (मायिक जगत से विलक्षण), इच्छा रहित ईश्वर, व्यापक, जगतगुरू, सनातन, तुरीय (तीनों गुणों से सर्वथा परे) व कैवल्य स्वरूप हैं अर्थात् अपने स्वरूप में स्थित हैं।
भजामि भाव वल्लभं। कुयोगिनां सुदुर्लभं।
स्वभक्त कल्प पादपं। समं सुलेव्यमन्वहं।।
व्याख्या : हे भाव प्रिय प्रभु! आप विषयी लोगों के लिए बहुत दुर्लभ हैं (अर्थात् जो विषयी लोग होते हैं, वे आपको प्राप्त नहीं कर पाते हैं)। अपने भक्तों के समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले (कल्पतरू) हैं। आप सम और सदा सुखपूर्वक सेवन करने योग्य हैं। अत: मैं सदैव आपको भजता हूँ।
अनूप रूप भूपतिं। नतो%हमुर्विजा पतिं।
प्रसीद में नमामि ते। पदाब्ज भक्ति देहि में।।
व्याख्या : हे अनुपम सुन्दर! हे शरीर रूपी पृथ्वी के स्वामी! हे जानकीनाथ अर्थात् प्राणशक्ति के स्वामी! मैं आपको प्रणाम करता हूँ। आप मुझ पर प्रसन्न होइये। मैं आपको नमस्कार करता हूँ। हे प्रभु! आप मुझे अपने चरण कमलों की भक्ति दीजिए।
पठंति ये स्तवं इदं। नरादेण ते पदं।
व्रजंति नात्र संशयं। त्वदीय भक्ति संयुता:।।
व्याख्या : जो साधक इस स्तुति का हृदय में पाठ करते हैं, वे आपकी भक्ति से युक्त होकर आपके परमपद को प्राप्त होते हैं। इसमें संदेह नहीं है।
दो0 बिनती करि मुनि नाइ सि डिग्री कह कर जोरि बहोरि।
चरन सरोरूह नाथ जनि कबहुँ तजै मति मोरि।।4।।
व्याख्या : इस प्रकार इत्र रस के समान अत्रि ऋषि ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की अर्थात् आत्मा के प्रति समर्पण किया और बोला कि हे नाथ! मेरी बुद्धि को ऐसी प्रेरणा कर दीजिए जो कभी भी आपसे विमुख नहीं हो।
अनुसुइया के पद गहि सीता। मिली बहोरि सुसील बिनीता।।
रिषिपतिनी मन सुख अधिकाई। आसिष देइ निकट बैठाई।।
व्याख्या : तब सुरता रूपी सीता अनुसुइया अर्थात् इत्र रस कोश में ही अनुसुइया रूपी कोशिका रहती है, जिसमें सुरता लग जाने पर अज्ञान रूपी निद्रा का निवारण हो जाता है और साधक मत्सर व डाह के भावों से पूर्णत: मुक्त हो जाता है। अनुसुइया कोशिका इत्र के समान रस से फलती-फूलती है। इसलिए अनुसुइया को इत्र रस रूपी अत्रि ऋषि की पत्नी के प्रतीक के रूप में लिखा गया है। जब सुरता अनुसुइया रूपी कोशिका में लग जाती है तो अनुसुइया रूपी कोशिका के मन में प्रसन्नता छा जाती है और सुरता को अपनी तरफ आकृष्ट कर लेती है। उसे ही "निकट बैठाई"" बोलकर लिखा गया है।
दिब्य बसन भूषन पहिराए। जे नित नूतन अमल सुहाए।।
कह रिषिबधू सरस मृदु बानी। नारि धर्म कछु ब्याज बखानी।।
व्याख्या : तब अनुसुइया रूपी कोशिका ने सुरता रूपी सीता को दिव्य वस्त्र प्रदान किए अर्थात् दिव्य ज्ञान रूपी वस्त्र प्रदान किए जो नित्य नये और निर्मल रहने वाले होते हैं। तब ऋषि पत्नी ने सरस मधुर वाणी में नाड़ी की धड़कन के प्रभाव का वर्णन किया। अर्थात् सुरता को समझ में आया कि नारी की धड़कन कैसे-कैसे प्रभाव दिखाती है।
मातु पिता भ्राता हितकारी। मितप्रद सब सुनु राजकुमारी।।
अमित दानि भर्ता बयदेही। अधम सो नारि जो सेव न तेही।।
व्याख्या : हे सुरता रूपी राजकुमारी! नाड़ियों रूपी माताएँ, चित रूपी पिता व भाव रूपी भाई ये सब हित करने वाले होते हैं परन्तु ये एक सीमा तक ही हित कर पाते हैं। असीम हित करने वाला तो भर्ता अर्थात् भरित अवस्था वाली आत्मा ही होता है। अत: वह नाड़ी रूपी स्त्री अधम गति वाली होती है, जो आत्मा रूपी स्वामी की सेवा नहीं करती है।
धीरज धर्म मित्र अ डिग्री नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी।।
बृद्ध रोगबस जड़ धनहीना। अंध बधिर क्रोधी अति दीना।।
व्याख्या : धैर्य, धारणा, मित्र और नारी की परीक्षा विपत्ति के समय ही होती है। वृद्ध, रोगी, मूर्ख, गरीब, अंधा, बहरा, क्रोधी व अत्यन्त दीन।
ऐसेहु पति कर किएँ अपमाना। नारि पाव जमपुर दुख नाना।।
एकइ धर्म एक ब्रत नेमा। कायँ बचन मन पति पद प्रेमा।।
व्याख्या : ऐसे पति का भी अपमान करने वाली नारी यमपुर के नाना दु:ख भोगती है। पत्नी की तो एक धारणा व एक ही नियम होना चाहिये कि वो मन, वचन व कर्म से पति के चरणों की सेवा करे। साधना की दृष्टि से आत्मा ही पति होता है और सुरता ही नारी होती है। अत: परमात्मा में निरन्तर सुरता लगाए रखना ही एकमात्र धर्म होता है।
जग पतिब्रता चारि बिधि अहहीं। बेद पुरान संत सब कहहीं।।
उत्तम के अस बस मन माहीं। सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं।।
व्याख्या : संसार में संतों, वेद व पुराणों ने चार प्रकार की पतिव्रता नारियों का वर्णन किया है। उत्तम प्रकार की पतिव्रता नारी वह होती है, जिसका मन वश में होता है और सपने में भी पराए पुरुष का चिंतन नहीं करती है। आध्यात्म की दृष्टि से वह सुरता उत्तम होती है, जो एक परमात्मा में लीन रहती है और मन पुरी तरह वश में होता है।
मध्यम परपति देखइ कैसें। भ्राता पिता पुत्र निज जैसें।।
धर्म बिचारि समुझि कुल रहई। सो निकिष्ट त्रिय श्रुति अस कहई।।
व्याख्या : मध्यम पतिव्रता नारी वह होती है जो पराए पुरुष को भाई, पिता व पुत्र के समान देखती है। जो नारी धर्म का विचार करके अर्थात् धारणा का मनन करके कुल की मर्यादा का विचार करके बची रहती है, वह निकृष्ट स्त्री होती है, ऐसा वेद कहते हैं। आध्यात्मिक दृष्टि में तब सुरता सहज भोगों में सहजता से लगी रहती है और परमात्मा में भी लगी रहती है, वह मध्यम श्रेणी की सुरता की अवस्था होती है। जो सुरता धारणा का मनन करके भोगों से बचती रहती है, वो सुरता निकृष्ट श्रेणी की मानी गयी है।
बिनु अवसर भय तें रह जोई। जानेहु अधम नारि जग सोई।।
पति बंचक परपति रति करई। रौरव नरक कल्प सत परई।।
व्याख्या : जो स्त्री मौका नहीं मिलने से और भयवश पतिव्रता बनी रहती है, वह अधम स्त्री होती है। पति को धोखा देकर जो पराए पति से रति करती है, वह तो सौ कल्पों तक रौरव नरक में पड़ती है। अर्थात् जो सुरता मौका नहीं मिलने के कारण या भय के कारण सांसारिक भोगों से दूर रहती है, वह अधम सुरता होती है, जो सुरता परमात्मा को भूलाकर सांसारिक विषय भोगों में लगी रहती है, वह सुरता तो भयंकर चिन्ता रूपी नरक पैदा करने वाली होती है।
छन सुख लागि जनम सत कोटी। दुख न समुझ तेहि सम को खोटी।।
बिनु श्रम नारि परम गति लहई। पतिब्रत धर्म छाड़ि छल गहई।।
व्याख्या : जो क्षण भर के विषयी सुख के लिए करोड़ों जन्मों के दु:ख को नहीं समझती, उसके समान दुष्टा कौन होगी? अर्थात् क्षण भर के भोगों में अगर सुरता लग जाए तो उस सुरता के समान खोटा कौन होगा? बिना परिश्रम के ही सुरता परम पद को प्राप्त कर लेती है, अगर वह छल-कपट छोड़कर परमात्मा में लग जाए।
पति प्रतिकूल जन्म जहँ जाई। बिधवा होइ पाइ तरूनाई।।
व्याख्या : किन्तु जो पति के प्रतिकूल चलती है, वो जहाँ भी जन्म पाती है वहाँ जवानी में ही विधवा हो जाती है। अर्थात् परमात्मा से विमुख सुरता जिस भी भोग वासना में लगती है, तो वह तृप्त नहीं हो पाती है। तृप्त नहीं हो पाने को ही विधवा के प्रतीक के रूप में लिखा है।
सो0 सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहइ।
जसु गावत श्रुति चारि अजहुँ तुलसिका हरिहि प्रिय।।5क।।
व्याख्या : स्त्री सहज में ही अपवित्र होती है परन्तु पति की सेवा करके शुभ गति को प्राप्त कर लेती है। अर्थात् सुरता तो सहज में विषयी (अपवित्र) होती है परन्तु परमात्मा में सुरता लग जाए तो शुभ गति प्राप्त हो जाती है। चार प्रकार की सुरता होती हैं परन्तु माया का हरण करने वाली सुरता ही परमात्मा को प्रिय होती है।
सो0 सुनु सीता तव नाम सुमिरि नारि पतिब्रत करहिं।
तोहि प्रानप्रिय राम कहिउँ कथा संसार हित।।5ख।।
व्याख्या : अनुसुइया रूपी ऋषि पत्नी बोली कि हे सुरता रूपी सीता! तुम्हारा नाम स्मरण करके नाड़ियाँ रूपी पतिव्रता, पतिव्रत धर्म का पालन करेंगी अर्थात् सुरता में लीन होने पर नाड़ियों में परमात्मा में लीनता के भाव पैदा हो जायेंगे। तुमको आत्मा रूपी राम प्राणों के समान प्रिय होते हैं। पतिव्रता धर्म अर्थात् परमात्मा के प्रति धारणा की कथा तो मैंने संसार के कल्याण के लिए कही है।
सुनि जानकी परम सुखु पावा। सादर तासु चरन सि डिग्री नावा।।
तब मुनि सन कह कृपानिधाना। आयसु होइ जाउँ बन आना।।
व्याख्या : सुरता रूपी सीता ने अनुसुइया रूपी ऋषि पत्नी की बात सुनकर परम सुख की अनुभूति की और मत्सर व डाह रहित अनुसूइया भाव के सामने समर्पण कर दिया। तब इत्र रस रूपी अत्रि ऋषि से आत्मा रूपी राम बोले कि अगर आपकी प्रेरणा हो तो अब मैं दूसरे वैराग्य कोश में चला जाउँ। वास्तव में ध्यान में मस्तिष्क के नए-नए कोश जागृत होते रहते हैं और प्रत्येक कोश की नयी अनुभूति साधक को होती रहती है। इन चौपाइयों में भी उसी अवस्था का वर्णन किया गया है।
संतत मो पर कृपा करेहू। सेवक जानि तजेहु जनि नेहू।।
धर्म धुरंधर प्रभु कै बानी। सुनि सप्रेम बोले मुनि ग्यानी।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम इत्र रस सम अत्रि ऋषि से बोले कि आप मुझ पर निरंतर कृपा करते रहियेगा और सेवक जान कर कभी प्रेम न छोड़ियेगा। धारणा में प्रबल आत्मा रूपी राम की वाणी सुनकर प्रेमपूर्वक अत्रि ऋषि बोले।
जासु कृपा अज सिव सनकादी। चहत सकल परमारथ बादी।।
ते तुम्ह राम अकाम पिआरे। दीन बंधु मृदु बचन उचारे।।
व्याख्या : बुद्धि रूपी ब्रह्मा, विश्वास रूपी शिव व सनातन रूपी सनकादि परमार्थवादी जिनकी कृपा चाहते हैं, हे आत्मा रूपी राम! आप वही निष्काम पुरुषों के भी प्रिय और दीनों के बन्धु भगवान् (प्रकृति को वश में करने वाले) हैं, जो इस प्रकार कोमल वचन बोल रहे हैं।
अब जानी मैं श्री चतुराई। भजी तुम्हहि सब देव बिहाई।।
जेहि समान अतिसय नहिं कोई। ता कर सील कस न अस होई।।
व्याख्या : अब मैंने सुरता रूपी श्री की चतुराई को जान लिया है, जिन्होंने सब देवताओं को अर्थात् सब भावों को छोड़कर आत्मा में रमण किया है। जिस आत्मा के समान अत्यन्त बड़ा और कोई नहीं है, उस आत्मा का शील भला, ऐसा क्यों न होगा?
केहि बिधि कहौं जाहु अब स्वामी। कहहु नाथ तुम्ह अंतरजामी।।
अस कहि प्रभु बिलोकि मुनि धीरा। लोचन जल बह पुलक सरीरा।।
व्याख्या : अब मैं किस प्रकार आपसे जाने को कहूँ? हे नाथ! आप तो अन्तर्यामी हैं। इस चौपाई में बहुत गहरा रहस्य छुपा हुआ है। वास्तव में जब ध्यान में आत्म चेतना इत्र रस रूपी कोश में चली जाती है तो इत्र कोश में पुलकावली छा जाती है तथा इत्र कोश से आत्मा चेतना को बाहर जाने की इच्छा नहीं करती है। इसलिए ही आत्मा रूपी राम अत्रि ऋषि से जाने की आज्ञा चाहते हैं परन्तु अत्रि ऋषि कहते हैं कि मैं कैसे जाने की कह दूँ। ऐसी ध्यान अवस्था आने पर आत्मा व इत्र कोश एक दूसरे को देखने लगते हैं और दोनों पुलकित हो उठते हैं। उसी अनुभूति को प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा गया है।
ठ0 तन पुलक निर्भर प्रेम पूरन नयन मुख पंकज दिए।
मन ग्यान गुन गोतीत प्रभु मैं दीख जप तप का किए।।
जप जोग धर्म समूह तें नर भगति अनुपम पावई।
रघुबीर चरित पुनीत निसि दिन दास तुलसी गावई।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में जब इत्र रस रूपी कोश बहुत प्रफुल्लित हो उठता है। उसी भाव अवस्था की अनुभूति को प्रतीकों के माध्यम से बताया गया है कि अत्रि मुनि का तन पुलकित हो रहा है और प्रेम की पूर्णता आ गयी है तथा नयन आत्मा रूपी कमल में लग गए हैं। उस अवस्था में अत्रि ऋषि रूपी भाव को लगने लगता है कि मैंने ऐसा कौन-सा जप-तप कर लिए जिससे मन, ज्ञान, गुण व इन्द्रियों से परे परमात्मा का दर्शन कर लिया अर्थात् आत्म अनुभूति कर ली। जप व योग की धारणा से साधक अनुपम भक्ति को प्राप्त कर लेता है। इसलिए तुलसीदास उसी साधना अनुभूति के द्वारा आत्मा की परम अनुभूति का रात-दिन गुण गान करते हैं।
दो0 कलिमल समन दमन मन राम सुजस सुखमूल।
सादर सुनहिं जे तिन्ह पर राम रहहिं अनुकूल।।6क।।
व्याख्या : आत्म अनुभूति की परम पवित्र कथा देह विकारों (कलिमल) का नाश करने वाली व मन को वश में करने वाली होती है तथा सुख का मूल भी होती है। अत: जो लोग आदरपूर्वक इस परम पवित्र आत्म अनुभूति की कथा को सुनेंगे, उन पर आत्मा रूपी राम स्वत: ही अनुकूल रहेंगे।
सो0 कठिन काल मल कोस धर्म न ग्यान न जोग जप।
परिहरि सकल भरोस रामहि भजहिं ते चतुर नर।।6ख।।
व्याख्या : देह बुद्धि की कठिन धारणा चिन्ता रूपी पाप का खजाना होती है। उस अवस्था में न तो ज्ञान होता है न योग होता है और न ही जप होता है। इसलिए जो देहबुद्धि का त्याग करके परमात्मा का पूर्ण भरोसा करके भजन करते हैं, वे ही साधक चतुर सुजान होते हैं।
मुनि पद कमल नाइ करि सीसा। चले बनहि सुर नर मुनि ईसा।।
आगें राम अनुज पुनि पाछें। मुनि बर बेष बने अति काछें।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में आत्मा रूपी राम इत्र रस रूपी अत्रि मुनि को सिर नवाकर इत्र रस कोश को छोड़कर स्वर व नर की धड़कन को वश में करते हुए आगे के कोश के लिए चल दिए। अर्थात् आत्म चेतना सुरता व लखन भावों सहित इत्र रस कोश को छोड़कर आगे दूसरे कोश के लिए चल दिए। ध्यान की उस अवस्था में आत्म चेतना आगे-आगे चलती है और लखन भाव आत्म चेतना का अनुसरण करता हुआ पीछे-पीछे चलता है। उसी को राम का आगे और लक्ष्मण का पीछे चलना बोलकर लिखा है।
उभय बीच श्री सोहइ कैसी। ब्रह्म जीव बीच माया जैसी।।
सरिता बन गिरि अवघट घाटा । पति पहिचानि देहिं बर बाटा।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में आत्मा व लखन भाव के बीच में सुरता ऐसे होते हैं जैसे ब्रह्म व जीव के बीच में माया होती है। वास्तव में सुरता ही माया होती है जब वो संसार में लग जाती है और सुरता परमात्मा में लग जाती है तो तब आत्मा ब्रह्म होती है और लखन भाव जीव का आभास कराता है। इसलिए सुरता को जीव व ब्रह्म के बीच में बताया गया है। परन्तु जब सुरता परमात्मा में लग जाती है तो आत्मा परमात्मा हो जाती है और लखन भाव अंश के रूप में परमात्मा का अनुसरण करने लगता है। उस अवस्था में मस्तिष्क के नाना कोश, नाड़ियाँ, पर्वत और दुर्गम कोश-कोशिकाएँ सभी आत्मा के प्रभाव को जानकर रास्ता दे देते हैं अर्थात् सभी आत्म चेतना को उर्ध्वगामी होने में सहायता करने लगते हैं।
जहँ जहँ जाहिं देव रघुराया। करहिं मेघ तहँ तहँ नभ छाया।।
मिला असुर बिराध मग जाता। आवतहीं रघुबीर निपाता।।
व्याख्या : जिस जिस भी नाड़ी, कोश व कोशिकाओं में आत्म चेतना प्रवेश करती हैं, वहाँ-वहाँ वासनाओं की तप्त मिट जाती है और संतोष व वैराग्य रूपी बादल छाया करने लगते हैं। ध्यान कितना भी गम्भीर हो बीच-बीच में कुछ विपरीत भाव पैदा होते रहते हैं। विराध अर्थात् असहजता के भाव पैदा होना ही विराध रूपी असुर होता है, जिसे देखते ही आत्मा रूपी राम मार देते हैं। अर्थात् ध्यान की उस अवस्था में आत्म चेतना के प्रभाव से विरोध का भाव तुरन्त मिट जाता है। विरोध का भाव मिट जाना ही विराध का वध कहलाता है।
तुरतहिं रूचिर रूप तेहिं पावा। देखि दुखी निज धाम पठावा।।
पुनि आए जहाँ मुनि सरभंगा। सुंदर अनुज जानकी संगा।।
व्याख्या : ध्यान में आत्म चेतना का प्रभाव इतना पड़ता है कि विरोध के भाव भी विरोधिता छोड़कर सहज हो जाते हैं। उसी अवस्था को ""तुरतहिं रूचिर रूप तेहिं पावा"" बोलकर लिखा गया है। जब विरोध भाव सहज हो जाता है तो वह निज धाम की अवस्था कहलाती है। जब विरोध भाव शान्त हो जाते हैं तो ध्यान में ऐसी अवस्था आती है कि सहजता की परम अवस्था आ जाती है जिससे मन का सरभंग भाव पैदा हो जाता है अर्थात् नियमों का बंधन टूट जाता है और सहजता आ जाती है। उस अवस्था में आत्मा की परम सुंदर अवस्था अर्थात् निर्मल अवस्था आ जाती है और लखन भाव व सुरता भाव आत्मा के साथ शोभा पाते हैं।
दो0 देखि राम मुख पंकज मुनिबर लोचन भृंग।
सादर पान करत अति धन्य जन्म सरभंग।।7।।
व्याख्या : आत्मा रूपी कमल को देखकर मन के सरभंग भाव रूपी मुनि के नेत्र उसका पान करने लगते हैं अर्थात् सरभंग का भाव भी आत्मलीन होने लगता है। उस रसपान की अवस्था को प्राप्त करके मन का सरभंग भाव धन्य हो जाता है।
कह मुनि सुनु रघुबीर कृपाला। संकर मानस राजमराला।।
जात रहेउँ बिरंचि के धामा। सुनेउँ श्रवन बन ऐहहिं रामा।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में सरभंग रूपी मन का भाव बोला कि हे कपालु आत्मा रूपी राम! आप विश्वास रूपी शंकर के मन के राजहंस हैं। मैं तो बुद्धि के बल पर चला जा रहा था परन्तु मैंने सुना कि वैराग्य रूपी वन में आत्मा रूपी राम आयेंगे अर्थात् परम वैराग्य की अवस्था में आत्मा रूपी राम के दर्शन होंगे।
चितवत पंथ रहेउँ दिन राती। अब प्रभु देखि जुड़ानी छाती।।
नाथ सकल साधन मैं हीना। कीन्ही कृपा जानि जन दीना।।
व्याख्या : तब से मैं चितवत होकर आत्म दर्शन की राह देख रहा हूँ। अत: अब आपके दर्शन करके अर्थात् आत्म साक्षात्कार करके मुझे संतोष मिल गया है। हे नाथ! मैं तो सब साधनों से हीन हूँ अर्थात् समस्त इन्छाओं से हीन होने के कारण ही आपने मुझे दीन-हीन जानकर ही कृपा की है।
सो कछु देव न मोहि निहोरा। निज पन राखेउ जन मन चोरा।।
तब लगि रहहु दीन हित लागी। जब लगि मिलौं तुम्हहि तनु त्यागी।।
व्याख्या : इसलिए आपका मुझ पर कोई अहसान नहीं है। क्योंकि स्वयं के प्राण को वश में करने पर साधक मन का हरण कर लेता है अर्थात् मन को वश में कर लेता है और आप तो मन के वश में होते ही कृपा कर ही देते हो। तुम तो तब ही साधक के कल्याण में लगे रहते हो तब तक साधक शरीर का आभास त्याग करके तुमसे मिला रहता है।
जोग जग्य जप तप ब्रत कीन्हा। प्रभु कहँ देइ भगति बर लीन्हा।।
एहि बिधि सर रचि मुनि सरभंगा। बैठे हृदयँ छाड़ि सब संगा।।
व्याख्या : योग, यज्ञ (अपान का पान में हवन), जप, तप व व्रत सबका पालन करके सरभंग रूपी मन के भाव ने भक्ति अर्थात् भयहीन अवस्था को प्राप्त कर लिया। इस प्रकार ध्यान की क्रिया का पालन करके सब आसक्ति का त्याग करके सरभंग रूपी मन का भाव आत्मा में लीन होने को तैयार हो गया।
दो0 सीता अनुज समेत प्रभु नील जलद तनु स्याम।
मम हियँ बसहु निरंतर सगुनरूप श्रीराम।।8।।
व्याख्या : जब सरभंग रूपी मन का भाव आत्मा में लीन होने लगता है तो उसके मन में भाव आ जाता है कि सुरता व लखन भाव सहित हे आत्मा रूपी राम! आप मेरे हृदय में निवास कीजिए। सगुण श्रीराम का तात्पर्य है कि सद्गुणों सहित सुरता व आत्म चेतना मेरे हृदय में रहना। मैं पहले भी पाठकों को बता चुका हूँ कि प्रत्येक सूक्ष्म से सूक्ष्म भाव का मन व हृदय सब होता है। इसलिए इसे पढ़कर आश्चर्य नहीं करना चाहिये।
अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। राम कृपाँ बैकुंठ सिधारा।।
ताते मुनि हरि लीन न भयऊ। प्रथमहिं भेद भक्ति बर लयऊ।।
व्याख्या : ऐसा कहकर सरभंग रूपी मन का भाव देहासक्ति का त्याग करके योग की ज्वाला से निर्मल हो गया और आत्मा रूपी राम की कृपा से बिना कुण्ठा (बिन अ कुण्ठा उ बैकुण्ठ) की अवस्था को प्राप्त कर लिया। वह सरभंग रूपी मन का भाव माया को हरने की अवस्था में लीन नहीं होकर भयहीन (भय अ गत उ भक्ति) अवस्था को प्राप्त कर लिया।
रिषि निकाय मुनिबर गति देखी। सुखी भए निज हृदयँ बिसेषी।।
अस्तुति करहिं सकल मुनि बृंदा। जयति प्रनत हित करूना कंदा।।
व्याख्या : रस रूपी ऋषियों ने जब सरभंग रूपी मन के भाव की यह गति देखी तो सभी ऋषि समूह अपने हृदय में बहुत सुखी हुए। उस अवस्था में मन के भावों में परमात्मा की स्तुति करने की उमंग उठ आती है और सब भाव स्तुति करने लगते हैं कि हे करूणा के मूल! आप प्राण के माध्यम से सबका कल्याण करने वाले हैं। आपकी जय हो।
पुनि रघुनाथ चले बन आगे। मुनिबर बृंद बिपुल सँग लागे।।
अस्थि समूह देखि रघुराया। पूछी मुनिन्ह लागि अति दाया।।
व्याख्या : ध्यान में फिर आत्मा रूपी राम वैराग्य रूपी वन के दूसरे कोश के लिए आगे चल दिए। अर्थात् आत्म चेतना दूसरे कोश के लिए चल दी। उस अवस्था में मन के भावों के समूह भी आत्म चेतना का अनुसरण करने लगते हैं। मैं यहाँ पाठकों को बता देना चाहता हूँ कि प्रत्येक कोश व कोशिका में भी मन के भाव होते हैं। अत: ध्यान में जब आत्म चेतना कोशों में प्रवेश करती चली जाती है तो उस कोश के मन के भावों का समूह भी आत्म चेतना का अनुसरण करने लगता है। उसी को ""मुनिबृंद बिपुल सँग लागे"" बोलकर लिखा गया है। जब आत्म चेतना आगे के कोश में जाती है तो रास्ते में नाड़ियों में अस्थि समूह देखती है, तो मन के भावों की उस अवस्था को देखकर दया भाव पैदा हो जाता है। वास्तव में ध्यान में ही समझ आ पाता है कि हमारे कोश व कोशिकाओं में बहुत से सद्भाव पैदा होते रहते हैं परन्तु आसुरी भावों के प्रभाव के कारण वे शीघ्र मृत हो जाते हैं और वे मृत सद्भाव के जीवाणु नाड़ियों में जमा होते जाते हैं। ये मृत भाव के जीवाणु ही नाड़ियों में अवरोध पैदा करके नाना रोग पैदा करते रहते हैं। इसलिए तामसिक वृति होने वाले जीव की नाड़ियों में सद्भाव मृत होकर ज्यादा अवरोध पैदा करते हैं। उन्हीं अवरोध की अवस्था को चिकित्सक हृदय नलियों में अवरोध बोलकर समझाते हैं। ज्यादा सद्भाव के जीवाणु मृत होने पर वही कैंसर के रूप में रोग पैदा कर देते हैं। ध्यान में इन भावों की दशा को अच्छी तरह समझा जा सकता है। आत्म चेतना को भावों के जीवाणुओं की यह दशा समझ में आ जाती है कि इनकी यह दशा आसुरी भावों ने की है। इसी अवस्था को देखकर आत्मा द्रवित हो जाती है।
जानतहूँ पूछिअ कस स्वामी। सब दरसी तुम्ह अंतरजामी।।
निसिचर निकर सकल मुनि खाए। सुनि रघुबीर नयन जल छाए।।
व्याख्या : मन के भाव रूपी मुनि कहने लगते हैं कि हे आत्मा रूपी राम! आप तो सब कुछ जानते हो, अन्तर्यामी हो, फिर हमसे कैसे पूछ रहे हो? आसुरी भावों ने ही मन के ये सब सद्भाव खाए हैं। ऐसा जानकर अर्थात् अनुभव करके आत्मा द्रवित हो उठती है। उसी को ""नयन जल छाए"" बोलकर लिखा है।
दो0 निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह।
सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह।।9।।
व्याख्या : आत्मा द्रवित होकर प्रण करती है अर्थात् प्राण की गति को बदलती है जिससे आसुरी भावों का अन्त हो जाए और कोश रूपी भूमि आसुरी भावों से रहित हो जाए। इस प्रकार सब भावों के कोशों में आत्म चेतना प्रवेश कर-करके सभी भावों को सुख प्रदान करने लगती है।
मुनि अगस्ति कर सिष्य सुजाना। नाम सुतीछन रति भगवाना।।
मन क्रम बचन राम पद सेवक। सपनेहुँ आन भरोस न देवक।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में अगस्त्य ऋषि व सुतीक्ष्ण मुनि का भाव पैदा हो जाता है। मैं पाठकों को अगस्त्य व सुतीक्ष्ण प्रतीकों का रहस्य बता देना चाहता हूँ। जब आत्म चेतना विभिन्न कोशों में प्रवेश करके सभी कोशों को निर्मल कर देती है तो साधक की वर्तमान में बरतने की अवस्था आ जाती है और उसके भविष्य के भावों का लोप हो जाता है। उसी अवस्था को प्रतीकों का सहारा लेकर अगस्त्य (अर्थात् अग अ अस्त यानि भविष्य के लोप) ऋषि बताया गया है। जब साधक वर्तमान में रमण करने वाला हो जाता है, तो उसकी बुद्धि निर्मल होकर परमात्मा में मिलने की तीव्र आकांक्षा से भर जाती है, उसी को सुतीक्ष्ण (अर्थात् सु अ तीक्ष्ण यानि सद्गुणों से युक्त तीक्ष्ण वृति वाली) के प्रतीक रूप में लिखा गया है। सुतीक्ष्ण की अवस्था अगस्त्य भाव से ही पैदा होती है, इसलिए सुतीक्ष्ण को अगस्त्य ऋषि का शिष्य बताया गया है। सुतीक्ष्ण की अवस्था आ जाने पर मन, वचन व कर्म से परमात्मा से लग्न लग जाती है और मन में किसी प्रकार की चाह नहीं बच पाती है। क्योंकि अग अ अस्त अर्थात् भविष्य का लोप होने पर चाह कैसे बच सकती है।
प्रभु आगवनु श्रवन सुनि पावा। करत मनोरथ आतुर धावा।।
हे बिधि दीनबंधु रघुराया। मो से सठ पर करिहहिं दाया।।
व्याख्या : सुतीक्ष्ण का भाव आत्म चेतना के आगमन से आतुर होकर मन के रथ को लेकर परमात्मा से मिलने के लिए दौड़ पड़ता है। उस अवस्था में सुतीक्ष्ण भाव के अन्दर पूर्ण समर्पण का भाव आ जाता है इसलिए वह कह उठता है कि क्रिया (विधि) द्वारा क्या दीनबंधु परमात्मा मुझ जैसे सठ पर दया करेंगे?
