मानव धर्म शास्त्र (Manav Dharma Shastra) एक सनातन धर्म ग्रन्थ है, जिसकी रचना सतगुरु Awadhoot Devidas Maharaj की दिव्य कृपा से गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी (Laxminarayan Meena, IPS) ने की है। यह ग्रन्थ प्रथम बार 2013 में हिन्दी में, 2022 में अंग्रेज़ी में तथा 2023 में बांग्ला में प्रकाशित हुआ (प्रकाशक: Kirti Publication; ISBN: 978-81-965006-1-0)
ॐ गुरुदेवाय नमः
ॐ परमात्मने नमः
तृतीय स्कन्ध
ॐ नामरूपं उपाधि धारकं जगत रूपं च जगतेश्वरम् ।
अस्ति नास्ति पारम् जगताधारम् अहम् त्वमेव शरणम् ॥ १ ॥
व्याख्या - हे परमपिता ! आप नाम व रूप को उपाधि के रूप में धारण करने वाले हैं तथा जगत के रूप में आप ही हैं तथा आप ही जगत के ईश्वर हैं । आप हैं और नहीं हैं, की सीमा से परे हैं । हे प्रभु! आप जगत के आधार हैं । मैं आपकी शरण में हूँ ।
भल मन्दः पारम् निर्विकारम् त्वम् सर्वरूपम् न संशयम् ।
न केवलम् शरणागत रक्षकम् त्वम् सर्वरक्षकम् इदम् सत्यम् ॥ २ ॥
व्याख्या - हे परमपिता ! आप अच्छे-बुरे से परे, निर्विकार व सब रूपों में हैं। इसमें संदेह नहीं है। हे प्रभु ! आप केवल शरण में आनेवाले की ही रक्षा नहीं करते हैं, बल्कि आप तो सबके रक्षक हैं। यह सत्य है ।
दो०- तुम्हे सब प्रेरक दीनबन्धु करुणायतन सहज दयाल ।
सब तजि शरण तिहारी प्रभु करहु कृपा जग प्रति पाल ॥ १ ॥
व्याख्या - हे परमपिता ! आप सबके हृदय में प्रेरणा करनेवाले, दीन बन्धु, करुणा के धाम तथा सहज में दया करनेवाले हैं । हे परमपिता! मैं सब छोड़ कर आपकी शरण में हूँ । हे जग के पालनकर्ता ! आप अनुकंपा करें ।
सुनहु नाथ अब विनति मोरी । जानत चहऊँ मरम में तोरी ॥
मति मम भोरी चाहत विशाला । हिय जनाउ जानि दास दयाला ॥
व्याख्या - हे परमपिता ! मेरी प्रार्थना सुनिए । हे प्रभु ! आपका वास्तविक रहस्य जानना चाहता हूँ । मेरी चाहत तो बहुत बड़ी है । परन्तु मेरी बुद्धि तो भोली है । अतः हे दयालु ! मुझे आपका दास समझ कर मेरे हृदय में आपका रहस्य समझा दीजिए ।
बिनु जानई होई न विश्वासा । बिनु विश्वास न तोर सुपासा ॥
सपनेउ सुख नाहिं बिनु तोरे । इहँ दृढ़ मत प्रभु मन मोरे ॥
व्याख्या - हे परमपिता ! आपको जाने बिना आपका विश्वास नहीं होता है तथा बिना विश्वास के आप मिलते नहीं हैं तथा आपके बिना तो सपने में भी सुख नहीं मिलता है । यह मेरा दृढ़ मत है ।
सो दयाल कृपा अब करहऊ । निज रूप जथारत प्रेरहऊ ॥
तुम्हीं करउ ग्यान उजियारा । देवहउ दृष्टि दिव्य अपारा ॥
व्याख्या - हे दयालु! आप अनुकंपा करके मेरे हृदय मे आपके यथार्थ रूप की प्रेरणा कर दीजिए और आप ही ज्ञान का प्रकाश कर दीजिए तथा दिव्य दृष्टि प्रदान कर दीजिए।
नाम रूप काह मरम सुहाई । हेतु केहि माया जग उपजाई ॥
काह घाम काह तुम्हार स्थाना । सब कहऊ समझाई भगवाना ॥
व्याख्या - हे परमपिता ! आपके नाम और रूप का क्या रहस्य है तथा संसार में माया किस कारण पैदा की है ? आपका वास्तविक घर कहाँ है तथा आपका रहने का स्थान कहाँ है ? ये सब मुझे समझा कर कहिए।
दो०- सुनु सुत तू प्रिय मोहि अति मरम न रखहूँ लुकाई ।
निज घट तोहि समझावूँ तू समझ मन बुद्धि चित्त लाई ॥ २ ॥
व्याख्या - हे वत्स ! तू मुझे बहुत प्रिय है, इसलिए तुझसे कुछ भी छिपा कर नहीं रखूँगा । अब मैं तुझे तेरे हृदय में ही समझा कर कहूँगा । इसलिए मन और बुद्धि को चित्त में समाहित करके समझने का प्रयास कर।
नाम अरु रूप उभय संकेता । सज्जन हिय सो मोर निकेता ॥
करि विश्वास सत्य बताऊँ । नाम रूप मरम हिय समझाऊँ ॥
व्याख्या - नाम और रूप दोनों मेरे लिए संकेत मात्र हैं । सज्जन लोगों का हृदय मेरा घर होता है । हे वत्स ! तुम विश्वास करो, मैं तुम्हें नाम और रूप का रहस्य बताता हूँ।
नाम अरु रूप नहीं मोरी सीमा । उभय पार मैं बसहूँ भीमा ॥
बिनु संकेत मिलहि नहीं राहा । सो नाम रूप भगत दरकाहा ॥
व्याख्या - हे वत्स ! नाम और रूप मेरी सीमा नहीं होती है । मैं तो इन दोनों से परे भाव में निवास करता हूँ । परन्तु बिना संकेत के रास्ता नहीं मिलता है । इसलिए भक्तों को नाम व रूप के संकेत की जरूरत होती है।
नाम रूप सुत मारग मोरा । मैं मंजिल भिन्न सदा एकोरा ॥
सकल नाम रूप मोते समाई । तब जावहहिं भगत मोहि पाई ॥
व्याख्या - हे वत्स ! नाम और रूप तो मेरे रास्ते हैं । परन्तु मैं तो सदा इनसे भिन्न अकेला हूँ । जब नाम और रूप मेरे अन्दर समा जाते हैं, तब भक्त जन मुझे प्राप्त करते हैं।
मरम सुत मैं कहऊँ गंभीरा । निज हिय समझउ तुम धीरा ॥
नाम रूप मारग साधन विश्वासा । जीव पथिक श्रद्धा भयी उजासा ॥
व्याख्या - हे वत्स ! तुम्हें मैं गम्भीर रहस्य बताता हूँ । हे धीर ! तुम स्वयं के हृदय में समझो । नाम और रूप मेरे रास्ते हैं तथा विश्वास साधन होता है तथा जीव राहगीर होता है और जीव की श्रद्धा ही उसको प्रकाश करती है ।
रिद्धि सिद्धि मारग बहु पड़ावा । सुस्तावहिं जीव तो जाई फँसावा ॥
बहु भांति सुख सम्पदा ललचाई । मोहिं भूलि तहँ परइ उरुझाई ॥
व्याख्या - हे वत्स ! नाम व रूप के मार्ग में रिद्धि-सिद्धि रूपी बहुत से पड़ाव आते हैं, जहाँ अगर जीव सुस्ता जाता है, तो वहाँ फँस जाता है और वहाँ जीव नाना प्रकार की सुख सम्पदा में लालच कर बैठता है और मुझे भूल कर संसार में फँस जाता है ।
सावधान जो होई जीव मतिधीरा । रुकहि न मारग भाव भव तीरा ॥
एहि भाँति पथिक जब चलहिं । नहिं संशय जीव मोहि मिलहिं ॥
व्याख्या - हे वत्स ! जो जीव सावधान और धीर होता है, वह रिद्धि-सिद्धि रूपी रास्ते में नहीं रुकता है और जीव निरन्तर चलता रहता है, तो इसमें संदेह नहीं है, वह मुझे प्राप्त कर लेता है ।
