स्वाधीन
मन हो तू स्वाधीन
परम सुख पायेगा ।
पराधीन कहाँ है सुख
बिरथा जन्म खो जायेगा ॥
मन हो ............................
प्रात: उठि सपन संजोए
रात देखा खाली हाथ पायेगा ।
मन हो ............................
उठता बैठता तू सोता जागता
पर चिन्ता करे बंध कैसे कट पायेगा ।
मन हो ............................
तू सोच जरा क्या संग लाया
क्या संग तेरे जायेगा ।
मन हो ............................
क्या कहेगें लोग सोचे तू
दु:खी मन तेरा हो जायेगा ।
मन हो ............................
पराधीन होगा अगर तू
पर इच्छा में उलझ जायेगा ।
मन हो ............................
संग्रह करेगा पर लोग दिखाने
तो सुख कैसे भोग पायेगा ।
मन हो ............................
पराधीन तू तड़पे अगर
कैसे निष्काम रह पायेगा ।
मन हो ............................
दूसर हेतु करे दिखावा
कैसे मन शान्त रह पायेगा ।
मन हो ............................
मन गुरु मुखी होगा जब तू
तभी स्वाधीन कहलायेगा ।
मन हो ............................
कहत लक्ष्मी सुनो रे बन्धु
हो वो स्वाधीन आनन्द छा जायेगा ।
मन हो ............................
‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके।
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