सहित अनुज मोहि राम गोसाईं। मिलहहिं निज सेवक की नाईं।।
मोरे जियँ भरोस दृढ़ नाहीं। भगति बिरति न ग्यान मन माहीं।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम जो इन्द्रियों के स्वामी हैं क्या अपने अनुसरणकर्ता लखन भाव सहित मुझसे अपने सेवक की तरह मिलेंगे? सुतीक्ष्ण का भाव कहता है कि मेरे हृदय में दृढ़ विश्वास नहीं है और मेरे मन में भक्ति, वैराग्य व ज्ञान भी नहीं है।
नहिं सतसंग जोग जप जागा। नहिं दृढ़ चरन कमल अनुरागा।।
एक बानि करूनानिधान की। सो प्रिय जाकें गति न आन की।।
व्याख्या : मैंने न तो सत्संग, योग, जप व यज्ञ (अपान का पान में हवन करना ही यज्ञ होता है) किए हैं और न ही मेरे मन में परमात्मा के चरणों में दृढ़ अनुराग है। हाँ परमात्मा की एक बान है अर्थात् आदत है कि उन्हें वही प्रिय होता है जिसे और किसी की कुछ आशा नहीं होती है। इन चौपाइयों में साधना का बहुत गहरा रहस्य खोला गया है। वास्तव में भविष्य का चिन्तन छोड़कर जब साधक समस्त अपेक्षाओं का त्याग करके वर्तमान में रमण करने लग जाता है तो उसकी बुद्धि की परमात्मा में मिलने की तीक्ष्ण इच्छा पैदा हो जाती है। उस अवस्था में योग, यज्ञ व जप आदि की कोई आवश्यकता नहीं रहती है।
होइहैं सुफलआजु मम लोचन। देखि बदन पंकज भव मोचन।।
निर्भर प्रेम मगन मुनि ग्यानी। कहि न जाइ सो दसा भवानी।।
व्याख्या : परमात्मा की इस बान (आदत) का वर्णन करके बुद्धि का सुतीक्ष्ण भाव मन ही मन कहने लगा कि आज परमात्मा के कमल स्वरूप शरीर को देखकर मेरे नेत्र धन्य होंगे। उस अवस्था का चिन्तन करते-करते बुद्धि का सुतीक्ष्ण भाव प्रेम में डूब गया। उस समय आने वाले भावों की दशा (भव अ आनी उ भवानी) का वर्णन किसी भी प्रकार नहीं किया जा सकता है।
दिसि अ डिग्री बिदिसि पंथ नहिं सूझा। को मैं चलेउँ कहाँ नहिं बूझा।।
कबहुँक फिरि पाछें पुनि जाई। कबहुँक नृत्य करइ गुन गाई।।
व्याख्या : जब बुद्धि का सुतीक्ष्ण भाव प्रेम में मग्न हो जाता है तो उसे किसी भी प्रकार का रास्ता नहीं सूझता है और न ही मैं कौन हूँ? कहाँ जा रहा हूँ? इस बात का आभास रहता है। उस अवस्था में वह कभी पीछे व कभी आगे चलने लगता है और कभी परमात्मा के गुणों का गान करके नाचने लगता है।
अबिरल प्रेम भगति मुनि पाई। प्रभु देखैं त डिग्री ओट लुकाई।।
अतिसय प्रीति देखि रघुबीरा। प्रगटे हृदय हरन भव भीरा।।
व्याख्या : उस दशा में बुद्धि के सुतीक्ष्ण भाव को भयहीन प्रेम की अवस्था प्राप्त हो जाती है। उस अवस्था में परमात्मा साधक को दृढ़ता रूपी वृक्ष की ओट से छुपकर देखते हैं। तब प्रेम की अति प्रबलता को देखकर परमात्मा साधक के हृदय में ही भावों की भीड़ को हटाने के लिए प्रकट हो जाते हैं।
मुनि मग माझ अचल होइ बैसा। पुलक सरीर पनस फल जैसा।।
तब रघुनाथ निकट चलि आए। देखि दसा निज जन मन भाए।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में बुद्धि का सुतीक्ष्ण भाव परमात्मा से लीनता के रास्ते में स्थिर हो गया और शरीर वैसे पुलकित हो उठा जैसे कटहल के फल के काँटे हों अर्थात् रूवाँ-रूवाँ खड़ा हो गया। तब ऐसी अवस्था में आत्मा रूपी राम सुतीक्ष्ण भाव के निकट चले आते हैं और सुतीक्ष्ण भाव की ऐसी प्रेम मग्न अवस्था को देखकर प्रसन्न होते हैं।
मुनिहि राम बहु भाँति जगावा। जाग न ध्यान जनित सुख पावा।।
भूप रूप तब राम दुरावा। हृदयँ चतुर्भुज रूप देखावा।।
व्याख्या : जब बुद्धि का सुतीक्ष्ण भाव प्रेम में मग्न हो गया तो आत्मा रूपी राम ने बहुत प्रकार से प्रेरणा करके प्रेम से बाहर लाने का प्रयास किया परन्तु ध्यान में जैसा आनन्द मिलता है वैसा ही आनन्द प्रेम की मग्नता में मिल रहा था। तब आत्मा रूपी राम ने प्रेरणा करके प्रेम के भावों को छुपा लिया और हृदय में चारों गुणों की अवस्था को प्रकट कर दिया। चारों गुणों की अवस्था का प्रकट होना ही चतुर्भुज रूप कहलाता है।
मुनि अकुलाइ उठा तब कैसे। बिकल हीन मनि फनिबर जैसे।।
आगे देखि राम तन स्यामा। सीता अनुज सहित सुख धामा।।
व्याख्या : तब सुतीक्ष्ण रूपी बुद्धि का भाव ऐसे व्याकुल हो उठा जैसे बिना मणि के नाग व्याकुल हो उठता है। तब सुतीक्ष्ण भाव ने श्याम स्वरूप आत्मा का साक्षात्कार किया जो सुरता व लखन भाव सहित सुख का घर है।
परेउ लकुट इव चरनन्हि लागी। प्रेम मगन मुनिबर बड़भागी।।
भुज बिसाल गहि लिए उठाई। परम प्रीति राखे उर लाई।।
व्याख्या : तब ध्यान की उस अवस्था में बुद्धि का सुतीक्ष्ण भाव स्थिर होकर आत्मा में लीन हो गया। तब आत्मा रूपी राम ने भी अपने भावों की विशालता रूपी भुजाओं में सुतीक्ष्ण भाव को ले लिया और हृदय में परम प्रीति पैदा हो गयी।
मुनिहि मिलत अस सोह कृपाला। कनक तरूहि जनु भेंट तमाला।।
राम बदनु बिलोक मुनि ठाढ़ा। मानहुँ चित्र माझ लिखि काढ़ा।।
व्याख्या : कृपालु आत्मा रूपी राम सुतीक्ष्ण रूपी बुद्धि के भाव से मिलते हुए ऐसे सुशोभित होने लगते हैं, मानो सोने के वृक्ष से तमाल का वृक्ष मिल रहा हो। आत्मा का साक्षात्कार करके सुतीक्ष्ण रूपी भाव चित्रलिखा सा खड़ा हो गया अर्थात् स्तब्ध होकर स्थिरप्रज्ञ हो गया।
दो0 तब मुनि हृदयँ धीर धरि गहि पद बारहिं बार।
निज आश्रम प्रभु आनि करि पूजा बिबिध प्रकार।।10।।
व्याख्या : तब सुतीक्ष्ण रूपी बुद्धि के भाव ने पूर्ण समर्पण करते हुए आत्मा रूपी राम को अपने आश्रम में लाकर नाना प्रकार से पूजा की अर्थात् आत्म चेतना सुतीक्ष्ण रूपी भाव कोश में पहुँची और मुनि ने नाना प्रकार से आत्मा चेतना को अंगीकार किया।
कह मुनि प्रभु सुनु बिनती मोरी। अस्तुति करौं कवन बिधि तोरी।।
महिमा अमित मोरि मति थोरी। रबि सन्मुख खद्योत अँजोरी।।
व्याख्या : सुतीक्ष्ण रूपी बुद्धि भाव कहने लगा कि हे आत्मा रूपी राम! आप मेरी प्रार्थना सुनिए। मैं किस प्रकार आपकी स्तुति करूँ। आपकी महिमा तो अपरम्पार है और मेरी बुद्धि छोटी है। जैसे सूर्य के सामने जुगनू का उजाला। ध्यान की उस अवस्था में स्वत: ही स्तुति के भाव उमड़ने लगते हैं। उन्हीं भावों को आगे की चौपाइयों में लिखा गया है।
श्याम तामरस दाम शरीरं। जटा मुकुट परिधन मुनि चीरं।।
पाणि चाप शर कटि तुणीरं। नौमि निरंतर श्रीरघुवीरं।।
व्याख्या : इन चौपाइयों में आत्म स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा गया है कि आत्मा का स्वरूप श्याम वर्ण व नील कमल की माला के समान है। हे जटाओं के मुकुट और मुनियों के वल्कल वस्त्र पहने हुए अर्थात् आत्मा समस्त भावों का मूल व इच्छाओं रूपी वस्त्रों से ढँकी रहती है। प्राण की चाप अर्थात् प्राण की तरंगों से इच्छा व वृति रूपी धनुष बाणों को धारण करने वाले तथा मकर में दृढ़ता रूपी तरकश बाँधे हुए हे आत्मा रूपी राम! आपको नमस्कार हो।
मोह बिपिन घन दहन कृशानु:। संत सरोरूह कानन भानु:।।
निसिचर करि वरुथ मृगराज:। त्रातु सदा नो भव खग बाज:।।
व्याख्या : हे आत्मा रूपी राम! आप मोह रूपी वन को जलाने के लिए अग्नि के समान हैं तथा संत रूपी कमलों के वन को प्रफुल्लित करने के लिए सूर्य के समान हैं। आप आसुरी भाव रूपी हाथियों को मारने के लिए सिंह के समान हैं और भाव रूपी पक्षी को मारने के लिए बाज के समान हैं। अत: हे प्रभु! आप हमारी सदा रक्षा करें।
अरुण नयन राजीव सुवेशं। सीता नयन चकोर निशेशं।।
हर हृदि मानस बाल मरालं। नौमि राम उर बाहु विशालं।।
व्याख्या : हे लाल कमल के समान नेत्र व सुन्दर भेष वाले! आप सुरता रूपी सीता के नयनों रूपी चकोर के लिए चन्द्रमा के समान हैं। माया के हरण की अवस्था में मन के मानसरोवर के बालहंस, विशाल हृदय और भुजा वाले हे आत्मा रूपी राम! मैं आपको नमस्कार करता हूँ।
संशय सर्प ग्रसन उरगाद:। शमन सुकर्कश तर्क विषाद:।।
भव भंजन रंजन सुर यूथ:। त्रातु सदा नो कृपा बरुथ:।।
व्याख्या : हे आत्मा रूपी राम! आप संशय रूपी सर्पों को ग्रसने के लिए गरुड़ के समान हैं तथा अत्यन्त कठोर तर्क से उत्पन्न होने वाले विषाद का नाश करने वाले हैं। आप भावों को मिटाने वाले व भाव रूपी देवों को आनन्द देने वाले हैं। हे कृपा के समूह आत्मा रूपी राम! आप हमारी रक्षा कीजिए।
निर्गुण सगुण विषम सम रूपं। ज्ञान गिरा गोतीतमनूपं।।
अमलमखिलमनवधधमपारं । नौमि राम भंजन महि भारं।।
व्याख्या : हे प्रभु! आप निर्गुण, सगुण, विषम व सम रूप हैं तथा ज्ञान, वाणी व इन्द्रियों से अतीत हैं। आप अनुपम हैं। आप निर्मल, सम्पूर्ण दोषों से रहित, अनन्त व प्रकृति से परे हैं। हे आत्मा रूपी राम! देह रूप पृथ्वी के भार को दूर करने वाले आपको मेरा नमस्कार।
भक्त कल्पपादप आराम:। तर्जन क्रोध लोभ मद काम:।।
अति नागर भव सागर सेतु:। त्रातु सदा दिनकर कुलकेतु:।।
व्याख्या : जो भक्तों के लिए कल्पना के आधार हैं तथा क्रोध, लोभ, मद और काम के भावों को डराने वाले हैं, अत्यन्त ही चतुर और संसार रूपी समुद्र से तरने के लिए सेतु रूप हैं, वे आत्मा रूपी सूर्य मेरी सदा रक्षा करें।
अतुलित भुज प्रताप बल धाम:। कलि मल विपुल विभंजन नाम:।।
धर्म वर्म नर्मद गुण ग्राम:। संतत शं तनोतु मम राम:।।
व्याख्या : जो अतुल्य बल व प्रताप वाले हैं और जिनका नाम देह विकारों का नाश करने वाला होता है। जो धारणा के आधार हैं और जिनके गुण समूह आनन्द देने वाले हैं। वे आत्मा रूपी राम मेरा सदैव कल्याण करें।
जदपि बिरज व्यापक अबिनासी। सब के हृदयँ निरंतर बासी।।
तदपि अनुज श्री सहित खरारी। बसतु मनसि मन कानन चारी।।
व्याख्या : हे प्रभु! यद्यपि आप निर्मल, सर्वव्यापक, अविनाशी व सबके हृदय में निरन्तर निवास करने वाले हैं परन्तु मेरे मन रूपी वन में तो आप लखन भाव व सुरता रूपी सीता सहित निवास कीजिए।
जे जानहिं ते जानहुँ स्वामी। सगुन अगुन उर अंतरजामी।।
जो कोसलपति राजिव नयना। करउ सो राम हृदय मम अयना।।
व्याख्या : हे प्रभु! आपको जो सगुण, निर्गुण व अन्तर्यामी जो जाने वे जाना करें। परन्तु मेरे हृदय में तो कोसलपति अर्थात् सुष्मना नाड़ी के द्वारा मन रूपी वैराग्य वन में विचरने वाले आत्मा रूपी राम ही निवास करें।
अस अभिमान जाइ जनि भोरे। मैं सेवक रघुपति पति मोरे।।
सुनि मुनि बचन राम मन भाए। बहुरि हरषि मुनिबर उर लाए।।
व्याख्या : सुतीक्ष्ण रूपी भाव बोला कि हे प्रभु! मेरा यह अभिमान भूलकर भी न जाए कि मैं सेवक हूँ और आत्मा रूपी राम मेरे स्वामी हैं। वास्तव में यह अवस्था समर्पण की होती है। इस प्रकार के सुतीक्ष्ण रूपी मुनि के वचन आत्मा रूपी राम को बहुत अच्छे लगे और तब हर्षित होकर सुतीक्ष्ण भाव को हृदय से लगा लिया अर्थात् लीन कर लिया।
परम प्रसन्न जानु मुनि मोही। जो बर मागहु देउँ सो तोही।।
मुनि कर मैं बर कबहुँ न जाचा। समुझि न परइ झूठ का साचा।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में जब आत्मा परम आनन्द की अवस्था में आ जाती है तो साधक के भावों के अनुसार वर देने की अवस्था आ जाती है। इसी अवस्था को कुछ साधना पंथों में सिद्धियों व चमत्कार के रूप में बताया जाने लगता है। परन्तु जब सुतीक्ष्ण रूपी बुद्धि का भाव परमात्मा में लीन होने को तत्पर होता है, तो उसे कोई वर माँगने की चाह नहीं रहती है। हालाँकि आत्मा मनोरथ पूरा करना चाहती है। इसलिए वर माँगने की बात सुनकर सुतीक्ष्ण रूपी भाव कहता है कि मैंने तो कभी वर नहीं माँगा अर्थात् मेरी तो कोई मनोकामना होती ही नहीं है। इसलिए मुझे तो समझ में भी नहीं आता है कि क्या सच है और क्या झूठ है?
तुम्हहि नीक लागै रघुराई। सो मोहि देहु दास सुख दाई।।
अबिरल भगति बिरति बिग्याना। होहु सकल गुन ग्यान निधाना।।
व्याख्या : अत: हे नाथ! आपको जो अच्छा लगे वही सुख देने वाला वर दीजिए। तब आत्मा रूपी राम ने सुतीक्ष्णा भाव के समर्पण व प्रेम को देखकर कहा कि तुम दृढ़ भक्ति, वैराग्य व विज्ञान के समस्त गुणों के घर हो जाओ।
प्रभु जो दीन्ह सो ब डिग्री मैं पावा। अब सो देहु मोहि जो भावा।।
व्याख्या : तब सुतीक्ष्ण भाव बोला कि हे प्रभु! आपने जो वर दिया वो तो मैंने प्राप्त कर लिया है अर्थात् दृढ़ भक्ति, वैराग्य व विज्ञान के भाव तो ध्यान की क्रिया द्वारा आ गए हैं। परन्तु अब आप मुझे मेरे भावों के अनुसार एक वर दीजिए।
दो0 अनुज जानकी सहित प्रभु चाप बान धर राम।
मम हिय गगन इंदु इव बसहु सदा निहकाम।।11।।
व्याख्या : हे प्रभु! आप लखन भाव व सुरता सहित प्राण को चढ़ाकर मेरे हृदय रूपी आकाश में चन्द्रमा के समान निष्काम होकर निवास कीजिए।
एवमस्तु करि रमानिवासा। हरषि चले कुंभज रिषि पासा।।
बहुत दिवस गुर दरसनु पाएँ। भए मोहि एहिं आश्रम आएँ।।
व्याख्या : ऐसा ही हो कहकर आत्मा रूपी राम हर्षित होकर अगस्त्य ऋषि के पास चले अर्थात् अग अ अस्त यानि भविष्य लोप वाले कोश में आत्म चेतना चलने लगी। तब सुतीक्ष्ण रूपी भाव भी अगस्त्य कोश में जाना चाहता है इसलिए बोला कि मुझे भी गु डिग्री के दर्शन किए बहुत दिन हो गए हैं और आश्रम पर आए भी बहुत दिन हो गए हैं।
अब प्रभु संग जाऊँ गुर पाहीं। तुम्ह कहँ नाथ निहोरा नाहीं।।
देखि कृपानिधि मुनि चतुराई। लिए संग बिहसे द्वौ भाई।।
व्याख्या : सुतीक्ष्ण बोला कि अब मैं आत्मा रूपी स्वामी के साथ गु डिग्री के आश्रम पर जाऊँगा। इसमें तुम पर कोई अहसान नहीं है अर्थात् ये तो सहज में हो रहा है। सुतीक्ष्ण भाव की चतुराई को देखकर आत्मा रूपी राम व लखन भाव हँसते हुए सुतीक्ष्ण भाव को साथ लेकर अगस्त्य कोश की तरफ ले चले।
पंथ कहत निज भगति अनूपा। मुनि आश्रम पहुँचे सुरभूपा।।
तुरत सुतीछन गुर पहिं गयऊ। करि दंडवत कहत अस भयऊ।।
व्याख्या : रास्ते में अर्थात् ध्यान में अपनी भयहीन अवस्था (भक्ति) का वर्णन करते हुए स्वरों को वश में करने वाले आत्मा रूपी राम अगस्त्य मुनि के आश्रम में पहुँच गए अर्थात् आत्म चेतना स्वरों को वश में करके अगस्त्य कोश में पहुँच गयी। तुरन्त सुतीक्ष्ण रूपी बुद्धि का भाव अगस्त्य रूपी गु डिग्री के पास गया और पूरी तरह समर्पण करते हुए ऐसा बोला।
नाथ कोसलाधीस कुमारा। आए मिलन जगत आधारा।।
राम अनुज समेत बैदेही। निसि दिनु देव जपत हहु जेही।।
व्याख्या : हे नाथ! सुष्मना नाड़ी के स्वामी चित रूप राजा के आत्मा रूपी कुमार जो समस्त जगत का आधार हैं, आपसे मिलने आए हैं। आत्मा रूपी राम लखन भाव व सुरता रूपी सीता सहित आए हैं, जिनका आप रात-दिन जप करते रहते हैं।
सुनत अगस्त तुरत उठि धाए। हरि बिलोकि लोचन जल छाए।।
मुनि पद कमल परे द्वौ भाई। रिषि अति प्रीति लिए उर लाई।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम के आगमन की बात सुनकर अगस्त्य ऋषि तुरन्त दौड़ पड़े अर्थात् अगस्त्य कोश आत्म चेतना के आभास से तुरन्त जागृत हो पड़ा और माया का हरण करने वाले आत्मा रूपी राम को देखकर नेत्रों में जल छा गया। अर्थात् भविष्य के लोप करने के हार्मोन (रस) का स्राव शु डिग्री हो गया। जब भविष्य के भावों का लोप होना शु डिग्री हो जाता है तो लखन भाव व आत्म चेतना दोनों अगस्त्य ऋषि रूपी कोश में समर्पण कर देते हैं अर्थात् भविष्य के लोप की अवस्था में स्थिर हो जाते हैं। उसी अवस्था को राम व लखन का अगस्त्य ऋषि के चरणों में पड़ना बोलकर लिखा है। तब भविष्य को लोप कराने वाले रस में विशेष प्रेम पैदा हो जाता है और परम मिलन की अवस्था आ जाती है। उसी अवस्था को हृदय से लगा लेना बोलकर लिखा गया है।
सादर कुसल पूछि मुनि ग्यानी। आसन पर बैठारे आनी।।
पुनि करि बहु प्रकार प्रभु पूजा। मोहि सम भाग्यवंत नहिं दूजा।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में अगस्त्य कोश में जब आत्म चेतना पहुँचती है तो आत्म चेतना स्थिर हो जाती है। उसी को आदरपूर्वक आत्मा रूपी राम को मुनि द्वारा आसन पर बैठाना बोलकर लिखा गया है। फिर बहुत प्रकार से आत्म चेतना को अंगीकार करके अगस्त्य कोश रूपी मुनि ने कहा कि मेरा जैसा भाग्यवान कोई नहीं है अर्थात् अगस्त्य कोश में आत्म चेतना स्थिर हो जाने से समस्त प्रकृति भी स्थिर होकर वश में आ जाती है। प्रकृति का वश में आना ही भाग्यवंत कहलाता है।
जहँ लगि रहे अपर मुनि बृंदा। हरषे सब बिलोकि सुखकंदा।।
व्याख्या : जहाँ तक अन्य कोशों के मन के भावों की बात है, वे सुख के मूल आत्मा रूपी राम को देखकर बहुत हर्षित हुए।
दो0 मुनि समूह महँ बैठे सन्मुख सबकी ओर।
सरद इंदु तन चितवत मानहुँ निकर चकोर।।12।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में जब आत्म चेतना अगस्त्य कोश में स्थिर हो जाती है तो सब मन के भावों का समूह भी शान्त होकर रह जाता है। उसी अनुभूति को प्रतीकों का सहारा लेकर आत्मा रूपी राम के सामने सब मुनियों को बैठा बताया गया है। उस अवस्था में सब भाव शान्त हो जाते हैं और सब आत्मोन्मुखी होकर एकटक अर्थात् लीन होकर आत्मा के स्वरूप को देखने लगते हैं। वह अवस्था ऐसी लगने लगती है मानों चकोरों का समूह शरद पूर्णिमा के चन्द्रमा को टकटकी लगाकर देख रहे हों।
तब रघुबीर कहा मुनि पाहीं। तुम्ह सन प्रभु दुराव कछु नाहीं।।
तुम्ह जानहु जेहि कारन आयउँ। ताते तात न कहि समुझायउँ।।
व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम मन के समूह रूपी मुनियों से बोले कि आप से तो कुछ छुपाव है नहीं। तुम सब जानते हो कि मैं किस कारण से आया हूँ। इसलिए मैंने कुछ समझाकर नहीं कहा अर्थात् ध्यान की उस अवस्था में सभी भावों को समझ आ जाता है कि आत्मा रूपी राम परमात्मा में लीन होने के लिए ही वैराग्य रूपी रूपी वन में भ्रमण कर रहे हैं। उस अवस्था को भावों से समझाकर कहने की आवश्यकता नहीं होती है।
अब सो मंत्र देहु प्रभु मोही। जेहि प्रकार मारौं मुनिद्रोही।।
मुनि मुसुकाने सुनि प्रभु बानी। पूछेहु नाथ मोहि का जानी।।
व्याख्या : ध्यान में कभी-कभी ऐसी अवस्था आ जाती है जिसमें भाव आपस में बिना बात किए भी बातें कर लेते हैं। वही सूक्ष्म अनुभूति इन चौपाइयों में लिखी गयी है। आत्मा रूपी राम मन के समूहों के भावों से कहते हैं कि अब आप ऐसी मंत्रणा दीजिए, जिससे मन के द्रोही अर्थात् मन को अशान्त करने वाले भावों का नाश कर सकूँ। तब आत्मा रूपी राम की बातें सुनकर मन के भाव मुस्कुराए कि आप हमसे ऐसा क्यों पूछ रहे हैं? क्योंकि मन को अशान्त तो मन के भाव ही करते हैं। इसलिए मन के भावों को आत्मा रूपी राम की बात सुनकर हँसी आती है।
तुम्हरेइँ भजन प्रभाव अघारी। जानउँ महिमा कछुक तुम्हारी।।
ऊमरि त डिग्री बिसाल तव माया। फल ब्रह्मांड अनेक निकाया।।
व्याख्या : हे चिन्ताओं का नाश करने वाले आत्मा रूपी राम! हम तो तुम्हारे प्रताप से ही तुम्हारी कुछ महिमा को जान पाते हैं। आपकी माया तो गूलर के विशाल वृक्ष की तरह है, अनेकों ब्रह्माण्डों के समूह ही जिसके फल हैं।
जीव चराचर जंतु समाना। भीतर बसहिं न जानहिं आना।।
ते फल भच्छक कठिन कराला। तब भयँ डरत सदा सोउ काला।।
व्याख्या : चर और अचर जीव गूलर के फल के भीतर रहने वाले छोटे-छोटे जीवाणुओं के समान भीतर बसते हैं और वे अपने अलावा दूसरा कुछ नहीं जानते। उन फलों का भक्षण करने वाला कठिन और कराल काल है। वह काल भी सदा आपके डर से डरता है।
ते तुम्ह सकल लोकपति साईं। पूँछेहु मोहि मनुज की नाईं।।
यह बर मागउँ कृपानिकेता। बसहु हृदयँ श्री अनुज समेता।।
व्याख्या : उन्हीं आपने समस्त लोकपालों अर्थात् कोशों का स्वामी होकर भी मुझसे मनुज अर्थात् मन अ अनुज यानि मन के छोटे भाव की तरह प्रश्न पूछा है। हे कृपा के धाम प्रभु! मैं तो आपसे यह वर माँगता हूँ कि आप सुरता व लखन भाव सहित मेरे हृदय में सदा निवास कीजिए अर्थात् आत्म चेतना सुरता सहित सदैव अगस्त्य कोश में बनी रहे।
अबिरल भगति बिरति सतसंगा। चरन सरोरूह प्रीति अभंगा।।
जद्यपि ब्रह्म अखण्ड अनंता। अनुभव गम्य भजहिं जेहि संता।।
व्याख्या : अगस्त्य भाव की इच्छा होती है कि प्रगाढ़ भक्ति, वैराग्य, सत्संग और आत्मा के चरण कमलों में अटूट प्रेम रहे। हालाँकि ब्रह्म अखण्ड व अनन्त होता है और अनुभव से समझने में आता है। इसलिए ही संत जन निरन्तर उसका भजन करते हैं।
अस तव रूप बखानउँ जानउँ। फिरि फिरि सगुन ब्रह्म रति मानउँ।।
संतत दासन्ह देहु बड़ाई। तातें मोहि पूँछेहु रघुराई।।
व्याख्या : हालाँकि मैं आपके ऐसे रूप को जानता हूँ और वर्णन भी करता हूँ। परन्तु फिर भी मेरी रूचि सगुण ब्रह्म में ही लगती है अर्थात् गुणों में बरतता ही हूँ। हे आत्मा रूपी राम! आप तो सेवकों अर्थात् साधकों को सदा ही बड़ाई दिया करते हैं, इसी से हे आत्मारूपी राम! आपने मुझसे पूछा है।
है प्रभु परम मनोहर ठाउँ। पावन पंचबटी तेहि नाउँ।।
दंडक बन पुनीत प्रभु करहू। उग्र साप मुनिबर कर हरहू।।
व्याख्या : ध्यान में अगस्त्य कोश जब जागृत हो उठता है तो उसकी इच्छा होती है कि आत्म चेतना सदा वहीं लगी रहे। इसलिए आत्मा रूपी राम से कहते हैं के हे प्रभु! मन का हरण करने वाला पवित्र पंचवटी स्थान है। पंचवटी कोश मस्तिष्क के चोटी वाला स्थान होता है। इस कोश में ध्यान सिद्धि होने पर पंच भूतों का ज्ञान हो जाता है। पंच भूतों का ज्ञान हो जाने पर परम पवित्रता आ जाती है। इसलिए पंचवटी कोश को परम पवित्र कोश कहा गया है। पंचभूतों में बरतने पर ही इन्द्रियों का आभास होता है। इसलिए अगस्त्य भाव कहता है कि आप पंचवटी रूपी कोश में निवास करके दंडक वन अर्थात् इन्द्रियों के वन को पवित्र कीजिए और मन की उग्र वासनाओं के श्राप को दूर कीजिए। दण्डक वन पर गौतम ऋषि के श्राप की कथा कही जाती है। इसका वास्तविक रहस्य यह है कि जब इन्द्रियाँ विषय वासनाओं में रमण करती हैं तो गौतम उ गौ अ उत्तम अर्थात् इन्द्रियों की पवित्रता का भाव इन्द्रियों का दमन करके विषय भोगों से बचाने का प्रयास करता है। इन्द्रियों के दमन को ही दण्डक वन का श्राप कहा जाता है। इन्द्रियों का दमन करके विषयों से बचाया जा सकता है परन्तु जब ध्यान क्रिया द्वारा ज्ञान हो जाता है तो इन्द्रियों को सहजता के द्वारा ही विषयों के जाल से बचाया जा सकता है। अत: अगस्त्य भाव यहाँ यही कहना चाह रहे हैं कि हे आत्मा रूपी राम! दण्डक वन को पवित्र कीजिए अर्थात् सहज अवस्था ला दीजिए।
बास करहु तहँ रघुकुल राया। कीजे सकल मुनिन्ह पर दाया।।
चले राम मुनि आयसु पाई। तुरतहिं पंचवटी निअराई।।
व्याख्या : हे आत्मा रूपी राम! आप वहाँ पंचवटी रूपी कोश में निवास कीजिए और समस्त मन के भावों के समूहों पर दया कीजिए। अगस्त्य भाव की प्रेरणा पाकर आत्मा रूपी राम चले और पंचवटी कोश के पास पहुँच गए। वास्तव में मस्तिष्क में अनन्त कोश होते हैं परन्तु यहाँ मुख्य-मुख्य कोशों का ही वर्णन करना सम्भव है।
दो0 गीधराज सैं भेंट भइ बहु बिधि प्रीति बढ़ाइ।
गोदावरी निकट प्रभु रहे परन गृह छाइ।।131।।
व्याख्या : अगस्त्य कोश और पंचवटी कोश के बीच में ध्यान पहुँचने पर साधक को दिव्य दृष्टि प्राप्त हो जाती है। उसी अवस्था को गीधराज से भेंट होना बताया गया है। दिव्य दृष्टि पैदा होते ही दिव्य प्रेम की अवस्था आ जाती है। उसे ही नाना प्रकार से प्रेम का बढ़ना बोलकर लिखा गया है। उसके बाद पंचवटी कोश में आत्म चेतना गोदावरी के किनारे स्थिर हो गयी। गोदावरी का बहुत गहरा रहस्य है। पंचवटी कोश में पंचभूतों का अस्तित्व होता है और उसी कोश में गोदावरी अर्थात् इन्द्रियों का आभास होता है। उसे ही गोदावरी के प्रतीक के रूप में लिखा गया है।