दो०- नाम नामी मैं स्वयं हूँ करि देखि हृदय विचार ।
नाम रूप भिन्न मोहि ते फँसहि जीव तहँ बेकार ॥ ३ ॥
व्याख्या - हे वत्स ! तुम हृदय में विचार करके देखो । मैं ही नाम और नामी हूँ । नाम और रूप दोनों तो मुझसे भिन्न हैं । जहाँ जीव व्यर्थ में ही फँस जाता है ।
नाम रूप मग बहु मंजिल एका । निज हिय सुत करि देखि विवेका ॥
नाम जुरहिं जब नामी संगा । होवहिं मन तब प्रीति अभंगा ॥
व्याख्या - नाम और रूप के बहुत सारे रास्ते होते हैं परन्तु मैं मंजिल रूप में एक ही होता हूँ । तुम हृदय में विचार करके देखो । जब नाम का भाव मेरे साथ जुड़ जाता है, तब जीव के मन में मेरे प्रति अटूट प्रीत हो जाती है ।
भाव दीवार तहँ जाइ मिटाई । अंश अरु अंशी तब एक सुहाई ॥
नाम जब करहहिं संग रूपा । आवहि भाव तब तबहि दूता ॥
व्याख्या - प्रीत की अटूट अवस्था में भावों की दीवार टूट जाती है और मुझ अंशी से मेरा अंश जीव मिल जाता है तथा एक रूपता आ जाती है । परन्तु जब नाम किसी रूप का अनुसरण करने लग जाता है, तो जीव के हृदय में द्वैत भाव आ जाता है ।
द्वैत देखि माया आय प्रगटाई । पुनि जीव जाई मोह भरमाई ॥
मोह ते पुनि प्रगट संसारा । फँसहि जीव तहँ नाना प्रकारा ॥
व्याख्या - द्वैत भाव देख कर माया पैदा हो जाती है और माया से जीव मोह में फँस जाता है तथा मोह के कारण पुनः संसार पैदा हो जाता है तथा जीव नाना प्रकार के विकारों में पड़ जाता है ।
नाम जपहिं जेहि जानइ नामी । रूप धरहिं जे भाव अनुगामी ॥
ते समझहिं हियँ मोर प्रतापा । अकथ इहँ बूझहिं आपहि आपा ॥
व्याख्या - जो लोग मुझ नामी को जान कर नाम जपते हैं तथा भाव के अनुसार मेरा रूप अनुसरण करते हैं, वे ही अपने हृदय में मेरे प्रताप को समझ पाते हैं । यह अवस्था अकथनीय है । इसको तो अपने आप ही समझा जा सकता है ।
दो०- निज हृदय तब समझहिं नाम रूप सकल भेद ।
अंशी से अंश मिलै मिटहिं सब जीव भव खेद ॥ ४ ॥
व्याख्या - उस अवस्था में जीव स्वयं अपने हृदय में नाम और रूप का भेद समझ पाता है तथा भेद समझ लेने से अंशी और अंश एक हो जाते हैं । जिससे जीव के समस्त दु:खों का निवारण हो जाता है ।
नाम रूप उभय मोर उपाधि । भिन्न दुइते मैं अलख अनादि ॥
अनन्त नाम अनन्त मोरे रूपा । कल्पहिं जीव निज मति अनुरूपा ॥
व्याख्या - नाम और रूप दोनों मेरी उपाधि हैं । परन्तु मैं तो इन दोनों से भिन्न अलख और अनादि हूँ । मेरे अनन्त नाम और अनन्त रूपों की कल्पना तो जीवों ने अपनी बुद्धि के अनुसार की है ।
मय सागर जीव बारि समाना । बिनु बारि न सागर सनुमाना ॥
एसउ नहिं मोर कछु महिमा । बिनु जीव सम पाथर गरिमा ॥
व्याख्या - मैं सागर की तरह हूँ तथा जीव सागर के जल के समान होता है तथा जैसे बिना जल के सागर की कोई महिमा नहीं होती है, वैसे ही बिना जीव के मेरी कोई महिमा नहीं होती है । बिना जीव के तो मैं पत्थर जैसा होता हूँ ।
जीव सहित मैं जगत समाना । सत कर्म सोई प्रगट स्थाना ॥
नर नारी हियँ सुन्दर धामा । तहाँ बसहउँ मैं सहित कामा ॥
व्याख्या - जीवों सहित मैं जगत में समाहित हूँ तथा सात्विक कर्म मेरे प्रकट होने के स्थान हैं । नर-मादा का हृदय ही मेरा सुन्दर घर है । जहाँ मैं माया सहित निवास करता हूँ ।
मोतें भिन्न जगत किछु न सुहाई । निगम-पुराण ऋषि मुनि गाई ॥
माया विस्तार जग बंधनकारी । गत माया सोइ मोर रूप सँवारी ॥
व्याख्या - मेरे से अलग इस संसार में कुछ भी नहीं है । वेद-पुराण व ऋषि-मुनियों सबने यही बताया है । जब माया का विस्तार होता है, तो यह संसार बन्धन वाला हो जाता है और जब माया मिट जाती है, तो यही संसार मेरा रूप बन जाता है ।
दो०- मैं अरु माया संग बसै जीव हृदयँ एक समान ।
मो ढिंग जीव आवत नहिं माया संग भटकत जहान ॥ ५ ॥
व्याख्या - मैं और मेरी माया जीव के हृदय में एक समान निवास करते हैं। परन्तु जीव मेरे पास तो आता ही नहीं है। वो तो माया के साथ संसार में भटकता रहता है।
माया अरु तुम बसहिं इक संगा । केहि विधि सम्भव इहँ अनंगा ॥
तुम सन माया सकइ न रहहिं । साधु सन्त बुध इहँ सब कहहिं ॥
व्याख्या - हे अनंग ! माया और आप एक साथ रहते हैं। यह किस प्रकार सम्भव हो सकता है ? आपके पास तो माया रह ही नहीं पाती है। सभी साधु-सन्त व विद्वान लोग ऐसा ही कहते हैं।
सुन सुत कहउँ सत्य बिचारी । नर-नारी हियँ रहइ नर-नारी ॥
कैसे रहहिं मैं अरु माया संगा । सो सब कहउँ समझाइ प्रसंगा ॥
व्याख्या - हे वत्स ! सब नर-मादा जीवों के हृदय में नर-नारी (नाड़ी) का स्थान होता है और मैं माया सहित वहाँ कैसे एक साथ रहता हूँ, यह प्रसंग तुम्हें समझाकर बताता हूँ।
जीव हियँ सुन्दर भवन हमारा । तहँ रहहिं हम उभय इकसारा ॥
हियँ भवन दुई कक्ष सुहाई । नर नारी तिन्ह नाम कहाई ॥
व्याख्या - जीव का हृदय ही मेरा और माया का सुन्दर घर होता है, जहाँ पर हम दोनों (परमात्मा और माया) एक समान रहते हैं। हृदय रूपी घर में दो कमरे होते हैं, नर और नारी (नाड़ी) जिनका नाम है।
जद्यपि कक्ष दुई पर इक द्वारा । खुलहहिं सो सदा भाव अनुसारा ॥
प्रभुता भुवन बरनिन जाई । जानइ सोइ अनुमान लगाई ॥
व्याख्या - यद्यपि हृदय रूपी घर में दो कमरे होते हैं, परन्तु उन दोनों कमरों का दरवाजा एक ही होता है, जो हमेशा भाव के अनुसार खुलता है। हृदय रूपी घर की प्रभुता का वर्णन नहीं किया जा सकता है। उसको जो जानता है, वही अनुमान लगा सकता है।
दो०- भाव अनुरूप हियँ सदन भाव अनुरूप सज्जा साज ।
भाव अनुरूप सुविधा सब भाव अनुरूप होइ सब काज ॥ ६ ॥
