जगत व्यवहार
मत दु:खी हो जीव
देखि जगत व्यवहार ।
अपना-पराया भ्रम पड़ा है
मोह के कारण जीव लाचार ।
मत दु:खी हो ............................
झूठे नाते झूठे रिश्ते
झूठा जगत आचार ।
मत दु:खी हो ............................
कोई मीठा बोले कोई कड़वा
सबका स्वार्थ आधार ।
मत दु:खी हो ............................
कोई दया दान करे
कोई करे पर उपकार ।
मत दु:खी हो ............................
कोई चोरी डकैती करे
कोई करे अत्याचार ।
मत दु:खी हो ............................
सब अपना राग अलापें
गजब है ये संसार ।
मत दु:खी हो ............................
कोई आतंकी कोई पाखण्डी
कोई करत भ्रष्ट आचार ।
मत दु:खी हो ............................
कोई नीति बखाने नाना
कोई दम्भ भरे मैं ईमानदार ।
मत दु:खी हो ............................
कोई सच्चा कोई झूठा फरेबी
कोई विनीत कोई अकड़दार ।
मत दु:खी हो ............................
कोई साधक कोई बाधक
कोई कर्मठ कोई बेकार ।
मत दु:खी हो ............................
कोई मालिक कोई सेवक
कोई कर्तव्य पाले कोई मांगे अधिकार ।
मत दु:खी हो ............................
कोई गृहस्थी कोई विरक्ति
कोई दानी कोई संग्रही अपार ।
मत दु:खी हो ............................
कोई वक्ता कोई श्रोता
कोई है ज्ञानी कोई भया लबार ।
मत दु:खी हो ............................
कोई धर्म करे कोई भगति करे
कोई हरि नाम का करे व्यापार ।
मत दु:खी हो ............................
कहत लक्ष्मी सुनो रे बन्धु
समता भाव रखो सदा इकसार ।
मत दु:खी हो ............................
‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके।
Satyavani Bhajan, Awadhoot Laxminarayan, Awadhoot Devidas Maharaj, Manav Dharma Shastra,