जब ते राम कीन्ह तहँ बासा। सुखी भए मुनि बीती त्रासा।।
गिरि बन नदी ताल छबि छाए। दिन दिन प्रति अति होहिं सुहाए।।
व्याख्या : जब से आत्म चेतना ने पंचवटी कोश में प्रवेश किया तब से मन के सब भावों की तृष्णा मिट गयी। उस अवस्था में सब कोश, कोशिकाएँ व नाड़ियाँ दिनों दिन निर्मल होने लगते हैं।
खग मृग बृंद अनंदित रहहीं। मधुप मधुर गुंजत छबि लहहीं।।
सो बन बरनि न सक अहिराजा। जहाँ प्रगट रघुबीर बिराजा।।
व्याख्या : पक्षी और पशुओं रूपी इच्छा व भोग भाव सहज होकर आनन्द में रहने लगते हैं। सुख भाव रूपी भ्रमर गुंजार करते हुए शोभायमान होने लगते हैं। उस वैराग्य रूपी वन जिसमें आत्म चेतना विराजित होती है, का वर्णन अहिराज अर्थात् शेष नाग भी नहीं कर सकते हैं। अर्थात् उस अवस्था को ऐसा भी नहीं, ऐसा भी नहीं, कहकर भी नहीं समझाया जा सकता है।
एक बार प्रभु सुख आसीना। लछिमन बचन कहे छलहीना।।
सुर नर मुनि सचराचर साईं। मैं पूछउँ निज प्रभु की नाईं।।
व्याख्या : ध्यान की ऐसी सुखद अवस्था आ जाती है तो आत्मा व लखन भाव आपस में बातें करने लगते हैं। उसी अनुभूति को इन चौपाइयों में लिखा गया है। हे स्वरों, धड़कन (नर), मन के भावों व चराचर के स्वामी! मैं तुम्हें अपना स्वामी जानकर पूछता हूँ कि --
मोहि समुझाइ कहहु सोइ देवा। सब तजि करौं चरन रज सेवा।।
कहहु ग्यान बिराग अ डिग्री माया। कहहु सो भगति करहु जेहिं दाया।।
व्याख्या : मुझे समझाकर कहिए क्योंकि मैं सब प्रकार से आपकी सेवा में हूँ अर्थात् पूर्ण रूप से समर्पित हूँ। मुझे ज्ञान, वैराग्य और माया के बारे में बताइये और उस भक्ति की अवस्था का वर्णन कीजिए, जिससे आप (आत्मा) द्रवित होते हैं।
दो0 ईश्वर जीव भेद प्रभु सकल कहौ समुझाइ।
जातें होइ चरन रति सोक मोह भ्रम जाइ।।14।।
व्याख्या : हे प्रभु! मुझे ईश्वर और जीव के भेद को समझाकर बताइये तथा जिससे आपके चरणों में प्रेम पैदा हो और शोक, मोह व भ्रम का नाश होता हो, ऐसी विधि को समझाइये।
थोरेहि महँ सब कहउँ बुझाई। सुनहु तात मति मन चित लाई।।
मैं अ डिग्री मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया।।
व्याख्या : तब आत्म चेतना लखन भाव को समझाते हुए कहती है कि हे तात! मैं संक्षेप में ही सब कुछ समझाकर बताता हूँ। तुम मन व बुद्धि को चित में लीन करके सुनो। मैं, मेरा और तेरा के भावों से माया पैदा होती है। जिस माया ने समस्त जीवों को वश में कर रखा है।
गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई।।
तेहि कर भेद सुनहु सोऊ। बिद्या अपर अबिद्या दोऊ।।
व्याख्या : जहाँ तक मन व इन्द्रियाँ विस्तार को प्राप्त करते हैं, वो सब माया जानना चाहिये। उस माया के भी भेद बताता हूँ, तुम सुनो एक विद्या और दूसरी अविद्या माया का रूप होते हैं।
एक दुष्टा अतिसय दुख रूपा। जा बस जीव परा भवकूपा।।
एक रचइ जग गुन बस जाकें। प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें।।
व्याख्या : एक अविद्या बहुत दोषयुक्त है और अत्यन्त दु:ख रूप होती है, जिसके वश में पड़कर जीव संसार रूपी भावों के कुएँ में पड़ जाता है। दूसरी विद्या रूपी माया होती है, जिसके वश में गुण होते हैं और जो समस्त संसार की रचना करती है। उसके पास स्वयं का कोई बल नहीं होता है, वह तो परमात्मा की प्रेरणा से ही चलती है।
ग्यान मान जहँ एकउ नाहीं। देख ब्रह्म समान सब माहीं।।
कहिअ तात सो परम बिरागी। तृन सम सिद्धि तीनि गुन त्यागी।।
व्याख्या : ज्ञान व मान जहाँ कुछ भी नहीं होता और सबमें जो समान रूप से एक ब्रह्म को देखता है। हे तात्! उस साधक को परम वैराग्यवान मानिए, जो सिद्धियों और तीन गुणों को तिनके के समान त्याग देता है।
दो0 माया ईस न आपु कहुँ जान कहिअ सो जीव।
बंध मोच्छ प्रद सर्बपर माया प्रेरक सीव।।15।।
व्याख्या : जो माया व ईश्वर को स्वयं का स्वरूप को नहीं जानता, उसे जीव कहते हैं। जो बन्धन व मोक्ष देने वाला, सबसे परे व माया का प्रेरक है वो तो परमात्मा होता है।
धर्म तें बिरति जोग तें ग्याना। ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना।।
जातें बेगि द्रवउँ मैं भाई। सो मम भगति भगत सुखदाई।।
व्याख्या : धारणा के अभ्यास से वैराग्य पैदा होता है और योग साधना से ज्ञान पैदा होता है तथा ज्ञान मोक्ष को देने वाला होता है, ऐसा वेद बताते हैं। जिससे परमात्मा शीघ्र द्रवित होते हैं, वो तो भयहीन अवस्था होती है, जो साधक को सुख देने वाली होती है।
सो सुतंत्र अवलंब न आना। तेहि आधीन ग्यान बिग्याना।।
भगति तात अनुपम सुखमूला। मिलइ जो संत होइँ अनुकूला।।
व्याख्या : वह भक्ति की अवस्था आना तो स्वतंत्रता होता है, उसका दूसरा कोई आधार नहीं होता है। अर्थात् जब साधक स्व स्वरूप को जानकर स्वयं के तंत्र (देह) में बरतने लग जाता है, तब उसे भयहीन (भक्ति) की अवस्था प्राप्त हो जाती है। इसलिए ज्ञान व विज्ञान भी भक्ति के अधीन ही होते हैं। हे तात्! भक्ति अनुपम सुखों का मूल होती है। ये तो तभी मिल पाती है, जब संत जन अनुकूल होकर कृपा कर देते हैं।
भगति कि साधन कहउँ बखानी। सुगम पंथ मोहि पावहिं प्रानी।।
प्रथमहिं बिप्र चरन अति प्रीती। निज निज कर्म निरत श्रुति रीती।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम बोले कि हे तात्! मैं तुम्हें भक्ति के साधनों का वर्णन करके बताता हूँ, जिनका अनुसरण करने पर प्राणी मुझे सरलता से प्राप्त कर सकते हैं अर्थात् सरलता से आत्म स्वरूप को जान सकते हैं। पहला साधन तो यह है कि जिन लोगों को ज्ञान का विशुद्ध प्रकाश (विप्र) हो गया है, प्रेम से उनकी शरण में जाएँ तथा निरत (दृश्य) व श्रुति (शब्द) की रीति को समझकर अपने-अपने कर्म में लगे रहें। इस चौपाइ में बहुत ही गहरा साधना रहस्य छुपा हुआ है। वास्तव में कर्म एक ही होता है, अपान का पान में हवन करना। अत: शब्द और दृश्य को देखते व सुनते हुए अपान का पान में हवन करते रहने से साधक को भयहीन अवस्था प्राप्त हो जाती है। क्योंकि अपान के पान में हवन से समस्त वासनाएँ मिट जाती हैं। वासनाओं का मिटना ही भक्ति ही अवस्था होता है।
एहि कर फल पुनि बिषय बिरागा। तब मम धर्म उपज अनुरागा।।
श्रवनादिक नव भक्ति दृढ़ाहीं। मम लीला रति की अति मन माहीं।।
व्याख्या : श्रुति (शब्द) व निरत (दृश्य) की गति को देखने का फल यह होता है कि विषयों से वैराग्य पैदा हो जाता है और जब विषयों से वैराग्य पैदा हो जाता है, तब जाकर ही परमात्मा की धारणा के प्रति अनुराग पैदा हो जाता है। तब श्रवण आदि की नयी भयहीन अवस्था दृढ़ होती है अर्थात् तब शब्द आदि से विषयों का भय पैदा नहीं हो पाता है। जब साधक वासनाओं के भय से मुक्त हो जाता है, तब परमात्मा के चरित को समझने में मन में अनुराग पैदा होने लग जाता है। अर्थात् साधक को निज स्वरूप को जाने की उत्कण्ठा पैदा हो जाती है।
संत चरन पंकज अति प्रेमा। मन क्रम बचन भजन दृढ़ नेमा।।
गु डिग्री पितु मातु बंधु पति देवा। सब मोहि कहँ जानै दृढ़ सेवा।।
व्याख्या : जिनका संत जनों के चरण कमलों में प्रेम होता है और जो मन, वचन व कर्म से भजन के नियम का पालन करते हैं अर्थात् अपान का पान में दृढ़तापूर्वक हवन करते हैं और गुरू, माता, पिता, भाई, पति आदि सब कुछ मुझ परमात्मा को मानकर मुझ आत्मा में ही दृढ़ता से लीन रहते हैं।
मम गुन गावत पुलक सरीरा। गदगद गिरा नयन बह नीरा।।
काम आदि मद दंभ न जाकें। तात निरंतर बस मैं ताकें।।
व्याख्या : जो परमात्मा के गुणों का पुलकित होकर गान करते हैं और जिनकी वाणी परमात्मा के गुणों का वर्णन करती हुई गदगद हो जाती है और आँखों से प्रेम रूपी जल बह निकलता है तथा जिनको काम, मद व दम्भ के विकार नहीं सताते हों, मैं सदा ऐसे साधकों के वश में रहता हूँ। अर्थात् ऐसे साधक आत्म स्वरूप को जान पाते हैं।
दो0 बचन कर्म मन मोरि गति भजनु करहिं नि:काम।
तिन्ह के हृदय कमल महुँ करउँ सदा बिश्राम।।16।।
व्याख्या : जो साधक मन, वचन व कर्म से मुझ आत्मा में लीन रहकर निष्काम भाव से अपान का पान में हवन करते हैं, ऐसे साधकों के हृदय कमल में मैं परमात्मा सदा विश्राम करता रहता हूँ।
भगति जोग सुनि अति सुख पावा। लछिमन प्रभु चरनन्हि सि डिग्री नावा।।
एहि बिधि गए कछुक दिन बीती। कहत बिराग ग्यान गुन नीती।।
व्याख्या : इस प्रकार लखन भाव ने भक्ति के मिलने की युक्ति को सुनकर बहुत सुख पाया और लखन भाव आत्मा रूपी राम के चरणों में समर्पित हो गया। इस प्रकार ध्यान में नाना प्रकार से वैराग्य, ज्ञान, गुण व नीति का अनुभव होने लगता है।
सूपनखा रावन कै बहिनी। दुष्ट हृदय दारून जस अहिनी।।
पंचबटी सो गइ एक बारा। देखि बिकल भइ जुगल कुमारा।।
व्याख्या : पाठकों के लिए मैं यहाँ शूर्पनखा के प्रतीक का रहस्य बता देता हूँ। रावण काम का प्रतीक है और स्वरों के माध्यम से प्राण की तरंगों के माध्यम से काम वासना की लहरें उठना ही शूर्पणखा का प्रतीक होता है। जब ध्यान में आत्मा निज स्वरूप में लीन होती है और सुरता व लखन भाव भी सहज होते हैं, तो भी अचानक स्वरों के माध्यम से वासना की तरंगें उठ आती हैं। ये वासना की लालसा बहुत दुष्ट हृदय वाली व सर्पिनि के समान खतरनाक होती है। जब पंचवटी कोश में आत्मा निजस्वरूप में ध्यानमग्न थे तो अचानक नाक के स्वरों के माध्यम से काम रूपी रावण की वासना रूपी बहिन शूर्पणखा पंचवटी रूपी कोश में पहुँच गयी और आत्मा व लखन भाव को देखकर व्याकुल हो गयी। वासना की यह विशेषता होती है कि वो आत्मा के सामने व्याकुल हो उठती है और उसके लक्षणों को जान लेने पर भी व्याकुल हो उठती है।
भ्राता पिता पुत्र उरगारी। पुरुष मनोहर निरखत नारी।।
होइ बिकल सक मनहि न रोकी। जिमि रबिमनि द्रव रबिहि बिलोकी।।
व्याख्या : सात्विक अहंकार रूपी काकभुसुण्डि का भाव राजसिक अहंकार रूपी गरुड़ भाव को समझाता है कि वासना रूपी स्त्री, भाव रूपी भाई और मूल रूपी पिता को देखकर मोहित होकर व्याकुल हो जाती है और मन को वश में नहीं रख पाती है। जैसे रविमणि सूर्य को देखकर पिघल जाती है। इन चौपाइयों में वासना के बहुत गम्भीर रहस्य को समझाया गया है। वास्तव में वासना रूपी स्त्री की यह विशेषता होती है कि वो भावों व भावों के मूल चित को देखकर व्याकुल हो जाती है और व्याकुल होकर अशान्ति पैदा कर देती है।
रूचिर रूप धरि प्रभु पहिं जाई। बोली बचन बहुत मुसुकाई।।
तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी। यह सँजोग बिधि रचा बिचारी।।
व्याख्या : वासना वास्तव में बहुत रूचिकर रूप धारण करके आत्मा को मोहित करने का प्रयास करती है। उसी को हँस कर वचन कहना बताया गया है। उस अवस्था में वासना रूपी शूर्पणखा आत्मा को आच्छादित करने के लिए कहती है कि तुम्हारे जैसा पुरुष और मेरी जैसी नारी संसार में कोई नहीं है। यह संयोग क्रिया (विधि) द्वारा बना है।
मम अनुरूप पुरुष जग माहीं। देखेउँ खोजि लोक तिहु नाहीं।।
तातें अब लगि रहिउँ कुमारी। मनु माना कछु तुम्हहिं निहारी।।
व्याख्या : वासना की लालसा रूपी शूर्पणखा बोली कि मेरे अनुरूप कोई पुरुष जगत में नहीं है। मैंने तीनों लोकों में खोजकर देख लिया है। अर्थात् लालसा को संतुष्ट करने वाला कोई भी भाव नहीं होता है। तीन गुणों रूपी लोकों में भी ऐसा कोई भाव नहीं होता जो किसी वासना को पूर्ण रूप से संतुष्ट कर सके। इसलिए मैं वासना की लालसा रूपी शूर्पणखा अभी तक अतृप्त हूँ। परन्तु तुमको अर्थात् आत्मा को देखकर कुछ मन शान्त होने लगा है।
सीतहि चितइ कही प्रभु बाता। अहइ कुआर मोर लघु भ्राता।।
गइ लछिमन रिपु भगिनी जानी। प्रभु बिलोकि बोले मृदु बानी।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम सुरता रूपी सीता की तरफ देखकर लखन भाव की तरफ इशारा किए कि ये लखन भाव अतृप्त (कुँआरा) है। तब लखन भाव ने लालसा रूपी शूर्पणखा को काम रूपी शत्रु की बहिन समझकर आत्मा रूपी राम की तरफ देखकर मधुर वाणी में कहा।
सुंदरि सुनु मैं उन्ह कर दासा। पराधीन नहिं तोर सुपासा।।
प्रभु समर्थ कोसलपुर राजा। जो कछु करहिं उनहि सब छाजा।।
व्याख्या : हे लालसा रूपी सुन्दरी! मैं तो (लखन भाव तो) आत्मा के रूख के अनुसार चलता हूँ इसलिए इस पराधीन अवस्था में तेरा मुझसे मिलन नहीं हो सकता है। आत्मा रूपी राम तो समर्थ हैं और सुष्मन प्रदेश के राजा हैं। अत: वे जो कुछ करेंगे, वो उनको शोभा देगा। अर्थात् आत्मा तो सहज व निर्मल होती है इसलिए आत्मा की प्रेरणा जो भी होती है, वो शोभा देगी।
सेवक सुख चह मान भिखारी। ब्यसनी धन सुभ गति बिभिचारी।।
लोभी जसु चह चार गुमानी। नभ दूहि दूध चहत ए प्रानी।।
व्याख्या : सेवक सुख की चाह करे और भिखारी सम्मान की चाह करे तथा व्यसनी धन की चाह करे और व्यभिचारी शुभ गति की चाह करे, लोभी अगर यश चाहे तो ये लोग वैसा ही चाहते हैं जैसे कोई आकाश में से दूध निकालना चाहता है। अर्थात् ये असम्भव बात को सम्भव करना चाहते हैं।
पुनि फिरि राम निकट सो आई। प्रभु लछिमन पहिं बहुरि पठाई।।
लछिमन कहा तोहि सो बरई। जो तृन तोरि लाज परिहरई।।
व्याख्या : फिर लालसा रूपी शूर्पणखा पुन: आत्मा रूपी राम के पास आयी और आत्मा ने पुन: लखन भाव के पास भेज दिया। वास्तव में जब ध्यान में कोई वासना पैदा हो जाती है तो वह आत्मा को आच्छादित करना चाहती है। उस अवस्था में आत्मा सावधान होने के कारण लखन भाव के पास वासना को भेज देते हैं और लखन भाव वासना को नकार करके पुन: आत्मा के पास भेज देते हैं। बार-बार लखन भाव के पास जब वासना का भाव आता है तो लखन भाव दृढ़ता से समझ लेता है कि वासना को तो वही भाव ग्रहण कर सकता है जो तृण तोड़ कर अर्थात् प्रतिज्ञा को तोड़कर सहजता का त्याग कर देता है।
तब खिसिआनि राम पहिं गई। रूप भयंकर प्रगटत भई।।
सीतहि सभय देखि रघुराई। कहा अनुज सन सयन बुझाई।।
व्याख्या : जब वासना के भाव को बार-बार नकारा जाता है तो वह क्षुब्ध हो उठती है और क्षुब्ध होते ही विकराल रूप धारण कर लेती है। उस अवस्था में सुरता भी हिल जाती है। अत: सुरता को भयभीत देखकर आत्मा रूपी राम लखन भाव को वासना का प्रभाव रोकने का इशारा करते हैं।
दो0 लछिमन अति लाघवँ सो नाक कान बिनु कीन्हि।
ताके कर रावन कहँ मनौ चुनौती दीन्हि।।17।।
व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम की प्रेरणा से लखन भाव ने लालसा रूपी शूर्पणखा को नाक-कान विहीन कर दिया अर्थात् लालसा के भाव का जोर करके दमन कर दिया। यह विज्ञान परक सत्य है कि जब कोई वासना की लालसा को दबा दिया जाता है, तो उससे काम के भाव में विक्षोभ पैदा हो उठता है। उसी को काम रूपी रावण को चुनौती देना बताया गया है।
नाक कान बिनु भइ बिकरारा। जनु स्रव सैल गे डिग्री कै धारा।।
खर दूषन पहिं गइ बिलपाता। धिग धिग तव पौरूष बल भ्राता।।
व्याख्या : जब लालसा रूपी शूर्पणखा का दमन किया तो वह क्षुब्ध होकर विकराल रूप धारण कर ली और कोशिकाओं में धारा के रूप में बह उठी। तब वह खर रूपी अज्ञान व दूषण रूपी द्वैष भाव के पास गयी अर्थात् वासना के क्षुब्ध होने पर अज्ञान व द्वैष भाव पैदा हो गए जो वासना को बल प्रदान करने लगते हैं। वासना का भाव अज्ञान रूपी खर व द्वैष रूपी दूषण भाव को भी क्षुब्ध करने का प्रयास करता है।
तेहिं पूछा सब कहेसि बुझाई। जातुधान सुनि सेन बनाई।।
धाए निसिचर निकर बरुथा। जनु सपच्छ कज्जल गिरि जूथा।।
व्याख्या : अज्ञान व द्वेष के भावों ने जब वासना के भाव से पूछा तो उसने सब बताया। तब अज्ञान व द्वैष के भावों ने विकारों के भावों की सेना को सजाया और उस अवस्था में आसुरी भावों के झुण्ड के झुण्ड पैदा होकर दौड़ने लगते हैं। वे आसुरी भाव ऐसे लगने लगते हैं मानों पंख धारी काजल के पर्वत हों। वास्तव लालसा का भाव जब क्षुब्ध हो जाता है तो बहुत से आसुरी भाव पैदा हो जाते हैं। उसी को यहाँ प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा गया है।
नाना बाहन नानाकारा। नानायुध धर घोर अपारा।।
सूपनखा आगें करि लीनी। असुभ रूप श्रुति नासा हीनी।।
व्याख्या : उस अवस्था में आसुरी भाव नानाकार व नानावृतियों का रूप धारण कर लेते हैं। उस क्षुब्ध अवस्था में क्षुभित वासना रूपी शूर्पणखा भाव सब आसुरी भावों को लेकर आगे-आगे चलती है। वह वासना का रूप बहुत अशुभ अर्थात् बन्धनकारी लगता है।
असगुन अमित होहिं भयकारी। गनहिं न मृत्यु बिबस सब झारी।।
गर्जहिं तर्जहिं गगन उड़ाहीं। देखि कटकु भट अति हरषाहीं।।
व्याख्या : उस अवस्था में नाना अशुभकारी अशकुन होने लगते हैं जो भय पैदा करने वाले होते हैं। उस अवस्था में आसुरी भाव अपने विनाश का भी विचार नहीं करते हैं। आसुरी भाव गर्जनें, ललकारने व आकाश में उड़ने लगते हैं अर्थात् आसुरी भावों में उथल-पुथल मच जाता है। आसुरी भावों की सेना को देखकर आसुरी योद्धा बहुत हर्षित होने लगते हैं।
कोउ कह जिअत धरहु द्वौ भाई। धरि मारहु तिय लेहु छड़ाई।।
धूरि पूरि नभ मंडल रहा। राम बोलाइ अनुज सन कहा।।
व्याख्या : जब आसुरी भावों में अथल-पुथल होती है तो कुछ भाव तो कहने लगते हैं कि आत्मा व लखन भाव रूपी दोनों भाईयों को वश में कर लो और सुरता रूपी स्त्री को पकड़कर ले चलो। इस प्रकार की उथल-पुथल से मस्तिष्क रूपी आकाश में विकार रूपी धूल उड़ने लगी तो आत्मा रूपी राम ने लखन भाव को बुलाकर बोला।
लै जानकिहि जाहु गिरि कंदर। आवा निसिचर कटकु भयंकर।।
रहेहु सजग सुनि प्रभु कै बानी। चले सहित श्री सर धनु पानी।।
व्याख्या : हे लखन भाव! तुम जानकी अर्थात् प्राणशक्ति (सुरता) को लेकर दृढ़ता रूपी गुफा में चले जाओ। क्योंकि नाना प्रकार के आसुरी भावों की भयानक सेना आ रही है। सावधान रहना। तब लखन भाव आत्म प्रेरणा पाकर सुरता सहित इच्छाओं को वश में करके (धनुष धारण करके) चले।
देखि राम रिपुदल चलि आवा। बिहसि कठिन कोदंड चढ़ावा।।
व्याख्या : जब आत्मा रूपी राम ने देखा कि आसुरी भावों की सेना आ गयी है तो हँसते हुए अर्थात् सहज होकर वासनाओं के दमन के लिए धनुष को चढ़ाया अर्थात् सजग होकर इच्छाओं को वश में कर लिया। जिससे वासनाओं के आसुरी भावों का कोई असर नहीं हो।
छ0 कोदंड कठिन चढ़ाइ सिर जट जूट बाँधत सोह क्यों।
मरकत सयल पर लरत दामिनि कोटि सों जुग भुजग ज्यों।।
कटि कसि निषंग बिसाल भुज गहि चाप बिसिख सुधारि कै।
चितवत मनहुँ मृगराज प्रभु गजराज घटा निहारि कै।।
व्याख्या : इस छन्द में आत्मा द्वारा वासनाओं के दमन करने की अवस्था का वर्णन किया गया है। उस अवस्था में साधक को ऐसा लगता है कि आत्मा रूपी राम ने इच्छाओं रूपी धनुष को भली-भाँति चढ़ाकर दृढ़ता रूपी जटाओं का जूड़ा बना लिया हो। उस समय ऐसा लगने लगता है मानों मन रूपी पन्ना की मणि पर करोड़ों बिजलियों की सी चमक उठकर दो वासना रूपी सर्प लड़ रहे हों। अर्थात् वासना रूपी सर्प अपना प्रभाव फैलाने का प्रयास कर रहे हों, ऐसा लगने लगता है। परन्तु आत्मा रूपी राम तो सहजता रूपी कमर में दृढ़ता रूपी तरकश बाँधकर इच्छा रूपी धनुष को दृढ़तापूर्वक पकड़े हुए हाथियों रूपी आसुरी भावों के झुण्डों को सिंह की तरह देखने लगते हैं।
सो0 आइ गए बगमेल धरहु धरहु धावत सुभट।
जथा बिलोकि अकेल बाल रबिहि घेरत दनुज।।18।।
व्याख्या : उस अवस्था में आसुरी भावों रूपी योद्धा पकड़ो-पकड़ो की आवाज करते हुए बहुत तेजी से दौड़ते हुए आ गए। उस ध्यान अवस्था में अकेले बाल सूर्य रूपी निर्मल आत्मा को आसुरी भावों ने चारों तरफ से घेर लिया।
प्रभु बिलोकि सर सकहिं न डारी। थकित भई रजनीचर धारी।।
सचिव बोलि बोले खर दूषन। यह कोइ नृपबालक नर भूषन।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम को देखकर आसुरी भावों की सेना थकित रह गयी और उन पर वासना रूपी बाण नहीं छोड़ सके। तब अज्ञान व द्वेष रूपी खर-दूषण ने आसुरी मंत्रणा के भावों को बुलाकर कहा कि यह आत्मा रूपी बालक धड़कन का आभूषण है।
नाग असुर सुर नर मुनि जेते। देखे जिते हते हम केते।।
हम भरि जन्म सुनहु सब भाई। देखी नहिं असि सुंदरताई।।
व्याख्या : नाग, असुर, सुर, नर व मुनि अर्थात् नाग प्राण वायु, आसुरी भाव, स्वर, नर (धड़कन) व मन के बहुत से भाव हमने देखें हैं परन्तु ऐसी सुन्दरता अर्थात् निर्मलता हमने कभी नहीं देखी।
जद्यपि भगिनी कीन्हि कुरूपा। बध लायक नहिं पुरुष अनूपा।।
देहु तुरत निज नारि दुराई। जीअत भवन जाहु द्वौ भाई।।
व्याख्या : यद्यपि इन्होंने हमारी आसुरी लालसा रूपी बहिन को कुरुप अर्थात् दमन कर दिया है परन्तु ये अनुपम पुरुष मारने योग्य नहीं है। इसलिए तुम तुम्हारी छुपाई हुई सुरता रूपी नारी को हमको दे दो और दोनों भाई भाव रूपी भवन (घर) को चले जाओ।
मोर कहा तुम्ह ताहि सुनावहु। तासु बचन सुनि आतुर आवहु।।
दूतन्ह कहा राम सन जाई। सुनत राम बोले मुसुकाई।।
व्याख्या : हे आसुरी मंत्रणा के भावों! तुम मेरी यह बात जाकर सुना दो और उसका उत्तर सुनकर शीघ्र चले आओ। फिर आसुरी भावों के दूतों ने आत्मा रूपी राम से जाकर ऐसा ही कहा तो आत्मा रूपी राम सुनकर मुस्कुराते हुए बोले।
हम छत्री मृगया बन करहीं। तुम्ह से खल मृग खोजत फिरहीं।।
रिपु बलवंत देखि नहीं डरहीं। एक बार कालहु सन लरहीं।।
व्याख्या : आत्म रूपी राम बोले कि हम तो क्षत्रिय अर्थात् तीनों गुणों का क्षय करने वाले होने के कारण वैराग्य रूपी वन में इच्छा रूपी मृगों का शिकार करते फिरते हैं और तुम्हारे जैसे आसुरी भावों को खोजते हैं। हम बलवान आसुरी शत्रुओं को देखकर डरते नहीं है। हम तो एक बार तो काल से भी लड़ लेंगे।
जद्यपि मनुज दनुज कुल घालक। मुनि पालक खल सालक बालक।।
जौं न होइ बल घर फिरि जाहू। समर बिमूख मैं हतउँ न काहू।।
व्याख्या : यद्यपि हम (आत्मा व लखन भाव) मन के आसुरी भावों के कुल का नाश करने वाले हैं और मन के भावों का पालन करने वाले व दुष्टता के भावों को दण्ड देने वाले बाल स्वरूप हैं। इसलिए तुम आसुरी भावों में अगर वासना का बल नहीं है तो वापिस लौट जाओ क्योंकि जो आसुरी भाव विमुख हो जाते हैं अर्थात् शान्त हो जाते हैं, हम उनका बध अर्थात् दमन नहीं करते हैं।
रन चढ़ि करिअ कपट चतुराई। रिपु पर कृपा परम कदराई।।
दूतन्ह जाइ तुरत सब कहेऊ। सुनि खर दूषन उर अति दहेऊ।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम बोले कि जो भाव द्वन्द्व की अवस्था में कपट करते हैं और विपरीत भावों पर कृपा करते हैं वे तो कायर भाव होते हैं। यह सब संवाद दूतों ने जाकर अज्ञान व दूषण रूपी ख,र-दूषण को जाकर सुना दिया। वास्तव में ध्यान में जब भावों का द्वन्द्व शु डिग्री हो जाता है, तो यह संवाद बहुत शीघ्रता से होने लगता है। उसी को प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा गया है। आगे के छन्द में भाव द्वन्द्व की अवस्था की अनुभूति को लिखा गया है। उस अवस्था में वासना रूपी बाण तिल के समान लगते हैं अर्थात् वासनाओं का असर नहीं होता है। वासना रूपी बाणों को निष्प्रभावी करके आत्मा फिर अपनी प्रेरणा की तरंग रूपी बाणों को छोड़ना शु डिग्री कर देती है। उसी को राम द्वारा धनुष तानकर बाण चलाना बोलकर लिखा गया है।