व्याख्या - हृदय रूपी घर भाव के अनुरूप आकार धारण कर लेता है तथा भाव के अनुरूप ही उसकी सजावट हो जाती है तथा भाव के अनुसार ही सब सुख-सुविधाएँ उपलब्ध होती हैं तथा भाव के अनुरूप ही उस घर में सब कार्य होते हैं ।
नर अयन में करहुँ निवासा । नारी भुवन तहँ माया सुवासा ॥
भाव ही तहँ सेवक सेविकाई । भाव ही भूषन बसन भव्यताई ॥
व्याख्या - मैं नर रूपी कमरे में निवास करता हूँ तथा नारी रूपी घर में माया का निवास होता है । भाव ही सेवक और सेविका का काम करते हैं तथा भाव ही भूषण व वस्त्रादि की भव्यता होते हैं ।
मैं अरु माया माझ अनुबन्धा । भाव तें खुलइ नर-नारी कुन्दा ॥
नर खुलहिं मैं प्रबल सुहाउ । नारी खुलत शान्त होइ जाऊँ ॥
व्याख्या - मेरे और माया के बीच में यह अनुबन्ध है कि भाव के अनुसार नर और नारी रूपी कमरों का दरवाजा खुलता है । जब नर रूपी घर का दरवाजा खुलता है, तो मैं प्रबल हो जाता हूँ और जब नारी रूपी घर का दरवाजा खुलता है, तो मैं शान्त हो जाता हूँ ।
इक दूसर उभय अनुसरहिं । माया अरु मोर भेद किछु नहिं ॥
दिखहहिं भेद भाव अनुसारी । बिरथा भरमित जीव संसारी ॥
व्याख्या - मैं और माया एक दूसरे का अनुसरण करते हैं । मुझमें और माया में कोई भेद नहीं है । जो भेद दिखाई देता है, वह तो भावों के अनुसार दिखाई देता है । जीव बेचारा व्यर्थ में ही संसार में भ्रमित होता रहता है ।
हृदय सदन सब मरम छुपाई । इहँ मम अद्भुत लीला सुहाई ॥
भाव ही भा मूल सकल संसारा । भाव तें माया भाव ते मोर दीदारा ॥
व्याख्या - हृदय रूपी घर में मेरा समस्त रहस्य छिपा हुआ रहता है । यही मेरी अद्भुत लीला है । भाव ही संसार का मूल है अर्थात् भावों से ही संसार का आभास हो रहा है और भाव ही माया है तथा भावों के द्वारा ही मुझ परमात्मा के दर्शन सम्भव हैं ।
दो०- भाव ही प्रबल सुत तोहि कहहूँ मैं समझाय ।
भाव तें भावी बनहिं भाव तें जीव उलझाय ॥ ७ ॥
व्याख्या - हे वत्स ! भाव ही प्रबल होते हैं तथा भावों से ही भविष्य का निर्माण होता है । जिसमें जीव उलझ जाता है ।
केहि विधि भाव करहिं खिलावन । सो सब कहउँ तोहि समझावन ॥
हिय भाव दया दान उपकारी । खुलहिं कपाट तुरत अमारी ॥
व्याख्या - किस प्रकार भाव जीव के साथ खिलवाड़ करते हैं, वो सब तुम्हें समझाने के लिए बताता हूँ । जब दया, दान व परोपकार के भाव हृदय में आते हैं, तो तुरन्त मेरे हृदय स्थित घर का दरवाजा खुल जाता है ।
जब खुलहिं द्वार सुत मोरा । माया अनुसरहिं करि निहोरा ॥
सहमान सब सुविधा प्रदानी । होवहिं सकल जीव रुख जानी ॥
व्याख्या - हे वत्स ! जब मेरा द्वार खुल जाता है, तो माया विनय भाव के साथ मेरा अनुसरण करने लगती है तथा जीव को सम्मान के साथ सब सुविधा प्रदान करने लग जाती है और सब कार्य जीव की इच्छा अनुसार घटित होने लग जाते हैं ।
सहज संतोष जो भाव सदाई । जीव निरंतर मोते मिल जाई ॥
लोग कहहिं जीव सिद्ध सुहाई । नाना भांति तहँ पूजा कराई ॥
व्याख्या - अगर जीव के हृदय में सहजता और संतोष का भाव हमेशा रहने लग जाए, तो वह जीव निरंतर मुझसे एकात्म हो जाता है । ऐसे जीव को लोग सिद्ध मानने लग जाते हैं और नाना प्रकार से उसकी पूजा करने लग जाते हैं ।
माया बस्य जीव मोरहि रूपा । इहँ पालहउँ मैं नीति अनूपा ॥
विगत माया सो आनन्द मूला । तबहिं होवउँ मैं जीव अनुकूला ॥
व्याख्या - जब माया जीव के वश में होती है, तो वह जीव मेरा ही स्वरूप हो जाता है । इस अद्भुत नीति का मैं सदैव पालन करता हूँ । माया का मिट जाना ही आनन्द का मूल होता है तथा उसी क्षण मैं जीव के अनुकूल हो जाता हूँ ।
दो०- सत भाव तें अनुकूलता असत् भाव तें मैं प्रतिकूल ।
उभय भाव जीव हियँ बसै सुत इहँ ज्ञान का मूल ॥ ८ ॥
व्याख्या - सात्विक भावों से मैं अनुकूल होता हूँ तथा असात्विक भावों से मैं प्रतिकूल हो जाता हूँ । सात्विक और असात्विक दोनों तरह के भाव जीव के हृदय में होते हैं । हे वत्स ! यही वास्तविक ज्ञान का मूल है ।
अब कहउँ माया मरम बुझाई । जेहि विधि दुवार हटात् खुलाई ॥
काम क्रोध मद लोभादि अपारा । आवहिं भाव खुलत माया द्वारा ॥
व्याख्या - अब मैं यहाँ माया के रहस्य को बताता हूँ कि किस प्रकार अचानक माया का द्वार खुल जाता है । जब काम, क्रोध, मद, लोभ आदि के भाव आते हैं, तो माया का दरवाजा तुरन्त खुल जाता है ।
जब जब खुलहिं माया द्वारा । मैं अनुसरउँ माया व्यापारा ॥
माया अधीन जीव जब सुहाए । सोइ बन्धन जगत सब गाए ॥
व्याख्या - जब असात्विक भावों से माया का दरवाजा खुल जाता है, तो उस अवस्था में मैं माया का अनुसरण करने लग जाता हूँ । उस अवस्था में जीव माया के अधीन हो जाता है । उसी को संसार में जीव का बन्धन बताया गया है ।
तोर मोर मोह भाव उपजाई। माया जाल जीव तब उलझाई॥
माया प्रेरहिं मैं करु अनुसरणा। विधि विधान जाइ नहिं बरणा॥
व्याख्या - तेरे-मेरे से मोह का भाव पैदा हो जाता है। तब माया के जाल में जीव उलझ जाता है। उस अवस्था में माया प्रेरित करती है और मैं माया का अनुसरण करता हूँ। यह मेरी विधि का विधान है। जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता है।
मोह बस्य जीव जग काह चावा। अमृत छाड़ि विषय विष धावा॥
जो मांगहि जीव भाव अनुसारी। सब देउँ इहँ विधिना हमारी॥
व्याख्या - मोह के वशीभूत जीव संसार में चाहता ही क्या है? वह तो अमरत्व को छोड़ कर विषय रूपी जहर की तरफ ही दौड़ता रहता है और जो जीव भाव से जो माँगता है, मैं उसको वो सब कुछ देता हूँ। क्योंकि यही मेरा विधान (व्यवस्था) है।
दो०- मोह अनुरूप भाव उपजत भाव ते क्रिया महान।
