Loading...

Lyrics

हे हरि (He Hari)

Satyavani Bhajan (Part-1)
हे हरि हे हरि तूने क्यों माया पैदा करी । इस माया का खेल निराला इसने ही तूझसे दूरी करी । हे हरि ............................ । काम क्रोध मद लोभ सब भये है माया परिवारी ॥ हे हरि ............................ । भावी है घर माया का नित रहत यह यौवन भरी । हे हरि ............................ । नित रुप नाना बदले सन्तों पर भी भारी परी । हे हरि ............................ । मन को यह गुलाम बनाए दास दासी सब इच्छा करी । हे हरि ............................ । कहत लक्ष्मी सुन रे हरि माया जीतन काह जुगत करी । हे हरि ............................ । ‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके। Satyavani Bhajan, Awadhoot Laxminarayan, Awadhoot Devidas Maharaj, Manav Dharma Shastra,
Special Thanks and credits to HTML Codex