हे प्रभु
हे प्रभु तेरी सृष्टि को देखकर
कभी आनन्द तो कभी गम छा जाता है ।
पता नहीं यह विरोधाभास क्या है ?
यह मेरे मन का दोष या फिर तेरी सृष्टि का ।
जब निहारता हूँ स्वच्छन्द आकाश को
तो अनन्त आनन्द में चला जाता हूँ ।
पर जब कभी इन्सान को देखता हूँ
तो मैं द्वन्द में पड़ कर सोचता हूँ ।
एक तरफ को सुन्दर सौम्य प्राकृतिक व्यवस्था
दूसरी तरफ राग द्वेष की जलती ज्वाला ॥
कभी कभी तो लगता है पशु पक्षी ही बेहतर हैं
सब दोष भले हों पर कम से कम संग्रह तो नहीं है ।
हे प्रभु आपकी सृष्टि का आनन्द
क्यों नहीं सबको प्राप्त समान होता ॥
यह प्रश्न मेरे दिमाग में हमेशा कोंधता है
क्यों नहीं प्रभु हम सबको तेरा आभास है ।
मैं जानता हूँ तेरी इच्छा के बिना पत्ता नहीं हिलता है
यह सब कुछ होने पर भी क्यों आप उदास हैं ।
आप सबसे जुड़े हुए हैं पर फिर क्यों छुपे हुए हो
क्या असुविधा है आपको प्रकट करने में ।
आपकी ही विधि आपका ही विधान है
आपतो स्वतन्त्र है फिर क्यों गुलामी का भान है ।
हे परम पिता मेरे इन अनसुलझे प्रश्नों का क्या उत्तर है ।
आप खुल कर क्यों नहीं बताते हैं हम तो आपकी ही सन्तान है।
जब प्रकृति में आनन्द छाता है तो
लगता है हर द्रुम लता खुशी में झूम उठती है।
आपकी प्रसन्नता को देखकर हवा भी मतवाली हो जाती है।
मन्द मन्द सुगन्ध वातावरण में संचारित हो उठती है।
तब लगता है आपकी सृष्टि कितनी सुन्दर है।
पशु पक्षियों का कलरव नदियों की उमंग
बहते हुए झरनों का संगीत जब बज उठता है।
तो ऐसा लगता है आप स्वयं झूम रहे हैं।
परन्तु जब हिंसा का ताण्डव होता है
घृणा, प्रतिस्पर्धा व रक्तपात का जब प्रभाव होता है
तो मानव को आपके अस्तित्व पर ही संदेह हो जाता है।
ऐसा नहीं है कि उस समय आप नहीं होते हैं
आप होते हैं परन्तु क्यों मौन हो जाते हो।
जब क्रोध की ज्वाला उठती है
जब लोभ वासना के नाग फुफकारते हैं तो
क्यों आप चुप होकर तिरोहित हो जाते हैं।
जब आपने दया दान परोपकार के फूल लगाए हैं
तो फिर क्यों काम क्रोध मद लोभ के नाग पैदा कर दिए।
मुझे पूर्ण विश्वास है आपके लिए सब सम्भव है
फिर क्यों आप अभी भी तिरोहित होकर बैठे हैं।
मैंने सुना है आप भक्तों की परीक्षा लेते हैं।
परीक्षा तो हमेशा कष्टकारी होती है।
परीक्षा के कष्ट को देख कर ही तो जीव आपसे दूर हो जाते हैं
अतः मेरा अनुरोध है परीक्षा लेना बन्द कर दो।
आप भक्तों को मन चाही चीज देना शुरू करो
रात दिन वे आपको छोड़ कर कहीं जायेंगे ही नहीं।
आपकी कृपा के माध्यम से सब कुछ देना परीक्षा के माध्यम से नहीं।
हे प्रभु यह सृष्टि आपकी ही है तो फिर क्यों
विरोधाभास का इतना बड़ा ताण्डव हो रहा है।
हे पिता आप ही मेरी शंका का समाधान कर सकते हैं।
आपके अलावा आप की सृष्टि में कोई हस्तक्षेप कर नहीं सकता।
मैं चाहता हूँ कि आपकी सृष्टि में आनन्द की बाहर आ जाए।
काम क्रोधादि के समस्त नाग सृष्टि से मिट जाएँ।
चारों तरफ भ्रातृत्व की धारा बह उठे।
सहयोग, सम्प्रीति के झरनों का संगीत बज उठे।
मेरी इच्छा है कि मानव मानवता के आदर्श का रास्ता पकड़ ले।
दुःख केवल अतीत की बातें हो जाए।
सुख की धारा ऐसी प्रस्फुटित हो कि सुख का महत्व ही नहीं रहे।
हे परम पिता मुझे विश्वास है आप ही हैं जो सब कुछ कर सकते हैं।
आप ही हैं जो बालू में तेल पैदा कर दें।
आप ही हैं प्रभु जो सोने में सुगन्ध ला दें।
आप ही तो हैं प्रभु जो सृष्टि की गति बदल सकते हैं तो फिर
मेरी यह सहयोग भ्रातृत्व, आनन्द की छोटी सी इच्छा पूर्ण कर दें।
मैं इन्तजार करूँगा प्रभु आपके जबाब का।
आपका आभारी
लक्ष्मी नारायण (आप का पुत्र)
‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके।
Satyavani Bhajan, Awadhoot Laxminarayan, Awadhoot Devidas Maharaj, Manav Dharma Shastra,