क्रिया तें कर्म बनत कर्म अनुरूप फल देइ विधान॥ ९ ॥
व्याख्या - मोह के अनुसार भाव पैदा होते हैं तथा भावों से क्रिया पैदा होती है तथा क्रिया के अनुसार कर्म घटित होता है तथा कर्म के अनुसार व्यवस्था फल प्रदान करती है।
मोह बस जीव विधि बस होई। घटहिं सकल रचि राखा सोई॥
बिरथा देहहिं दोष मोहि मूढ़ा। जानइ नहिं विधि विधान गूढ़ा॥
व्याख्या - मोह के वशीभूत जीव मोह के अनुरूप क्रिया (कर्म) करने को बाध्य हो जाता है और जैसी विधि होगी, वैसा ही कर्म घटित होना सुनिश्चित हो जाता है। संसार में लोग मुझे व्यर्थ में ही दोष लगाते रहते हैं। वे मूर्ख लोग विधि (क्रिया) की व्यवस्था (विधान) के रहस्य को नहीं जानते हैं।
भाव सब भव सागर बनाई। भाव ही माया भाव ही माया मिटाई॥
ऐहि भांति मोर अरु माया संगा। जीव हियँ बसहिं बनि अनंगा॥
व्याख्या - इस समस्त दृश्य संसार का भाव ही मूल है। क्योंकि भाव से ही माया पैदा होती है और भाव से ही मेरे दर्शन होते हैं। हे वत्स! इस प्रकार मेरा और माया का साथ बना हुआ है। जिससे हम जीव के हृदय में बिना शरीर के निवास करते रहते हैं।
भाव माझ मैं सदा करूँ निवासा। भाव अनुरूप होइ मोर सुपासा॥
भाव ही बंधन भाव ही रजु सुहाई। भाव ही ग्रन्थि भाव ही उलझाई॥
व्याख्या - हे वत्स! मैं सदा भावों में निवास करता हूँ तथा भावों के अनुरूप ही जीव मेरे पास आ पाता है । भाव ही बन्धन होते हैं तथा भाव ही बन्धन की रस्सी होते हैं और भाव ही बन्धन की गाँठ होते हैं तथा भाव ही भावों को बाँधते हैं।
भाव मूल मय भाव मोरे रूपा । इहँ लीला मोर अद्वितीय अनूपा ॥
मय ही माया मैं ही ईश कहाउँ । भाव अनुरूप सब नाम धराउँ ॥
व्याख्या - मैं ही भावों का मूल हूँ । इसलिए सब भाव ही मेरे रूप होते हैं । यह भावों की मेरी लीला अद्वितीय व अनुपम है । मैं ही माया के रूप में और मैं ही ईश्वर के रूप में आभासित होता रहता हूँ तथा भावों के अनुसार मैं ही नाना नाम धारण कर लेता हूँ ।
दो०- मैं अरु माया भाव अन्तर नहिं कोउ दूजा आधार ।
सब घट मैं ही बसहउँ प्राण रूप इक सार ॥ १० ॥
व्याख्या - मेरे और माया के बीच केवल भाव का अन्तर है और दूसरा कोई अन्तर नहीं है । मैं तो सब जीवो के हृदय में प्राण के रूप में एक समान निवास करता हूँ ।
प्राण ही आत्मा प्राण ही अंश मोरा । सब एक रस देह भेद कोरा ॥
जेहि विधि नीर घट लेइ अकारा । ऐसउ सब देह प्राण प्रकारा ॥
व्याख्या - प्राण ही आत्मा होता है तथा प्राण ही मेरा अंश होता है । इसलिए समस्त प्राणियों में मैं एक रस होकर रहता हूँ । केवल शरीर का ही भेद होता है। जैसे जल बर्तन में रखने पर एक विशेष आकार धारण कर लेता है । ऐसे ही मेरा प्राण शरीरों में विभिन्न आकार धारण कर लेता है ।
नीर एक भिन्न घट अनुसारी । घट विलग नीर नीर इक सारी ॥
सदा रहउँ मैं प्राण समाई । सो सब कहउँ तोहि समझाई ॥
व्याख्या - जैसे जल एक होता है । परन्तु बर्तन के अनुसार अलग दिखाई देता है तथा जब बर्तन जल से अलग कर लिया जाता है, तो जल-जल एक हो जाता है । वैसे ही मैं भी प्राणों में एक समान रहता हूँ । मैं सब जगह एक समान कैसे रहता हूँ, वो तुम्हें समझाकर कहता हूँ सुनो :-
काठ अनल जिमि घृत क्षीरा । ऐसउ बसहउँ हियँ मैं धीरा ॥
समझ तू श्वास पय समाना । प्राण सोहि करि घृत अनुमाना ॥
व्याख्या - जैसे लकड़ी में अग्नि और दूध में घी छिपा हुआ रहता है । ऐसे ही मैं जीव के हृदय में निवास करता हूँ । इसलिए वत्स ! तू श्वास को दूध के समान समझ और प्राण को दूध में घी की तरह समझ ।
अनल अवट जामिन लगाना । सो सब जोग जप तप समाना ॥
ज्ञान बिराग सोइ दधि मथनी । निकसइ सोइ घृत तत बरनी ॥
व्याख्या - योग, जप व तप दूध को गर्म करना व जामिन (जावण) लगाने के समान है तथा ज्ञान व वैराग्य दही को मथनेवाली मथनियाँ समझ और मथने से जो निकलता है, वही आत्मतत्व रूपी घी है ।
दो० - वासना सकल छछि सम ग्यान नवनीत समान ।
छछि तजि नवनीत गहहिं सोइ जानि चतुर सुजान ॥ ११ ॥
व्याख्या - वासनाएँ छाछ के समान होती हैं और ज्ञान घी के समान होता है । इसलिए जो वासना रूपी छछिया का त्याग करके, ज्ञान रूपी घी ग्रहण करते हैं, उनको चतुर सज्जन जानना चाहिए ।
एहि भांति समझ सुत मोहि । मैं ही जगत सब अरु न कोहि ॥
भाव रूप मैं जगत समेता । प्रति हियँ मोर सुंदर निकेता ॥
व्याख्या - हे वत्स ! इस प्रकार तुम मुझको समझो । मैं ही संसार में सब कुछ हूँ और कोई दूसरा नहीं है । मैं ही भाव के रूप में जगत सहित हूँ तथा जीव का प्रत्येक हृदय मेरा सुन्दर घर है ।
मैं ही जगत में ही ईश कहाउँ । भाव आधार नाम रूप घराउँ ॥
भाव रूप मैं घरहउँ शरीरा । नाम रूप इहँ मरम गभीरा ॥
व्याख्या - हे वत्स ! मैं ही ईश्वर हूँ और मैं ही जगत कहलाता हूँ । मैं जीव के भाव के अनुसार नाम और रूप धारण कर लेता हूँ । भाव के अनुसार ही मैं शरीर भी धारण कर लेता हूँ । मेरे नाम और रूप का यह गम्भीर रहस्य है ।
निज मन लावहिं जीव जेहि भावा । सृष्टि सकल अनुरूप दिखावा ॥
भाव अनन्त सोइ मैं अनन्ता । मैं ही ईश अल्लाह भगवन्ता ॥
व्याख्या - जीव स्वयं के मन में जो भाव लाता है, उसको सृष्टि उसी भाव के अनुसार दिखाई देती है । भाव अनन्त होते हैं । इसलिए मेरे रूप भी अनन्त होते हैं । मैं ही ईश्वर, अल्लाह व भगवान होता हूँ ।
जीव मोर अंश करइ विश्वासा । मिटहिं भेद पावइ मोर सुपासा ॥
जब लगि रह वासना मन माहि । दिखहिं माया मय जगत सबाहि ॥
व्याख्या - जीव मेरा ही अंश होता है । जो इस बात पर विश्वास करते हैं, उनके लिए सब भेद मिट जाते हैं और वे मेरे निकट आ जाते हैं । जब तक मन में वासना रहती है, तभी तक संसार माया से युक्त दिखता है ।