छ0 उर दहेउ कहेउ कि धरहु धाए बिकट भट रजनीचरा।
सर चाप तोमर सक्ति सूल कृपान परिघ परसु धरा।।
प्रभु कीन्हि धनुष टकोर प्रथम कठोर घोर भयावहा।
भए बधिर ब्याकुल जातुधान न ग्यान तेहि अवसर रहा।।
व्याख्या : दूतों की बातें सुनकर खर-दूषण रूपी आसुरी भावों का हृदय जल उठा अर्थात् क्षोभ पैदा हो गया। जिससे वे कहने लगे कि दौड़ो पकड़ो। यह सुनकर आसुरी भावों रूपी योद्धा, इच्छा रूपी बाण, धनुष तोमर, शक्ति, शूल, कृपाण परिघ और फरसा धारण करके दौड़ पड़े अर्थात् आसुरी भाव क्षुभित होकर लालसा, वासना व देवता आदि हथियार धारण करके भाव द्वन्द्व में कूद पड़े। तब आत्मा रूपी राम ने इच्छाओं को दृढ़ता पूर्वक वश में करके धनुष की टंकार करी जो आसुरी भावों के लिए बहुत कठोर, घोर और भयानक था। जिसे सुनकर आसुरी भाव बहरे हो गए अर्थात् निष्प्रभावी हो गए। उस अवस्था में आसुरी भावों को कुछ भी होश नहीं रहा। वास्तव में जब आत्म चेतना आसुरी भावों के प्रति सजग हो जाती है तो भाव द्वन्द्व के युद्ध में आसुरी भाव निष्प्रभावी हो जाते हैं।
दो0- सावधान होइ धाए जानि सबल आराति।
लागे बरषन राम पर अस्र सस्त्र बहुभाँति।।19(क)।।
व्याख्या : भाव द्वन्द्व की अवस्था में आत्म चेतना आसुरी भावों को बलवान जानकर सजग हो उठती है और सावधानी के साथ आसुरी भावों से मुकाबला करने लगती है। तब आसुरी भाव नाना प्रकार की वासना व लालसा रूपी अस्त्र-शस्त्रों से आत्मा पर आक्रमण कर देते हैं।
तिन्ह के आयुध तिल सम करि काटे रघुबीर।
तानि सरासन श्रवन लगि पुनि छाँड़े निज तीर।।19 (ख)।।
व्याख्या : जब आत्मा निर्मल होती है और परमात्मा में लीन रहती है तो उस अवस्था में वासना रूपी बाण तिल के समान लगते हैं अर्थात् वासनाओं का असर नहीं होता है। वासना रूपी वाणों को निष्प्रभावी करके आत्मा फिर अपनी प्रेरणा की तरंग रूपी बाणों को छोड़ना शुरु कर देती है। उसी को राम द्वारा धनुष तानकर बाण चलाना बोलकर लिखा गया है।
छ0 तब चले बान कराल। फुंकरत जनु बहु ब्याल।।
कोपेउ समर श्रीराम। चले बिसिख निसित निकाम।।
व्याख्या : तब वासना रूपी भयानक बाण ऐसे चले मानों फुफकारते हुए बहुत से सर्प जा रहे हों। तब वासना रूपी बाणों को देखकर आत्मा रूपी राम क्रोधित हो उठे। तब वासना रूपी बाणों को काटने के लिए निष्कामता रूपी बाण चलाए जो वासनाओं को बहुत तीक्ष्णता से लगे।
अवलोकि खरतर तीर। मुरि चले निसिचर बीर।।
भए क्रुद्ध तीनिउ भाइ। जो भागि रन ते जाइ।।
व्याख्या : निष्कामता रूपी तीक्ष्ण बाणों को देखकर आसुरी वासना रूपी योद्धा पीठ दिखाकर भागने लगे। तब आसुरी योद्धाओं की ऐसी अवस्था देखकर खर, दूषण व त्रिशिरा रूपी तीनों भाई क्रोधित हो उठे और कहने लगे कि जो भाव रूपी योद्धा युद्ध से भागेगा। यहाँ पाठकों को त्रिशिरा के प्रतीक का रहस्य बता देना चाहता हूँ। खर अज्ञान का प्रतीक है और दूषण द्वैषता के विकार का प्रतीक है तथा अज्ञान व द्वैष का प्रभाव सत, रज व तम तीनों गुणों पर हो जाता है उसी से त्रिशिरा का भाव पैदा होता है। त्रिशिरा का भाव तीनों नाड़ियों में प्रवाहित होता रहता है। इसलिए तीनों भाई कहते हैं कि जो भी आसुरी भाव भावयुद्ध से भागकर जायेगा।
तेहि बधब हम निज पानि। फिरे मरन मन महुँ ठानि।।
आयुध अनेक प्रकार। सनमुख ते करहिं प्रहार।।
व्याख्या : उसका बध हम अपने हाथों से करेंगे। तब आसुरी भावों ने मन में मरण ठानकर वापस लौटना शु डिग्री कर दिया। फिर आसुरी भावों ने आत्मा रूपी राम पर नाना प्रकार के वृति रूपी हथियारों से प्रहार करना शु डिग्री कर दिया।
रिपु परम कोपे जानि। प्रभु धनुष सर संधानि।।
छाँड़े बिपुल नाराच। लगे कटन बिकट पिसाच।।
व्याख्या : वासना के भावों को अत्यन्त क्षुभित जानकर आत्मा रूपी राम ने इच्छाओं को दृढ़ता से वश में करके निष्कामता के बाणों का संधान किया। निष्कामता के बाण आसुरी भावों के लिए भयंकर भयानक लगते हैं, जिससे आसुरी भाव कटना अर्थात् मरना शु डिग्री हो जाते हैं।
उर सीस भुज कर चरन। जहँ तहँ लगे महि परन।।
चिक्करत लागत बान। धर परत कुधर समान।।
व्याख्या : निष्कामता के बाणों से आसुरी भावों की छाती, सिर, भुजा, हाथ व चरण जहँ-तहँ गिरने लगे अर्थात् वासना के भावों की इच्छा व वृतियाँ क्षत-विक्षत होने लग गए। ये आसुरी भाव निष्कामता का बाण लगते ही चिल्लाने लगते हैं और उनके जड़ता रूपी पर्वत के समान सिर कट-कट करके गिरने लगते हैं।
भट कटत तन सत खंड। पुनि उठत करि पाषंड।।
नभ उड़त बहु भुज मुंड। बिनु मौलि धावत रूंड।।
व्याख्या : उस अवस्था में आसुरी भावों के शरीर कटकर सैकड़ों टुकड़े हो जाते हैं। वे फिर माया करके उठ खड़े होते हैं। वास्तव में ध्यान की अवस्था में ही समझ आ पाता है कि आसुरी भाव सैकड़ों टुकड़ों में बँटकर पुन: प्रबल वेग से उठ खड़ा होता है। कई बार तो ऐसा भ्रम हो जाता है कि आसुरी भाव मर गया है परन्तु थोड़ी देर में पुन: प्रचण्ड वेग से पैदा हो जाता है। इसलिए आसुरी भावों के सिर व भुजाओं को नाना प्रकार से उड़ना बोलकर बताया गया है। बिना सिर के आसुरी भावों के धड़ दौड़ने लगते हैं। अर्थात् इच्छा रूपी सिर कट भी जाए तो वृति रूपी धड़ दौड़ने लगता है।
खग कंक काक सृगाल। कटकटहिं कठिन कराल।।
व्याख्या : उस अवस्था में समझ में आता है कि भावों के द्वन्द्व की अवस्था में इच्छा रूपी पक्षी, वासना रूपी चील, लालसा रूपी कौए और धूर्तता रूपी सियार कटकटा कर आवाज करने लगते हैं।
छ0 कटकटहिं जंबुक भूत प्रेत पिसाच खर्पर संचहीं।
बेताल बीर कपाल ताल बजाइ जोगिनि नंचहीं।।
रघुबीर बान प्रचंड खंडहिं भटन्ह के उर भुज सिरा।
जहँ तहँ परहिं उठि लरहिं ध डिग्री ध डिग्री करहिं भयंकर गिरा।।
व्याख्या : ध्यान की उस अवस्था में जब भाव द्वन्द्व शु डिग्री होता है तो धूर्तता रूपी सियार कटकटाने लगते हैं और भय रूपी भूत, प्रेत व लालच रूपी पिशाच वासना रूपी खोपड़ियों का संचय करने लगते हैं। उस अवस्था में बेताल अर्थात् विपरीत भाव रूपी वीर मस्तिष्क में उठने लगते हैं और आत्मा रूपी राम के निष्कामता रूपी बाण आसुरी भावों के सिर, भुजा व छाती को काटने लगते हैं। आसुरी भावों के धड़ जहाँ-तहाँ गिरने लगते हैं। फिर उठते और लड़ते हैं और पकड़ों-पकड़ों का भयंकर शब्द करते हैं। वास्तव में ऐसा ही होता है। कभी-कभी वासना के आसुरी भाव मृत प्राय: हो जाते हैं और कभी-कभी पुन: प्रबल वेग से उठ खड़े होते हैं। उसी अनुभूति को प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा गया है।
छ0 अंतावरीं गहि उड़त गीध पिसाच कर गहि धावहीं।
संग्राम पुर बासी मनहुँ बहु बाल गुड़ी उड़ावहीं।।
मारे पछारे उर बिदारे बिपुल भट कहँरत परे।
अवलोकि निज दल बिकल भट तिसिरादि खर दूषन फिरे।।
व्याख्या : वासना रूपी इच्छाओं को लालसा रूपी गीद्ध पकड़ कर उड़ते हैं और उन्हीं वासनाओं की इच्छाओं को लालच रूपी पिशाच हाथों से पकड़ते हैं। अर्थात् आसुरी भावों में भी आपस में द्वन्द्व चलने लगता है। उस अवस्था में ऐसा लगता है मानों संग्राम रूपी नगर के बालक इच्छा रूपी पतंगें उड़ा रहे हों। ऐसे भाव द्वन्द्व की अवस्था में बहुत से आसुरी भावों रूपी योद्धा मारे गए और बहुत से भावों के हृदय विदीर्ण हो गए और कराहने लगते हैं। इस प्रकार आसुरी भावों की सेना व्याकुल हो उठती है, जिसे देखकर खर रूपी अज्ञान, दूषण रूपी द्वैष व त्रिशिरा रूपी आसुरी वृति के योद्धा आत्मा की तरफ मुड़े।
छ0 सर सक्ति तोमर परसु सूल कृपान एकहि बारहीं।
करि कोप श्रीरघुबीर पर अगनित निसाचर डारहीं।।
प्रभु निमिष महुँ रिपु सर निवारि पचारि डारे सायका।
दस दस बिसिख उर माछ मारे सकल निसिचर नायका।।
व्याख्या : भाव द्वन्द्व की अवस्था में आसुरी भाव क्षुभित होकर पूर्ण शक्ति लगाकर वृति रूपी फरसा, इच्छा रूपी शूल और आसक्ति रूपी कृपाण लेकर ही साथ आत्मा रूपी राम पर प्रहार करते हैं। तब आत्मा रूपी राम ने क्षण भर में आसुरी भावों के अगनित बाणों को काटकर, उन्हें ललकारते हुए प्रेरणा रूपी बाण छोड़े। समस्त आसुरी भावों के खर-दूषण व त्रिशिरा रूपी सेनानायकों के हृदय में दस-दस निष्कामता रूपी बाण मारे। दस-दस बाण मारने का रहस्य यह है कि आसुरी भाव दस प्राणों और दस इन्द्रियों के माध्यम से ही प्रवाहित होते हैं। अत: दस प्राणों व दस इन्द्रियों को निष्काम किए बिना असुरों का संहार नहीं हो सकता है।
छ0 महि परत उठि भट भिरत मरत न करत माया अति घनी।
सुर डरत चौदह सहस प्रेत बिलोकि एक अवध धनी।।
सुर मुनि सभय प्रभु देखि मायानाथ अति कौतुक करयो।
देखहिं परसपर राम करि संग्राम रिपुदल लरि मरयो।।
व्याख्या : आसुरी भाव निष्कामता के बाणों से घायल होकर गिर पड़ते हैं परन्तु फिर उठे खड़े होकर भिड़ने लगते हैं। आसुरी भाव मरते नहीं हैं बल्कि नाना प्रकार की माया रचने लगते हैं। ऐसी अवस्था देखकर देव भाव भयभीत हो उठते हैं कि आसुरी भाव तो चौदह सहस अर्थात् दस इन्द्रियों, मन, बुद्धि, चित व अहंकार में प्रसारित हो रहे हैं और आत्मा रूपी राम तो अकेले हैं। देव भावों को भयभीत देखकर आत्मा रूपी राम ने प्रेरणा करके कौतुक किया, जिससे शत्रु सेना अर्थात् आसुरी भाव आपस में ही लड़ने लग गए। वास्तव में जब निष्कामता का प्रभाव होने लगता है तो आसुरी भाव आपस में ही लड़ने लग जाते हैं। उसी भाव अवस्था का इस छन्द में वर्णन किया गया है।
दो0 राम राम कहि तनु तजहिं पावहिं पद निर्बान।
करि उपाय रिपु मारे छन महुँ कृपानिधान।।20(क)।।
व्याख्या : उस अवस्था में आसुरी भाव आत्मोन्मुखी होकर आसक्ति रूपी शरीर को छोड़ने लगते हैं और निर्वाण की प्राप्ति करने लगते हैं अर्थात् अनासक्त अवस्था आने लगती है। इस प्रकार आत्मा रूपी राम ने प्रेरणा करके क्षण मात्र में ही सब आसुरी भावों को मार गिराया।
दो0 हरषित बरषहिं सुमन सुर बाजहिं गगन निसान।
अस्तुति करि करि सब चले सोभित बिबिध बिमान।।20(ख)।।
व्याख्या : जब आसुरी भाव आसक्ति का त्याग कर देते हैं तो दैवीय भाव हर्षित होकर सुमन अर्थात् सु अ मन यानि शुभ मन के भावों की वर्षा करने लगते हैं और मस्तिष्क रूपी आकाश में अनहद की ध्वनि आने लगती है। ऐसी अवस्था आ जाने पर दैवीय भावों में परमात्मा की स्तुति करने के उद्गार उठने लगते हैं। इस प्रकार धीरे-धीरे नाना वृतियों रूपी विमानों पर चढ़कर देव भाव भी चले जाते हैं अर्थात् सहज होकर शान्त हो जाते हैं।
जब रघुनाथ समर रिपु जीते। सुर नर मुनि सब के भय बीते।।
तब लछिमन सीतहि लै आए। प्रभु पद परत हरषि उर लाए।।
व्याख्या : जब भाव द्वन्द्व में आत्मा की प्रेरणा से आसुरी भाव शान्त हो जाते हैं, तो स्वर (सुर) धड़कन (नर) व मन के भाव भय से मुक्त हो जाते हैं। तब लखन भाव सुरता रूपी सीता को ले आते हैं और हर्षित होकर आत्मा रूपी राम के आगे समर्पण कर देते हैं।
सीता चितव स्याम मृदु गाता। परम प्रेम लोचन न अघाता।।
पंचबटी बसि श्री रघुनायक। करत चरित सुर मुनि सुखदायक।।
व्याख्या : उस अवस्था में सुरता आत्मा में लीन हो जाती है और परम प्रेम की अवस्था आ जाती है। इस प्रकार पंचवटी कोश में आत्मा रूपी राम निवास करके नाना प्रकार के चरित करते हैं, जो स्वरों व मन को सुख देने वाले होते हैं। अर्थात् पंचवटी कोश में आत्म चेतना लगने पर मन व स्वरों को सुख देने वाली अनुभूति होने लगती है।
धुआँ देखि खरदूषन केरा। जाइ सुपनखाँ रावन प्रेरा।।
बोली बचन क्रोध करि भारी। देस कोस कै सुरति बिसारी।।
व्याख्या : अज्ञान व द्वेष रूपी खर-दूषण भावों का नाश हुआ देखकर वासना की लालसा रूपी शूर्पणखा काम रूपी रावण के पास गयी और क्षुब्ध होती हुई बोली कि तुमने तो देश व कोश की सुरता को भुला दिया है।
करसि पान सोवसि दिनु राती। सुधि नहिं तव सिर पर आराती।।
राज नीति बिनु धन बिनु धर्मा। हरिहि समर्पे बिनु सतकर्मा।।
व्याख्या : हे काम रूपी रावण! तुम तो अपान वायु का पान करके रात दिन अज्ञान रूपी निद्रा में सोते रहते हो। तुमको आभास ही नहीं है कि तुम्हारे सिर पर निष्कामता रूपी शत्रु आ खड़ा हुआ है। राज्य का संचालन बिना नीति के नहीं हो सकता है और धन अर्थात् अर्जित भावों की वृति की रक्षा बिना धारणा के नहीं हो सकती है। बिना माया के हरण के सत्कर्म नहीं हो सकते।
बिद्या बिनु बिबेक उपजाएँ। श्रम फल पढ़े किएँ अ डिग्री पाएँ।।
संग तें जती कुमंत्र ते राजा। मान ते ग्यान पान तें लाजा।।
व्याख्या : बिना विवेक के विद्या की रक्षा नहीं हो सकती क्योंकि बिना विवेक के परिश्रम व्यर्थ जाता है। विषयों का संग करने से साधक और कुमंत्रणा से राजा का पतन हो जाता है। मान करने से ज्ञान चला जाता है और शराब के सेवन से लज्जा चली जाती है।
प्रीति प्रनय बिनु मद ते गुनी। नसाहि बेगि नीति अस सुनी।।
व्याख्या : नम्रता के बिना प्रीति और मद (अहंकार) से गुणवान शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं। ऐसी नीति मैंने सुनी है।
सो0 रिपु रूज पावक पाप प्रभु अहि गनिअ न छोट करि।
अस कहि बिबिध बिलाप करि लागी रोदन करन।।21 (क)।।
व्याख्या : शत्रु, रोग, अग्नि, चिन्ता (पाप), स्वामी और वासना रूपी सर्प को छोटा करके नहीं समझना चाहिये। ऐसे नाना प्रकार से कह कर वासना की लालसा रूपी शूर्पणखा विलाप करने लगी।
दो0 सभा माझ परि ब्याकुल बहु प्रकार कह रोइ।
तोहि जिअत दसकंधर मोरि कि असि गति होइ।।21(ख)।।
व्याख्या : उस अवस्था में लालसा रूपी शूर्पणखा आसुरी भावों की सभा में व्याकुल होकर गिर पड़ती है और नाना प्रकार से रो-रो कहने लगती है कि हे काम रूपी रावण! तुम तो दस इन्द्रियों रूपी सिरों को धारण करने वाले हो। फिर भी तुम्हारे रहते मेरी यह दशा हो गयी है।
सुनत सभासद उठे अकुलाई। समुझाई गहि बाँह उठाई।।
कह लंकेस कहसि निज बाता। केइँ तव नासा कान निपाता।।
व्याख्या : लालसा रूपी शूर्पणखा की बातें सुनकर आसुरी भावों के सभासद व्याकुल होकर उठे और लालसा रूपी शूर्पणखा को सहारा प्रदान करते हुए उठाया। तब काम रूपी रावण बोला कि तू अपनी बात तो बता, तेरे नाक-कान किसने काटे हैं अर्थात् तेरी वृति और शब्द को किसने अवरुद्ध किया है।
अवध नृपति दसरथ के जाए। पुरुष सिंघ बन खेलन आए।।
समुझि परी मोहि उन्ह कै करनी। रहित निसाचर करिहहिं धरनी।।
व्याख्या : ये चित रूपी दसरथ से पैदा हुए पुरुषों में सिंहों के समान हैं, जो वैराग्य रूपी वन में वासनाओं का शिकार करने आए हैं। मुझे ऐसा समझ में आया है कि वे शरीर रूपी पृथ्वी को आसुरी भावों से रहित कर देंगे।
जिन्ह कर भुजबल पाइ दसानन। अभय भए बिचरत मुनि कानन।।
देखत बालक काल समाना। परम धीर धन्वी गुन नाना।।
व्याख्या : जिनकी भाव रूपी भुजाओं का बल पाकर वैराग्य रूपी वन में मन के भाव निर्भय होकर विचरण करने लगे हैं। वे देखने में बालस्वरूप हैं परन्तु आसुरी भावों के लिए काल के समान हैं। वे परम धैर्यवान और श्रेष्ठ धनुर्धर और नाना गुणों से युक्त हैं।
अतुलित बल प्रताप द्वौ भ्राता। खल बध रत सुर मुनि सुख दाता।।
सोभा धाम राम अस नामा। तिन्ह के संग नारि एक स्यामा।।
व्याख्या : वे दोनों भाई अतुलित बल व प्रताप वाले हैं तथा आसुरी भावों का वध करने वाले व दैवीय भावों को सुख देने वाले हैं। वे सुन्दरता के घर हैं और आत्मा रूपी राम उनका नाम है। उनके साथ सुरता रूपी सुन्दर एक नारी है।
रूप रासि बिधि नारि सँवारी। रति सत कोटि तासु बलिहारी।।
तासु अनुज काटे श्रुति नासा। सुनि तव भगिनि करहिं परिहासा।।
व्याख्या : वह सुरता रूपी नारी ध्यान क्रिया के द्वारा निर्मल स्वरूप वाली बन गयी है। इसलिए करोड़ों कामदेव रति अर्थात् भोग वासनाएँ भी उस पर न्यौछावर हैं। अर्थात् वासनाओं का भी वहाँ वश नहीं चलता है। उसी आत्मा रूपी राम के छोटे भाई लखन भाव ने मेरे नाक-कान काटे हैं। तुम्हारी बहिन सुनकर मेरा मजाक किया अर्थात् काम की बहिन समझकर तिरस्कार किया।
खर दूषन सुनि लगे पुकारा। छन महुँ सकल कटक उन्ह मारा।।
खर दूषन तिसिरा कर घाता। सुनि दससीस जरे सब गाता।।
व्याख्या : अज्ञान व दूषण रूपी भाव जब मुझ लालसा भाव की सहायता के लिए आए तो क्षण मात्र में सब आसुरी भावों की सेना को मार दिया। अज्ञान, दूषण व त्रिशिरा रूपी भावों के वध की बात सुनकर काम रूपी रावण के अंग जलने लगे।
दो0 सूपनखहि समुझाइ करि बल बोलेसि बहु भाँति।
गयउ भवन अति सोचबस नीद परइ नहिं राति।।22।।
व्याख्या : तब काम रूपी रावण ने लालसा के भाव को नाना प्रकार से ढाँढ़स बँधाया और अपने बल का नाना प्रकार से वर्णन किया। फिर काम रूपी भाव अपने भावों में ही मग्न हो गया। अपने भावों में मग्न होने को ही भवन जाना बोलकर लिखा गया है। ऐसी सोच की अवस्था में काम भाव को शान्ति नहीं मिल पाती है। उसी अवस्था को अज्ञान रूपी रात में नींद नहीं आना बोलकर लिखा गया है।
सुर नर असुर नाग खग माहीं। मोरे अनुचर कहँ कोउ नाहीं।।
खर दूषन मोहि सम बलवंता। तिन्हहि को मारइ बिनु भगवंता।।
व्याख्या : काम रूपी रावण मन ही मन विचार करने लगा कि स्वरों, नर (धड़कन) असुरों, नागों (प्राण वायु का एक प्रकार) व इच्छा रूपी पक्षियों में सब जगह तो मेरे भावों की पहुँच होती है। अज्ञान व दूषण रूपी खर-दूषण के आसुरी भाव तो मुझ काम के समान ही बलवान होते हैं। उन भावों को तो भगवान (भग अ वान उ प्रकृतिवान अर्थात् प्रकृति को वश में करने वाला) के बिना कोई नहीं मार सकता है।
सुर रंजन भंजन महि भारा। जौं भगवंत लीन्ह अवतारा।।
तौ मैं जाइ बै डिग्री हठि करऊँ। प्रभु सर प्रान तजें भव तरऊँ।।
व्याख्या : स्वरों में रमण करने वाले व शरीर रूपी पृथ्वी के विकारों को मिटाने के लिए प्रकृति को वश में करने की क्षमता का आत्मा में अगर अवतरण हो गया है तो मैं काम भाव जबरदस्ती बैर करूँगा अर्थात् स्वभाव वश बैर करना ही पड़ेगा क्योंकि आत्मोन्मुखी होने पर तो मैं भाव रूपी भवसागर से पार हो जाऊँगा।
होइहि भजनु न तामस देहा। मन क्रम बचन मंत्र दृढ़ एहा।।
जौं नर रूप भूप सुत कोऊ। हरिहउँ नारि जीति रन दोऊ।।
व्याख्या : काम रूपी रावण ने सोचा कि तामसिक भावों की प्रबलता के कारण भजन नहीं हो सकता अर्थात् वासनाओं का त्याग नहीं हो सकता है। मन, वचन व कर्म से ऐसी मंत्रणा में काम रूपी रावण दृढ़ हो गया। अगर नर (धड़कन) के रूप में चित से पैदा आत्मा रूपी राम है तो मैं नारी (नाड़ी) का हरण करके अर्थात् नारी की धड़कन को प्रभावित करके आत्मा रूपी राम और लखन भाव दोनों को भाव युद्ध में जीत लूँगा।
चला अकेल जान चढ़ि तहवाँ। बस मारीच सिंधु तट जहवाँ।।
इहाँ राम जसि जुगुति बनाई। सुनहु उमा सो कथा सुहाई।।
व्याख्या : इन चौपाइयों में राम व काम की सूक्ष्म गति की अनुभूति का वर्णन किया गया है। अकेला काम भाव ही नारी (धड़कन) का हरण करने के लिए वहाँ चला, जहाँ भाव रूपी भवसागर के तट पर मारीच रूपी असुर रहता है। मारीच का बहुत गम्भीर रहस्य है। वास्तव में कुछ आसुरी वासना के भाव ऐसे होते हैं जो मारीच यानि सूर्य की किरणों के समान चिलकने वाले होते हैं, जो शान्त मन में किरणों (मारीच) के समान प्रवेश करके लहरें उठा कर नाड़ी की धड़कन को प्रभावित कर देता है। इसलिए एक तरफ काम रूपी रावण मारीच आसुरी भाव की सहायता लेकर नाड़ी (नारी) की धड़कन से उत्पन्न सुरता का हरण करना चाहता है, तो दूसरी तरफ आत्मा रूपी राम सुरता को परमात्मा से दृढ़ करना चाहते हैं। अत: हे श्रद्धा रूपी पार्वती! अब तुम आगे की अनुभव कथा को सुनो।
दो0 लछिमन गए बनहिं जब लेन मूल फल कंद।
जनकसुता सन बोले बिहसि कृपा सुख बृंद।।23।।
व्याख्या : ध्यान में जब लखन भाव इच्छाओं के मूल को और इच्छाओं के फलों के लक्षणों को जानने के लिए वैराग्य रूपी वन में चले जाते हैं, तो प्राण से उत्पन्न सुरता से सुख के मूल आत्मा रूपी राम हँसकर बोले।
सुनहु प्रिया ब्रत रूचिर सुसीला। मैं कछु करबि ललित नरलीला।।
तुम्ह पावक महुँ करहु निवासा। जौ लगि करौं निसाचर नासा।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम सुरता रूपी सीता से बोले कि हे प्रिये! तुम पतिव्रत की धारणा का पालन करने वाली सुशील हो। अर्थात् सुरता अनुराग के साथ परमात्मा में लीन रहने वाली है। मैं (अर्थात् आत्मा) अब कुछ नर लीला करना चाहता हूँ अर्थात् नर की धड़कन से उत्पन्न होने वाले भावों का असर होने वाला है। वास्तव में यह होता है कि जब काम का भाव नारी की धड़कन को प्रभावित करने का प्रयास करता है तो आत्म चेतना नर की धड़कन को अनुकूल रखने का प्रयास करती है। इसलिए तुम अग्नि में प्रवेश कर जाओ जब तक मैं आसुरी भावों का नाश करूँ। अग्नि में प्रवेश करने का तात्पर्य यह है कि सुरता जब अति निर्मल होकर परमात्मा में लग जाती है तो सुरता की लौ ज्योति की तरह हो जाती है। उसी को अग्नि में प्रवेश करना कहा गया है।
जबहिं राम सब कहा बखानी। प्रभु पद धरि हियँ अनल समानी।।
निज प्रतिबिंब राखि तहँ सीता। तैसइ सील रूप सुबिनीता।।
व्याख्या : जब आत्मा रूपी राम ने जैसे ही सुरता को प्रेरणा की वह तुरन्त अग्नि स्वरूपा हो गयी। जब सुरता अग्नि स्वरूपा हो जाती है तो भी सुरता का आभास बना रहता है। उसी को निज प्रतिबिम्ब को बनाए रखना बोला गया है। वास्तव में जब सुरता ज्योति स्वरूप हो जाती है, तो परमात्मा में लीनता की शील व पवित्रता बनी रहती है।
लछिमनहूँ यह मरमु न जाना। जो कछु चरित रचा भगवाना।।
दसमुख गयउ जहाँ मारीचा। नाइ माथ स्वारथ रत नीचा।।
व्याख्या : जब सुरता अति लीनता की अवस्था में पहुँचकर अग्नि स्वरूपी हो जाती है, तो लखन भाव भी सुरता के मर्म को नहीं जान पाता है। वास्तव में लखन भाव तो केवल लक्षणों को लख सकता है परन्तु परमात्मा से अति लीनता हो जाने पर तो लक्षणों का भी अभाव हो जाता है। इसलिए लखन भाव सुरता के इस मर्म को नहीं जान पाता है। उधर काम रूपी रावण मारीच रूपी आसुरी भाव के पास गया और स्वार्थवश मारीच आसुरी भाव के सामने जाकर समर्पण किया।
नवनि नीच कै अति दुखदाई। जिमि अंकुस धनु उरग बिलाई।।
भयदायक खल कै प्रिय बानी। जिमि अकाल के कुसुम भवानी।।
व्याख्या : दुष्ट का झुकना भी बहुत दु:ख देने वाला होता है जैसे अंकुश, धनुष, साँप और बिल्ली का झुकना। हे श्रद्धा रूपी भवानी! दुष्ट की मीठी वाणी भी दु:ख देने वाली होती है, जैसे बिना ऋतु के फूल। अर्थात् वासना के भाव चाहे कितने ही मधुर लगते हों परन्तु अन्त में तो दु:ख देने वाले ही होते हैं।
दो0 करि पूजा मारीच तब सादर पूछी बात।
कवन हेतु मन ब्यग्र अति अकसर आयहु तात।।24।।
व्याख्या : तब मारीच रूपी आसुरी भाव ने आदर करके काम रूपी रावण से पूछा कि हे तात्! आपका मन किस कारण इतना अधिक व्यग्र है और आप अचानक कैसे आए हो?
