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Lyrics

जग अन्धा (Jag Andha)

Satyavani Bhajan (Part-1)
जग अन्धा यह जग है सारा अन्धा अन्धा है सब इसका धन्धा । वट वासना लगाकर हरि को भूल गया बन्दा । यह जग है.............l मिष्टि मिष्टि क्या बोलत मन भीतर है भाव गन्दा । यह जग है.............l पर प्रशंसा सुनि जुरि चढ़त मजा पाय सुनि पर निंदा । यह जग है.............l हरि नाम से धन कमाए झूठ बोल लेवत चन्दा । यह जग है.............l मन्दिर-मस्जिद चर्च बनाए बिरथा गल डाल लिया फन्दा । यह जग है.............l सतगुरु बनि दुकान चलाए खा माल पराया बना बैठा सण्डा । यह जग है.............l कहत लक्ष्मी सुनो रे बन्धु बिनु हरि भजन नहीं कोई आनन्दा ॥ यह जग है सारा अन्धा........ll ‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके। Satyavani Bhajan, Awadhoot Laxminarayan, Awadhoot Devidas Maharaj, Manav Dharma Shastra, Satyavani Sangit Mahotsav,
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