दो० - माया मिटि जगत मिटा जगत मिटे मंगल बच जाए ।
हंसा अब बेपरवाह भया नित आनन्द सरोवर नहाय ॥ १२ ॥
व्याख्या - माया के मिट जाने पर संसार मिट जाता है तथा चारों तरफ मंगल ही मंगल बच जाता है । ऐसी अवस्था में जीव निश्चिन्त हो जाता है तथा सदा आनन्द रूपी सरोवर में गोता लगाने लगता है ।
मैं सुख मूल आनन्द समेता । दु:ख तबहिं जब माया सचेता ॥
जेहि जेहि भाव इच्छा उपजाई । सोई सब माया जानहउ भाई ॥
व्याख्या - हे वत्स ! मैं आनन्द सहित सुख का मूल हूँ और दु:ख तो तब पैदा होता है, जब माया जागृत हो जाती है । जो जो भाव इच्छा पैदा करते हैं, वो सब भाव माया के होते हैं ।
विगत वासना मोते लय लाई । सकल जगत मो सम दिखाई ॥
पाप पुण्य सब माया सुहाई । सर्ग नरक बिरथा उरझाई ॥
व्याख्या - जब जीव की विषय-वासनाएँ मिट जाती हैं, तो उसकी मुझसे लौ लग जाती है और समस्त संसार उसको मेरा ही रूप दिखाई देने लग जाता है । पाप-पुण्य की कल्पना तो सब माया है, जो व्यर्थ में ही जीव को स्वर्ग-नरक की कल्पना में उलझा देती है ।
पाप पुण्य मूल नहिं कर्म सुहाई । भाव उभय सब फल दिलाई ॥
भाव अनुरूप सुख दु:ख पाई । बिरथा जग कर्म दोष लगाई ॥
व्याख्या - पाप-पुण्य का कारक कर्म नहीं होता है । भाव ही पाप-पुण्य को पैदा करनेवाला होता है । भाव के अनुरूप ही जीव सुख-दु:ख भोगता है । संसार में व्यर्थ ही कर्म को दोष लगाया जाता है ।
नाथ कर्म पाप-पुण्य आधारा । निगम-पुराण सकल पुकारा ॥
आप कहत नहिं आधार कर्मा । नहिं बुझहउँ नाथ इहँ मर्मा ॥
व्याख्या - हे परमपिता ! वेद-पुराण सब यही कहते हैं कि कर्म ही पाप-पुण्य का आधार होता है । परन्तु आप कह रहे हैं कि कर्म पाप-पुण्य का आधार नहीं होता है । हे प्रभु ! मैं आपके इस रहस्य को नहीं समझ पा रहा हूँ ।
दो०- जस कर्म तस फल मिलै कहत सुनत सब संसार ।
आप कहत भिन्न मत प्रभु कैसे करहउँ इतवार ॥ १३ ॥
व्याख्या - हे प्रभु ! जैसा कर्म किया जाता है । वैसा ही फल मिलता है, समस्त संसार ऐसा ही कहता और सुनता आया है । परन्तु आप फल का आधार भिन्न बता रहे हैं । ऐसी स्थिति में मैं आपकी बात को कैसे मानूँ ?
नहिं संशय सुत मरम गभीरा । भल विलेख देखि कर्म हियँ धीरा ॥
कर्म अरु भाव नहिं बिलगाई । भाव सदा जीव कर्म करवाई ॥
व्याख्या - हे वत्स ! पाप-पुण्य का आधार कर्म नहीं होता है, इसमें संशय नहीं है । तुम अच्छी तरह से हृदय में कर्म की प्रक्रिया को विचार करके देखो। कर्म और भाव अलग नहीं होते हैं। परन्तु भाव ही सदा जीव से कर्म करवाते हैं।
दिखत कर्म इक फल भिन्ना। एक तें सुखद मन एक ते खिन्ना॥
मन माहिं तुम करउ बिचारा। वैद्य हकीम कसाई व्यवहारा॥
व्याख्या - हे वत्स! कर्म दिखने में तो एक जैसा लगता है। परन्तु एक कर्म मन को सुख देनेवाला होता है और एक कर्म मन को दु:खी करनेवाला हो जाता है। मन में तुम वैद्य, हकीम और दुष्ट व्यक्ति के कर्मों का विचार करके देखो।
वैद्य हकीम जो चलावइ छूरी। आरत हित जद्यपि कर्म कूरी॥
जो दुष्ट करहिं छूरी आघाता। आरत बिकल भीषण संघाता॥
व्याख्या - अगर वैद्य-हकीम चाकू से काट कर रोग का उपचार करते हैं, तो रोगी को सुख मिलता है। परन्तु कोई दुष्ट व्यक्ति अगर चाकू चलाता है, तो उससे जीव को भीषण कष्ट होता है।
वैद्य हकीम कहावहिं उपकारी। दुष्ट जन सकल धिक्कारी॥
इहाँ सरूप इक भाव अलादा। ता मत पाव सुख अरु व्याधा॥
व्याख्या - वैद्य-हकीम परोपकारी कहलाते हैं तथा दुष्ट लोगों को समाज में धिक्कारा जाता है। यहाँ कर्म का स्वरूप यानी छुरी चलाना एक जैसा ही है। परन्तु छुरी चलाने के पीछे भाव अलग होता है। इसलिए एक से सुख और दूसरे से दु:ख मिलता है।
दो०- कर्म ते बड़ भाव है भाव ही सब फल दिलाय।
फल ते पुनि भाव उपजत बिरथा जीव फँस जाय॥ १४॥
व्याख्या - कर्म से बड़ा भाव होता है तथा भाव ही सब फलों को दिलानेवाला होता है अर्थात् भाव के अनुसार ही सब कर्मों का फल मिलता है। फल के चिन्तन से फिर भाव पैदा होने लग जाते हैं और जीव व्यर्थ में ही कर्म-फल में फँस जाता है।
धन्य नाथ कर्म मरम बुझाई। तुम समान तुम्हीं जग गुसाईं॥
अबहु संशय मोर मन माहिं। निष्काम कर्म काह समुझाहि॥
व्याख्या - हे प्रभु! मैं धन्य हुआ कि आपने कर्म का रहस्य समझा दिया है। हे स्वामी! आपके समान तो संसार में आप ही हैं। परन्तु प्रभु अभी भी मेरे मन में संशय है कि निष्काम कर्म कैसे होता है। दया करके मुझे समझाइए।
सुत कहूँ गूढ़ ते गूढ़ मरमा। जेहि विधि होहि कर्म निष्कर्मा॥
करहि जेहि कर्म कामना हीना। बुध जन निष्काम कह दीना॥
व्याख्या - हे वत्स! मैं तुम्हें कर्म के गूढ़ से गूढ़ रहस्य को समझा कर कहता हूँ। जिससे वास्तव में निष्काम कर्म घटित होता है। फल की इच्छा के बिना जो कर्म किया जाता है, उसे विद्वानों ने निष्काम कर्म कह दिया है।
नहिं सत्य इहँ कहूँ समझाई। बिनु इच्छा कर्म कबहु सुहाई॥
जब जब इच्छा रहइ मन माहि। तब तबहि फल बन्ध सुहाहि॥
व्याख्या - परन्तु यह सत्य नहीं है। क्योंकि बिना इच्छा के क्या कभी कोई कर्म हो सकता है? जब जब मन में इच्छा रहती है, तब तब फल का बन्धन रहता ही है।
इहाँ मरम अति गूढ़ छुपाई। सुनहउ मन बुद्धि चित्त लाई॥
कहत सुलभ समुझत कठीना। कर्म कि सम्भव कामना हीना॥
व्याख्या - यहाँ बहुत गम्भीर रहस्य छिपा हुआ है। हे वत्स! तुम मन और बुद्धि को चित्त में समाहित करके सुनो। कर्म का रहस्य कहने में आसान लगता है। परन्तु समझना बहुत कठिन है। क्योंकि बिना इच्छा के कर्म कैसे हो सकता है? यह सबके मन में रहस्य बना रहता है।