दसमुख सकल कथा तेहि आगें। कहीं सहित अभिमान अभागें।।
होहु कपट मृग तुम्ह छलकारी। जेहि बिधि हरि आनौं नृपनारी।।
व्याख्या : तब काम रूपी रावण ने मारीच रूपी आसुरी भाव को सब बात अभिमान पूर्वक बता दी और फिर कहा कि तुम छल करने वाले कपटी मृग रूपी वासना बनो, जिस उपाय से मैं सुरता रूपी राज बधू को हर लाऊँ। अर्थात् तुम कपटी वासना का रूप धारण करो और सुरता की परमात्मा में लीनता को भंग कर दो, तो फिर मैं सुरता का हरण कर लूँगा।
तेहिं पुनि कहा सुनहु दससीसा। ते नर रूप चराचर ईसा।।
तासों तात बय डिग्री नहिं कीजै। मारें मरिअ जिआएँ जीजै।।
व्याख्या : हे काम रूपी रावण! सुनिए। वे नर की धड़कन के रूप में समस्त भावों को संचालित करने वाले हैं। अत: हे तात्! उनसे बैर मत कीजिए अर्थात् नर की धड़कन के विपरीत मत जाइए। नर की धड़कन से भाव जीते हैं और नर की धड़कन से ही भाव मरते हैं। अर्थात् सब भावों की गति नर की धड़कन पर ही निर्भर करती है।
मुनि मख राखन गयउ कुमारा। बिनु फर सर रघुपति मोहि मारा।।
सत जोजन आयउँ छन माहीं। तिन्ह सब बय डिग्री किएँ भल नाहीं।।
व्याख्या : मारीच रूपी आसुरी भाव बोला कि जब आत्मा रूपी राम विश्वामित्र रूपी मन के भाव के यज्ञ की रक्षा करने गये थे, तब मुझको बिना फर का बाण मारा था अर्थात् प्रेरणा रूपी बाण ही मारा था, जिससे मैं सत योजन अर्थात् सौ भावों से पार क्षण मात्र में पहुँच गया था। इसलिए उनके साथ बैर करने में कोई भलाई नहीं हैं।
भइ मम कीट भृंग की नाई। जहँ तहँ मैं देखउँ दोउ भाई।।
जौं नर तात तदपि अति सूरा। तिन्हहि बिरोधि न आइहि पूरा।।
व्याख्या : मेरी दशा उस समय भृंगी के कीड़े जैसी हो गयी। अब मैं जहाँ-तहाँ दोनों भाईयों आत्मा रूपी राम व लखन भाव को ही देखता हूँ। अगर वे नर (धड़कन) हैं तो भी बहुत शूरवीर हैं। इसलिए उनका विरोध करने में सफलता नहीं मिलेगी।
दो0 जेहिं ताड़का सुबाहु हति खंडेउ हर कोदंड।
खर दूषन तिसिर बधेउ मनुज कि अस बरिबंड।।25।।
व्याख्या : जिसने ताड़का रूपी आसुरी वासना को और सुबाहु रूपी असुर को मारकर शंका रूपी अज्ञानता के धनुष को तोड़ दिया और अज्ञान, दूषण व त्रिशिरा रूपी आसुरी भावों को मार दिया। ऐसा प्रचण्ड बली भी कहीं मनुष्य हो सकता है अर्थात् ये तो प्रतीकों का सहारा लेकर भावों की मानस कथा लिखी गयी है, इसमें संदेह नहीं करना चाहिये।
जाहु भवन कुल कुसल बिचारी। सुनत जरा दीन्हिसि बहु गारी।।
गु डिग्री जिमि मूढ़ करसि मम बोधा। कहु जग मोहि समान को जोधा।।
व्याख्या : इसलिए हे काम रूपी रावण! तुम अपने आसुरी कुल की कुशलता का विचार करके अपने भवन अर्थात् आसुरी भावों में ही लौट जाओ। ऐसा सुनकर काम रूपी रावण जल उठा और उसने बहुत सी गाली देते हुए कहा कि हे मूर्ख! तू गु डिग्री की तरह मुझे ज्ञान सिखाता है? बता तो, संसार में मेरे समान योद्धा कौन है? काम के भाव में जब क्षोभ पैदा हो जाता है तो उसे कोई शिक्षा नहीं सुहाती है।
तब मारीच हृदयँ अनुमाना। नवहि बिरोधें नहिं कल्याना।।
सस्त्री मर्मी प्रभु सठ धनी। बैद बंदि कबि भानस गुनी।।
व्याख्या : तब मारीच रूपी आसुरी भाव ने विचार किया कि शस्त्रधारी, भेद जानने वाला, स्वामी, मूर्ख, धनवान, वैद्य, भाट, कवि व रसोईया इन सब से विरोध करने में भलाई नहीं होती है।
उभय भाँति देखा निज मरना। तब ताकिसि रघुनायक सरना।।
उत डिग्री देत मोहि बधब अभागें। कस न मरौं रघुपति सर लागें।।
व्याख्या : दोनों प्रकार से ही मेरा मरना सुनिश्चित है। ऐसा विचार करके मारीच रूपी आसुरी भाव ने आत्मोन्मुखी होना ही उचित समझा। काम रूपी रावण को जवाब देने पर यह मुझको मार देगा इसलिए अच्छा है आत्मा रूपी राम की प्रेरणा से ही मरूँ।
अस जियँ जानि दसानन संगा। चला राम पद प्रेम अभंगा।।
मन अति हरष जनाव न तेही। आजु देखिहउँ परम सनेही।।
व्याख्या : ऐसा हृदय में विचार करके मारीच रूपी भाव काम रूपी रावण के साथ आत्मा के प्रति प्रेम का भाव रखकर चला। उस अवस्था में मारीच रूपी आसुरी भाव के मन में बहुत हर्ष हो रहा था कि आत्मा रूपी राम से भेंट होगी। परन्तु इस रहस्य को काम रूपी रावण को नहीं बता रहा था।
छ0 निज परम प्रीतम देखि लोचन सुफल करि सुख पाइहौं।
श्री सहित अनुज समेत कृपानिकेत पद मन लाइहौं।।
निर्बानदायक क्रोध जाकर भगति अबसहि बसकरी।
निज पानि सर संधानि सो मोहि बधिहि सुखसागर हरी।।
व्याख्या : जब कोई आसुरी भाव एक बार आत्मा की प्रेरणा के सम्पर्क में आ जाता है तो उसके हृदय में आत्मा के प्रति प्रेम पैदा हो जाता है और उसकी वृति बदल जाती है। यहाँ पर मारीच रूपी आसुरी भाव के साथ भी ऐसा ही हुआ है। अत: मारीच रूपी आसुरी भाव मन में विचार करता हुआ जा रहा है कि मैं मेरी आँखों से मेरे प्रियतम आत्मा रूपी राम को देखकर सुख प्राप्त करूँगा। अब मैं लखन भाव व सुरता सहित आत्मा रूपी राम के शरण में जाऊँगा अर्थात् आत्मोन्मुखी हो जाऊँगा। आत्मा रूपी राम का क्रोध करना भी मोक्ष को देने वाला होता है। इसलिए आत्मा रूपी राम की भक्ति अवश में रहने वाले परमात्मा को वश में कर देती है। स्वयं के प्राणों की तरंग रूपी प्रेरणा से अगर आत्मा रूपी राम जो कि माया का हरण करने वाले हैं, मुझे मारेंगे तो मेरा कल्याण हो जायेगा।
दो0 मम पाछें धर धावत धरें सरासन बान।
फिरि फिरि प्रभुहि बिलोकिहउँ धन्य न मो सम आन।।26।।
व्याख्या : जब आत्मा रूपी राम प्रेरणा रूपी बान को धारण करके मेरे पीछे दौड़ेंगे तो मैं बार-बार आत्म दर्शन कर सकूँगा। उस अवस्था को प्राप्त कर लेने के कारण मेरे समान कोई दूसरा भाव धन्य नहीं होगा।
तेहि बन निकट दसानन गयऊ। तब मारीच कपटमृग भयऊ।।
अति बिचित्र कछु बरनि न जाई। कनक देह मनि रचित बनाई।।
व्याख्या : तब काम रूपी रावण का भाव पंचवटी रूपी कोश में गया और मारीच रूपी आसुरी भाव ने छदम इच्छा रूपी मृग का रूप धारण कर लिया। वह छद्म इच्छा रूपी मृग अद्भुत था, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। वास्तव में जब कोई छद्म इच्छा पैदा होती है तो वह अति मनोहर रूप धारण कर लेती है। सोने को माया का प्रबल प्रतीक माना जाता है, इसलिए छदम इच्छा रूपी कपटी मृग को सोने का मृग बताया गया है।
सीता परम रूचिर मृग देखा। अंग-अंग सुमनोहर बेषा।।
सुनहु देव रघुबीर कृपाला। एहि मृग कर अति सुंदर छाला।।
व्याख्या : जब छद्म इच्छा रूपी कपटी मृग जो कि माया रूपी स्वर्ण से जड़ित था, को सुरता ने देखा तो सुरता को बहुत रूचिकर लगा। इसलिए सुरता आत्मा रूपी राम से बोली कि हे कृपाल! इस स्वर्ण जड़ित हिरण की खाल बहुत सुन्दर है।
सत्यसंघ प्रभु बधि करि एही। आनहु चर्म कहति बैदेही।।
तब रघुपति जानत सब कारन। उठे हरषि सुर काजु सँवारन।।
व्याख्या : इसलिए हे सत्यसंघ अर्थात् सहजता को धारण करने वाले! इस इच्छामयी स्वर्णमृग को मारकर लाओ। तब आत्मा रूपी राम ने सब जान लिया कि छद्म इच्छा रूपी कपटी मृग से सुरता में विचलन आ गया है। इसलिए स्वरों की गति को पुन: कल्याणकारी बनाने के लिए हर्षित होकर उठे।
मृग बिलोकि कटि परिकर बाँधा। करतल चाप रूचिर सर साँधा।।
प्रभु लछिमनहि कहा समुझाई। फिरत बिपन निसिचर बहु भाई।।
व्याख्या : छद्म इच्छा रूपी कपटी मृग को देखकर आत्मा रूपी राम ने दृढ़ता रूपी तरकश बाँधा और हाथ में धनुष लेकर अर्थात् इच्छाओं को वश में करके प्रेरणा रूपी बाण चढ़ाया। फिर आत्मा रूपी राम ने लखन भाव रूपी लक्ष्मण को समझाया कि तुम सावधान रहना, क्योंकि वैराग्य रूपी वन में बहुत से आसुरी भाव विचरण करते हैं।
सीता केरि करेहु रखवारी। बुधि बिबेक बल समय बिचारी।।
प्रभुहि बिलोकि चला मृग भाजी। धाए रामु सरासन साजी।।
व्याख्या : तुम बुद्धि व विवेक द्वारा सुरता रूपी सीता की रखवाली करना। आत्मा रूपी राम को देखकर छद्म इच्छा रूपी मृग दौड़ चला और आत्मा रूपी राम प्रेरणा रूपी धनुष चढ़ाकर उसके पीछे दौड़ने लगे।
निगम नेति सिव ध्यान न पावा। माया मृग पाछें सो धावा।।
कबहुँ निकट पुनि दूरि पराई। कबहुँक प्रगटइ कबहुँ छपाई।।
व्याख्या : जिस आत्म प्रेरणा को वेद नेति नेति करके रह जाते हैं और विश्वास रूपी शिव भी ध्यान में नहीं पाते हैं, वही आत्म प्रेरणा छद्म इच्छा रूपी मृग के पीछे दौड़ने लगती है। कभी छद्म इच्छा निकट आ जाती है, तो कभी दूर चली जाती है। कभी छद्म इच्छा प्रकट हो जाती है तो कभी गुप्त हो जाती है। वास्तव में कभी कभी कई इच्छाएँ ऐसी होती हैं, जो कभी प्रकट तो कभी छुप जाती हैं। उसी भाव अनुभूति को प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा गया है।
प्रगटत दुरत करत छल भूरी। एहि बिधि प्रभुहि गयउ लै दूरी।।
तब तकि राम कठिन सर मारा। धरनि परेउ करि घोर पुकारा।।
व्याख्या : छद्म इच्छा रूपी आसुरी भाव प्रगट व अप्रकट होने का बहुत छल करता है। इस प्रकार छल करते हुए आत्मा रूपी राम को बहुत दूर तक ले गया। तब आत्मा रूपी राम ने तान कर प्रेरणा रूपी बाण मारा, जिससे घोर आवाज करता हुआ छद्म इच्छा रूपी आसुरी भाव भूमि पर गिर पड़ा।
लछिमन कर प्रथमहिं लै नामा। पाछें सुमिरेसि मन महुँ रामा।।
प्रान तजत प्रगटेसि निज देहा। सुमिरेसि रामु समेत सनेहा।।
व्याख्या : प्रथम में तो छद्म इच्छा रूपी आसुरी भाव ने लक्ष्मण रूपी लखन भाव का नाम पुकारा और फिर मन में आत्मा रूपी राम का स्मरण करने लगा। जब आसुरी भाव का छल बल समाप्त हो गया तो अपना आसुरी भाव प्रकट कर दिया और प्रेम सहित आत्मा रूपी राम का नाम स्मरण करने लगा। वास्तव में यही होता है, जब आसुरी इच्छा आत्मा के प्रभाव में आ जाती है, तो वह सहज होकर आत्मोन्मुखी हो उठती है।
अंतर प्रेम तासु पहिचाना। मुनि दुर्लभ गति दीन्हि सुजाना।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम तब अन्त:करण के प्रेम को जान लिए और मुनियों को दुर्लभ परम पद दे दिया अर्थात् आसुरी भाव को सहज कर दिया।
दो0 बिपुल सुमन सुर बरषहिं गावहिं प्रभु गुन गाथ।
निज पद दीन्ह असुर कहुँ दीनबन्धु रघुनाथ।।27।।
व्याख्या : उस अवस्था में जब आसुरी भाव सहज हो जाते हैं, तो स्वरों के माध्यम से सुमन अर्थात् निर्मल भाव पैदा होने लग जाते हैं और आत्मा रूपी राम के गुणों में लीन होने लग जाते हैं। क्योंकि दीनबंधु आत्मा रूपी राम ने आसुरी भावों को निर्मल (सहज) करके अपने में लीन कर लिया।
खल बधि तुरत फिरे रघुबीरा। सोह चाप कर कटि तुनीरा।।
आरत गिरा सुनि जब सीता। कह लछिमन सन परम सभीता।।
व्याख्या : मारीच रूपी आसुरी भाव का बध करके आत्मा रूपी राम वापस पंचवटी रूपी कोश के लिए लौटने लगे। इस समय उनके हाथ में इच्छा दमन रूपी धनुष और कमर में दृढ़ता रूपी तरकश शोभा दे रहा था। इधर जब सुरता रूपी सीता ने लक्ष्मण को बुलाने की आर्त आवाज सुनी तो भयभीत होते हुए सुरता रूपी सीता ने लखन भाव से कहा। वास्तव में सुरता शब्द की ध्वनि से भी विचलित हो उठती है। यहाँ पर शब्द की ध्वनि से सुरता के विचलन को ही प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा गया है।
जाहु बेगि संकट अति भ्राता। लछिमन बिहसि कहा सुनु माता।।
भृकुटि बिलास सृष्टि लय होई। सपनेहुँ संकट परइ कि सोई।।
व्याख्या : हे लखन भाव! तुम शीघ्रता से जाओ तुम्हारे आत्मा रूपी भाई पर संकट आया है। तब लखन भाव सुरता रूपी माता की बात सुनकर हँसा और बोला कि जिस आत्मा रूपी राम के भृकुटि विलास अर्थात् भृकुटि के इशारों से सृष्टि का लय हो जाता है। उन पर क्या सपने में भी कोई संकट आ सकता है?
मरम बचन जब सीता बोला। हरि प्रेरित लछिमन मन डोला।।
बन दिसि देव सौंपि सब काहू। चले जहाँ रावन ससि राहू।।
व्याख्या : जब सुरता रूपी सीता ने कुछ मर्म वचन कहे अर्थात् सुरता ने लखन भाव को बोला कि आत्मा रूपी राम आसुरी भावों से आच्छादित होकर विकारों में फँस सकती है, इसलिए तुम शीघ्रतापूर्वक जाकर आसुरी भावों के लक्षणों को लखकर आत्मा को निर्मल रहने में सहायता करो। तब माया का हरण करने वाले हरि भाव की प्रेरणा से लखन भाव का मन डोल गया। इसलिए सुरता रूपी सीता को वैराग्य रूपी वन के दैवीय भाव रूपी देवी-देवताओं को सौंपकर वहाँ चले जहाँ पर काम रूपी चन्द्रमा के लिए आत्मा रूपी राम राहू बन कर गए हुए थे।
सून बीच दसकंधर देखा। आवा निकट जती के बेषा।।
जाकें डर सुर असुर डेराहीं। निसि न नीद दिन अन्न न खाहीं।।
व्याख्या : काम रूपी रावण ने जब सुरता रूपी सीता को सूना देखा तो कपटी साधु का भेष बनाकर आया। वास्तव में काम का भाव छल-कपट द्वारा नाना स्वरूप धारण कर लेता है, जिससे ज्ञान के भाव भी धोखा खा जाते हैं। जिस काम रूपी रावण से दैवीय व आसुरी सभी भाव डरते हैं और काम के कारण रात-दिन सो व खा नहीं पाते हैं।
सो दससीस स्वान की नाईं। इत उत चितइ चला भड़िहाई।।
इमि कुपंथ पग देत खगेसा। रह न तेज तन बुधि बल लेसा।।
व्याख्या : वास्तव में जब जीव की तामसिक वृति प्रबल होती है तो काम रूपी रावण से सभी भाव डरते हैं। परन्तु जब जीव की वृति निर्मल हो जाती है और आत्मा व सुरता परमात्मा में लग जाती है तो काम रूपी रावण चोर की तरह प्रवेश करने का प्रयास करता है। उसी भाव अवस्था का प्रतीकों के माध्यम से वर्णन करते हुए कहा गया है कि काम रूपी रावण कुत्ते की तरह इधर-उधर ताकता हुआ चोरी के लिए चला। सात्विक अहंकार रूपी काकभुसुण्डि कहते हैं कि हे ज्ञान के अहंकार रूपी गरुड़! इस प्रकार कुमार्ग पर पैर रखते ही शरीर में तेज तथा बुद्धि एवं बल का लेश भी नहीं रह जाता है।
नाना बिधि करि कथा सुहाई। राजनीति भय प्रीति देखाई।।
कह सीता सुनु जती गोसाईं। बोलेहु बचन दुष्ट की नाईं।।
व्याख्या : काम का भाव चोरी-चोरी भावों की चेतना में प्रवेश करके नाना प्रकार की सुहावनी कथा बनाकर राजनीति, भय और प्रेम दिखाने का प्रयास करता है। परन्तु सुरता निर्मल होने के कारण काम की चालाकी से पूरी तरह प्रभावित नहीं हो पाती है इसलिए कहती हैं कि हे यति गोसाईं अर्थात् साधक जैसे लगने वाले इन्द्रियों को वश में करने वाले! (राम को भी गोसाईं अर्थात् इन्द्रियों को वश में करने वाला कहा जाता है और रावण को भी गोसाईं अर्थात् इन्द्रियों को वश में करने वाला कहा गया है क्योंकि राम तो विकारों से बचाकर इन्द्रियों को वश में करते हैं और रावण विकारों में डालकर इन्द्रियों को वश में करता है। यही दोनों में अन्तर होता है।) तुम वचन तो दुष्टों जैसे बोल रहे हो।
तब रावन निज रूप देखावा। भई सभय जब नाम सुनावा।।
कह सीता धरि धीरजु गाढ़ा। आइ गयउ प्रभु रहु खल ठाढ़ा।।
व्याख्या : तब काम रूपी रावण ने अपना असली रूपी प्रकट कर दिया और तब काम रूपी रावण का नाम सुनकर सुरता रूपी सीता भयभीत हो गयी अर्थात् काम के प्रभाव से सुरता की लीनता हिल गयी। तब सुरता रूपी सीता ने धैर्य धारण करते हुए कहा कि अरे मूर्ख! तू आत्मा रूपी राम के आने तक खड़ा रह। ध्यान में समझ में आता है कि सुरता बिना आत्मा के आधार के भय करने लग जाती है, जिससे लीनता की लौ टूट जाती है।
जिमि हरिबधुहि छुद्र सस चाहा। भएसि कालबस निसिचर नाहा।।
सुनत बचन दससीस रिसाना। मन महुँ चरन बंदि सुख माना।।
व्याख्या : जैसे सिंह की बधु को छुद्र खरगोश चाहे वैसे ही तू मेरी (सुरता) चाह करके काल के वश में हो गया है। सुरता रूपी सीता के वचन सुनकर काम रूपी रावण क्रोधित हो उठा। परन्तु मन में सुरता के चरणों की वन्दना करके सुख माना। इस चौपाइ में गहरा रहस्य स्पष्ट रूप से खोला गया है। सुरता काम के भाव को समझाती है कि तू अगर मेरी चाह करेगा तो तेरा मरण निश्चित है क्योंकि मेरी चाह करने वाले को वासना नहीं सता सकती है और तू काम बिना वासना के जीवित रह ही नहीं सकता है। ऐसी बात सुनकर काम के भाव से क्षोभ पैदा हो जाता है परन्तु वासना से मुक्त होने की सम्भावना सुरता के प्रति श्रद्धा पैदा कर देती है। उसी को मन में सुरता के चरणों की वन्दना करना बोला गया है।
दो0 क्रोधवंत तब रावन लीन्हिसि रथ बैठाइ।
चला गगनपथ आतुर भयँ रथ हाँकि न जाइ।।28।।
व्याख्या : तब क्रोधित होते हुए काम रूपी रावण ने सुरता रूपी सीता को वृति रूपी रथ पर बैठा लिया और बड़ी उतावली के साथ आकाश मार्ग से चला, किन्तु डर के मारे उससे रथ हाँका नहीं जा रहा था। वास्तव में जब काम का भाव क्षुभित हो जाता है, तो आसुरी वृति प्रबल होकर सुरता का हरण कर लेती है। परन्तु काम का भाव भयभीत सा रहता है और सुरता को किस ओर ले जाए रास्ता नहीं सूझ पाता है। उसी को वृति रूपी रथ को हाँक नहीं पाना बोलकर लिखा है।
हा जग एक बीर रघुराया। केहिं अपारध बिसारेहु दाया।।
आरति हरन सरन सुखदायक। हा रघुकुल सरोज दिननायक।।
व्याख्या : सुरता जब काम के चंगुल में फँस जाती है तो पश्चाताप करने लगती है, उसीको सुरता रूपी सीता का विलाप करना बोलकर लिखा गया है। उस समय सुरता कहती है कि जगत में आत्मा रूपी राम ही एक वीर हैं। पता नहीं किस विकार के कारण मेरा त्याग कर दिया। आत्मा रूपी राम संकटों का हरण करने वाले व शरण में आने वाले को सुख देने वाले होते हैं। हे आत्मा रूपी कमल के सूर्य!
