हे जीव
सुन रे जीव तुझे समझाऊँ ।
मैं हूँ जल तू है लहर मेरी
तुझे पल भर भी नहीं मैं छोड़ पाऊँ ॥
सुन रे ...........................
बिनु वाणी सदा बोलता मैं
तेरे अन्तरमन से बतराऊँ ॥
पर तू ऐसा उलझा जग में
वाणी तुझे कैसे सुनवाऊँ ॥
सुन रे ...........................
मेरे पद से तू चलता सदा
पर माया का बोझ लिए तू कैसे तुझे चलवाऊँ ॥
सुन रे ...........................
मेरे कर से कर्म करता तू सारे
पर नहीं करता मेरे लिए जग हेतु कैसे करवाऊँ ॥
सुन रे ...........................
मेरे तन से तू स्पर्श करता सब
पर भोग में रमा तू कैसे मुक्त करवाऊँ ॥
सुन रे ...........................
मेरे मुख से तू खाता सब कुछ
मुझे तू नहीं खिलाए तो कैसे खा पाऊँ ॥
सुन रे ...........................
मेरी आखों से तू देखे जग को
मुझे देखत नहीं तो कैसे मैं दिख पाऊँ ॥
कहत हरि सुन रे लक्ष्मी
घट अन्दर खोज तुझे मिल जाऊँ ॥
‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके।
Satyavani Bhajan, Awadhoot Laxminarayan, Awadhoot Devidas Maharaj, Manav Dharma Shastra,