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Lyrics

विनय पद (Vinay Pad)

Satyavani Bhajan (Part-1)
विनय पद तू प्रभु दयाल बहु कृपाल सदा मोर हितकारी । हियँ न संतोषा मोरहि दोषा तुम सब जानहि असुरारी ॥ तू सुख दाता भव अति त्राता तबहउ तोहि नहिं ध्यावउँ । पितु माता तुम्हीं ताता अब तोहि छाड़ि कहाँ मैं शरण जावउँ ॥ तू ही कर्ता तू ही भर्ता तउ सदा अकर्ता कहावहि । सृष्टि तुम्हारी त्रिगुणमय सारी समझई जेहि तुम समझावहि ॥ तू निराला जग रखवाला तोर समान अरु नहि जग कोई । मिटहिं अग्याना बनहि सुजाना जब जब कृपा तोरी होई ॥ जप तप संयम नियम कठिन बहु कोह सकै साधहि । जेहि अनुरागी अति बड़भागी बिनु प्रयास सहज तुमइ पावहिं ॥ बिरती बिराग राग कुरागा ग्यानी जन बहु भांति उरझावहिं । जेहि जानउ ताइ मानउ हम सरल हियं शरण तुमार आवहिं ॥ ना जानहिं काह मानहि अगम अगोचर सुनि सुनि भरमाहि । स्वार्थ लागी लगन अब जागी तोहि मिलन हेतु मन मचलाहि ॥ अब तू ही बताई काह उपाई जाते दर्शन तुम्हार हम पाहि । मन अभिमानी करहि नादानी क्षमा करहउ प्रभु कृपा तुमार चाहि ‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके। Satyavani Bhajan, Awadhoot Laxminarayan, Awadhoot Devidas Maharaj, Manav Dharma Shastra,
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