शरणागति
जोग न जानउँ जग्य न जानउँ
जानउँ नहीं जप तप कृपाला ।
तेरी कृपा बस मैं अब चाउँ
दया कर प्रभु करो मोहि निहाला ॥
जोग न जानउ ...........................
तामस है प्रभु तन मेरा
जानउँ नहीं भगति रसाला ॥
जोग न जानउ ...........................
कंचन कामिनि इच्छा सताती
अब प्रभु तू ही मेरा रखवाला ॥
जोग न जानउ ...........................
तेरे नाम रुप में बुद्धि भरमाती
अब प्रभु तूही राह दिखाने वाला ॥
जोग न जानउ ...........................
भल मन्द का जग जाल पड़ा
तूही इस जाल से मुक्त कराने वाला ॥
जोग न जानउ ...........................
कहत लक्ष्मी सुनो रे सतगुरु
आऊँ शरण में तेरी तू ही शरण देने वाला ॥
जोग न जानउ ...........................
‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके।
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