जीव नहीं रहा इन्सान
अरे गजब हुआ जग में
जीव नहीं रहा इन्सान ।
कहीं हिन्दू बना फिरता
कहीं कहता मैं मुसलमान ॥
अरे गजब ............................
कभी बनता सिक्ख ईसाई
जीव तू निकला नादान ॥
अरे गजब ............................
एक ब्रह्म से पैदा होते
तबहु समझे नहीं अज्ञान ॥
अरे गजब ............................
एक राह आता-जाता
तब काह हिन्दू-मुसलमान ॥
अरे गजब ............................
अस्थि मांस रूधीर सबका
सदा मिलेगा एक समान ॥
अरे गजब ............................
हाड़ मांस का पुतला बना
बिरथा करे जग अभिमान ॥
अरे गजब ............................
कहीं मन्दिर बनाए मस्जिद बनाए
जबकि एक खुदा एक ही भगवान ॥
अरे गजब ............................
कहीं झालर बजाए कहीं बांग लगाए
पर निज घट ढूँढ़त नहीं जहान ॥
अरे गजब ............................
कहत लक्ष्मी सुनो रे बन्धु
निज हियँ देखो करके ग्यान ॥
अरे गजब ............................
‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके।
Satyavani Bhajan, Awadhoot Laxminarayan, Awadhoot Devidas Maharaj, Manav Dharma Shastra,