दो०- बिनु भाव इच्छा नहिं बिनु इच्छा कर्म न होय।
कहत सुनत सब जग हय निज हिय समझै नहि कोय॥ १५॥
व्याख्या - बिना भावों के इच्छा पैदा नहीं होती है और बिना इच्छा के कर्म नहीं हो सकता है। इस बात को संसार में सब कहते हैं और सुनते हैं। परन्तु हृदय में समझने का प्रयास नहीं करते हैं।
जब जब कामना मन माहिं। तब तब फल बन्ध सुहाहिं॥
बिनु कामना केहि विधि करमा। मम अनुग्रह समझहिं मरमा॥
व्याख्या - जब जब मन में इच्छा रहती है, तब तब फल रूपी बन्धन रहता ही है। बिना इच्छा के कर्म कैसे होता है, इस रहस्य को मेरी कृपा से ही समझा जा सकता है।
क्रिया अरु कर्म विराट भेदा। जद्यपि उभय सरूप अभेदा॥
क्रिया ही कर्म जानत जग सारा। ताते परहि भ्रम जीव विचारा॥
व्याख्या - क्रिया और कर्म में बहुत ही अन्तर होता है। हालांकि ऊपर से देखने पर दोनों एक से ही लगते हैं। इसलिए क्रिया को ही संसार कर्म मान लेता है। जिससे बेचारा जीव भ्रम में पड़ जाता है।
क्रिया सकल जग फल अनुगामी। कर्म हय यज्ञ सोइ निष्कामी॥
श्वास यजन सोइ यज्ञ कहाई। यज्ञ ही कर्म बाकी क्रिया भाई॥
व्याख्या - समस्त क्रियाएँ फल की इच्छा का ही अनुगमन करती हैं। इसलिए केवल यज्ञ ही कर्म होता है, जो निष्काम होता है। श्वास का श्वास में यजन ही वास्तविक यज्ञ होता है और यज्ञ ही कर्म होता है। बाकी सब क्रिया के अन्तर्गत आता है।
यथारथ कर्म यज्ञ नहिं दूजा। कर्मकाण्ड नहिं किछु तहँ पूजा॥
ओ अहम सो मन्त्र ॐ कहाई। श्वास जानि घृत सम भाई॥
व्याख्या - यथार्थ कर्म तो यज्ञ ही होता है और कोई दूसरा नहीं होता है। यज्ञ के लिए न कोई कर्मकाण्ड होता है और न ही वहाँ पर कोई पूजा विधान ही होता है। ओ अर्थात् जीव और अहम यानी ‘मैं’। अर्थात् मैं और जीव एक हैं। इसी का प्रतीक ॐ मन्त्र होता है और श्वास को घी के समान समझना चाहिए।
दो०- कर्मकाण्ड जो यज्ञ करे क्रिया करि फल उलझाय।
फल इच्छा बन्धन बने जीव बिरथा जग भरमाय ॥ १६ ॥
व्याख्या - जो कर्मकाण्ड जैसा यज्ञ करते हैं, वे तो मात्र क्रिया करते हैं और फल में उलझ जाते हैं तथा फल की इच्छा बन्धन का कारण बन जाती है। जिससे जीव व्यर्थ में ही संसार में फँस जाता है।
सो कहउँ यज्ञ विधि समझाई। करहिं नित्य जेहि मुक्ति पाई॥
सुरता सोई हय विधि यज्ञना। गमना गमन श्वास जपना॥
व्याख्या - अब मैं यहाँ यज्ञ की विधि समझा कर कहता हूँ। जिसको अगर कोई नित्य करेगा, वही मुक्ति प्राप्त कर लेगा। सुरता ही यज्ञ की वास्तविक विधि है और श्वास का आना-जाना ही जप है।
चेतन पुरोहित जीव जजमाना। नाभी चक्र यज्ञ कुण्ड समाना॥
हिरण्य गर्भ अनल अति पावन। प्राण हवि ग्यान लपटावन॥
व्याख्या - वास्तविक यज्ञ का पुरोहित चेतन जीव होता है तथा जीव का नाभी मण्डल यज्ञ के कुण्ड के समान होता है। हिरण्य गर्भ ही पवित्र अग्नि होता है तथा प्राण ही हवि होता है। जिससे ज्ञान रूपी लपटें उठती हैं।
होवहि हवन श्वास-प्रश्वासा। सो यज्ञ असल करि विश्वासा॥
उपजहिं भाव अन्न सरूपा। करहिं ग्रहण कल्याण अनूपा॥
व्याख्या - श्वास का प्रश्वास में मिलना ही हवन होता है। यह यज्ञ ही वास्तविक यज्ञ होता है। इस यज्ञ क्रिया से जो भाव पैदा होते हैं, वे ही अन्न के समान होते हैं। जिनको ग्रहण करने से जीव का कल्याण सुनिश्चित हो जाता है।
करहहिं यज्ञ होहि निष्कामी। क्रिया सहज बिनु फल अनुगामी॥
विगत चाह सकल फल देइ। इहँ सम क्रिया कर्म दूसरा नेइ॥
व्याख्या - जो यज्ञ करते हैं, वे निष्कामी हो जाते हैं और उनकी क्रिया सहज हो जाती है । जिसमें फल का बन्धन नहीं रह जाता है । बिना इच्छा किये भी सब फल प्राप्त हो जाते हैं । अतः यज्ञ के समान क्रिया और कर्म संसार में दूसरा नहीं होता है ।
दो०- यज्ञ ते अन्न उपजत अन्न ते मन पावन भाव ।
पावन भाव ते क्रिया बने सोइ क्रिया सहज कहाव ॥ १७ ॥
व्याख्या - यज्ञ से अन्न पैदा होता है अर्थात् विशुद्ध प्राण पैदा होता है और अन्न से मन के भाव पवित्र हो जाते हैं तथा मन के पवित्र भावों से जो क्रिया पैदा होती है, वो सहज हो जाती है ।
क्रिया सहज जहाँ भावी अभावा । बिनु भावी सकै कि काम सतावा ॥
यज्ञ सदा वर्तमान रमाई । भावी चिन्तन तहँ न चलाई ॥
व्याख्या - जब क्रिया सहज हो जाती है, तब भविष्य का चिंतन मिट जाता है और भविष्य के चिन्तन के बिना इच्छाएँ नहीं सता सकती हैं । यज्ञ हमेशा वर्तमान में रमन कराता है । इसलिए यज्ञ क्रिया से भविष्य का चिन्तन नहीं हो पाता है ।
भावी अभाव क्रिया सहज सुहाए । सोइ क्रिया कर्म निष्काम कहाए ॥
कर्म निष्काम यज्ञ आधारा । सत्य इहँ मोर दृढ़ विचारा ॥
व्याख्या - भविष्य के चिन्तन के अभाव में क्रिया सहज हो जाती है तथा वह सहज क्रिया ही निष्काम कर्म कहलाती है । निष्काम कर्म का आधार यज्ञ ही होता है । यह मेरा दृढ़ सत्य कथन है ।
ध्यान ही यज्ञ बाकी पाखण्ड़ा । लय योग सोइ शक्ति अखण्ड़ा ॥
विगत चाह सकल फल दाई । इहँ सम क्रिया कर्म दूसरा नाई ॥
व्याख्या - ध्यान की क्रिया ही वास्तविक यज्ञ होता है । बाकी यज्ञ के नाम पर पाखण्ड होते हैं । ध्यान से जब लय योग हो जाता है, तब अखण्ड शक्ति पैदा हो जाती है । उस अवस्था में समस्त इच्छाएँ शान्त हो जाती हैं । जिससे समस्त फलों की प्राप्ति हो जाती है । अतः यज्ञ के समान न संसार में कोई क्रिया है और न दूसरा कोई कर्म है ।
क्रिया कर्म भिन्न बिनु ग्याना । यज्ञ ते पुनि भयउ एक समाना ॥
पुनि तहँ क्रिया कर्म नहिं भेदा । उभय विगत सब जग खेदा ॥
