गुरु तुम बिनु कौन पार लगावै रे
गुरु तुम बिनु कौन पार लगावै रे ।
पल पल मोहे तोरी याद सताए रे ।
यह जग है बिराना स्वार्थ के रिश्ते नाते रे ।
काम क्रोध का उबाल उठे ये सब तरनी ते ताते रे ॥
गुरु तुम बिनु कौन धीर बधाँवे ये जग दुख सागर रे ।
तेरे चरणों में जगह देदे मुझको तू कृपा का आगर रे ।
मान अपमान की अनल जले तू ही निभावन हारा रे ।
जब जब याद करूँ मैं तुझको मिले दिल को सहारा रे ।
अवगुण मेरे माफ करो मैं हूँ दास तुम्हारा रे ।
कर पकड़ो अब मेरा दयानिधि करो मोर उधारा रे ॥
‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके।
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