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Lyrics

हरि उवाच (Hari Uvach)

Satyavani Bhajan (Part-1)
हरि उवाच बिरथा दोष लगाए मोहि मैं नहिं माया पैदा करी । सुन रे जीव बताऊँ खरी खरी । निरविकार मैंने तुझे बनाया तू ने ही माया से यारी करी ॥ सुन रे जीव ............................ चित का तूने पेड़ बढ़ाया तहाँ माया की फली लगी ॥ सुन रे जीव ............................ माया पे तू ऐसा रीझा काम क्रोध की लग गई झरी ॥ सुन रे जीव ............................ तन मन तेरा भटक गया माया ने अब इच्छा पैदा करी । सुन रे जीव ............................ भाव का भव सागर बना लिया जीव तूने ही मुझसे दूरी करी ॥ सुन रे जीव ............................ बैठा मैं तेरी बाट निहारूँ पर तू भूल गया मुझे हर घरी ॥ सुन रे जीव ............................ माया देवे जब कष्ट तुझको तब तू पुकारे हरि हरि सुन रे जीव ............................ फिर भी सुनता मैं तेरी कबहूँ नहीं मैंने देर करी ॥ सुन रे जीव ............................ कहत हरि सुन रे लक्ष्मी शरण मेरी माया जीतन जुगत की ॥ सुन रे जीव बताऊँ खरी खरी । ‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके। Satyavani Bhajan, Awadhoot Laxminarayan, Awadhoot Devidas Maharaj, Manav Dharma Shastra,
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