व्याख्या - क्रिया और कर्म बिना ज्ञान के भिन्न लगते हैं । परन्तु यज्ञ से दोनों एक हो जाते हैं और क्रिया व कर्म का भेद मिट जाता है और दोनों सहज हो जाते हैं । जिससे सब कष्टों का निवारण हो जाता है ।
दो०- यज्ञ ही ध्यान हय ध्यान ही ग्यान उमगाय ।
ग्यान से सहजता आवै सहजता सोइ निष्काम कहाय ॥ १८ ॥
व्याख्या - यज्ञ की क्रिया ही ध्यान होता है तथा ध्यान से ही हृदय में ज्ञान पैदा होता है और ज्ञान से जीव में सहजता आ जाती है तथा सहजता ही निष्काम कर्म की अवस्था कहलाती है ।
यज्ञ सम नहीं कोउ पुण्य दूजा। पावहिं सकल मानस करि पूजा॥
नित्य करहिं जो यज्ञ करमा। तिन्ह हियँ बसहहिं धरमा॥
व्याख्या - यज्ञ के समान संसार में दूसरा कोई पुण्य नहीं होता है। यज्ञ के प्रभाव से मानसिक पूजा से ही सब कुछ प्राप्त हो जाता है। इसलिए जो नित्य यज्ञ करते हैं, उनके हृदय में धर्म का निवास हो जाता है।
अहिंसा परम धर्म बेद बखाना। सोइ फल सहजहि यज्ञ प्रदाना॥
विगत वासना अहिंसा कहाई। यज्ञ अनल सब वासना जलाई॥
व्याख्या - अहिंसा को वेदों ने परम धर्म बताया है और यज्ञ सहज में ही अहिंसा प्रदान कर देता है। क्योंकि विषय-वासनाओं से मुक्त अवस्था अहिंसा कहलाती है और यज्ञ की अग्नि में विषय-वासनाएँ जल जाती हैं।
सो यज्ञ सहज धर्म प्रकटाई। जानइ मरम सन्त कहाई॥
सुत कहूँ में यहाँ यज्ञ प्रतापा। मिटवहिं जग सकल संतापा॥
व्याख्या - इसलिए यज्ञ कर्म सहज में ही धर्म पैदा कर देता है और जो धर्म के इस मर्म को जान लेते हैं, वे सन्त कहलाते हैं। हे वत्स ! मैंने तुम्हें यहाँ यज्ञ के प्रताप को समझा दिया है। जो संसार में समस्त संतापों को मिटानेवाला होता है।
नित्य यज्ञ जो तुम करइब। नहिं संशय परम पद लेइब॥
रइब सहज पर उपकारी। आनन्द मगन गत विकारी॥
व्याख्या - हे वत्स ! अगर तुम नित्य यज्ञ करोगे, तो इसमें संदेह नहीं है कि तुम परम पद प्राप्त कर लोगे तथा सदा तुम सहज और परहित में रत रहोगे तथा समस्त विकार मिट जायेंगे और आनन्द में मगन रहोगे।
दो० - धन्य धन्य प्रभु तुम धन्य धन्य तुम जगतेश।
मरम गभीर समझायउ मिटै मोर सकल क्लेस॥ १९ ॥
व्याख्या - हे परमपिता ! आप धन्य हैं, हे जगत के ईश्वर ! आप धन्य हैं, जो आपने मुझे गम्भीर रहस्य समझा दिया है। जिसको सुनकर मेरे समस्त क्लेशों का नाश हो गया है।
छ० - मति मोरी अति भोरी लीला अनुपम केहि विधि गाऊँ।
जप जोग बिरागा नहिं मन अनुरागा तोर अनुग्रह मैं चाऊँ॥
ऋषि मुनि ध्यावहिं पार न पावहिं निज मति निज समझाई।
नाना ग्रन्थ बहुरि पंथा बिनु अनुभूति जीव जग उरु झाई॥
व्याख्या - हे परमपिता! मेरी बुद्धि तो भोली है और आपकी लीला अनुपम है। इसलिए आपकी लीला का मैं कैसे बखान कर सकता हूँ। मैं जप, योग, वैराग्य भी नहीं जानता हूँ तथा मेरे मन में आपके प्रति अनुराग भी नहीं है। फिर भी हे प्रभु! मैं आपकी कृपा चाहता हूँ। ऋषि-मुनि आपका भजन करते हैं। फिर भी आपके रहस्य को नहीं जान पाते हैं। सब अपनी-अपनी बुद्धि से आपको समझते हैं। नाना प्रकार के ग्रन्थ और पंथों में जीव बिना निज अनुभूति के संसार में उलझ जाता है।
छ० - सुनहु दयाला करहु निहाला तोर शरण अब मैं आई।
आठों यामा जपूँ तोर नामा अन्तकाल तोर पुर जाई॥
मन क्रम बानी छाडूँ नादानी सहज रहूँ जग सदाहूँ।
यह बर देहउ स्वामी हे अन्तरयामी तुम्हीं मोर गुसाँई॥
व्याख्या - हे दयालु! मुझ पर कृपा करके निहाल कर दीजिए। मैं अब आपकी शरण में आया हूँ। हे प्रभु! मैं आठों पहर आपका नाम जपूँ तथा अन्तकाल में आपके धाम को प्राप्त होऊँ, ऐसी कृपा कीजिए। हे प्रभु! मैं मन-वचन और कर्म की चतुराई छोड़ कर सदा संसार में सहज रह सकूँ। हे प्रभु! मुझे वरदान दीजिए। आप तो अन्तर्यामी हैं। आपके सिवा संसार में मेरा और कोई नहीं है।
दो० - एवमस्तु सुत सदा भगति रहइब हियँ तोर।
मागउँ अरु बरु नहिं अदेय किछु मोर॥ २० ॥
व्याख्या - हे वत्स! ऐसा ही होगा तथा आपके हृदय में सदैव भक्ति बनी रहेगी। हे वत्स! तुम और कुछ वर मांग लो। मुझे संसार में ऐसा कुछ भी नहीं दिखता है, जो मैं तुमको नहीं दे सकता।
जानहउ नहिं मैं साँच असाँचे। देहउ बर जो तुम्हार मन राचा॥
धन्य धन्य भगत प्रिय मोरे। रहइब संतोष सदा हियँ तोरे॥
व्याख्या - हे प्रभु! मैं तो उचित-अनुचित (सत्य-असत्य) का भेद नहीं जानता हूँ। इसलिए जो आपको अच्छा लगे, वो ही वर मुझे दीजिए। हे मेरे प्रिय भक्त! तुम धन्य हो! इसलिए तुम्हारे हृदय में संतोष सदा निवास करेगा।
परहित भाव प्रबल मन माहिं। तू पाइब अनुग्रह मोर सदाहिं॥
अविरल भगति अरु सतसंगा। रहइब हियँ सदा तोर अभंगा॥
व्याख्या - हे वत्स! तेरे हृदय में परहित का भाव बहुत प्रबल है। इसलिए तू सदा मेरी कृपा प्राप्त करता रहेगा तथा तेरे हृदय में निरन्तर भक्ति और सत्संग का भाव बना रहेगा।
जब जब करहि स्मरण मोहि। आइ सँभालउँ अविलम्ब तोहि ॥
जो जो तू कहइब जन हेतु। मैं करइब सब मरजादा सेतु ॥
व्याख्या - हे वत्स ! तू जब जब मुझे याद करेगा, मैं तुरन्त तुझे आकर सम्भाल लूँगा। तू जन कल्याण के लिए जो जो कहेगा, मैं वो सब मेरी मर्यादा रखने के लिए करूँगा।
भोगहु भोग सकल निष्कामा। अन्तकाल पाइब मोरइ धामा ॥
मैं प्रसन्न सुत सत्य बखानी। लेखनी तुम्हार रहउँ समानी ॥
व्याख्या - हे वत्स ! तुम निष्काम हो कर समस्त भोगों का सुख लो और अन्त काल में मेरे ही धाम को प्राप्त करोगे। हे वत्स ! सत्य कह रहा हूँ। मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ। इसलिए तुम्हारी लेखनी में निवास करता हूँ।
दो०- परहित पावन शुभ लिखा हेतु मंगल सकल जहान।
पढ़ गुन जेहि अनुसरहिं तिन्ह हियँ उपजार्उँ मैं ग्यान ॥ २१ ॥