हा लछिमन तुम्हार नहिं दोसा। सो फलु पायउँ कीन्हेउँ रोसा।।
बिबिध बिलाप करति बैदेही। भूरि कृपा प्रभु दूरि सनेही।।
व्याख्या : हे लखन रूपी भाव! तुम्हार कोई दोष नहीं है। मैंने तुम पर क्रोघ करने का फल पा लिया है। इस प्रकार नाना भाँति सुरता का भाव विलाप करता है। सुरता रूपी सीता कहती है कि आत्मा रूपी राम की कृपा तो बहुत है परन्तु वे स्नेही बहुत दूर हो गए हैं।
बिपति मोरि को प्रभुहि सुनावा। पुरोडास चह रासभ खावा।।
सीता कै बिलाप सुनि भारी। भए चराचर जीव दुखारी।।
व्याख्या : प्रभु को मेरी यह विपत्ति कौन सुनावे? यज्ञ के अन्न को गधा खाना चाहता है अर्थात् अपान के पान में हवन से बचे हुए सात्विक भावों को काम का भाव वश में करना चाहता है। इस प्रकार सुरता के विलाप (पश्चाताप) को सुनकर सभी भाव दु:खी हो गए।
गीधराज सुनि आरत बानी। रघुकुल तिलक नारि पहिचानी।।
अधम निसाचर लीन्हें जाई। जिमि मलेछ बस कपिला गाई।।
व्याख्या : जब सुरता के भाव को ग्लानि (पश्चाताप) होती है, तो दिव्य दृष्टि का भाव पैदा हो जाता है। उसी दिव्य दृष्टि के भाव को गिद्धराज के प्रतीक के रूप में लिखा गया है। जब दिव्यता रूपी गिद्धराज ने सुरता का विलाप सुना तो सुरता को पहचान लिया कि ये तो आत्मा में लीन सुरता है। उसने देखा कि नीच काम का भाव सुरता को लिए जा रहा है जैसे मलेच्छ प्रकार के विकार बरबस इन्द्रियों को घसीटकर ले जा रहे हों। निर्मल इन्द्रियों को ही कपिला गाय का प्रतीक दिया गया है।
सीते पुत्रि करसि जनि त्रासा। करिहउँ जातुधान कर नासा।।
धावा क्रोधवंत खग कैसें। छूटइ पबि परबत कहुँ जैसें।।
व्याख्या : दिव्यदृष्टि रूपी गिद्धराज बोला कि हे सुरता रूपी पुत्री! तुम भय मत करो। मैं इस आसुरी भाव का नाश करूँगा। ऐसा कहकर दिव्य दृष्टि रूपी गिद्धराज जटायु क्रोध में भरकर कैसे दौड़ा, जैसे पर्वतकी तरफ बज्र छूट रहा हो। वास्तव में आसुरी भाव पर्वत जैसा जड़ होता है और दिव्यता का भाव जड़ता रूपी पर्वत के लिए बज्र के समान ही होता है।
रे रे दुष्ट ठाढ़ किन होही। निर्भय चलेसि न जानेहि मोही।।
आवत देखि कृतांत समाना। फिरि दसकंधर कर अनुमाना।।
व्याख्या : दिव्यता का जटायु भाव बोला कि अरे दुष्ट! तू खड़ा क्यों नहीं होता? तू मुझे नहीं जानता। निर्भय होकर चल दिया। दिव्यदृष्टि रूपी जटायु को यमराज के समान आता हुआ देखकर काम रूपी रावण ने मन में अनुमान किया।
की मैनाक कि खगपति होई। मम बल जान सहित पति सोई।।
जाना जरठ जटायू एहा। मम कर तीरथ छाँड़िहि देहा।।
व्याख्या : कि या तो यह मैनाक पर्वत है या पक्षियों का स्वामी गरुड़। मैनाक पर्वत और गरुड़ के प्रतीकों का यहाँ बहुत गहरा रहस्य है। मैनाक का तात्पर्य मै अ नाक अर्थात् जिस भाव में अहंकार का अभाव होता है, ऐसा भाव ही दिव्य दृष्टि वाला मैनाक कहलाता है। या फिर गरुड़ यानि ज्ञान के अहंकार का भाव। जब ज्ञान का अहंकार हो जाता है तब भी दिव्यता की अवस्था आती है परन्तु ज्ञान का अहंकार काम के सामने टिक नहीं पाता है, इसलिए ही तो काम रूपी रावण कहता है कि अगर ये ज्ञान का अहंकार रूपी गरुड़ है, तो ये तो इसके स्वामी (विष्णु यानि अणु-अणु में व्यापक) के सहित मेरा बल जानता है। परन्तु जब दिव्य दृष्टि का भाव नजदीक आया तो काम रूपी रावण ने जाना कि ये तो दृढ़ता रूपी जटायु है। यह मेरे हाथ रूपी तीर्थ में शरीर छोड़ेगा अर्थात् मेरे (काम) वश में तीनों गुणों के प्रभाव में आकर दिव्यदृष्टि का भाव मिट जायेगा।
सुनत गीध क्रोधातुर धावा। कह सुनु रावन मोर सिखावा।।
तजि जानकिहि कुसल गृह जाहू। नाहिं त अस होइहि बहुबाहू।।
व्याख्या : ऐसा सुनकर दिव्य दृष्टि रूपी गिद्धराज क्रोध करके दौड़ा और कहा कि हे काम रूपी रावण! तुम मेरी बात मानो और सुरता रूपी सीता को छोड़कर कुशलतापूर्वक अपने घर चले जाओ वरना बहुत भुजाओं वाले अर्थात् बहु काम वासना वाले काम रूपी रावण ऐसा होगा कि --
राम रोष पालक अति घोरा। होइहि सकल सलभ कुल तोरा।।
उत डिग्री न देत दसानन जोधा। तबहिं गीध धावा करि क्रोधा।।
व्याख्या : तुम आत्मा रूपी राम की भयानक क्रोधाग्नि में कुल सहित अर्थात् वासनाओं सहित जल जावोगे। ऐसी अवस्था में काम रूपी रावण उत्तर नहीं देता है, तो दिव्य दृष्टि रूपी गिद्ध क्रोध करके दौड़ा।
धरि कच बिरथ कीन्ह महि गिरा। सीतहि राखि गीध पुनि फिरा।।
चोचन्ह मारि बिदारेसि देही। दंड एक भइ मुरुछा तेही।।
व्याख्या : दिव्यता रूपी जटायु ने काम रूपी रावण को वृति हीन (रथ हीन) करके गिरा दिया। तब दिव्यता रूपी गिद्ध ने सुरता को एक ओर बैठाकर फिर लौटा और ज्ञान रूपी चोंच मारकर काम के शरीर को विदीर्ण कर दिया। इससे काम रूपी रावण को एक घड़ी के लिए मुर्छा आ गयी। अर्थात् दिव्य दृष्टि के प्रभाव से काम मुर्छित हो गया।
तब सक्रोध निसिचर खिसिआना। काढ़ेसि परम कराल कृपाना।।
काटेसि पंख परा खग धरनी। सुमिरि राम करि अद्भुत करनी।।
व्याख्या : तब काम का भाव क्षुब्ध हो उठा और अत्यन्त वासना रूपी कटार निकाल कर दिव्य दृष्टि रूपी गिद्ध के संयम रूपी पंख काट दिए। जिससे दिव्य दृष्टि रूपी गिद्ध पृथ्वी पर गिर पड़ा और आत्मा की अद्भुत करनी का स्मरण करने लगा।
सीतहि जान चढ़ाइ बहोरी। चला उताइल त्रास न थोरी।।
करति बिलाप जाति नभ सीता। ब्याध बिबस जनु मृगी सभीता।।
व्याख्या : सुरता रूपी सीता को पुन: आसुरी वृति रूपी रथ पर चढ़ाकर काम रूपी रावण डरा हुआ सा बहुत शीघ्रता से चला। सुरता रूपी सीता विलाप करती हुई आकाश मार्ग से जा रही थी जैसे मानो कोई वासना रूपी ब्याध के जाल में पड़ी भयभीत हिरनी हो।
गिरि पर बैठे कपिन्ह निहारी। कहि हरि नाम दीन्ह पट डारी।।
एहि बिधि सीतहि सो लै गयऊ। बन असोक महँ राखत भयऊ।।
व्याख्या : तब सुरता रूपी सीता ने देखा कि जड़ता रूपी पर्वत पर बुद्धि रूपी बन्दर बैठे हैं, तो माया का हरण करने वाले का नाम लेकर प्रेरणा रूपी वस्त्र डाल दिए। इस प्रकार काम रूपी रावण सुरता रूपी सीता को ले गया और वासना रूपी लंका के वैराग्य रूपी अशोक वन में रख दिया। प्रमस्तिष्क ही वासनाओं का गढ़ होता है। परन्तु प्रमस्तिष्क में भी बहुत से ज्ञान व वैराग्य के कोश व कोशिकाएँ होते हैं, इसलिए ही अशोक वाटिका को सुरता रूपी सीता का रखने का स्थान बताया है। क्योंकि निर्मल सुरता अचानक वासनाओं में रमण नहीं कर सकती है।
दो0 हारि परा खल बहु बिधि भय अ डिग्री प्रीति देखाइ।
तब असोक पादप तर राखिसि जतन कराइ।।29(क)।।
व्याख्या : जब काम का भाव भय और प्रेम दिखाकर भी सुरता को वासनाओं में नहीं फँसा सका, तो वासना रूपी लंका के अशोक वाटिका में यत्न करके सुरता को रख दिया। वासत्व में काम का भाव सुरता को वासनाओं में रमण कराना चाहता है परन्तु परमात्मा में लीन आत्मा वासनाओं के प्रति आकर्षित नहीं हो पाती है, तो प्रमस्तिष्क कोश में विरक्ति रूपी अशोक वाटिका में सुरता को सावधानी पूर्वक रख देता है ताकि धीरे-धीरे सुरता को वासनाओं में फँसाया जा सके।
।। नवाह्न पारायण, छठा विश्राम।।
दो0 जेहि बिधि कपट कुरंग सँग धाइ चले श्रीराम।
सो छबि सीता राखि उर रटति रहति हरिनाम।।29(ख)।।
व्याख्या : जिस प्रकार माया रूपी हिरण के साथ आत्मा रूपी राम दौड़ चले थे, उसी छवि को हृदय में रख कर माया का हरण करने वाले आत्मा रूपी राम के नाम को रटने लगी। वास्तव में जब सुरता काम के चंगुल में पड़ जाती है, तो पुन: आत्मा का स्मरण करके काम के चंगुल से बाहर आना चाहती है। उसी अवस्था का यहाँ वर्णन किया गया है।
रघुपति अनुजहि आवत देखी। बाहिज चिंता कीन्हि बिसेषी।।
जनकसुता परिहरिहु अकेली। आयहु तात बचन मम पेली।।
व्याख्या : जब आत्मा रूपी राम ने लखन भाव को आता हुआ देखा तो बाह्य रूप में बहुत चिंता की और कहा कि हे लखन भाव! तुमने प्राण की सुता सुरता को अकेली छोड़ दिया और मेरी प्रेरणा का उल्लंघन करके यहाँ चले आए।
निसिचर निकर फिरहिं बन माहीं। मम मन सीता आश्रम नाहीं।।
गहि पद कमल अनुज कर जोरी। कहेउ नाथ कछु मोहि न खोरी।।
व्याख्या : इस वैराग्य रूपी वन में बहुत से आसुरी भाव रूपी राक्षस घूमते रहते हैं। अब मेरा मन कह रहा है कि सुरता पंचवटी कोश रूपी आश्रम में नहीं है अर्थात् सुरता आसुरी भावों के चंगुल में फँस गयी होगी। तब लखन भाव आत्म चेतना के सामने समर्पण करते हुए बोला कि हे नाथ! क्या कहूँ, इसमें मेरा कोई दोष नहीं है।
अनुज समेत गए प्रभु तहवाँ। गोदावरि तट आश्रम जहवाँ।।
आश्रम देखि जानकी हीना। भए बिकल जस प्राकृत दीना।।
व्याख्या : लखन भाव सहित आत्मा रूपी राम उस कोश में गए जहाँ पंचवटी कोश गोदावरी रूपी नाड़ी के तट पर था। अर्थात् गोदावरी (जिस नाड़ी से इन्द्रियों का आभास होता है) कोश में गए। वहाँ कोश रूपी आश्रम को सुरता हीन देखा तो आत्मा रूपी राम सहज में ही व्याकुल हो उठे। वास्तव में सुरता के अभाव में आत्मा व्याकुल हो उठती है।
हा गुन खानि जानकी सीता। रूप सील ब्रत नेम पुनीता।।
लछिमन समुझाए बहु भाँती। पूछत चले लता तरु पाँती।।
व्याख्या : हे समस्त गुणों को पैदा करने वाली शक्ति (जानकी)! तुम तो रूप, शील, वृतियों व पवित्रता के नियमों का पालन करने वाली हो। तब लखन भाव ने नाना प्रकार से आत्मा रूपी राम को समझाया। फिर भी वे सूक्ष्म नाड़ियों रूपी लताओं व सूक्ष्म कोश रूपी वृक्षों को पूछते हुए चले। अर्थात् अब आत्म चेतना सूक्ष्म नाड़ियों व सूक्ष्म कोशों में सुरता को खोजने लगी।
हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी। तुम्ह देखी सीता मृगनैनी।।
खंजन सुक कपोत मृग मीना। मधुप निकर कोकिला प्रबीना।।
व्याख्या : हे इच्छाओं रूपी पक्षियों! हे वासना रूपी पशुओं! हे लालसा रूपी भ्रमरों की पंक्तियों! तुमने कहीं मृगनयनी अर्थात् चंचला सुरता को देखा है? खंजन, तोता, कबूतर, हिरन, मछली, भौरों का समूह, प्रवीन कोयल।
कुंद कली दाड़िम दामिनी। कमल सरद ससि अहिभामिनी।।
बरुन पास मनोज धनु हंसा। गज केहरि निज सुनत प्रसंसा।।
व्याख्या : कुंदकली अनार, बिजली, कमल, शरद चन्द्रमा और नागिनी, वरुण का पाश, कामदेव का धनुष, हंस गज और सिंह ये सब आज अपनी प्रशंसा सुन रहे हैं। इन चौपाइयों के प्रतीकों का बहुत गहरा रहस्य है। खंजन, तोता, कबूतर, हिरन, मछली भौरें आदि सब इच्छाओं के नाना प्रकारों का प्रतीक होते हैं। अत: जब सुरता आत्मा में लीन रहती है, तो ये सब निस्तेज अर्थात् शान्त रहते हैं परन्तु जब सुरता काम के चंगुल में फँस जाती है, तो ये नाना प्रकार की इच्छाएँ पुन: बलवती हो उठती हैं। उसी भाव अवस्था को नाना प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा गया है। कुंदकली कुण्डली का, अनार भावों का, दामिनी प्राणशक्ति का, कमल चक्रों का, शरद चन्द्रमा वासनाओं की शीतलता का, नागिनी-वासनाओं का, वरुण पाश कर्मबन्धन का, कामदेव का धनुष भोग वासनाओं की इच्छा का, हंस हकार, सकार का, गज व सिंह मन की गति के प्रतीक हैं। वास्तव में जब सुरता आत्मा में लीन रहती है तो कुण्डलिनि शक्ति, चक्र, मन की वृति आदि किसी का भी आभास नहीं रहता है परन्तु ज्योंहि सुरता काम के वश में हो जाती है, तो ये सब पुन: आभासित होने लगते हैं। इसी अवस्था को प्रशंसा प्राप्त करना बताया गया है।
श्रीफल कनक कदलि हरषाहीं। नेकु न संक सकुच मन माहीं।।
सुनु जानकी तोहि बिनु आजू। हरषे सकल पाइ जनु राजू।।
व्याख्या : श्रीफल अर्थात् वैभव के भाव, कनक अर्थात् माया व कदलि यानि जड़ता के भाव हर्षित हो रहे हैं और मन में उनके कोई शंका व संकोच भी नहीं है। हे सुरता! तुम्हारे बिना आज सब सांसारिक भाव ऐसे हर्षित हो रहे हैं, जैसे राज्य की प्राप्ति हो गयी हो। अर्थात् सांसारिक भाव सुरता के अभाव में प्रसन्न होने लगते हैं।
किमि सहि जात अनख तोहि पाहीं। प्रिया बेगि प्रगटसि कस नाहीं।।
एहि बिधि खोजत बिलपत स्वामी। मनहुँ महा बिरही अति कामी।।
व्याख्या : हे सुरता रूपी सीता! तुमसे यह अनख (ईर्ष्या) कैसे सही जाती है। हे प्रिय! तुम जल्दी से प्रकट क्यों नहीं हो जाती हो? इस प्रकार आत्मा रूपी राम विलाप करते हुए सुरता को खोजने लगते हैं, जैसे बहुत कामी पुरुष विरह में नारी को खोजता हो।
पूरनकाम राम सुख रासी। मनुज चरित कर अज अविनासी।।
आगे परा गीधपति देखा। सुमिरत राम चरन जिन्ह रेखा।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम तो पूर्ण काम अर्थात् सहज होता है परन्तु मन के आवरण के कारण अजन्मा व अविनाशी परमात्मा मन के अनुसार चरित करने लगता है। काम के प्रभाव में आकर दिव्य दृष्टि का भाव घायल हो जाता है, तो आत्मा दिव्य भाव को घायल अवस्था में देखता है। उस अवस्था में दिव्य दृष्टि का भाव घायल होते हुए भी आत्मोन्मुखी होता है। उसी को राम के नाम का स्मरण करता हुआ बताया गया है।
दो0 कर सरोज सिर परसेउ कृपासिंधु रघुबीर।
निरखि राम छबि धाम मुख बिगत भईं सब पीर।।30।।
व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने कर कमलों से दिव्य दृष्टि रूपी गिद्ध के सिर को सहलाया अर्थात् प्रेरणा की तरंगों से दिव्य दृष्टि के भाव को सहारा प्रदान किया। तब आत्मा रूपी राम की छवि को देखकर अर्थात् आत्मा का साक्षात्कार पाकर दिव्य दृष्टि रूपी गिद्ध भाव काम के प्रभाव से मुक्त होकर सहज हो गया।
तब कह गीध बचन धरि धीरा। सुनहु राम भंजन भव भीरा।।
नाथ दसानन यह गति कीन्ही। तेहिं खल जनकसुता हरि लीन्ही।।
व्याख्या : तब दिव्य दृष्टि रूपी गिद्ध धैर्य धारण करके बोला कि हे आत्मा रूपी राम! तुम तो भावों से पैदा होने वाली पीड़ा को दूर करने वाले हो। मेरी (दिव्यता) यह गति काम रूपी रावण ने की है और उसी मूर्ख काम ने प्राणशक्ति से उत्पन्न सुरता रूपी सीता का हरण कर लिया है।
लै दच्छिन दिसि गयउ गोसाईं। बिलपति अति कुररी की नाईं।।
दरस लागि प्रभु राखेउँ प्राना। चलन चहत अब कृपानिधाना।।
व्याख्या : दक्षिण दिशा को वासना का प्रतीक माना जाता है इसलिए सुरता रूपी सीता को काम रूपी रावण द्वारा दक्षिण दिशा में ले जाना बोलकर लिखा है। दक्षिण दिशा बोलने का दूसरा कारण यह है कि पंचवटी कोश के उत्तर की तरफ गोदावरी नदी रूपी नाड़ी है, जहाँ से इन्द्रियों का आभास होता है और गोदावरी नाड़ी के दक्षिण में प्रमस्तिष्क कोश होता है, जहाँ पर नाना प्रकार की वासनाओं की उत्पत्ति होती है। इसलिए वासना रूपी लंका को दक्षिण दिशा में ही बताया गया है। दिव्यदृष्टि रूपी गिद्ध को ही यह क्षमता प्राप्त होती है कि वो सुरता किस दिशा में गयी है और किस हालात में है, बता सकता है। इसलिए दिव्यदृष्टि रूपी गिद्ध कहता है कि सुरता को काम रूपी रावण दक्षिण दिशा की तरफ लेकर गया है और सुरता बहुत व्याकुल होकर कुररी की तरह चिल्ला रही थी। हे आत्मा रूपी राम! मैंने तो आपके दर्शनों के लिए प्राण रोके थे। हे कृपानिधान! अब मेरे प्राण चलना चाहते हैं अर्थात् अब दिव्यता का आभास भी आत्मा में लीन होना चाहता है।
राम कहा तनु राखहु ताता। मुख मुसुकाइ कही तेहिं बाता।।
जाकर नाम मरत मुख आवा। अधमउ मुकुत होइ श्रुति गावा।।
व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने कहा कि तुम अपना शरीर रखो अर्थात् दिव्यता का आभास रखो। यह सुनकर दिव्यदृष्टि रूपी गिद्ध हँसकर बोला कि जिसको मरते हुए भी याद करने से अधम की भी मुक्ति हो जाती है अर्थात् आत्म चिंतन करने से भी भाव निर्मल हो जाता है।
सो मम लोचन गोचर आगें। राखौं देह नाथ केहि खाँगें।।
जल भरि नयन कहहिं रघुराई। तात कर्म निज तें गति पाई।।
व्याख्या : वही आत्मा रूपी राम मेरी आँखों और इन्द्रियों के सामने हैं तो फिर मैं किसलिए शरीर को रखूँ। तब आत्मा रूपी राम द्रवित होकर बोले कि हे तात! निज कर्म अर्थात् अपान का पान में हवन करके इस गति को प्राप्त किया जा सकता है, जो तुमने पाई है।
परहित बस जिन्ह के मन माहीं। तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं।।
तनु तजि तात जाहु मम धामा। देउँ काह तुम्ह पूरनकामा।।
व्याख्या : जिनके मन में परहित अर्थात् आत्मा का कल्याण का भाव रहता है, उनको संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं होता है। इसलिए हे तात! अब तुम शरीर का त्याग करके मुझमें (आत्मा) लीन हो जाइये। तुम तो सहज संतोष की अवस्था में हो, इसलिए तुम्हें क्या दूँ?
दो0 सीता हरन तात जनि कहहु पिता सन जाइ।
जौं मैं राम त कुल सहित कहिहि दसानन आइ।।31।।
व्याख्या : हे तात! तुम चित रूपी पिताजी से सुरता रूपी सीता के हरण की बात मत कहना। अगर मैं निर्मल आत्मा हूँ तो दस इन्द्रियों रूपी दस सिरों को धारण करने वाला काम भाव ही समस्त आसुरी भावों सहित आकर चित रूपी पिता को बतायेगा। यहाँ बहुत सूक्ष्म अनुभूति का वर्णन किया गया है। दसरथ भी दस इन्द्रियों को सिर के रूप में धारण करने वाला है। यहाँ यह बात समझने की है क्योंकि चित रूपी दसरथ तो दस इन्द्रियों को आत्मोन्मुखी करके मूल अवस्था में चला गया परन्तु काम रूपी रावण दस इन्द्रियों को सिर के रूप में धारण करके भोग वासनाओं में रमण करता है। अत: यहाँ आत्मा रूपी राम यही कह रहे हैं कि अगर मैं आत्मा अपने स्वरूप में अवस्थित रहूँगा, तो काम का भाव भी दस इन्द्रियों रूपी सिरों का त्याग करके सहज अवस्था में जाकर चित रूपी दसरथ से मिल जायेगा।
गीध देह तजि धरि हरि रूपा। भूषन बहु पट पीत अनूपा।।
स्याम गात बिसाल भुज चारी। अस्तुति करत नयन भरि बारी।।
व्याख्या : दिव्य दृष्टि रूपी भाव ने गिद्ध का शरीर त्याग करके अर्थात् वासना-लालसा सब त्याग करके माया को हरण करने वाला हरि का रूप धारण कर लिया अर्थात् दिव्य दृष्टि का भाव जब आत्मा में लीन हुआ तो माया का भ्रम मिट गया और दिव्यता के अनुपम वस्त्रों रूपी आवरण तैयार हो गया। उसी दिव्यता की आभा या आवरण को दिव्य वस्त्र धारण करने के प्रतीक के रूप में लिखा गया है। उस अवस्था में परम निर्मलता आ जाती है और चारों गुणों की विशालता (सत, रज, तम व गुणातीत) हृदयंगम हो जाती है अर्थात् गुणों की चारों अवस्थाएँ समझ में आ जाती हैं और उस अवस्था में साधक के हृदय में स्तुति का उद्गार प्रस्फुटित होने लग जाता है।
छ0 जय राम रूप अनुप निर्गुण सगुन गुन प्रेरक सही।
दससीस बाहु प्रचंड खंडन चंद सर मंडन मही।।
पाथोद गातसरोज मुख राजीव आयत लोचनं।
नित नौमि रामु कृपालु बाहु बिसाल भव भय मोचनं।।
व्याख्या : हे आत्मा रूपी राम! आपकी जय हो। आप अनुपम हैं। आप ही सगुण व निर्गुणों के प्रेरक हैं। आप ही दस इन्द्रियों को सिर के रूप में धारण करने वाले काम रूपी रावण की विशाल भुजाओं का खण्ड करने के लिए प्रेरणा रूपी प्रचण्ड बाण धारण करे वाले हैं और शरीर रूपी पृथ्वी की सद्गुण रूपी शोभा बढ़ाने वाले हैं। जलयुक्त मेघ के समान श्याम शरीर वाले, कमल के समान मुख व विशाल नेत्रों वाले, विशाल भुजाओं वाले व भावों से उत्पन्न भय का नाश करने वाले, हे कृपालु राम! मैं सदा आपको नमस्कार करता हूँ।
छ0 बलमप्रमेयमनादिमजम ब्यक्तमेकमगोचरं।
गोबिंद गोपर द्वंदहर बिग्यानघनं धरनी धरं।।
जे राम मंत्र जपंत संत अनंत जन मन रंजनं।
नित नौमि राम अकाम प्रिय कामादि खल दल गंजनं।।
व्याख्या : आप अपरिमित वाले, अनादि, अजन्मा, अव्यक्त, एक अगोचर, गोबिंद अर्थात् इन्द्रियों को बिन्दने वाले यानि इन्द्रियों को वश में करने वाले, गोपर अर्थात् इन्द्रियों से परे, भावों के द्वन्द्व को दूर करने वाले, विज्ञान के घर व शरीर रूपी पृथ्वी को धारण करने वाले हैं। जो संत राम मंत्र जपते हैं अर्थात् आत्मोन्मुखी होकर मन को अन्तर्वृति करते हैं, आप उनके मन को शान्ति देने वाले हैं। उन निष्काम प्रिय तथा काम आदि दुष्टवृतियों के दल का दलन करने वाले हे आत्मा रूपी राम! मैं नित्य आपको नमस्कार करता हूँ।
छ0 जेहि श्रुति निरंजन ब्रह्म ब्यापक बिरज अज कहि गावहीं।
करि ध्यान ग्यान बिराग जोग अनेक मुनि जेहि पावहीं।।
सो प्रगट करूना कंद सोभा बृंद अग जग मोहई।
मम हृदय पंकज भृंग अंग अनंग बहु छबि सोहई।।
व्याख्या : जो वेदों ने (अर्थात् जो सदैव अनुभव में आया हो) निरंजन अर्थात् निर अ अंजन यानि माया से रहित, सर्वव्यापक ब्रह्म, निर्विकार व अजन्मा कह बताया है तथा जिसे ध्यान, ज्ञान, वैराग्य व योग के द्वारा बहुत से मुनियों ने जाना है। वे ही परमात्मा करूणा के मूल, शोभा के समूह प्रकट होकर समस्त जड़-चेतन जगत को मोहित कर रहे हैं। मेरे हृदय कमल के भ्रमर रूप परमात्मा के अंग-अंग में बहुत से कामदेवों की छवि शोभा पा रही है। ध्यान में वास्तव में साधक को समझ में आ जाता है कि जिस परमात्मा को ब्रह्म, व्यापक, अजन्मा, अगोचर आदि बताया गया है, वो ही जड़ चेतन जगत को मोहित करने वाला है तथा साधक के स्वयं के हृदय कमल में ही निवास करने वाला है, जो अनंग होकर अनेकों कामदेवों की शोभा पा रहा है।
छ0 जो अगम सुगम सुभाव निर्मल असम सम सीतल सदा।
पस्यंति जं जोगी जतन करि करत मन गो बस सदा।।
सो राम रमा निवास संतत दास बस त्रिभुवन धनी।
मम उर बसउ सो समन संसृति जासु कीरति पावनी।।
व्याख्या : जो परमात्मा अगम्य व सुगम स्वभाव वाला है तथा सम विषम परिस्थितियों में सदैव समान व शीतल बना रहता है। जिसे योग में लगे हुए योगी लोग मन व इन्द्रियों को वश में करके देख पाते हैं। तीनों गुणों से उत्पन्न भावों को पैदा करने वाले व रोम-रोम में रमण करने वाले परमात्मा अपने दासों के वश में होते हैं अर्थात् जो साधक दास यानि जो अपनी इच्छाओं का दमन कर लेता है यानि इच्छाओं को वश में कर लेता है। उनके वश में होते हैं। इसलिए साधक भावपूर्वक स्तुति करता हुआ कहता है कि हे संशयों का नाश करने वाले प्रभु! आप सदैव मेरे हृदय में निवास कीजिए। आपका यश जग में पवित्र करने वाला होता है।
दो0 अबिरल भगति मागि बर गीध गयउ हरिधाम।
तेहि की क्रिया जथोचित निज कर कीन्ही राम।।32।।
व्याख्या : इस प्रकार दिव्य दृष्टि रूपी गिद्ध अविरल भक्ति का वरदान माँग कर निष्काम अवस्था में अवस्थित हो गया। हरिधाम का तात्पर्य हरि यानि माया का हरने वाला और धाम यानि अवस्था से है। दिव्य दृष्टि रूपी गिद्ध की सब अंतिम संस्कार आत्मा रूपी राम ने स्वयं के हाथों से की अर्थात् दिव्यदृष्टि के भाव को स्वयं आत्मा ने अपने आप में लीन कर लिया।
कोमलचित अति दीनदयाला। कारन बिनु रघुनाथ कृपाला।।
गीध अधम खग आमिष भोगी। गति दीन्ही जो जाचत योगी।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम कोमल चित वाले व दीनों पर दया करने वाले होते हैं। आत्मा रूपी राम तो बिना कारण के ही कृपा करने वाले हैं। इसलिए इच्छा व आसुरी भावों रूपी भोगों का भोग करने वाले दिव्यदृष्टि रूपी गिद्ध को भी वह परमगति प्रदान कर दी जिसे योग साधना करके योगी लोग माँगते रहते हैं।
सुनहु उमा ते लोग अभागी। हरि तजि होहिं बिषय अनुरागी।।
पुनि सीतहि खोज दौ भाई। चले बिलोकत बन बहुताई।।
व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी पार्वती! इसलिए वे लोग दुर्भाग्य वाले होते हैं जो परमात्मा को छोड़कर विषयों में अनुराग रखते हैं। फिर आत्मारूपी राम व लखन भाव सुरता रूपी सीता को खोजने के लिए वैराग्य रूपी वन में देखते चले जाते हैं। अर्थात् ध्यान धीरे-धीरे वैराग्य रूपी वन की सघनता में प्रवेश करने लगता है और सुरता को खोजने का प्रयास करता है।
संकुल लता बिटप घन कानन। बहु खग मृग तहँ गज पंचानन।।
आवत पंथ कबंध निपाता। तेहिं सब कही साप कै बाता।।
