जपा - अजपा
जब तक चाह है मन में
तब तक चले जप तन में ॥
जब मिटे जाए चाह मन में
तब नहिं रहे भेद तन मन में ॥
विगत इच्छा सुरता हरि चरणन में
तब भेद मिटे अंशी का पल में ॥
होइ अभिन्न तब काह जपे मन में
तबहि सहज होत अजपा तन में ॥
श्वास डोर से बंधे हरि चरणन में
सोइ कहावे जपा अजपा जग में ॥
कहत लक्ष्मी सुनो रे बन्धु
लगा के सुरता पालो मुक्ति पल में ॥
‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके।
Satyavani Bhajan, Awadhoot Laxminarayan, Awadhoot Devidas Maharaj, Manav Dharma Shastra,