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Lyrics

हे पुत्र (He Putra)

Satyavani Bhajan (Part-1)
हे पुत्र हे पुत्र मैंने तो सृष्टि आनन्द के लिए ही बनाई है। गम तो मेरी माया रुपी परछाई है॥ जो विरोधाभास तुझको दिखाई देता है। वो तो तुम्हारे मन का विरोधाभास है। मैं तो सदा आनन्द ही देखना चाहता हूँ॥ पर इन्सान की करतूतों में आनन्द कहाँ। मैं चाहता हूँ कि आनन्द की भाव धारा हो। सहयोग और सोहार्द्र की हवा वहे। बन्धुत्व और भ्रातृत्व के धागे में सब पिरोए हों मैं तो यहाँ तक राजी हूँ कि मैं सबके साथ रहूँ परन्तु संसार में मुझे रखने वाला कोई मिलता ही नहीं मैंने तो सबको सदा ही अपनाया है परन्तु जगत की चाह ने मुझे पराया बना दिया। मैं तो सदा ही तैयार हूँ बुलाने पर आने को बस कोई सच्चे दिल से बुलाए तो सही। रक्त की नदी मैं देखना नहीं चाहता मुझे घृणा, कटुता द्वेष की दुर्गन्ध बुरी लगती है इसलिए मैं उदास होकर बैठा रहता हूँ। मैं मानता हूँ मेरी क्षमता है आनन्द बहाने की परन्तु मेरा बहवाया हुआ आनन्द तो द्वेष की अग्नि में जल जाता है। मैं सहयोग सौहार्द्र की प्रेरणा करता हूँ परन्तु मेरी प्रेरणा तो तेरी माया के प्रवाह में बह जाती है। मैंने तो तुझे ही मेरा कर्ता बना कर भेजा है पर जब तू मेरी सुनता ही नहीं है तो आनन्द कौन पैदा करेगा। मैं कभी असत्य बोलता नहीं हूँ इसलिए कहता हूँ तू मुझे बुला मैं चला आऊँगा॥ परन्तु मुझे दया, दान के पुष्प चाहिये मुझे वैराग्य का आसन चाहिये मेरा विस्तार सात्विक बुद्धि का हो। मेरा भोजन सत वृति का हो तथा पीने का जल साम्यता का रस हो। मुझे संतोष के पंखे से हवा करना मेरा भोजन ज्ञान की थाली में परोसना मैं सत्य बता रहा हूँ दौड़ कर आ जाऊँगा॥ तू वत्स तेरे अन्तरमन से बात करके देख मैंने हमेशा तुझे समझाने का ही प्रयास किया है जब जब तू मुझे पुकारा मैं सब समय आया। पर तू विचार कर देख तूने हमेशा चाहा क्या? तू तो हमेशा माया का विस्तार करता रहता है। माया के विस्तार में मुझे भूल जाता है। जब विपद आती है तुझ पर तभी तो मुझे पुकारता है। मैं फिर भी आता हूँ तेरे बुलाने पर मैं सदा तेरे पास रहना चाहता हूँ बस तू मुझे रखने का प्रयास तो कर। मैं तेरी हर इच्छा पूरी करूँगा तू निष्काम हो कर तो देख। हे वत्स तू माया का प्रवाह तो कम कर जिससे मैं तेरे हृदय में प्रवेश कर सकूँ। तू प्राण का अध्ययन कर देखना माया का प्रवाह थम सा जायेगा। जब माया सुस्ताएगी तब मैं तुरन्त तेरे हृदय रुपी घर में प्रवेश कर जाऊँगा। तेरे पास आकर फिर मैं कामादि नागों का नाश कर दूँगा। मैं तेरे हृदय में आनन्द की धारा प्रवाहित कर दूँगा जिससे सुख दुःख रुपी नदियाँ भी अपना अस्तित्व खो देंगीं। अतः वत्स तू जल्दी कर अपनी श्वास को निहार। मैं अभी आता हूँ तू मुझे अभी पुकार॥ तू निडर निर्भय रह मैं तेरे साथ हूँ। पर तू बुला मैं हर पल तैयार हूँ॥ मेरी कृपा तेरे साथ है तू निर्भय हो मेरा आशीर्वाद है। तेरा परम पिता अलख निरंजन। ‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके। Satyavani Bhajan, Awadhoot Laxminarayan, Awadhoot Devidas Maharaj, Manav Dharma Shastra,
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