व्याख्या : वैराग्य रूपी वन में भी नाना प्रकार की भाव लताएँ और दृढ़ता रूपी वृक्ष होते हैं। उन भाव रूपी लताओं और दृढ़ता रूपी वृक्षों में नाना प्रकार के इच्छा रूपी पक्षी व मृग तथा वृति रूपी हाथी और शेर रहते हैं। वैराग्य रूपी वन के रास्ते में चलते हुए आत्मा रूपी राम ने कबंध अर्थात् कर्म बन्धन रूपी राक्षस को मार दिया। तब कर्मबन्धन रूपी कबंध ने कर्म का बन्धन पड़ने की सारी बात कही अर्थात् साधक को उस समय कर्मबन्धन का रहस्य समझ में आ जाता है। कर्म का बन्धन कैसे पड़ता है, उसी को आगे की चौपाई में बताया गया है।
दुरबासा मोहि दीन्ही सापा। प्रभु पद पेखि मिटा सो पापा।।
सुनु गंधर्ब कहउँ मैं तोही। मोहि न सोहाइ ब्रह्मकुल द्रोही।।
व्याख्या : मुझे दुर्वासा ऋषि ने श्राप दिया था अर्थात् साधक दुरवासना की आसक्ति के कारण ही कर्म के बन्धन में पड़ता है। उसी दुरवासना के कबंध (कर्म बन्धन) को श्राप कहा गया है। कर्म बन्धन का भाव अब कहता है कि आत्मा का साक्षात्कार करने से मेरा दुर-वासनाओं का बन्धन कट गया है। तब आत्मा रूपी राम कहते हैं कि हे गन्धर्व! गन्धर्व शब्द का साधना की दृष्टि से बहुत गहरा मर्म है। गन्धर्व दस प्राण वायुओं में से एक वायु होती है। जब गन्धर्व प्राण वायु प्रबल होती है तो रजोगुण प्रबल होकर भोग वृति को प्रबल कर देता है। भोग की वृति से ही दुर-वासना प्रबल होकर कर्म का बन्धन डाल देती हैं। अत: उसी अवस्था को समझाने के लिए दुर्वासा का श्राप बताया गया है। आत्मा रूपी राम कहते हैं हे गन्धर्व (प्राण वायु)! तुम सुनो। मुझे ब्रह्मकुल का द्रोही अर्थात् सहजता को नष्ट करने वाला भाव पसन्द नहीं होता है। सहजता की अवस्था को ही ब्रह्म के प्रतीक के माध्यम से समझाया गया है।
दो0 मन क्रम बचन कपट तजि जो कर भूसुर सेव।
मोहि समेत बिरंच सिव बस ताकें सब देव।।33।।
व्याख्या : इसलिए जो भी प्राणवायु मन, वचन, कर्म के कपट को छोड़कर अर्थात् वासना को छोड़कर शरीर के स्वरों में रमण करती है, उस प्राण वायु के मुझ आत्मा सहित, ब्रह्म अर्थात् बुद्धि और विश्वास रूपी शिव वश में हो जाते हैं और सभी भाव भी वश में हो जाते हैं।
सापत ताड़त परुष कहंता। बिप्र पूज्य अस गावहिं संता।।
पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना।।
व्याख्या : सापत ताड़त अर्थात् जो दुरवासनाओं के कठोर श्राप यानि वासनाओं के कठोर बन्धन से मुक्त करा दे ऐसा विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश (विप्र) का भाव सदैव पूजनीय होता है। ऐसा वेद गाते हैं। इसलिए विशुद्ध ज्ञान के प्रकाश वाले शीलता भाव को, जो कि गुणहीन अर्थात् गुणों से परे होता है, को सदा पूजना चाहिये। शूद्र अर्थात् शीघ्र द्रवति शूद्र: अर्थात् जो भाव गुणों व ज्ञान की प्रवीनता को देखकर विषयों के सामने शीघ्र द्रवति हो जाता है, ऐसा शूद्रता के भाव को नहीं पूजना चाहिये अर्थात् ऐसे भाव का अनुसरण नहीं करना चाहिये।
कहि निज धर्म ताहि समुझावा। निज पद प्रीति देखि मन भावा।।
रघुपति चरन कमल सिरु नाई। गयउ गगन आपनि गति पाई।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम ने कबंध भाव को अपनी धारणा समझाई और कबंध (कर्म बन्धन) की आत्मा के प्रति प्रेम का समर्पण देखकर अच्छा लगा। फिर कबंध का भाव आत्मा के प्रति समर्पण करता हुआ अर्थात् कर्म बन्धन की वृति को छोड़कर मस्तिष्क रूपी आकाश में चला गया।
ताहि देइ गति राम उदारा। सबरी के आश्रम पगु धारा।।
सबरी देखि राम गृहँ आए। मुनि के बचन समुझि जियँ भाए।।
व्याख्या : पाठकों को बता देना चाहता हूँ कि जब साधक कर्म बंधन से मुक्त अवस्था को प्राप्त कर लेता है तो ध्यान में आत्म चेतना सबरी (सब्र) की अवस्था में पहुँच जाती है। उसी को प्रतीकों का सहारा लेकर सबरी के आश्रम पर राम व लक्ष्मण का जाना बताया गया है। तब शबरी (सब्र) भाव को लगा कि आत्मा रूपी राम आ गए हैं तो मुनि मतंग के वचनों को याद करके उसका मन प्रसन्न हो गया। मुनि मतंग के प्रतीक का बहुत गहरा रहस्य है। मन का एक भाव सदैव जीवात्मा से कहता रहता है कि यह मत कर, यह मत कर। यह मतकर का भाव ही जीवात्मा को विषय वासनाओं में पड़ने से बचाता है। उसी को प्रतीकों के माध्यम से मतंग ऋषि कहा गया है।
सरसिज लोचन बाहु बिसाला। जटा मुकुट सिर उर बनमाला।।
स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। सबरी परी चरन लपटाई।।
व्याख्या : इन चौपाइयों में आत्म दर्शन होने पर शबरी (सब्र) भाव की दशा का वर्णन किया गया है। कमल सदृश्य नेत्र और विशाल भुजावाले, सिर पर जटाओं का मुकुट और हृदय पर वनमाला धारण किये हुए सुन्दर साँवले और गोरे दोनों भाव रूपी भाईयों के चरणों में शबरी (सब्र) का भाव लिपट गया। आत्मा की दृष्टि दिव्य होती है इसलिए कमल को प्रतीक बनाकर लिखा गया है। आत्मा के भावों की विशालता को ही विशाल भुजाओं के प्रतीक के रूप में लिखा गया है। वनमाला के प्रतीक के माध्यम से बताया गया है कि आत्मा वैराग्य के भावों की माला से ढँकी हुई है। साँवले और गोर वर्ण आत्मा की निर्मलता और लक्षणों के प्रतीक के रूप में लिखे गए हैं।
प्रेम मगन मुख बचन न आवा। पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा।।
सादर जल लै चरन पखारे। पुनि सुंदर आसन बैठारे।।
व्याख्या : शबरी (सब्र) का भाव आत्म दर्शन करके प्रेम में मग्न हो जाता है तथा उस अवस्था में वाणी भी मौन हो जाती है। बस उस समय तो बार-बार आत्मा के प्रति समर्पण का भाव आता रहता है। उसी को चरण कमलों में बार-बार सिर झुकाना बताया गया है। फिर संतोष रूपी जल लेकर आत्मा रूपी राम के चरण कमलों को धोया और पुन: सहजता रूपी सुन्दर आसन पर बैठाया।
दो0 कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुँ आनि।
प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि।।34।।
व्याख्या : शबरी (सब्र) के भाव ने सहजता के मूल रूपी फल लाकर आत्मा रूपी राम को दिए, जो बहुत सु रस अर्थात सु अ रस यानि सात्विक रस से भरे हुए थे। उन फलों को आत्मा रूपी राम ने प्रेम के सहित प्रशंसा करते हुए खाए। अर्थात् आत्मा ने शबरी (सब्र) भाव से सहजता को ग्रहण किया।
पानि जोरि आगें भइ ठाढ़ी। प्रभुहि बिलोकि प्रीति अति बाढ़ी।।
केहि बिधि अस्तुति करौं तुम्हारी। अधम जाति मैं जड़मति भारी।।
व्याख्या : पानि जोड़कर अर्थात् पान वायु में स्थिर होकर शबरी का भाव आत्मा रूपी राम के सामने खड़ा हो गया। आत्मा का साक्षात्कार करते ही शबरी के भाव का प्रेम अत्यन्त बढ़ गया। तब शबरी का भाव कहने लगा कि हे प्रभु! मैं आपकी स्तुति कैसे करूँ। मैं अधम जाति की हूँ अर्थात् मेरी उत्पत्ति तो नाड़ी की वासना वृतियों से होती है। क्योंकि जब धीरे-धीरे मत कर, मत कर का भाव प्रबल होता है, तब जाकर ही वासनाओं को छोड़कर शबरी (सब्र) की अवस्था आती है। इसलिए उसी अवस्था को समझाने के लिए नीच जाति की नारी होना बताया गया है।
अधम ते अधम अधम अति नारी। तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी।।
कह रघुपति सुनु भामिनि बाता। मानउँ एक भगति कर नाता।।
व्याख्या : वासना का भाव अधम वृति से पैदा होता है और उस अधम वृति से नारी (नाड़ी) की गति अधम हो जाती है। उस अधमता की अवस्था में से मैं मंदबुद्धि वाली शबरी रूपी भाव पैदा होती हूँ। शबरी के भाव को मंदबुद्धि कहने का बहुत गहरा रहस्य है। वास्तव में जब तक बुद्धि के घोड़े दौड़ते रहते हैं, तब तक संतोष या सब्र की अवस्था आ ही नहीं पाती है। परन्तु जब मत कर, ऐसा मत कर रूपी मतंग भाव से बुद्धि की गति मन्द हो जाती है, तो शबरी का भाव आना शुरु हो जाता है। तब आत्मा रूपी राम बोले कि हे भामिनि! मैं तो केवल एक भक्ति का नाता मानता हूँ। अर्थात् आत्मा का साक्षात्कार तो विषय वासनाओं के शान्त हो जाने पर भयहीन अवस्था आने पर ही सम्भव हो पाता है।
जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई।।
भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा।।
व्याख्या : जाति-पाँति, कुल की बड़ाई की धारणा, धन, बल, कुटुम्ब, गुण और चतुराई इन सबके होने पर भी भक्ति हीन नर ऐसा लगता है, जैसे बिना पानी का बादल दिखायी पड़ता है। अर्थात् भक्ति नहीं होने पर नर की धड़कन से आनन्द रूपी जल नहीं निकलता है बल्कि जलहीन बादल जैसे फीका लगने लगता है।
नवधा भगति कहउँ तोही पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं।।
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा-प्रसंगा।।
व्याख्या : मैं तुमको नौ प्रकार की भक्ति बताता हूँ अर्थात नौ प्रकार से साधक भयहीन अवस्था को प्राप्त कर सकता है। अत: हे भामिनी! तुम मन में धारण करके सावधानी पूर्वक सुनो। प्रथम भयहीन अवस्था तो संतों के संग करने पर आती है क्योंकि जब संतों की संगत की जाती है, तो मुझ परमात्मा की कथाओं में रूचि पैदा हो जाती है। जिनके संशयों का अंत हो जाता है, वे ही संत होते हैं और संशयों का अंत हो जाने वाला कभी भी वासनाओं के जाल में नहीं पड़ता है और बिना वासनाओं के भय नहीं सता सकता है इसलिए संतों का संग करने से वासनाएँ शान्त होती हैं और जैसे-जैसे वासनाएँ शान्त होती चली जायेंगी वैसे-वैसे भय भी मिटता चला जायेगा। जब भय कम होने लग जायेगा तो मन शान्त होकर परमात्मा की कथा प्रसंग में रूचि लेने लगता है, जिससे भी वासनाओं का भय कम होता चला जाता है।
दो0 गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।
चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान।।35।।
व्याख्या : गु डिग्री के चरण कमलों की सेवा करने से भक्ति की प्राप्ति होती है। गु डिग्री की सेवा करने के अभ्यास से मन का भय कम हो जाता है, इसलिए गुरु सेवा को अमान भक्ति अर्थात् मान-अपमान का भय कम होने की अवस्था कहा जाता है। भक्ति की चौथी अवस्था परमात्मा के गुणों का कपट छोड़कर गान करने पर पैदा होती है। अगर परमात्मा के गुणों का बखान दिखावे के लिए पाखण्डपूर्ण तरीके से किया जाता है, तो उससे तो उल्टा भय ही पैदा होता है। भय हीन अवस्था तो तब ही सम्भव होती है, जब कपट का त्याग करके निर्मल भाव से परमात्मा के गुणों का बखान किया जाता है।
मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा।।
छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा।।
व्याख्या : दृढ़ विश्वास के साथ मंत्र का जप करने से मन अन्तर्वृति वाला हो जाता है, जिससे विषयों का भय कम जाता है। अत: यह भक्ति की पाँचवीं अवस्था बतायी गयी है। जब मंत्र के जप से मन अन्तर्वृति वाला हो जाता है, तो ज्ञान का प्रकाश होने लग जाता है, उसी को वेद की अनुभूति कहा जाता है। जब वेद की अनुभूति हो जाती है, तो साधक में इन्द्रियों के दमन की क्षमता आ जाती है और शील बढ़ जाता है तथा सांसारिक कर्मों से विरक्ति बढ़ने लग जाती है। तब साधक के हृदय में निरन्तर सद्गुणों की धारणा प्रबल होने लग जाती है।
सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें सन्त अधिक करि लेखा।।
आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा।।
व्याख्या : जब वेद की अनुभूति अर्थात् साधक के हृदय में ज्ञान का अवतरण हो जाता है, तो साधक समस्त जगत को परमात्मामय देखने लगता है और उसे संत परमात्मा से भी ज्यादा अच्छे लगने लगते हैं अर्थात् जिनके संशय मिट गए हों, वे परमात्मा से भी अच्छे लगने लगते हैं। तब आठवीं भक्ति की अवस्था आ जाती है, जिसमें सहज संतोष की प्राप्ति हो जाती है। उस अवस्था में सपने में भी पराए दोष नहीं दिखाई देते हैं क्योंकि संसार का भ्रम मिट जाने पर तो संसार स्व का विस्तार मात्र लगने लगता है। अत: ऐसी अवस्था में पराए दोष कैसे दिखाई पड़ सकते हैं।
नवम सरल सब सन छल हीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना।।
नव महुँ एकउ जिन्ह कें होई। नारि पुरुष सचराचर कोई।।
व्याख्या : नवीं भयहीन अवस्था सरल व छलहीन होने पर आती है तथा उस अवस्था में मुझे परमात्मा का पूर्ण भरोसा होता है तथा हर्ष व शोक कुछ भी नहीं होता है। इन नौ अवस्थाओं में से कोई भी साधक अगर एक भी अवस्था को प्राप्त कर लेता है, तो चाहे वो नारी हो या पुरुष हो या चराचर जगत का कोई भी जीव हो।
सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरें। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें।।
जोगि बृंद दुरलभ गति जोई। तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई।।
व्याख्या : वही जीव मुझे सबसे प्रिय होता है और उसके हृदय में सब प्रकार से निर्भय की अवस्था अर्थात् भक्ति की अवस्था आ जाती है। जो गति योगियों के समूहों को भी दुर्लभ होती है, वही गति आज तुम (शबरी) को सुलभ हो गयी है। अर्थात् शबरी (सब्र) की अवस्था आने पर सरलता से भयहीन अवस्था आ जाती है।
मम दरसन फल परम अनूपा। जीव पाव निज सहज सरूपा।।
जनक सुता कइ सुधि भामिनी। जानहि कहु करिबर गामिनी।।
व्याख्या : मेरे दर्शन अर्थात् आत्म साक्षात्कार का यह परम अनुपम फल होता है कि जीव निज स्वरूप को प्राप्त कर लेता है। हे भामिनि! अगर सुरता रूपी सीता की कुछ खबर जानती हो तो बताओ।
पंपा सरहि जाहु रघुराई। तहँ होइहि सुग्रीव मिताई।।
सो सब कहिहि देव रघुबीरा। जानतहूँ पूछहु मतिधीरा।।
व्याख्या : हे आत्मा रूपी राम! तुम पंपा सरोवर पर जाइये अर्थात् शबर कोश से आगे पंपा कोश होता है, जहाँ पर बुद्धि के भावों का जमावड़ा रहता है। इसलिए शबरी भाव कहता है कि वहाँ पर सुग्रीव अर्थात् सुबुद्धि रूपी सुग्रीव से मित्रता होगी। वही सुबुद्धि रूपी सुग्रीव ही सुरता के बारे में सब बता देगा। हे मतिधीर! तुम तो सब जानते ही हो।
बार बार प्रभु पद सिरु नाई। प्रेम सहित सब कथा सुनाई।।
व्याख्या : इस प्रकार शबरी के भाव ने आत्मा रूपी राम के सामने समर्पण करते हुए प्रेम सहित सब कथा सुनायी।
छ0 कहि कथा सकल बिलोकि हरि मुख हृदयँ पद पंकज धरे।
तजि जोग पावक देह हरि पद लीन भइ जहँ नहिं फिरे।।
नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू।
बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागहू।।
व्याख्या : शबरी के भाव ने सब कथा कहकर और आत्म दर्शन करके अपने हृदय कमल में रख लिया और फिर योग अग्नि में अपने शरीर को रखकर शबरी (सब्र) का भाव आत्मा में पूर्ण रूप से लीन हो गया और परम पद को प्राप्त कर लिया। ऐसी परम अवस्था आ जाने पर नर (धड़कन) बहुत से कर्मों और मिथ्या धारणाओं, भ्रम व शोक पैदा करने वाले सब भावों का त्याग कर देता है। इसलिए परमात्मा के चरणों में अनुराग करके ये सब बात तुलसीदास बहुत विश्वास के साथ कहते हैं।
दो0 जाति हीन अघ जन्म महि मुक्त कीन्हि असि नारि।
महामंद मन सुख चहसि ऐसे प्रभुहि बिसारि।।36।।
व्याख्या : जो नाड़ी चिन्ता रूपी पाप को जन्म देने वाली होती है, वह भी परमात्मा की कृपा से मुक्त हो जाती है। अर्थात् वह नाड़ी भी निर्मल होकर भयहीन अवस्था को प्राप्त कर लेती है। अत: हे मूर्ख मन! तू ऐसे परमात्मा को छोड़कर सुख चाहता है।
चले राम त्यागा बन सोऊ। अतुलित बल नर केहरि दोऊ।।
बिरही इव प्रभु करत बिषादा। कहत कथा अनेक संबादा।।
व्याख्या : अब ध्यान आत्म चेतना वैराग्य रूपी वन को छोड़कर आगे चला अर्थात् वैराग्य के बाद अब बुद्धि के भावों रूपी वानरों के कोश के लिए चला। दोनों भाई आत्मा रूपी राम व लखन भाव अतुलित बल वाले और नर की धड़कन वासनाओं को हरने वाली है। आत्मा रूपी राम विरही की तरह विषाद करते हुए अनेकों कथाएँ और संवाद कहते हैं। अर्थात् आत्मा सुरता के अभाव में विरह का अनुभव करती है। आत्मा को बार-बार सुरता की याद आती रहती है। उसी को नाना कथाओं के संवाद के प्रतीक के रूप में लिखा गया है।
लछिमन देखु बिपिन कइ सोभा। देखत केहि कर मन नहिं छोभा।।
नारि सहित सब खग मृग बृंदा। मानहुँ मोरि करत हहिं निंदा।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम लखन भाव से कहते हैं कि हे लखन! तुम जरा वैराग्य रूपी वन की शोभा को देखो। इसे देखकर किस भाव के मन में क्षोभ पैदा नहीं होगा? इस वैराग्य रूपी वन में नाड़ी सहित सब इच्छाओं रूपी पक्षी व हिरनों के समूह मानों मेरी निन्दा कर रहे हैं। इस चौपाई का बहुत गहरा रहस्य है। निन्दा करने का प्रतीक इसलिए लिया गया है कि बिना सुरता के संग के वैराग्य रूपी वन में घूमना व्यर्थ होता है। अगर सुरता काम रूपी रावण के वश में हो और आत्म चेतना वैराग्य रूपी वन में हो, तो ये असहज अवस्था होती है। इसलिए इसे निंदा के प्रतीक के माध्यम से लिखा गया है।
हमहि देखि मृग निकर पराहीं। मृगीं कहहिं तुम्ह कहँ भय नाहीं।।
तुम्ह आनंद करहु मृग जाए। कंचन मृग खोजन ए आए।।
व्याख्या : हे लखन भाव! हमें देखकर इच्छा रूपी मृगों के समूह भागने लगते हैं, तब सहज इच्छा रूपी हिरनियाँ उनसे कहती हैं कि हे सहज इच्छा रूपी मृगों! तुम्हें डरने की जरूरत नहीं है। ये तो माया रूपी हिरणों को अर्थात् असहज इच्छाओं को खोजने आए हैं। वास्तव में जब ध्यान में आत्मा पवित्र हो जाती है, तो सहज इच्छाओं से आत्मा का कोई विरोध नहीं होता है। निर्मल आत्मा तो असहज इच्छाओं का ही शिकार करती है।
संग लाइ करिनीं करि लेहीं। मानहुँ मोहि सिखावनु देहीं।।
सास्त्र सुचिंतित पुनि पुनि देखिअ। भूप सुसेवित बस नहिं लेखिअ।।
व्याख्या : हाथी हथिनियों को साथ लगा लेते हैं अर्थात् वृतियाँ वृतियों के भावों को साथ लगा लेती हैं, मानों संदेश दे रही हो कि नाड़ी को कभी भी अकेला (सूना) नहीं छोड़ना चाहिये। शास्त्र अच्छी तरह याद हो तो भी निरन्तर उसका चिन्तन करते रहना चाहिये। अच्छी तरह से सेवा किये हुए राजा को भी कभी वश में नहीं समझना चाहिये। इसी प्रकार ध्यान का गहरा अभ्यास होने पर भी सुरता को नहीं छोड़ना चाहिये।
राखिअ नारि जदपि उर माहीं। जुबती सास्त्र नृपति बस नाहीं।।
देखहु तात बसंत सुहावा। प्रिया हीन मोहि भय उपजावा।।
व्याख्या : नारी को हृदय में रखने पर भी अर्थात् नाड़ी की धड़कन को हृदय में आभासित करने पर भी वह युवती, शास्त्र व राजा की तरह वश में नहीं आ पाती है। हे तात्! देखो भावों की निर्मलता से वसन्त ऋतु का सा आभास हो रहा है परन्तु मेरा मन सुरता रूपी प्रिया के बिना भयभीत हो रहा है।
दो0 बिरह बिकल बलहीन मोहि जानेसि निपट अकेल।
सहित बिपिन मधुकर खग मदन कीन्ह बगमेल।।37(क)।।
व्याख्या : मुझ आत्मा को सुरता के विरह में व्याकुल, बलहीन व अकेला समझकर कामवासना रूपी कामदेव ने भ्रमर व पक्षियों रूपी भोग भावों सहित मुझ पर हमला कर दिया। वास्तव में ध्यान के अभ्यास से भावों में निर्मलता आ जाती है परन्तु बिना सुरता के आधार के आत्म चेतना भयभीत व व्याकुल हो उठती है। ऐसी अवस्था में नाना भोग वासना के भाव आत्मा को आच्छादित करने का प्रयास करते हैं।
दो0 देखि गयउ भ्राता सहित तासु दूत सुनि बात।
डेरा कीन्हेउ मनहुँ तब कटकु हटकि मनजात।।37(ख)।।
व्याख्या : परन्तु जब कामदेव का दूत देख गया कि मैं अकेला नहीं लखन भाव रूपी भाई के साथ हूँ तो यह खबर पाकर कामदेव ने डेरा डाल दिया। इस दोहे में बहुत गहरा रहस्य है। आत्मा को सुरता और लखन भाव का बहुत बड़ा आधार होता है। तब जाकर ही आत्मा परमात्मा में लीन हो पाती है। सुरता भावों के आवागमन को रोकती है और लखन भाव भावों के लक्षणों को पहचान कर आत्मा की निर्मलता की रक्षा करता है। इसलिए लखन भाव को देखकर कामदेव की भोग भाव रूपी सेना असहाय हो जाती है। उसको ही प्रतीकों का सहारा लेकर कामदेव का समर्पण कर देना बताया है।
बिटप बिसाल लता अरुझानी। बिबिध बितान दिए जनु तानी।।
कदलि ताल बर धुजा पताका। देखि न मोह धीर मन जाका।।
व्याख्या : विशाल भाव रूपी वृक्षों में भोग रूपी बेलें उलझी हुई होती हैं, मानों भोग वासनाओं ने नाना प्रकार के तंबू तान दिए हों। केला और ताल सुन्दर भावों की ध्वजा के समान लगते हैं। इन्हें देखकर वही नहीं मोहित होता, जिसका मन धीर है।
बिबिध भाँति फूले तरु नाना। जनु बानैत बने बहु बाना।।
कहुँ कहुँ सुंदर बिटप सुहाए। जनु भट बिलग बिलग होइ छाए।।
व्याख्या : नाना प्रकार के भोग रूपी फल भावों रूपी वृक्षों पर लगे हुए होते हैं जैसे बाँसों का बाना (मंच) नाना प्रकार से बना हुआ हो, ऐसे भावों का जाल बुना हुआ होता है। कहीं कहीं सुन्दर भाव रूपी वृक्ष शोभा दे रहें हैं और ऐसा लगता है मानो भाव रूपी योद्धाओं ने अलग अलग छावनी डाली हो।
कूजत पिक मानहुँ गज माते। ढेक महोख ऊँट बिसराते।।
मोर चकोर कीर बर बाजी। पारावत मराल सब ताजी।।
व्याख्या : उस अवस्था में मधुर भाव तो कोयल की कूक जैसे लगते हैं और भोग वृतियाँ मानो हाथियों की तरह चिंघाड़ती हुई सी लगती हैं। ढेक और महोख रूपी भाव अर्थात् लालसा व वासना के भाव मानों ऊँट और खच्चर हैं। मयूर, चकोर, तोते, कबूतर और हंस रूपी भाव मानो अरबी घोड़ों के समान उत्साह वाले हैं।
तीतिर लावक पदचर जूथा। बरनि न जाइ मनोज बरुथा।।
रथ गिरि सिला दुंदुभी झरना। चातक बंदी गुन गन बरना।।
व्याख्या : तीतर और बटेर रूपी चंचल भाव पैदल सिपाहियों के झुण्ड हैं। इस प्रकार कामदेव की भाव रूपी सेना का वर्णन नहीं हो सकता है। वृतियों की जड़ता रुपी रथ हैं और प्राण रूपी झरने की आवाज नगाड़े होते हैं। पपीहे रूपी भाव भाट हैं, जो गुण समूह का वर्णन करते हैं।
मधुकर मुखर भेरि सहनाई। त्रिबिध बयारि बसीठीं आई।।
चतुरंगिनी सेन सँग लीन्हें। बिचरत सबहि चुनौती दीन्हें।।
व्याख्या : ध्यान में सुनाई पड़ने वाली भ्रमरों की आवाज ही भेरी और शहनाई का प्रतीक हैं। उस अवस्था में तीनों गुणों की शीतल, मन्द, सुगन्ध हवा सहजता रूपी दूत का काम करती है। अर्थात् गुणों के निर्मल हो जाने पर गुण गुणों में बरतने लगते हैं। उस अवस्था में सत, रज, तम व गुणातीत भाव अवस्था रूपी चतुरंगिणी सेना साथ लिए मानो कामदेव सबको चुनौती देता हुआ विचर रहा है।
लछिमन देखत काम अनीका। रहहिं धीर तिन्ह कै जग लीका।।
एहि के एक परम बल नारी। तेहि तें उबर सुभट सोइ भारी।।
व्याख्या : हे लखन भाव! जो कामदेव की भाव सेना को देखकर विचलति नहीं होते हैं, जगत में उनका ही यश होता है। अर्थात् जगत में उनका ही कल्याण होता है, जो काम वासना के भावों से प्रभावित नहीं होते हैं। इन काम भावों के लिए नारी का बड़ा बल होता है अर्थात् काम के भाव नाड़ी की धड़कन से बल प्राप्त करते हैं। अत: जो भाव नाड़ी की धड़कन से उत्पन्न काम भावों से बच जाएँ, उन्हें योद्धा भाव मानना चाहिये।
दो0 तात तीनि अति प्रबल खल काम क्रोध अरु लोभ।
मुनि बिग्यान धाम मन करहिं निमिष महुँ छोभ।।38(क)।।
व्याख्या : हे तात्! काम, क्रोध और लोभ के भाव प्रबल दुष्ट भाव होते हैं। ये भाव विज्ञान के धाम मुनियों के मन में भी क्षण भर में क्षोभ पैदा कर देते हैं।
दो0 लोभ के इच्छा दंभ बल काम के केवल नारि।
क्रोध के परुष बचन बल मुनिबर कहहिं बिचारि।।38(ख)।।
व्याख्या : लोभ के भाव को इच्छा और दम्भ के भावों का बल मिलता है परन्तु काम के भाव को तो केवल नारी से बल मिलता है। क्रोध को कठोर वचनों से बल मिलता है। ऐसा मुनि लोग अनुभव करके कहते हैं।
गुनातीत सचराचर स्वामी। राम उमा सब अंतरजामी।।
कामिन्ह कै दीनता देखाई। धीरन्ह कें मन बिरति दृढ़ाई।।
व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी पार्वती! आत्मा रूपी राम तो गुणातीत और समस्त चराचर जगत के स्वामी हैं तथा सबके अन्तर्यामी हैं। वे कामियों के मन में काम को और बढ़ा देते हैं तथा वे ही धैर्यवानों के हृदय में वैराग्य को दृढ़ कर देते हैं। अर्थात् अच्छा-बुरा सब एक परमात्मा की क्षमता से ही होता है।
क्रोध मनोज लोभ मद माया। छूटहिं सकल राम की दाया।।
सो नर इन्द्रजाल नहिं भूला। जा पर होइ सो नट अनुकूला।।
