हे परमपिता
हे परम पिता मेरे मन में
भ्रम पड़ गया ।
विषय-वासना में मैं उलझ गया ॥
हे परम पिता ............................
तू है एक रस प्रभु
मैं पर तुझे ढूँढ नहीं पाया ॥
हे परम पिता ............................
मन की इच्छा हेतु तुझे याद किया
इच्छा पूर्ण ही तुझे मान लिया ॥
हे परम पिता ............................
जब जब हुआ असफल
दोष तेरे ऊपर ही मंड दिया ॥
हे परम पिता ............................
स्वार्थ हेतु मैं क्रिया करता
बस उसी को कर्म मान लिया ॥
हे परम पिता ............................
तेरा भेद मैं नहीं जान सका
असली कर्म भूल गया ॥
हे परम पिता ............................
मेरा हुआ जब स्वार्थ पूरा
बस उसी को पुण्य मान लिया ॥
हे परम पिता ............................
परहित का मरम न समझा
बस स्वार्थ में ही उलझ गया ॥
हे परम पिता ............................
दया दान किया स्वार्थ हेतु
भ्रम वश परमारथ मान लिया ॥
हे परम पिता ............................
आत्मा है प्रकृति से पर
मैं पर का परमारथ भूल गया ॥
हे परम पिता ............................
जब जब बुद्धि दौड़ी मेरी
मैं तुझसे दूर चला गया ॥
हे परम पिता ............................
जब जब किया समर्पण मैंने
मुझे लगा तेरे पास आ गया ॥
हे परम पिता ............................
क्षमा करो अब प्रभु मुझको
अब मैं शरण में तेरी आ गया ॥
हे परम पिता ............................
‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके।
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