हे प्रभु
हे प्रभु तेरा भेद बतादे
मैं तेरी शरण में आया ।
हे प्रभु ............................ ।
मन बुद्धि सब हार थके हैं
पर मैं तुझे समझ नहीं पाया ।
हे प्रभु ............................ ।
जहाँ जहाँ कल्पना करी मैंने
वहाँ तूने प्रभु रुप बदल लिया ।
हे प्रभु ............................ ।
कल्पना का ऐसा जाल पड़ा
प्रभु मैं बिरथा भरमा गया ।
हे प्रभु ............................ ।
कभी मैंने मस्जिद में खोजा
कभी मैंने मंदिर में मान लिया ।
हे प्रभु ............................ ।
कभी मैंने घट-घट में माना
कभी गुण गोतीत बोल दिया ।
हे प्रभु ............................ ।
कभी प्राण से जोड़ा तुझको
कभी मैंने मूरत रुप बना लिया ।
हे प्रभु ............................ ।
गृहस्थ में कभी विरक्त में लगे
मैंने ऐसा भ्रम का फंदा डाल लिया ।
हे प्रभु ............................ ।
कहाँ कैसे समझूँ तुझ को प्रभु
तू ही बता मैंने समरप किया ।
हे प्रभु ............................ ।
‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके।
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