व्याख्या - तुमने सदा परहित की पवित्र भावना से शुभ लेखन लिखा है, जो समस्त संसार के लिए मंगल का साधन है। अतः जो इसको पढ़ कर व समझ कर अनुसरण करेंगे, मैं उनके हृदय में ज्ञान पैदा करूँगा।
मोरहिं रूप हय इहँ ग्रन्था। बिगत जाति पाँति मुक्त सब पंथा ॥
इहँ ग्रन्थ मैं सदा करूँ निवासा। बचन सत्य करो मोर विश्वासा ॥
व्याख्या - यह ग्रन्थ मेरा ही रूप है तथा यह समस्त जाति व पंथों से मुक्त है। इसलिए मैं सदा इसमें निवास करता हूँ। ये मेरे सत्य वचन हैं। विश्वास करो।
इहँ ग्रन्थ चारि फल खानि। इहँ माझ मोर मरम समानी ॥
सहित श्रद्धा करहिं जेहि पाठा। जीतहहिं सहज प्रकृति आठा ॥
व्याख्या - यह ग्रन्थ धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष के चारों फलों को देनेवाला है तथा इसमें मेरा रहस्य छिपा हुआ है। जो श्रद्धापूर्वक इसका पाठ करेंगे, वे आठ प्रकार की प्रकृति को वश में कर लेंगे।
होवहिं सहज धरम आचारी। बिनुहिं प्रयास मुक्ति अधिकारी ॥
सकल विषमता छँटहिं कैसे। भानू प्रकाश नसई तम जैसे ॥
व्याख्या - नित्य पाठ करनेवाले सहज में धर्म का आचरण करने लग जाते हैं और बिना प्रयास के ही मुक्ति के अधिकारी बन जाते हैं तथा इसके अध्ययन से समस्त विषमताएँ वैसे ही हट जाती हैं, जैसे सूर्य के प्रकाश से अन्धकार मिट जाता है।
रिपु करहिं मित व्यवहारा। पल पल पावहहिं मोर सहारा ॥
सुख वैभव परिवार समाई। अनुकूल रहिं पति पत्नी सदाई ॥
व्याख्या - शत्रु भी मित्र जैसा व्यवहार करने लग जाते हैं तथा प्रति क्षण मेरा सहारा मिलने लग जाता है। परिवार में सुख-शान्ति आ जाती है तथा पति-पत्नी एक दूसरे के अनुकूल हो जाते हैं।
दो०- सागर सम गम्भीर है गंगा सम पावन ग्रन्थ।
सर्व हिताय सुलभ यह अन्धहु दिखावहिं पंथ ॥ २२ ॥
व्याख्या - यह ग्रन्थ सागर की तरह गम्भीर है तथा गंगा की तरह पावन करनेवाला है। यह सभी के हित के लिए है तथा अन्धों को भी रास्ता दिखानेवाला है।
धन्य धन्य मैं भयउँ नाथा। मोहि पर रखहिं अनुग्रह हाथा ॥
जय जय भगवन्त अनन्ता। जय जय करुणा कर मुकुन्दा ॥
व्याख्या - हे परमपिता ! मैं धन्य हो गया कि मेरे ऊपर आपने अपना कृपा हस्त रख दिया। हे भगवन् ! आपकी जय हो, हे अनन्त ! आपकी जय हो। हे करुणाकर ! हे मुकुन्द ! आपकी जय हो।
जय भवेश जय भव तारकं। जय तपेश जय माया निवारकं ॥
जय जगदीश जय सृष्टिकर्ता। जय महेश जय भव दुख हर्ता ॥
व्याख्या - हे भावों के ईश्वर ! आपकी जय हो, हे भावों से मुक्त करानेवाले आपकी जय हो। हे तप के ईश्वर, हे माया से मुक्ति दिलानेवाले प्रभु ! आपकी जय हो। हे जगत के ईश्वर ! आपकी जय हो, हे सृष्टि के रचयिता ! आपकी जय हो। हे महेश ! आपकी जय हो, हे भावों के दुःख दूर करनेवाले प्रभु ! आपकी जय हो।
जय दीन बन्धु जय असुरारी। जय पालन कर्ता जय मुरारी ॥
जय गुणागार जय गुणातीता। जय त्रिकालज्ञ जय कालातीता ॥
व्याख्या - हे दीन बन्धु ! आपकी जय हो, हे असुरारी ! आपकी जय हो, हे जगत के पालनकर्ता ! आपकी जय हो, हे मुरारी ! आपकी जय हो। हे गुणों के घर आपकी जय हो, हे गुणातीत प्रभु ! आपकी जय हो। हे त्रिकालज्ञ ! आपकी जय हो, हे काल से परे प्रभु ! आपकी जय हो।
जय भगत वत्सलं जय रक्षकम्। जय सर्वज्ञं जय सर्व सहायकं ॥
जय निर्गुण सगुणं जय निराकारं। जय अजं अजेय जग पालकम् ॥
व्याख्या - हे भक्त वत्सल भगवन ! आपकी जय हो, हे सबके रक्षक प्रभु ! आपकी जय हो। हे सर्वज्ञ ! आपकी जय हो, हे सबके सहायक प्रभु ! आपकी जय हो। हे गुणों से निर्लिप्त व गुणों से युक्त प्रभु ! आपकी जय हो। हे जन्म रहित प्रभु ! हे अजय व जगत के पालनकर्ता प्रभु ! आपकी जय हो।
जय अलखं जय निरञ्जनम्। जय माया पतिम भगत उद्धारकम् ॥
जय आनन्द कन्द जय मंगलं। जय कृपालं जय सर्व व्यापकं ॥
व्याख्या - हे अलख ! आपकी जय हो, हे निरञ्जन ! आपकी जय हो, हे मायापति ! आपकी जय हो । हे भक्तों का उद्धार करने वाले प्रभु ! आपकी जय हो । हे अजेय ! आपकी जय हो, हे जगत का पालन करनेवाले प्रभु ! आपकी जय हो । हे आनन्द के मूल प्रभु ! आपकी जय हो, हे मंगल मूर्ति प्रभु ! आपकी जय हो । हे कृपालु ! आपकी जय हो, हे सर्व व्यापक प्रभु ! आपकी जय हो ।
दो०- तुम्हे समान तुम्हीं प्रभु अरु नहिं जग दूजा कोय ।
सोहि समझहिं नाथ आपको जेहि आपुन अनुग्रह होय ॥ २३ ॥
व्याख्या - हे परमपिता ! आपके समान तो आप ही हैं प्रभु और दूसरा आपके समान कोई नहीं है । हे प्रभु ! आपको तो वो ही समझ सकता है, जिस पर आपकी अनुकंपा होती है ।
छ०- जय असुरारि जय मुरारि जय जय सृष्टि कर्ता ।
जय भगवन्ता जय अनन्ता जय जय जग भर्ता ॥
जय सुरेश जय महेश जय जय शरण सुख दाता ।
जय जगतेश जय विशेष जय जय भव दुःख त्राता ॥
व्याख्या - हे असुरारि ! आपकी जय हो, हे मुरारी ! आपकी जय हो, हे सृष्टि कर्ता भगवान ! आपकी जय हो । हे भगवन्त ! हे अनन्त ! आपकी जय हो, हे जगत के पालनकर्ता ! आपकी जय हो । हे देवताओं के ईश्वर ! आपकी जय हो, हे महा ईश्वर ! आपकी जय हो, हे शरण देनेवाले प्रभु ! आपकी जय हो । हे जगत के ईश्वर ! आपकी जय हो, हे अशेष ! आपकी जय हो, हे भावों के दुःख से मुक्त करानेवाले प्रभु ! आपकी जय हो ।
दो०- भगति ग्यानमय इहँ कथा पढ़हिं गुनहिं जेहि नर नारी ।
सत इच्छा पूर्ण सकल कृपा करहिं तिन्ह हिय असुरारि ॥ २४ ॥
व्याख्या - भक्ति और ज्ञान से पूर्ण इस कथा को जो भी स्त्री-पुरुष पढ़ कर समझेंगे, उनकी समस्त सात्विक इच्छाएँ पूर्ण हो जायेंगी तथा उन पर भगवान कृपा करेंगे ।
॥ इति श्री मानवधर्मशास्त्रस्य नाम रूप मर्मार्थम भगति ज्ञान दायकं तृतीय स्कन्ध सम्पूर्णम् ॥
॥ मानवधर्मशास्त्रस्य मासपरायण चतुर्थ पड़ाव ॥