व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी पार्वती! परमात्मा की कृपा से ही क्रोध, काम, लोभ, मद व माया के सब विकार मिट जाते हैं। वो मनुष्य इन्द्रियों के जाल में नहीं पड़ता है, जिस पर परमात्मा अनुकूल होते हैं।
उमा कहउँ मैं अनुभव अपना। सत हरि भजनु जगत सब सपना।।
पुनि प्रभु गए सरोबर तीरा। पंपा नाम सुभग गंभीरा।।
व्याख्या : हे श्रद्धा रूपी पार्वती! मैं अपना अनुभव बताता हूँ कि परमात्मा का भजन ही सत्य है बाकी सब जगत तो स्वपन की तरह है। ध्यान की अवस्था में आत्म चेतना पंपा सरोवर रूपी बुद्धि के कोश में प्रवेश की। बुद्धि कोश रूपी पंपा सरोवर बहुत ही गम्भीर व सुभग अर्थात सु अ भग यानि शुभ प्रकृति वाला था।
संत हृदय जस निर्मल बारी। बाँधे घाट मनोहर चारी।।
जहँ तहँ पिअहिं बिबिध मृग नीरा। जनु उदार गृह जाचक भीरा।।
व्याख्या : बुद्धि कोश रूपी पंपा सरोवर का जल संत के हृदय के समान निर्मल था और मन को हरने वाले सत, रज, तम व गुणातीत रूपी चार सुन्दर घाट बने हुए हैं। उन घाटों पर नाना इच्छाओं रूपी मृग जल पीते हैं और वहाँ बुद्धि के भावों की ऐसी भीड़ लगी रहती है, मानो दान देने वाले के घर भिखारियों की भीड़ लगी होती है।
दो0 पुरइनि सघन ओट जल बेगि न पाइअ मर्म।
मायाछन्न न देखिए जैसें निर्गुन ब्रह्म।।39(क)।।
व्याख्या : घनी पुरइनों यानि कमल के पत्तों की आड़ में जल्दी जल का पता नहीं चलता। घने कमल के पत्ते ध्यान की उस अवस्था के प्रतीक है, जिसमें कमल खिल जाता है। ज्यों-ज्यों चक्र जागृत होते जाते हैं और कोश जागृत होते जाते हैं त्यों-त्यों उनको कमल खिलना बोलकर बताया जाता है। अत: जब कोश जागृत हो जाते हैं, तो कमल रूपी कोश के पत्ते घने हो जाते हैं, जिससे कोशों से निकलने वाले हार्मोन्स (रसायन) रूपी जल का पता नहीं चल पाता है। उसी को प्रतीकों का सहारा लेकर पुरइनों की सघनता में जल का दिखाई नहीं पड़ना लिखा गया है। कमल के पत्तों की सघनता से जल वैसे ही नहीं दिखता जैसे माया के रहने पर निर्गुण ब्रह्म का अनुभव नहीं हो पाता है।
दो0 सुखी मीन सब एकरस अति अगाध जल माहिं।
जथा धर्मसीलन्ह के दिन सुख संजुत जाहिं।।39(ख)।।
व्याख्या : उस बुद्धि कोश रूपी सरोवर के अगाध जल में मन के भावों रूपी मछलियाँ सुखी रहती हैं, जैसे शील को धारण करने वालों के दिन सुख पूर्वक बीतते हैं।
बिकसे सरसिज नाना रंगा। मधुर मुखर गूँजत बहु भृंगा।।
बोलत जलकुक्कुट जल हंसा। प्रभु बिलोकि जनु करत प्रसंसा।।
व्याख्या : उस बुद्धि कोश रूपी पंपा सरोवर में नाना प्रकार के रंग बिरंगे कमल खिले हुए हैं अर्थात् नाना प्रकार की बुद्धि के भाव विकसित हैं। वहाँ पर नाना भ्रमर रूपी भोग भाव मधुर गुंजार कर रहे हैं। उस बुद्धि कोश रूपी जल सरोवर में जल मुर्गे अर्थात् निर्मल अहंकार के भाव व राजहंस अर्थात् सात्विक अहंकार के भाव बोल रहे हैं। ये सब भाव आत्मा रूपी राम को देखकर उनकी प्रशंसा करने लगते हैं अर्थात् आत्मा की तरफ आकर्षित होने लगते हैं।
चक्रबाक बक खग समुदाई। देखत बनइ बरनि नहिं जाई।।
सुंदर खग गन गिरा सुहाई। जात पथिक जनु लेत बोलाई।।
व्याख्या : चक्रवाक, बगुले आदि भाव रूपी पक्षियों का समुदाय देखते ही बनता है, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। निर्मल भाव रूपी पक्षी सुन्दर व मधुर वाणी बोल रहे हैं। वे जाते हुए मन रूपी राहगीर को मानों बुला रहे हों अर्थात् मन को मोहित कर लेते हैं।
ताल समीप मुनिन्ह गृह छाए। चहु दिसि कानन बिटप सुहाए।।
चंपक बकुल कदंब तमाला। पाटल पनस परास रसाला।।
व्याख्या : बुद्धि कोश रूपी सरोवर के निकट मन के भावों के समूह के समूह रहते हैं। उन्हें मुनियों के घर बनाकर रहना बताया गया है। चारों दिशाओं में वैराग्य रूपी वन छाया रहता है और धैर्य रूपी वृक्ष लहलहाते रहते हैं। उस वैराग्य रूपी वन के वृक्षों में चम्पा, मौलसिरी (बकुल), कदम्ब, तमाल, पाटल, कटहल, ढाक और आम आदि वृक्ष नाना भोग इच्छा रूपी फलों व नये पत्तों से सुशोभित हो रहे हैं।
नव पल्लव कुसुमित तरु नाना। चंचरीक पटी कर गाना।।
सीतल मंद सुगंध सुभाऊ। संतत बहु मनोहर बाऊ।।
व्याख्या : नये-नये भाव रूपी वृक्ष नयी-नयी इच्छाओं रूपी पत्तों और सद्गुण रूपी सुगन्ध फूलों से युक्त हैं। जिन भाव रूपी वृक्षों पर भोग भाव रूपी भ्रमरों के समूह गुंजार करते हैं। उस अवस्था में तीनों गुणों की निर्मल मंद सुगन्ध हवा बहने लगती है, जो निरन्तर मन को हरने वाली होती है।
कुहू कुहू कोकिल धुनि करहीं। सुनि रव सरस ध्यान मुनि टरहीं।।
व्याख्या : मधुर-मधुर इच्छाएँ रूपी कोयल की ध्वनि को सुनकर ध्यान में अनुराग पूर्वक लगा हुआ मन भी हिल जाता है अर्थात् भोग इच्छा में मन ललचा जाता है।
दो0 फल भारन नमि बिटप सब रहे भूमि निअराइ।
पर उपकारी पुरुष जिमि नवहिं सुसंपति पाइ।।40।।।
व्याख्या : सद्गुण रूपी फलों से भाव रूपी वृक्ष सहजता रुपी भूमि पर झुके जा रहे होते हैं। जैसे परोपकारी पुरुष सद्गुणों रूपी सम्पत्ति को पाकर विनम्र होता चला जाता है।
देखि राम अति रुचिर तलावा। मज्जनु कीन्ह परम सुख पावा।।
देखी सुंदर तरुबर छाया। बैठे अनुज सहित रघुराया।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम ने बुद्धि कोश रूपी सुन्दर सरोवर को देखकर मज्जन पान किया और परम सुख की अनुभूति की अर्थात् बुद्धि के निर्मल भावों से परम सुख मिला। तब सुन्दर भाव रूपी वृक्ष की छायाँ देखकर आत्मा रूपी राम लखन भाव सहित बैठ गए अर्थात् सुंदर भावों को देखकर आत्मा व लखन भाव उन भावों में रमण करने लग गए। उसी को सुन्दर पेड़ के नीचे राम व लक्ष्मण का बैठना बताया गया है।
तहँ पुनि सकल देव मुनि आए। अस्तुति करि निज धाम सिधाए।।
बैठे परम प्रसन्न कृपाला। कहत अनुज सन कथा रसाला।।
व्याख्या : जब आत्मा व लखन भाव सद्भावों में रमण करने लग जाते हैं, तो मन के सब दैवीय भाव प्रकट हो जाते हैं और फिर समर्पित होते हुए शान्त भी हो जाते हैं। उसी अनुभूति को देवों व मुनियों का आना और लौट जाना बोलकर लिखा है। उस अवस्था में आत्मा की सहज अवस्था लौट आती है और लखन भाव से आत्मा रूपी राम रसयुक्त कथा कहने लगते हैं अर्थात् लखन भाव को सद्भावों की सुख अनुभूति को प्रेरणा कर समझाते हैं। उसी को ""कहत अनुज सन कथा रसाला"" बोलकर लिखा है।
बिरहवंत भगवंतहि देखी। नारद मन भा सोच बिसेषी।।
मोर साप करि अंगीकारा। सहत राम नाना दुख भारा।।
व्याख्या : ऐसी अवस्था में मन का नारद भाव प्रकट हो जाता है और वो आत्मा रूपी राम को सुरता रूपी सीता के विरह में देख कर मन में विशेष चिन्ता करने लगता है कि मेरे श्राप अर्थात् मेरी कठोरता के कारण आत्मा रूपी राम नाना प्रकार के कष्ट सह रहे हैं। नारद मन का ऐसा भाव है जो दृढ़ वैराग्य की प्रेरणा करता है और विषयों के जाल से बचने की चेतावनी देता है। परन्तु जब वैराग्य और भोगों के बीच में द्वन्द्व चलता है, तो नारद का भाव चिन्ता में पड़ जाता है।
ऐसे प्रभुहि बिलोकउँ जाई। पुनि न बनिहि अस अवसरु आई।।
यह बिचारि नारद कर बीना। गए जहाँ प्रभु सुख आसीना।।
व्याख्या : तब मन के नारद भाव ने विचार किया कि ऐसी अवस्था में आत्मा रूपी राम को जाकर देखता हूँ क्योंकि ऐसा अवसर दोबारा नहीं आयेगा। ऐसा अवसर आत्मा की उस अवस्था का प्रतीक है, जिसमें आत्मा शबरी (सब्र) की अवस्था को पार करके बुद्धि कोश में पहुँचकर भावों का दृष्टा बनकर सुखपूर्वक आसीन हो गयी। अत: नारद ने ऐसा विचार करके हाथ में बीणा लेकर वहाँ गए जहाँ बुद्धि के कोश में आत्मा रूपी राम सुखपूर्वक बैठे थे।
गावत राम चरित मृदु बानी। प्रेम सहित बहु भांति बखानी।।
करत दंडवत लिए उठाई। राखे बहुत बार उर लाई।।
व्याख्या : मन का नारद भाव मधुर वाणी में प्रेम के साथ आत्मा रूपी राम के गुणों का बखान करने लगा। और आत्मा रूपी राम के सामने समर्पण कर दिया अर्थात् दण्डवत पड़ गया। तब आत्मा रूपी राम ने मन के नारद भाव को उठाकर बार-बार छाती से लगा लिया अर्थात् मन के नारद भाव को प्रेम से अपना लिया।
स्वागत पूँछि निकट बैठारे। लछिमन सादर चरन पखारे।।
व्याख्या : कुशल क्षेम पूछकर नारद भाव को निकट बैठाया और लखन भाव ने नारद भाव के चरण धोए अर्थात् लखन भाव ने मन के नारद भाव के भावों को लखकर निर्मल कर लिया।
दो0 नाना बिधि बिनती करि प्रभु प्रसन्न जियँ जानि।
नारद बोले बचन तब जोरि सरोरुह पानि।।41।।
व्याख्या : मन के नारद भाव ने तब आत्मा रूपी राम की नाना प्रकार से विनती की अर्थात् निर्मलता के साथ समर्पण करते हुए आत्मा रूपी राम को सहज प्रसन्न जानकर कमल के समान हाथों को जोड़कर बोले।
सुनहु उदार सहज रघुनायक। सुंदर अगम सुगम बर दायक।।
देहु एक बर मागउँ स्वामी। जद्यपि जानत अंतरजामी।।
व्याख्या : हे उदार व सहज आत्मा रूपी राम! आप सुंदर अगम व सुगम वर के देने वाले हैं। हे स्वामी! मैं एक वर माँगता हूँ, वह मुझे दीजिए, यद्यपि आप तो प्रत्येक भाव के अन्त:करण को जानने वाले हैं।
जानहु मुनि तुम्ह मोर सुभाऊ। जन सन कबहुँ कि करउँ दुराऊ।।
कवन बस्तु असि प्रिय मोहि लागी। जो मुनिबर न सकहु तुम्ह मागी।।
व्याख्या : हे मन के नारद भाव! तुम तो मुझ आत्मा का स्वभाव जानते ही हो। क्या मैं कभी अपने भक्तों से छिपाव करता हूँ? ऐसी कौनसी वस्तु मुझे प्रिय है, जो तुम माँगों और मैं नहीं दे सकता हूँ? अर्थात् आत्मा के लिए अदेय कुछ भी नहीं होता है।
जन कहुँ कछु अदेय नहिं मोरें। अस बिस्वास तजहु जनि भोरें।।
तब नारद बोले हरषाई। अस बर मागउँ करउँ ढिठाई।।
व्याख्या : आत्मा को अपने भक्तों के लिए कुछ भी अदेय नहीं होता है। अत: इस विश्वास को सपने में भी नहीं छोड़ना चाहिये। वास्तव में आत्मा की शक्ति अपरम्पार होती है। तब मन का नारद भाव प्रसन्न होता हुआ बोला कि मैं ऐसा वर माँग कर धृष्टता करता हूँ।
जद्यपि प्रभु के नाम अनेका। श्रुति कह अधिक एक तें एका।।
राम सकल नामन्ह ते अधिका। होउ नाथ अघ खग गनबधिका।।
व्याख्या : यद्यपि परमात्मा के अनेक नाम हैं और वेदों ने भी एक से एक बढ़कर नाम बताये हैं। परन्तु हे प्रभु! मुझे ऐसा वर दीजिए कि राम का नाम सब नामों से बढ़कर हो और पाप रूपी पक्षियों के वध के लिए यह बधिक के समान हो। वास्तव में जब ध्यान में मन का नारद भाव आत्मा का साक्षात्कार करता है, तो वह उसके सम्बोधन का कोई एक नाम धारण करना चाहता है। इसलिए राम नाम को सबसे बढ़कर धारण करना चाहता है।
दो0 राका रजनी भगति तव राम नाम सोइ सोम।
अपर नाम उडगन बिमल बसहुँ भगत उर ब्योम।।42(क)।।
व्याख्या : हे आत्मा रूपी राम! आपकी भक्ति पूर्णिमा की रात्रि की तरह शीतल व ज्ञान का प्रकाश करने वाली हो और उसमें ""राम"" का नाम चन्द्रमा होकर तथा अन्य सब नाम तारागण होकर भक्तों के हृदय रूपी निर्मल आकाश में निवास करें।
दो0 एवमस्तु मुनि सन कहेउ कृपासिंधु रघुनाथ।
तब नारद मन हरष अति प्रभु पद नायउ माथ।।42(ख)।।
व्याख्या : तब आत्मा रूपी राम ने प्रेरणा की कि ऐसा ही होगा। तब मन के नारद भाव ने हर्षित होते हुए आत्मा रूपी राम के चरणों में सीस झुकाया अर्थात् पूर्ण समर्पण कर दिया यानि लीन हो गया।
अति प्रसन्न रघुनाथहि जानी। पुनि नारद बोले मृदु बानी।।
राम जबहिं प्रेरेउ निज माया। मोहेहु मोहि सुनहु रघुराया।।
व्याख्या : तब मन के नारद भाव ने आत्मा रूपी राम को बहुत प्रसन्न जानकर मधुर वाणी में कहा कि हे आत्मा रूपी राम! तुम जब प्रेरित करते हो तब ही माया अपना प्रभाव दिखाती है। उससे आपकी माया ने मुझे मोहित कर लिया था।
तब बिबाह मैं चाहउँ कीन्हा। प्रभु केहि कारन करै न दीन्हा।।
सुनु मुनि तोहि कहउँ सहरोसा। भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा।।
व्याख्या : मन के नारद भाव ने कहा कि जब मैं विश्वमोहनी रूपी भाव से विवाह करना चाहता था अर्थात् विश्व के मोहने की सिद्धि को प्राप्त करना चाहता था तो किस कारण आपने मुझे रोका था? तब आत्मा रूपी राम ने कहा कि मैं तुम्हें सहजता के साथ कहता हूँ कि जो भाव मुझे सबका भरोसा छोड़कर भजते हैं, मैं उन्हें माया के जाल में नहीं पड़ने देता हूँ।
करउँ सदा तिन्ह कै रखवारी। जिमि बालक राखइ महतारी।।
गह सिसु बच्छ अनल अहि धाई। तहँ राखइ जननी अरगाई।।
व्याख्या : मैं उनकी सदैव वैसे ही रखवाली करता हूँ जैसे बालक की रक्षा उसकी माँ करती है। इस चौपाई में परमात्मा के स्वभाव का वर्णन किया गया है। वास्तव में परमात्मा स्वयं ही साधक के योगक्षेम की व्यवस्था कर देता है। ज्यों-ज्यों साधक का भरोसा परमात्मा पर बढ़ता चला जाता है त्यों-त्यों योगक्षेम होता चला जाता है। साधक को पता भी नहीं चल पाता है और परमात्मा उसे सिद्धियों के जाल से बचा लेते हैं। नारद का विश्वमोहिनी से शादी करने का कथानक वास्तव में साधक का सिद्धियों को प्राप्त करने की लालसा का ही प्रतीक है। उसी को नारद का विवाह बताकर प्रतीकों का सहारा लेकर समझाया गया है। जैसे बच्चा अग्नि की तरफ दौड़ता है तो उसकी माता उसे रोक लेती है। उसी प्रकार अगर सच्चा भक्त विषय वासना रूपी अग्नि में गिरने लगता है, तो परमात्मा रूपी महतारी उसकी रक्षा कर लेती है।
प्रौढ़ भएँ तेहि सुत पर माता। प्रीति करइ नहिं पाछिलि बाता।।
मोरे प्रौढ़ तनय सम ग्यानी। बालक सुत सम दास अमानी।।
व्याख्या : जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता चला जाता है तो माता उससे प्रीत (प्रेम) तो करती है परन्तु पिछली जैसी बात नहीं रहती है। उसी प्रकार मेरा ज्ञानी भक्त उस सयाने बालक की तरह होता है। उस सयाने (ज्ञानी) भक्त पर मेरा प्रेम तो रहता है परन्तु योगक्षेम का दायित्व मेरा नहीं रहता है। परन्तु जो भक्त अपने बल का मान नहीं करता है, वो मुझे शिशु के समान प्रिय होता है और उसका मैं योगक्षेम करता हूँ।
जनहि मोर बल निज बल ताही। दुहु कहँ काम क्रोध रिपु आही।।
यह बिचारि पंडित मोहि भजहीं। पाएहुँ ग्यान भगति नहीं तजहीं।।
व्याख्या : भक्त केवल मेरे बल पर रहता है और ज्ञानी को उसका अपना बल होता है। काम व क्रोध रूपी शत्रु दोनों को ही सताते हैं परन्तु शिशुवत जो मेरा भक्त होता है, उसकी रक्षा मैं स्वयं करता हूँ और ज्ञानी अपने ज्ञान के बल पर काम व क्रोध रूपी शत्रुओं का मुकाबला करता है। ऐसा विचारकर जो विद्वान लोग हैं, वे मुझे शैशव भक्त बनकर भजते हैं और ज्ञान हो जाने पर भी शिशुवत ही बने रहते हैं। वे कभी भक्ति को नहीं छोड़ते हैं।
दो0 काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कै धारि।
तिन्ह महँ अति दारुन दुखद मायारूपी नारि।।43।।
व्याख्या : काम, क्रोध, लोभ व मदादि के भाव मोह की धारा की प्रबलता के अनुसार दु:ख देने वाले होते हैं। परन्तु इन सबसे भी भयंकर दु:ख देने वाली तो माया रूपी नारी होती है। अर्थात् नाड़ी की धड़कन से जब माया के भाव पैदा होने लग जाते हैं, तो वे भयंकर दु:ख देने वाले हो जाते हैं। साधारणत: नारी का मतलब स्त्री से लगा लिया जाता है। परन्तु यह सही नहीं है क्योंकि स्त्री तो जीवात्मा है और उसमें भी काम, क्रोधादि भाव पुरुष की तरह ही होते हैं। नारी का वास्तविक तात्पर्य नाड़ी से ही लेना चाहिये क्योंकि नाड़ी की अशुद्धता ही माया के विकार पैदा करती है और नाड़ी की निर्मलता ही भक्ति पैदा करती है। इसलिए तो साधना के प्रारम्भ में नाड़ी शोधन पर विशेष बल दिया जाता है।
सुनु मुनि कह पुरान श्रुति संता। मोह बिपिन कहुँ नारि बसंता।।
जप तप नेम जलाश्रय झारी। होइ ग्रषम सोषइ सब नारी।।
व्याख्या : हे मन के नारद भाव रुपी मुनि! सभी वेद व संत जन यही कहते हैं कि मोह रूपी वन में नाड़ी की धड़कन माया रूपी बसंत पैदा कर देती है। जो जप, तप व नियम रूपी जलाशय को वासना रूपी अग्नि बन सुखा देती है।
काम क्रोध मद मत्सर भेका। इन्हहि हरषप्रद बरष एका।।
दुर्बासना कुमुद समुदाई। तिन्ह कहँ सरद सदा सुखदाई।।
व्याख्या : काम, क्रोध, मद व मत्सर रूपी मेढ़कों को वासना रूपी वर्षा सुख देने वाली होती है और बुरी वासनाएँ कुमुदों के समूह बन जाती हैं। उनको सुख देने वाली यह नाड़ी की धड़कन शरद ऋतु बन जाती है।
धर्म सकल सरसीरुह बृंदा। होइ हिम तिन्हहि दहइ सुख मंदा।।
पुनि ममता जवास बहुताई। पलुहइ नारि सिसिर रितु पाई।।
व्याख्या : धारणा योग्य सब भाव (दया, करुणा, क्षमा, मैत्री, धैर्य, दान, परोपकार आदि भाव धारण करने योग्य होते हैं) कमलों का समूह होता है। जिन्हें नाड़ी की धड़कन बर्फ बनकर जला देती है। फिर ममता रूपी जवास का समूह माया रूपी नाड़ी को शिशिर ऋतु की तरह पाकर हरा-भरा हो जाता है। अर्थात् नाड़ी की धड़कन से जब धारणा करने योग्य भाव मर जाते हैं, तो वासना रूपी जवासा पैदा होकर हरे-भरे हो जाते हैं अर्थात् काम, क्रोध, मदादि के भाव प्रबल हो उठते हैं।
पाप उलूक निकर सुखकारी। नारि निबिड़ रजनी अँधिआरी।।
बुधि बल सील सत्य सब मीना। बनसी सम त्रिय कहहिं प्रबीना।।
व्याख्या : चिन्ता रूपी पापी उल्लूओं के लिए नाड़ी की धड़कन से उत्पन्न अज्ञान रूपी रात्रि सुख देने वाली होती है। बुद्धि, बल, शील व सत्य ये सब मछलियों की तरह होते हैं और उनको फँसाने के लिए नाड़ी की त्रिगुणमयी धड़कन बंसी के समान होती है। चतुर पुरुष ऐसा कहते हैं।
दो0 अवगुन मूल सूलप्रद प्रमदा सब दुख खानि।
ताते कीन्ह निवारन मुनि मैं यह जियँ जानि।।44।।
व्याख्या : नाड़ी की उश्रृंखल धड़कन समस्त अवगुणों का मूल, कष्ट देने वाली और समस्त दु:खों की खान होती है। इसलिए मैंने तुम्हें नारी की माया से बचाने के लिए विश्वमोहनी रूपी सिद्धियों के जाल से बचाया।
सुनि रघुपति के बचन सुहाए। मुनि तन पुलक नयन भरि आए।।
कहहु कवन प्रभु कै असि रीती। सेवक पर ममता अरु प्रीती।।
व्याख्या : आत्मा रूपी राम के वचनों को सुनकर मन के नारद भाव का तन पुलकित हो उठा और नेत्रों में जल छा गया। नारद भाव तब मन ही मन कहने लगा कि कहो तो किस प्रभु की ऐसी रीति है कि सेवक पर इतना ममत्व व प्रेम करते हैं। अर्थात् उस अवस्था में नारद के भाव को परमात्मा का निश्छल प्रेम व ममता का भाव समझ में आ जाता है।
जे न भजहिं अस प्रभु भ्रम त्यागी। ग्यान रंक नर मंद अभागी।।
पुनि सादर बोले मुनि नारद। सुनहु राम बिग्यान बिसारद।।
व्याख्या : ऐसे परम कृपालु परमात्मा को जो लोग नहीं भजते हैं, वे मनुष्य ज्ञान हीन, दुर्बुद्धि और अभागे होते हैं। फिर मन का नारद भाव आदरपूर्वक बोला कि हे आत्मा रूपी राम! आप तो विज्ञान विशारद हैं। सुनिए --।
संतन्ह के लच्छन रघुबीरा। कहहु नाथ भव भंजन भीरा।।
सुनु मुनि संतन्ह के गुन कहऊँ। जिन्ह ते मैं उन्ह कें बस रहऊँ।।
व्याख्या : ध्यान की अवस्था में मन के नारद भाव को बहुत सी अनुभूतियाँ होती हैं। उसी अवस्था में संत-असंत के भेद का मर्म समझ में आ जाता है। उसी आत्म संवाद को यहाँ प्रतीकों का सहारा लेकर लिखा गया है। मन का नारद भाव आत्मा रूपी राम से कहता है कि हे आत्मा रूपी राम! आप भावों के भय का नाश करने वाले हैं। अत: मुझे संतों के लक्षणों को समझा कर कहिए। तब आत्मा प्रेरणा करके मन के नारद भाव को समझाते हुई कहती हैं कि हे मुनि! तुम संतों के गुण सुनो, जिनके कारण मैं आत्मा सन्त जनों के वश में हो जाती हूँ।
षट बिकार जित अनघ अकामा। अचल अकिंचन सुचि सुखधामा।।
अमित बोध अनीह मितभोगी। सत्यसार कबि कोबिद जोगी।।
व्याख्या : संत छ: विकारों (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर) को जीत कर पाप रहित अर्थात् चिन्ता मुक्त व निष्काम रहता है। वह स्थिर बुद्धि, सर्वत्यागी, पवित्र व सहज सुख का घर होता है। वह असीम ज्ञानवान, इच्छा रहित, मिताहारी, सत्यनिष्ठ, कवि, विद्वान व योगी होता है।
सावधान मानद मदहीना। धीर धर्म गति परम प्रबीना।।
व्याख्या : वह विषयों से सावधान, दूसरों को मान देने वाला, मद से रहित, धैर्यवान व धारणा की गति में चतुर होता है अर्थात् दया, करुणा, क्षमा, मैत्री आदि भावों को धारण करने में कुशल होता है।
दो0 गुनागार संसार दुख रहित बिगत संदेह।
तजि मम चरन सरोज प्रिय तिन्ह कहुँ देह न गेह।।45।।
व्याख्या : संत समस्त गुणों का घर और सांसारिक दु:खों से रहित व संशय हीन होता है। उसे मुझ आत्मा के चरण कमलों के समान प्रिय अपना शरीर व घर भी नहीं होता है।
निज गुन श्रवन सुनत सकुचाहीं। पर गुन सुनत अधिक हरषाहीं।।
सम सीतल नहिं त्यागहिं नीति। सरल सुभाउ सबहि सन प्रीती।।
व्याख्या : जो संत होगा वह अपनी प्रशंसा सुनकर संकोच करता है और दूसरों की प्रशंसा सुनकर हर्षित होता रहता है। वह सदा शांत स्वभाव वाला होता है तथा कभी भी परमात्मा पर विश्वास की नीति का त्याग नहीं करता है। उसका स्वभाव सरल होता है तथा सबसे प्रेम करता है।
जप तप ब्रत दम संजम नेमा। गु डिग्री गोबिंद बिप्र पद प्रेमा।।
श्रद्धा छमा मयत्री दाया। मुदिता मम पद प्रीति अमाया।।
व्याख्या : वे जप, तप, व्रत, दम, संयम व नियम का पालन करते हैं और गुरु, गोविन्द अर्थात् गो अ विन्द जो इन्द्रियों को जीतने वाले हैं और विप्र अर्थात विशुद्ध ज्ञान से प्रकाशित लोगों के चरणों में प्रेम रखते हैं। संतों में श्रद्धा, क्षमा, मैत्री व दया के लक्षण होते हैं। वे प्रसन्न चित होकर निष्काम भाव से मुझ परमात्मा के चरणों में प्रेम रखते हैं।
बिरति बिबेक बिनय बिग्याना। बोध जथारथ बेद पुराना।।
दंभ मान मद करहिं न काऊ। भूलि न देहिं कुमारग पाऊ।।
व्याख्या : उन्हें वैराग्य, विवेक, विनय, विज्ञान, वेद व पुराणों का अनुभूत ज्ञान रहता है। वे दम्भ और मान नहीं करते हैं तथा भूल करके भी वासनाओं के मार्ग पर नहीं चलते हैं।
गावहिं सुनहिं सदा मम लीला। हेतु रहित परहित रत सीला।।
मुनि सुनु साधुन्ह के गुन जेते। कहि न सकहिं सारद श्रुति तेते।।
व्याख्या : वे सदैव मुझ परमात्मा की लीलाओं को अनुभव करते रहते हैं तथा स्वार्थ से रहित परोपकार में लगे रहते हैं। हे मन के नारद भाव रूपी मुनि! संतों के लक्षणों को पूर्ण रूप से तो सरस्वती व वेद भी नहीं कह सकते हैं।
छ0 कहि सक न सारद सेष नारद सुनत पद पंकज गहे।
अस दीनबंधु कृपाल अपने भगत गुन निज मुख कहे।।
सिरु नाइ बारहिं बार चरनन्हि ब्रह्मपुर नारद गए।
ते धन्य तुलसीदास आस बिहाइ जे हरि रंग रँए।।
व्याख्या : संतों के सब लक्षणों को तो शेष व सरस्वती भी नही कह सकते हैं, ऐसा सुनते ही मन का नारद भाव चरणों में गिर पड़ा अर्थात् पूर्ण रूप से समर्पण कर दिया। दीनबंधु कृपालु परमात्मा ने अपने मुख से अपने भक्तों के गुणों का बखान किया। अर्थात् आत्म प्रेरणा से संतों के लक्षण नारद भाव को आत्मसात हो गए। तब बार-बार परमात्मा के प्रति समर्पण करते हुए मन का नारद भाव ब्रह्मपुर अर्थात ब्रह्म के चिंतन में ही लग गया। इसलिए ऐसे साधक धन्य हैं, जो समस्त आशाओं का त्याग करके परमात्मा के रंग में रंग जाते हैं।
दो0 रावनारि जसु पावन गावहिं सुनहिं जे लोग।
राम भगति दृढ़ पावहिं बिनु बिराग जप जोग।।46(क)।।
व्याख्या : जो काम के शत्रु परमात्मा के पवित्र गुणों को सुनते व कहते हैं, वे लोग बिना वैराग्य, जप व योग साधना के ही परमात्मा की दृढ़ भक्ति प्राप्त कर लेते हैं।
दो0 दीप सिखा सम जुबति तन मन जनि होसि पतंग।
भजहि राम तजि काम मद करहि सदा सतसंग।।46(ख)।।
व्याख्या : युवती वासनाओं का शरीर दीप शिखा के समान होता है। अत: हे मन! तू पतंगा बनकर वासनाओं की लौ में मत गिर। तू तो काम व मदादि को छोड़कर निरन्तर परमात्मा का भजन कर और सदा सत्संग कर।
।। मास पारायण, बाईसवाँ विश्राम।।
।। इति श्रीमद्रामचरित मानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने तृतीय: सोपान: समाप्त:।।