गुरु गुरु करता गुरु मिटै गुरु बच जाए
गुरु गुरु करता गुरु मिटै गुरु बच जाय ।
गुरु बचै आनन्द बरसै सहजहि बूँद समुद्र समाय ॥
गुरु में हो लीन बन्दे तेरी गुरुता बढ़ जाएगी ।
आवागमन का भ्रम मिटै लख चौरासी कट जाएगी ॥
चार पदारथ करतल होवें भूख तेरी सब भग जायेगी ।
काम क्रोध का तहाँ बस न चलै निर्भयता आ जायेगी ॥
ऋद्धि सिद्धि सेवा करेंगी सुख शांति घर में छा जायेगी ।
अमरता का ज्ञान हृदय प्रगटावै मोह निसा सब मिट जायेगी ॥
कहत लक्ष्मी सुनो रे बन्धु हो लीन गुरु की सत्ता मिल जायेगी ॥
‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके।
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