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मानव धर्म शास्त्र - प्रथम स्कन्ध

Manav Dharma Shastra (Hindi)
मानव धर्म शास्त्र (Manav Dharma Shastra) एक सनातन धर्म ग्रन्थ है, जिसकी रचना सतगुरु Awadhoot Devidas Maharaj की दिव्य कृपा से गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी (Laxminarayan Meena, IPS) ने की है। यह ग्रन्थ प्रथम बार 2013 में हिन्दी में, 2022 में अंग्रेज़ी में तथा 2023 में बांग्ला में प्रकाशित हुआ (प्रकाशक: Kirti Publication; ISBN: 978-81-965006-1-0) ॐ गुरुदेवाय नमः ॐ परमात्मने नमः प्रथम स्कन्ध ॐ सृष्टि मूलं करुणाधामं सहज दयालं अखिलेश्वरं । सर्वव्यापकम् आनन्दस्वरूपम् परमेश्वरम् नमो नमः ॥ १ ॥ व्याख्या - सृष्टि के मूल, करुणा के धाम, सहज में ही दया करनेवाले, समस्त ब्रह्माण्ड के ईश्वर, आनन्द के रूप में सर्वत्र व्यापक हे परमपिता! मैं आपको नमन करता हूँ। ॐ जन्म मरण रहितं अद्वितीयम् अखण्डं निरविकारम् चैतन्यम् । सर्व विभूतिधारकम् विश्वेश्वरम् अहम् त्वमेव शरणम् ॥ २ ॥ व्याख्या - जन्म-मरण से रहित, अद्वितीय, अखण्ड, निर्विकार, चैतन्य एवं समस्त विभूतियों को धारण करनेवाले, हे जगत के ईश्वर! मैं आपकी शरण में आया हूँ। दो० - तुम समान जग दूजा नहिं, तुम्हीं नाथ तुम्हार समान । दौ कर जोरि विनती करूँ अब द्रवहु कृपानिधान ॥ १ ॥ व्याख्या - हे परमपिता! आपके समान संसार में और कोई नहीं है। आपके समान तो प्रभु केवल आप ही हैं। हे कृपानिधान! मैं दोनों हाथ जोड़ कर आप से प्रार्थना करता हूँ कि आप मेरे ऊपर अनुकंपा कीजिए। दीन दयाल प्रभु सहज कृपालु । लेहउ शरण अब मोहि दयालु ॥ तुम्हहीं छाड़ि नहिं कोऊ दूजा । मम हृदय नहिं भगति न पूजा ॥ व्याख्या - हे परमपिता! आप तो दीनों पर दया करनेवाले और सहज में ही अनुकंपा करनेवाले हैं। अतः मुझे आपकी शरण में ले लीजिए। हे प्रभु! आपको छोड़ कर मेरा और कोई सहारा नहीं है। परन्तु मेरे हृदय में न तो भक्ति-भाव ही है और न पूजा का भाव है। कपटी कुटिल मैं महा अभिमानी । क्षमा करहउ नाथ मोर नादानी ॥ तुम सहज सरल हितकारी । सो जानि आयहुँ शरण तिहारी ॥ व्याख्या - हे प्रभु! मैं कपटी, कुटिल और महा अभिमानी हूँ। अतः हे नाथ! मेरी नादानी क्षमा कर दो। हे परमपिता! आप सहज, सरल और हित करने वाले हैं। अतः यह जान कर मैं आपकी शरण में आया हूँ। स्वारथ हेतु जगत मैं जाना । निगम-पुराण सकल बखाना ॥ बिनु स्वारथ किछु नहिं जग माहिं। काह संभव परमारथ चलाहिं ॥ व्याख्या - हे प्रभु ! स्वार्थ के कारण जगत आभासित होता है । वेद-पुराण और सभी संत जन ऐसा ही कहते हैं । बिना स्वार्थ के संसार में कुछ भी नहीं है । तब ऐसी अवस्था में क्या परमार्थ पर चलना सम्भव हो सकता है ? छन्द बन्द किछु नहिं ग्याना । मोहि सम नहिं जग अग्याना ॥ चाह बड़ मोर बुद्धि अति छोटी । स्वारथ रत करणी खोटी ॥ व्याख्या - हे प्रभु ! मुझे छन्द आदि का कोई ज्ञान नहीं है और संसार में मेरे समान कोई अज्ञानी भी नहीं है । हे परमपिता ! मेरी चाह तो बहुत बड़ी है । परन्तु मेरी बुद्धि बहुत छोटी है और स्वार्थ के कारण मेरे कर्म भी बहुत खोटे हैं । जानइ दयाल करूँ हठधर्मी । क्षमहउ नाथ जद्यपि कुकर्मी ॥ स्वारथ हेतु करहुँ सब कर्मा । जानहउँ नहिं काह मोर धर्मा ॥ व्याख्या - हे परमपिता ! आपको दयालु जान कर ही हठ कर रहा हूँ कि मुझे क्षमा कर दीजिए । हालांकि मैं कुकर्म करनेवाला ही हूँ । हे प्रभु ! मैं तो सब कर्म स्वार्थ के लिए ही करता हूँ और मैं जानता भी नहीं हूँ कि मेरा क्या धर्म है । दो०- मोहि सम नहिं कोऊ स्वारथी परमारथी नहिं तोर समान । क्षमा करहु नाथ सोहि अब जानि कपटी कुटिल अग्यान ॥ २ ॥ व्याख्या - हे परमपिता ! मेरे समान संसार में कोई स्वार्थी नहीं है और आपके समान कोई परमार्थ करनेवाला नहीं है । इसलिए मुझे कपटी, कुटिल और अज्ञानी जान कर क्षमा कर दीजिए । तोर चरण करहुँ इक अरजी । निज छाड़ि सकल खुद गरजी ॥ कृपा करि देवहु हियँ विवेका । होई सम्भव परमारथ अनेका ॥ व्याख्या - हे परमपिता ! मैं आपके चरणों में अपने समस्त स्वार्थों को छोड़ कर प्रार्थना करता हूँ कि मेरे हृदय में ऐसा विवेक पैदा कर दीजिए, जिससे परमार्थ सम्भव हो सके । परहित काव्य होवहि रचना । सो करहु कृपा जानि मोहि अपना ॥ सरल सरस जनु हितकारी । देवहिं जो पुरुषार्थ फल चारी ॥ व्याख्या - हे परमपिता ! परमार्थ के लिए ऐसे काव्य की रचना हो सके, जो सरल, सरस और जन कल्याण करनेवाली हो तथा धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष के चारों फलों को देनेवाली हो । अतः आप मुझे आपका अपना समझ कर, मुझ पर अनुकंपा कीजिए । जाति पंथ नहिं होवहहि भेदा । पढ़हिं-सुनहि मिटावहि खेदा ॥ पल पल प्रभु तोर याद दिलाई । करि दया ऐसी देहउ लिखाई ॥ व्याख्या - हे परमपिता ! कृपा करके ऐसी काव्य रचना करवा दीजिए, जिसमें जाति व पंथों का भेद नहीं हो तथा पढ़ने व सुनने से ही कष्टों का निवारण हो जाए तथा क्षण-क्षण आपकी याद दिलाये । बुद्धि विवेक नहिं बल हिय मोरे । सकल सम्भव अनुग्रह तोरे ॥ कृपा तुमार सफल सब काजा । शरण तिहारी रखहउ लाजा ॥ व्याख्या - हे प्रभु ! बुद्धि और विवेक का बल मेरे हृदय में नहीं है। केवल आपकी अनुकंपा से ही सब सम्भव हो सकता है। हे प्रभु ! आपकी कृपा से ही समस्त कार्यों में सफलता मिलती है । अतः मेरी लाज रखिए । मैं आपकी शरण में हूँ । दो० - राज धर्म लिखत चाहूँ जो परमारथ पथ दिखलाय । राजा अरु प्रजा जे पालहिं उभय आनन्द सागर नहाय ॥ ३ ॥ व्याख्या - मैं यहाँ ऐसे धर्म के रहस्य को लेखनीबद्ध करना चाहता हूँ, जो परमार्थ की राह दिखानेवाला हो तथा राजा और प्रजा अगर पालन करें, तो दोनों आनन्द के सागर में स्नान कर सकें अर्थात अपार आनन्द की प्राप्ति कर सकें । सत् धर्म आज अति दरकारा । बिनु ताइ मिटहिं नहिं विकारा ॥ छल छद्म दम्भ कपट अपारा । राजा प्रजा उभय भयउ लाचारा ॥ व्याख्या - आज सत् धर्म के पालन करने की बहुत आवश्यकता है । क्योंकि बिना सत् धर्म के समाज के विकारों का नाश नहीं हो सकता है । आज समाज में छल-छद्म, दम्भ, कपट बहुत बढ़ गये हैं । जिससे राजा और प्रजा दोनों असहाय हो गये हैं । राजा बनइ बिनु जानइ नीति । धरम न पालहिं करइ अनीति ॥ नृप खोजहिं जुगति प्रजा शोषण । दुष्कृत बहु हेतु निज पोषण ॥ व्याख्या - आज बिना नीति जाने राजा बन रहे हैं । इसलिए राज धर्म का पालन नहीं करके अन्याय के रास्ते पर चल रहे हैं । आज राजा सब समय अपनी प्रजा के शोषण के उपाय खोजता रहता है और स्वयं का स्वार्थ पूरा करने के लिए बहुत से बुरे कार्य करता है । निसि-दिवस नृप करइ चतुराई । प्रजा मूढ़ जानइ नहिं नृपताई ॥ करहिं मन मानि बनइ भूपा । प्रजा बिकल परइ अंध कूपा ॥ व्याख्या - आज कल राजा रात-दिन चालाकी करता रहता है और अज्ञानतावश प्रजा राजा की कूटनीति को जान नहीं पाती है । राजा बनने के बाद मन-मानी करता है और प्रजा व्याकुल होकर अज्ञान रूपी अंधकार में भटक रही है । आतंक बहुरि बढ़हिं समाजा । स्वारथ अंध हो बैठई राजा ॥ मार काट बहु छद्म छलावा । अकारण सरिता रक्त बहावा ॥ व्याख्या - आज समाज में बहुत आतंक बढ़ रहा है और राजा स्वार्थ में अन्धा होकर बैठा है। समाज में मार-काट और झूठ-फरेब का बोलबाला हो रहा है तथा बिना कारण ही खून की नदियाँ बह रही हैं। दो० - हिंसा प्रति हिंसा बहुत जगत में, विषमता आकाश छुवाय । इक दिगू भण्डार कोटि भरा, दूजा दिकू उदर न भर पाय ॥ ४ ॥ व्याख्या - आज संसार में बहुत हिंसा-प्रतिहिंसा बढ़ रही है तथा विषमता आकाश को छू रही है। एक तरफ तो करोड़ों भंडार भरे पड़े हैं और दूसरी तरफ लोग भूखे मर रहे हैं। राज काजी भयउ भ्रष्ट आचारी । नीति बिमुख प्रजा अहित कारी ॥ लोक शाही बनइ शोषण यन्त्र । जनहित वादा सोइ बना मन्त्र ॥ व्याख्या - आज राज कर्मचारी भ्रष्ट आचरण करनेवाले हो गये हैं और नीति त्याग करके जनता का नुकसान करनेवाले बन गये हैं। लोकतन्त्र जनता के शोषण का यन्त्र बन गया है और जन-कल्याण का वादा करना ही शोषण करने का मन्त्र हो गया है। लोक संस्था सब भई असहाई । दशा दुर कहि सकहि न जाई ॥ बिकइ न्याय जिमि हाट बाजारा । धन सन्मुख भयउ असहारा ॥ व्याख्या - समस्त लोक संस्थाएँ असहाय-सी हो गयी हैं, उनकी दुर्दशा का वर्णन नहीं किया जा सकता है। आज न्याय हाट के बाजार की तरह बिक रहा है तथा न्याय पूर्णतः धन-बल के सामने असहाय हो गया है। धन अरु पद लालसा बढ़ाई । सत् असत् ताते भेद मिटाई ॥ सेवक बनि करहिं पाखण्डा । जद्यपि हियँ स्वारथ अखण्डा ॥ व्याख्या - धन और पद की लालसा बढ़ गयी है। जिससे सत्य-असत्य का भेद मिट गया है। जनसेवक बन कर पाखण्ड करते हैं। हालांकि उनके हृदय में प्रबल स्वार्थ ही छिपा रहता है। पंथ कुपंथ भयउ इकसारा । वाद बहु बिकल भा जग सारा ॥ जाति धरम भाषा नस्ल भेदा । सकल भयउ हेतु जग खेदा ॥ व्याख्या - मार्ग-कुमार्ग सब एक जैसे हो गये हैं तथा बहुत से वादों के कारण सारा संसार अशान्त हो रहा है। जातिवाद, धर्म, भाषावाद व नस्ल भेद के कारण संसार में अशान्ति पैदा हो रही है। दो० - सब जगत विवश भया मुक्ति मार्ग नहिं दिखत कोय । नाम धर्म फसाद हुआ पल-पल हिंसा-प्रतिहिंसा होय ॥ ५ ॥ व्याख्या - सारा संसार विवश हो गया है और इस विवशता से मुक्त होने का कोई रास्ता दिखाई नहीं पड़ रहा है । धर्म के नाम पर झगड़ा हो रहा है । जिससे पल-पल हिंसा-प्रतिहिंसा की घटनाएँ घट रही हैं। लुप्त साधु सज्जन सत धर्मा । बढ़त दुष्ट जन अशुभ कर्मा ॥ नारी विवश भई वासना साधन । नित घटित बहु निरजातन ॥ व्याख्या - आज साधु, सज्जन और सत् धर्म लोप हो रहा है और समाज में दुष्ट लोग और अशुभ कर्म बढ़ रहे हैं । नारी वासना का साधन बन गयी है और नित्य प्रतिदिन बहुओं पर अत्याचार हो रहे हैं। पति-पत्नी माझ बढ़हि कटुता । उभय मिलि करहि दुष्टता ॥ उभय न मानहिं गृहस्थ धर्मा । गृह कटुता हेतु दम्भ कर्मा ॥ व्याख्या - पति-पत्नी के बीच कटुता बढ़ रही है और दोनों ही एक दूसरे के प्रति दुष्टता का व्यवहार कर रहे हैं । दोनों ही गृहस्थ धर्म का पालन नहीं कर रहे हैं और काज-कर्म में दम्भ के कारण गृहस्थ जीवन में कटुता बढ़ रही है । मातृ-पितु करहिं न सेवकाई । भयउ अलग सुत ले लुगाई ॥ कर्तव्य न पालहि चाह अधिकारा । केहि विधि मिटहिं समाज विकारा ॥ व्याख्या - माता-पिता की पुत्र सेवा नहीं कर रहे हैं और अपनी स्त्री को लेकर माता-पिता से अलग हो जाते हैं । कोई भी कर्तव्यों का पालन नहीं करना चाहता है । परन्तु अपने अधिकारों की चाह सब समय रखते हैं । ऐसी अवस्था में समाज की विकृति कैसे दूर हो सकती है ? धन अरु भुज बल चलइ राजा । नीति विगत होवहिं सब काजा ॥ लोलुप लम्पट अरु व्यभिचारी । सोइ जानइ बड़ राज आचारी ॥ व्याख्या - आज राज्य का संचालन धन बल और भुज बल के आधार पर हो रहा है और राज्य के कार्य बिना नीति के ही हो रहे हैं । जो लोलुप, लम्पट और व्यभिचारी होता है, उसी को बड़ा राजनीतिज्ञ माना जाता है । दो०- लोभ लालसा बहु प्रबल राजा प्रजा उभय लिपटाय । जनहित सपनेउ नहिं निज स्वारथ रहा सताय ॥ ६ ॥ व्याख्या - समाज में लोभ और लालसा बहुत प्रबल हो रहे हैं तथा राजा और प्रजा दोनों ही लोभ-लालच में फँसे हुए हैं । परमार्थ (जन कल्याण) की बात कोई सपने में भी नहीं सोचता है और स्वार्थ की भावना सबको सता रही है । नीति परायण अति अल्प सुजाना । करहिं दुष्ट पल-पल अपमाना ॥ भल मानुष मन भयउ कुण्ठा । सहहिं अनीति करहिं न ठण्ठा ॥ व्याख्या - नीति पर चलनेवाले लोग बहुत कम हो गये हैं तथा दुष्ट प्रवृत्ति के लोग सज्जन लोगों का क्षण-क्षण अपमान करते रहते हैं । सज्जन लोगों के मन कुण्ठित हो गये हैं । इसलिए अपमान सह लेते हैं, परन्तु दुष्टों से झगड़ा नहीं करते हैं । दया दान अरु पर उपकारा । दिखावा प्रबल नहिं ज्ञान आधारा ॥ स्वारथ हेतु करहिं सेवकाई । नहिं सहज कोउ लोग लुगाई ॥ व्याख्या - दया, दान और परोपकार करने के पीछे केवल दिखावे का भाव ही प्रबल रहता है । ज्ञान के आधार पर कोई भी दया, दान व परोपकार नहीं करते हैं । स्वार्थ के कारण ही सेवा करने का दिखावा किया जा रहा है । वास्तव में तो कोई भी स्त्री-पुरुष सहज होकर सेवा नहीं करते हैं । प्रवचन करहिं मर्म न जानहिं । बनि गुरु निज सर्वज्ञ मानहिं ॥ अहम ब्रह्मास्मि कह बखानहिं । निज अज्ञ पर सर्वज्ञ जनावहिं ॥ व्याख्या - प्रवचन करते हैं, परन्तु प्रवचन का रहस्य नहीं जानते हैं तथा गुरु बन कर स्वयं को सब कुछ जाननेवाला मानते हैं । स्वयं को ही ब्रह्म बताते हैं जबकि स्वयं अज्ञानी होते हैं, परन्तु स्वयं को लोगों के सामने सब कुछ जाननेवाला ही बताते हैं । बहु पाखण्ड भयउ समाजा । शोषण चरम करहिं न लाजा ॥ अधम निलज्ज बनि बैठहिं राजा । तब केहि विधि होवहिं सुकाजा ॥ व्याख्या - समाज में बहुत पाखण्ड हो गया है तथा शोषण चरम सीमा पर पहुँच गया है । परन्तु किसी को भी शर्म नहीं आती है। आज अधम व निर्लज्ज लोग राजा बन बैठे हैं, तब कैसे अच्छे कार्य समाज में हो सकते हैं ? दो०- लघु अरु बड़ राज गुमास्ता सकल भयउ चाटुकार । निज स्वारथ प्रबल अति केहि विधि करहिं उपकार ॥ ७ ॥ व्याख्या - आज राजा के समस्त छोटे-बड़े प्रतिनिधि चापलूस हो गये हैं और उनके अन्दर स्वार्थ बहुत प्रबल हो गया है । तब ऐसी अवस्था में कैसे लोक कल्याण हो सकता है ? धनवन्त गृह संग्रह विराटा । निर्धन न दाल जुरहिं न आटा ॥ पूंजीपति करहिं शोषण कंगाला । उभय भोगहिं नरक विशाला ॥ व्याख्या - धनवानों के घर में आवश्यकता से अधिक जमा किया हुआ है । परन्तु गरीब दाल-रोटी भी नहीं जुटा पाता है । पूंजीपति गरीबों का शोषण करते हैं । इसलिए गरीब व अमीर दोनों चिन्ता रूपी नरक भोगते हैं । अति संग्रह सोउ कष्टदायक । क्षुधा उदर सोउ भयवायक ॥ गरीब-अमीर बहु गहरी खाई । बढ़त नित्य हेतु नृपताई ॥ व्याख्या - आवश्यकता से ज्यादा संग्रह भी कष्ट देनेवाला होता है तथा पेट की भूख भी भयानक कष्ट देनेवाली होती है । गरीब और अमीर के बीच बहुत गहरी खाई है, जो राजनीति के कारण नित्य बढ़ती जा रही है । नित मरहिं मानुष कीट समाना । बहुरि अतिचार हेतु अग्याना ॥ गृह अभाव यद्यपि अन्न दाना । पर भरहिं दम्भ इन्द्र समाना ॥ व्याख्या - आज अज्ञान के कारण बहुत अत्याचार बढ़ रहे हैं तथा मनुष्य कीट-पतंगों की तरह मर रहे हैं । घर में लोगों के पास चाहे खाने को दाना नहीं है, परन्तु दम्भ इन्द्र के समान भरते हैं । बात बात कहहिं बात सवाला । महामूढ़ पालहिं अज्ञान विशाला ॥ जे देहवहिं सीख लागइ गाली । कर्म कुटिल सदा भाव कुचाली ॥ व्याख्या - मूर्ख लोग बहुत अज्ञान में फँसे हुए हैं और बातों ही बातों में अपनी बातों का सवाल बनाते रहते हैं अर्थात झूठा दम्भ भरते रहते हैं तथा ऐसे लोगों को अगर अच्छी सलाह भी दी जाय, तो वह भी गाली के समान लगती है । ऐसे लोग बुरे कर्म करते रहते हैं तथा मन में कुचाल ही सोचते रहते हैं । दो० - पर अपमान मान समझि मूढ़ करहिं अभिमान । मानव धर्म जानइ नहिं दुःख सागर फँसहि अज्ञान ॥ ८ ॥ व्याख्या - दूसरों के अपमान को ही दुष्ट लोग अपना सम्मान समझते हैं । ऐसे मूर्ख लोग इन्सानियत को नहीं जानते हैं तथा दुःख रूपी सागर से बाहर नहीं निकल पाते हैं । राजा प्रजा उभय उलझ परहिं । मन उत्ताल शान्ति बिस्मरहिं ॥ बिनु प्रजा सुधरहिं नहिं राजा । बिनु राज न बनहिं सुसमाजा ॥ व्याख्या - आज समाज व राज व्यवस्था इतनी जटिल हो गयी है, जिसके कारण शान्ति स्वप्न बन कर रह गयी है । बिना समाज सुधार के राज्य व्यवस्था नहीं सुधर सकती है और बिना अच्छी राज व्यवस्था के समाज नहीं सुधर सकता है। राजा प्रजा करहिं प्रति आरोपा । सत धरम दिखावहिं आलोका ॥ प्रभु प्रेरहउ मम हियँ माहिं । राज धर्म जन हित सकूँ बताहिं ॥ व्याख्या - प्रजा और राजा आज आपस में एक दूसरे को दोष दे रहे हैं । अतः ऐसी अवस्था में केवल सत्‌धर्म ही दोनों (प्रजा और राजा) को सही रास्ते पर ला सकता है। अतः हे परमपिता ! मेरे हृदय में सत्‌धर्म को समझाने की प्रेरणा कर दीजिए, जिससे मैं जन कल्याणकारी सत्‌धर्म का वर्णन कर सकूँ। परमारथ हेतु लिखउ सारा। करहउँ हियँ प्रेरणा अपारा ॥ हियँ तुम्हार मरम बुझाउँ। राजा प्रजा उभय हित कराउँ ॥ व्याख्या - हे वत्स ! तुम परमार्थ की भावना से लिखना शुरू करो, मैं तुम्हारे हृदय में सत्‌धर्म की प्रेरणा कर देता हूँ । मैं तुम्हारे हृदय में ही सत्‌धर्म के मर्म को समझाऊँगा। जिसका पालन करने से राजा व प्रजा दोनों का कल्याण होगा। कृपा तुम्हार बहुरि आभारी। जानिन चाहउँ मरम अपारी ॥ वर्तमान काह तुम उपजाई। जा फिर निज इहँ प्रगटाई ॥ व्याख्या - हे परमपिता ! मैं आपकी अनुकंपा का बहुत-बहुत आभारी हूँ । अब मैं जानना चाहता हूँ कि वर्तमान व्यवस्था कैसे पैदा हुई है ? क्या यह वर्तमान व्यवस्था आपने पैदा की है या फिर अपने आप प्रकट हुई है ? दो०- तुम नहिं उपजाए जगत को तो कैसे प्रगटहिं अपनेउ आप। काह मूल भयउ तब कृपा करि समझावउ मोहि तात ॥ ९ ॥ व्याख्या - अगर यह वर्तमान राज व समाज व्यवस्था आपने पैदा नहीं की है, तो यह स्थिति अपने-आप कैसे पैदा हो गयी है ? आप कृपा करके मुझे समझाइए कि आप की मूल व्यवस्था क्या थी ? राजा प्रजा काह भयउ अधिकारा। मूल अवस्था काह कर्त्तव्य अपारा ॥ काह आचरण कीन्ह सम्राटा। पावहिं प्रजा सन्मान विराटा ॥ व्याख्या - मूल प्राकृतिक अवस्था में राजा व प्रजा के क्या दायित्व व अधिकार थे? राजा किस प्रकार व्यवहार करता था, जिससे प्रजा राजा का सम्मान करती थी ? प्रजा पालहिं जो विधि व्यवहारु। केहि विधि सम्भव इहँ आचारु ॥ जाति पंथ ऊँच-नीच मत नाना। कैसे उपजै घृणादि अग्याना ॥ व्याख्या - समाज में कानून व आचरण विधि का लोग कैसे पालन करते थे? जाति व ऊँच-नीच की भावना समाज में कैसे पैदा हुई तथा घृणा और संघर्ष का वातावरण कैसे बना ? तुम सर्वज्ञ प्रभु शक्तिशाली। काह हेतु न बचाई विधि निराली ॥ बाल वृद्ध पुरुष अबला नारी। भ्रमहि सब दुःख सिन्धु अपारी ॥ व्याख्या - हे परमपिता ! आप सर्वशक्तिशाली हैं । फिर भी आप आपकी मूल आनन्द की व्यवस्था को क्यों नहीं बचा पाये ? आज जिसके कारण बाल-वृद्ध, स्त्री-पुरुष सब लोग दुःख रूपी सागर में फँस गये हैं ? काह प्रभु तुम्हार मूल सिखावन । काह भयी भाषा हेतु समझावन ॥ केहि हेतु प्रगटई भाषा नाना । विखण्ड समाज हेतु अग्याना ॥ व्याख्या - हे परमपिता ! आपकी मूल शिक्षा व्यवस्था क्या थी तथा आपकी मूल भाषा क्या थी तथा विभिन्न प्रकार की भाषाएँ कैसे पैदा हो गयीं ? जिससे अज्ञानता के कारण समाज की एकता खण्डित हो गयी है । दो० - नारी भोग वस्तु बनी चरम यौन दुराचार । काह विधि तुम्हार भयी काह अबहु उपचार ॥ १० ॥ व्याख्या - आज यौन सम्बन्धों के कारण नारी की दुर्दशा हो रही है। इस सम्बन्ध में आपकी मूल व्यवस्था क्या थी तथा वर्तमान समस्या का क्या उचित समाधान हो सकता है ? केहि विधि उद्भव परिवारा । काह उत्तम पति-पत्नी आचारा ॥ निसि दिवस बढ़त कटुता भारी । कारन कवन कहउ असुरारी ॥ व्याख्या - हे परमपिता ! पति-पत्नी के सम्बन्धों का उचित आधार क्या है ? तथा परिवार संस्था की उत्पत्ति कैसे हुई ? तथा आज पति-पत्नी व पारिवारिक सम्बन्धों में कटुता बढ़ती जा रही है। हे परमपिता ! इसका कारण क्या है ? रहइ समता सकल परिवारा । काह उपाई जन जन मधु आचारा ॥ सर्व अंग पाव विकास समाजा । सो सब कहवउ होइ सुकाजा ॥ व्याख्या - परिवार में समरसता रहे तथा व्यक्ति सम्बन्धों में मधुरता किस प्रकार लाई जा सकती है ? परिवार व समाज की सर्वांगीण समृद्धि, सम्पन्नता व शक्ति किस प्रकार बढ़ाई जा सकती है ? ये सब उपाय बताइए, जिससे अच्छे कार्य हो सकें। काह व्यवहार उचित नातेदारी । कैसे बचहिं मोह कुटुम्ब अपारी ॥ भाषा सरल प्रभु मोहि समझाई । जन-जन सोइ सकहउँ बताई ॥ व्याख्या - नातेदार और रिश्तेदारों के साथ किस प्रकार का व्यवहार किया जाना चाहिए तथा किस प्रकार परिवार की मोह रूपी व्याधि से बचा जा सकता है ? हे प्रभु ! मुझे सरल भाषा में समझा कर बताइये, जिससे मैं जन-साधारण को बता सकूँ । कृषि - उद्योग अरु व्यवसायि । काह विधि उचित कहहु समझाई ॥ जीव न परहिं संग्रह विकारा । करहिं विकास सहज आचारा ॥ व्याख्या - कृषि, उद्योग और व्यवसाय की क्या व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे मनुष्य परिग्रह की बुराई से बच सके तथा सहज बन कर विकास के कार्यों में लगा रहे ? दो० - कैसे आवइ समता समाज में मिट सकइ भेद अपार । न धनवन्त न कंगाल रहे सब मिल करहिं प्यार ॥ ११ ॥ व्याख्या - हे परमपिता ! समाज में समानता कैसे लाई जा सकती है? जिससे भेद-भाव मिट सकें तथा समाज में कोई गरीब व अमीर नहीं रहे तथा सभी लोग मिल कर प्रेम के साथ रह सकें । चहुँ दिस भागम भाग मचाई । भय अरु हताशा जीव फँसाई ॥ करि दाया प्रभु मोहि देउ बताई । निशंक निर्भय आनन्द मिलाई ॥ व्याख्या - आज की भाग-दौड़ की जिन्दगी से मनुष्य भय और हताशा में फँसता जा रहा है । अतः ऐसा कोई उपाय बताइए, जिससे जीव निर्भय और आनन्द के साथ जीवन को जी सके । क्रोध मोह घृणा अरु निन्दा पराई । छल छद्म चहुँ दिसि रहइ छाई ॥ सरल सहज उपाय बताओ । जीव ताते निज लहई बचाऊ ॥ व्याख्या - क्रोध, पराई निन्दा, घृणा, कटुता, छल-छद्म आदि बुरे भावों से कैसे जीव अपने आपको बचाए, इसका कोई सरल और सर्वग्राही उपाय बताइए । जप तप अरु संयम आचारा । नहिं सम्भव आज व्यवहारा ॥ आहार विहार तामस अधिकाई । जोग जग्य नहिं किछु उपाई ॥ व्याख्या - हे परमपिता ! आज जप-तप और संयम सांसारिक जीवन में सम्भव नहीं हो पा रहे हैं । आज खान-पान और व्यवहार में तामसिकता बढ़ गयी है । जिससे योग व यज्ञ आदि का कोई उपाय नहीं है । परबस जीव सकल गुँसाई । निज भूलि पर रहहिं फँसाई ॥ प्रभु देउ मारग सरल बताई । भाषा बद्ध जाइ सकउँ कराई ॥ व्याख्या - हे परमपिता ! आज समस्त जीव एक दूसरे के अधीन हो रहे हैं तथा स्वयं को भूल कर दूसरे के व्यवहार से प्रभावित हो रहे हैं । अतः प्रभु कोई सरल रास्ता बता दीजिए, जिसे मैं लिख सकूँ । दो० - निर्मल मन नयन बन्द करि धरहुँ हिय ध्यान तुम्हार । राज धर्म मोहि समझाऊ जन जन होइ उपकार ॥ १२ ॥ व्याख्या - मैं मन को निर्मल करके हृदय में आप का ध्यान करता हूँ । हे परमपिता ! मेरे हृदय में धर्म के रहस्य को समझा दीजिए, जिससे प्रत्येक जीव का कल्याण हो सके । तुम प्रभु दयाल प्रेरणा दायक । जीव अरु जगत उभय नायक ॥ मम हिय जेहि आवइ विचारा । लिखहुँ सकल मति अनुसारा ॥ व्याख्या - हे परमपिता ! आप प्रेरणा देने वाले हैं तथा आप ही जीव और जगत दोनों के स्वामी हैं । मेरे हृदय में अब जो भी विचार आ रहे हैं, उनको मेरी बुद्धि के अनुसार लिख रहा हूँ । तुम दयाल मैं शरण तिहारी । करहु कृपा मोहि जानि गँवारी ॥ सर्वज्ञ प्रभु सकल हियँ जानी । क्षमहउ मोहि जानि अग्यानी ॥ व्याख्या - हे परमपिता ! आप दयालु हैं । मैं आपकी शरण में आया हूँ । इसलिए मुझे मूर्ख समझ कर कृपा कीजिए । हे प्रभु ! आप सबके हृदय की बात जाननेवाले हैं । अतः मुझे अज्ञानी समझ कर, मेरे सब अपराध क्षमा कर दीजिए । कर जोरि करहउँ अब निहोरा । मन बुद्धि जानि सकल प्रभु तोरा ॥ तुम समान नहिं कोउ जग दूजा । सोइ जानि करहउँ मानस पूजा ॥ व्याख्या - हे प्रभु ! मेरे मन व बुद्धि सब आप ही के हैं । अतः मैं हाथ जोड़ कर निवेदन करता हूँ । आपके समान संसार में कोई दूसरा नहीं है । मैं यह जान कर मन में ही आप की पूजा करता हूँ । तुम्हीं जगत तुम्हीं जग नायक । तुम्हीं जीव तुम्हीं जीव पायक ॥ तुम्हीं ग्यान तुम्हीं ग्यान दायक । काह कहूँ प्रभु तुम सब नायक ॥ व्याख्या - हे परमपिता ! आप ही जगत हैं और आप ही जगत के स्वामी हैं । हे प्रभु ! आप ही जीव हैं तथा आप ही जीव के सहायक हैं । आप ही ज्ञान रूप हैं तथा आप ही ज्ञान देनेवाले हैं । हे परमपिता ! मैं क्या कहूँ ? आप तो सबके मालिक हैं । दो० - तुम गुरु मैं शिष्य प्रभु आवहूँ सब तजि शरण तिहार । गुरु-शिष्य संवाद करहिं द्रष्टा बनि होवउँ लेखनहार ॥ १३ ॥ व्याख्या - हे परमपिता ! आप ही मेरे गुरु हैं तथा मैं आपका शिष्य हूँ । इसलिए सब कुछ छोड़ कर, मैं आपकी शरण में आया हूँ । अब गुरु-शिष्य संवाद शुरू कीजिए । जिसको मैं द्रष्टा बन कर लिखता रहूँ । त्वम मम सुत उभय अभेदा । माया हेतु बनहिं इहँ जग भेदा ॥ अब तोहि कहउँ असल कहानी । सुनत मिटहिं सकल नादानी ॥ व्याख्या - हे वत्स ! तुम और मैं तो दोनों एक ही हैं । माया के कारण इस संसार में भेद दिखाई पड़ रहा है । अब मैं तुमको मेरी मूल कथा बताता हूँ, जिसको सुनने से सब प्रकार का अज्ञान मिट जाता है । होई संशय जो सुत मन माहि । तुरत सो मोहि देइब जनाहिं ॥ भ्रम सकल मिटाउँ सुत क्षण में । मोर दास समझाउँ तोरे मन में ॥ व्याख्या - हे वत्स ! तुम्हारे मन में अगर कोई शंका हो, तो मुझे तुरन्त बता देना । मैं तेरे समस्त संशयों को क्षणमात्र में दूर कर दूँगा । हे वत्स ! तू मेरा दास है, इसलिए मैं तेरे मन में ही सब कुछ समझा कर कहूँगा । मैं जग सृजक पालक संहारी । द्रष्टा बनि रहउँ असुरारी ॥ सकल सृष्टि मम उपजाई । जीव चराचर सकल सुहाई ॥ व्याख्या - हे वत्स ! मैं ही इस संसार का सृजन कर्ता, पालन कर्ता और संहार करनेवाला हूँ । मैं हमेशा द्रष्टा बन कर प्रकृति पार (असुरारि) अवस्था में रहता हूँ । ये समस्त सृष्टि मेरे द्वारा पैदा की गयी है । जिसमें समस्त चराचर के जीव आते हैं । तुम सकल प्रभु काह प्रमाणा । काह नाम धाम कहाँ अस्थाना ॥ जानिन काह तुम्हार उपाई । कहऊ समझाई मोर गुँसाई ॥ व्याख्या - हे परमपिता ! आप ही जगत के सब कुछ हैं । इसका क्या प्रमाण है तथा आपका नाम क्या है तथा आपके रहने का स्थान कहाँ है ? हे प्रभु आपको जानने का उपाय क्या है ? कृपा करके मुझे समझा कर कहिए । दो० - मोर परिचय प्रमाण सकल तबहिं मिलै नाम अरु धाम । जो पहिचानहिं मुझको ताहि देउँ भगति निष्काम ॥ १४ ॥ व्याख्या - हे वत्स ! मेरा परिचय ही मेरा प्रमाण है कि मैं जगत का मूल हूँ । मेरा परिचय होने पर ही मेरे नाम और धाम का रहस्य समझ में आता है । जो कोई मुझको पहचान लेता है, उसको मैं दुर्लभ निष्काम भक्ति प्रदान करता हूँ । निज चिन्हहिं जेहि जानई मोहि । दूसरा उपाई नहिं जग कोहि ॥ निज मन निज परिचय कराई । मारग सरल देहवउँ बताई ॥ व्याख्या - जो स्वयं को पहचानते हैं, वे लोग ही मुझे जान पाते हैं और मुझे जानने का कोई उपाय नहीं है । हे वत्स ! स्वयं का मन ही स्वयं का परिचय कराता है । स्वयं को जानने का तुमको बहुत सरल मार्ग बताता हूँ । भाव सकल सुत मन कहाई । प्राण सोई जननी जनक सुहाई ॥ करि ध्यान समझ अब भावा । ब्रह्म ब्रह्माण्ड समझ तव आवा ॥ व्याख्या - हे वत्स ! जीव के भाव ही मन कहलाते हैं तथा प्राण वायु से ही समस्त भावों की उत्पत्ति होती है । अतः अब तुम ध्यान करके भावों को समझने का प्रयास करो, जिससे समस्त ब्रह्माण्ड व ब्रह्म का रहस्य समझ में आ जायेगा । नयन मूँद देखि निज श्वासा । होवहिं अनुभव हियँ उजासा ॥ लगाव सुखासन बैठहु सोजा । आवत जावत सास पाव मोजा ॥ व्याख्या - आँखें बन्द कर स्वयं के श्वास को देखिए। ऐसा करने से हृदय में ज्ञान का अनुभव होने लग जाता है। हे वत्स ! सुखासन लगा कर सीधा बैठने से श्वास के आने-जाने का अनुभव करने पर शरीर में आनन्द आने लग जाता है। सुत अब करहु अनुसरना। बहवहिं हियँ ग्यान झरना॥ मम वचन करहु ना शंका। कहहुँ सत्य बजाइक डंका॥ व्याख्या - हे वत्स ! अब तुम मेरी बताई हुई विधि का अनुसरण करो। तुम्हारे हृदय में ज्ञान का स्रोत बह उठेगा। हे वत्स ! मेरे वचनों पर सन्देह मत करो। मैं तुम्हें खुल कर सत्य बता रहा हूँ। दो० - गुरु वचन प्रीत फलदायनि इहँ मम मन दृढ़ विश्वास। तोर विधि अब अनुसरहुँ करहु कृपा जानि निज दास ॥ १५॥ व्याख्या - गुरु के वचनों पर विश्वास फल देनेवाला होता है। यह मेरे मन में दृढ़ विश्वास है। अतः हे गुरुदेव ! मैं आपकी बताई हुई विधि का अनुसरण करूँगा, आप मुझे आपका दास समझ कर कृपा कीजिए। धन्य प्रभु में करइब प्रयासा। पूर्ण करहु नाथ मम अभिलाषा॥ तोहि छाडि मोर गति दूसर नाहिं। सोइ नाथ मोहि लेहहु अपनाहिं॥ व्याख्या - हे गुरुदेव ! मैं आपकी विधि के अनुसरण का प्रयास करता हूँ। कृपा करके मेरी अभिलाषा पूरी कर दीजिए। आपको छोड़ कर मेरा दूसरा कोई आधार नहीं है। अतः हे स्वामी ! आप मुझे अपना लीजिए। सुन जहाँ कहुँ अनुभव अपना। मिटहिं भ्रम जिमि जागत सपना॥ अनुभूति वर्णन अति कठिना। होई सम्भव गुरु कृपा अधिना॥ व्याख्या - हे जगत के निवासियों, मैं यहाँ अपने अनुभव का वर्णन करने जा रहा हूँ। जिसके सुनने से भ्रम वैसे ही मिट जाता है, जैसे जागने पर स्वप्न मिट जाता है। यद्यपि अनुभूति का वर्णन करना बहुत कठिन होता है। परन्तु गुरु की कृपा से यह सम्भव हो जाता है। प्रातः उठि करि मज्जन पाना। बैठि आसन कीन्ह गुरु ध्याना॥ श्वास अनुभव जब मैं कीन्हा। अद्भुत घटना परा मन चीन्हा॥ व्याख्या - सुबह उठ कर नित्य क्रियादि करके, आसन लगा कर, मैं परमपिता का ध्यान करने लगा। आसन पर बैठे हुए जब मैंने श्वास के आने-जाने का अनुभव किया, तो अद्भुत घटना घटित हुई तथा मन का परिचय होने लगा। मनहि मन अब होत विचारा। देखउँ तहँ ब्रह्माण्ड विस्तारा॥ मन माझ सकल जग समाई। निज प्रसार सो कहा न जाई॥ व्याख्या - अब ध्यान में मन ही मन में विचार करने लगा तथा मन के अन्दर ही ब्रह्माण्ड का विस्तार दिखाई देने लगा। मन के अन्दर ही समस्त संसार बसा हुआ है। स्वयं के मन के विस्तार को कहा नहीं जा सकता है। दो० - मन तें बड़ कोऊ नहिं नहिं लघु मन ते कोय। मन हेतु बन्धन परई मन तेहि मुक्ति होय ॥ १६ ॥ व्याख्या - मन से बड़ा संसार में कोई नहीं होता है तथा मन से छोटा भी कोई नहीं होता है। मन के कारण ही बन्धन पड़ता है और मन से ही मुक्ति प्राप्त होती है। भाव तें भाव पुनि भाव तें भावा। भाव सोइ भव सागर कहावा ॥ भाव ही मन मन ही सोइ भावा। मम हियँ समझ इहँ आवा ॥ व्याख्या - भावों से भाव पैदा होते हैं तथा भावों का समूह ही भवसागर कहलाता है। भाव ही मन होता है तथा मन ही भाव होता है। यह मुझे मेरे हृदय में ही समझ में आ गया। दृष्टि बनहिं भाव अनुरूपा। दिखहिं सृष्टि सोई भाव सरूपा ॥ नयन बन्द चलहिं भाव विचारा। हियँ माझ देखहूँ सृष्टि विस्तारा ॥ व्याख्या - भाव के अनुरूप दृष्टि बनती है तथा भाव के अनुरूप ही सृष्टि का स्वरूप दिखाई देता है। मेरी आँखें बन्द थीं, परन्तु भावों का विचार चलने लगा, जिससे मैंने हृदय के भीतर ही समस्त सृष्टि का विस्तार देखा। अंग अंग भ्रमण करहिं भावा। बूझहु निज देह सृष्टि समावा ॥ जहँ जहँ जावहहिं मन मोरा। देखहूँ तहँ प्रभाव प्रभु तोरा ॥ व्याख्या - ध्यान में मेरा मन (भाव) अंग-अंग में भ्रमण करने लगा, तब स्वयं के शरीर में ही समस्त सृष्टि समझ में आने लगी। मेरा मन जहाँ-जहाँ गया, वहाँ सब जगह प्रभु आपका ही प्रभाव दिखाई पड़ने लगा। देखहूँ नक्षत्र नदिया नारे। सकल भयउ देह नस जारे ॥ जो जो कल्पना मन विचारा। त्यों त्यों होई ब्रह्माण्ड विस्तारा ॥ व्याख्या - मैंने समस्त नक्षत्र, नदियाँ आदि को देखा तथा पाया कि ये सब शरीर के नस जाल का ही विस्तार मात्र है। जो कल्पना मन में आने लगी, वैसे-वैसे ही ब्रह्माण्ड का विस्तार होने लगा। दो० - कोटि कोटि ब्रह्माण्ड देह बसै कोटि कोटि सूरज चन्द। सचराचर वनस्पति बसै समझ जीव मूढ़ महामन्द ॥ १७ ॥ व्याख्या - इस शरीर में ही करोड़ों ब्रह्माण्ड बसे हुए हैं तथा करोड़ों सूर्य व चन्द्रमा भी इसी शरीर में समाये हुए हैं। चराचर जगत सहित समस्त वनस्पति भी शरीर में समाई रहती है । ये सब देख कर मेरा मन कहने लगा कि हे मूर्ख जीव, अब तो समझो । ध्यान गभीर होवन जब लागा । हृदयँ माझ विवेक तब जागा ॥ पल तें होइ अनुभव अनेका । मन दृष्टि श्वास भयउ ऐका ॥ व्याख्या - जब ध्यान गंभीरता से लगने लगा, तब हृदय के भीतर विवेक पैदा होने लगा तथा क्षण भर में बहुत अनुभव होने लगे । मन, दृष्टि व श्वास तब एक होने लग गये । समझ परहिं तब हियँ माहिं । बिनु प्राण मन अरु दृष्टि नाहिं ॥ बिनु प्राण बनहिं नहिं भावा । भाव अभाव न दृष्टि सुहावा ॥ व्याख्या - तब मेरे हृदय में समझ आ गया कि बिना प्राण शक्ति के मन और दृष्टि नहीं बन पाते हैं । बिना प्राण शक्ति के भाव नहीं पैदा हो पाते हैं तथा बिना भावों के दृष्टि नहीं बन पाती है । दृश्य बिनु नहिं जगत सुहाई । जगत अभाव न माया उपजाई ॥ मन ही जग मन जग विस्तारा । निगम-पुराण सकल पुकारा ॥ व्याख्या - बिना दृष्टि के संसार का आभास नहीं होता है तथा बिना संसार के माया पैदा नहीं हो पाती है । इसलिए वेद-पुराण सभी ने कहा है कि मन ही जगत होता है तथा मन के अनुरूप ही संसार का विस्तार होता है । ध्यान माझ बुझहु मन खेला । जग सकल हेतु मन अकेला ॥ करहिं मन हियँ भाव दीवारा । भूलहिं जीव जगत करतारा ॥ व्याख्या - मुझे ध्यान करते हुए मन का समस्त खेल समझ में आया कि अकेला मन ही समस्त संसार का कारण है । मन ही जीव के हृदय में भावों की दीवार पैदा कर देता है, जिससे जीव संसार में परमात्मा को भूल जाता है । दो० - मन जानइ मन जीत हय, मन भूलहिं तब हार । प्राण तें मन उपजत हय, प्राणण चित्त आधार ॥ १८ ॥ व्याख्या - मन को पहचान लेने पर, मन को जीतना संभव हो जाता है तथा मन को भूल जाने पर, जीव हार जाता है । प्राण से मन पैदा होता है और प्राण चित्त से पैदा होते हैं । मन वश होवहिं चित्त निरोधा । सो जन कहावहिं जोगी पुरोधा ॥ सकल बूझहूँ ध्यान लगाहिं । मन बाहिर जगत कछु नाहिं ॥ व्याख्या - मन को वश में कर लेने पर चित्त का निरोध हो जाता है तथा जो चित्त का निरोध कर लेते हैं, वे योगी कहलाते हैं । मुझे ध्यान लगाने पर समझ में आया कि मन के बाहर जगत में कुछ भी नहीं है । होइ द्वन्द भाव बुद्धि उपजाई । भाव अनुरूप त्रिमति सुहाई ॥ परहित रत जो होवइ भावा । बुद्धि सात्विक तहँ उपजावा ॥ व्याख्या - भावों के आपसी द्वन्द से बुद्धि पैदा होती है, इसलिए भावों के अनुसार ही बुद्धि भी तीन प्रकार की होती है । अगर परोपकार के भावों में द्वन्द पैदा होता है, तो बुद्धि सात्विक पैदा होती है । निज सुख हेतु जो द्वन्द सुहाई । नहिं संशय मति राजस आई ॥ परद्रोह भाव जो द्वन्द चलाई । बुद्धि तामस बहुरि उपजाई ॥ व्याख्या - भावों में आपसी द्वन्द अगर स्वयं के सुख के लिए चलता है, तो उससे राजसिक बुद्धि पैदा होती है तथा दूसरों को परेशान करने के भावों में अगर द्वन्द चलता है, तो तामसिक बुद्धि पैदा होती है । त्रिगुण पार जो चलहिं द्वन्दा । नहिं शंका मिटहिं जग फन्दा ॥ बुद्धि अनुरूप होवहिं कर्मा । ध्यान माझ बुझहुँ इहँ मर्मा ॥ व्याख्या - अगर भावों का द्वन्द त्रिगुणों (सत्, रज, तम) से परे होता है, तो जीव को सांसारिक बन्धनों से मुक्ति मिल जाती है । बुद्धि के अनुसार ही समस्त कर्म होते हैं, यह रहस्य मुझे ध्यान में समझ आया है । दो० - भाव द्वन्द बुद्धि प्रगटहिं बुद्धि तें भासहिं इन्द्रियादि । बुद्धि गो मिलि क्रिया करहिं तातें घटइ कर्म अबाध ॥ १९ ॥ व्याख्या - भावों के आपसी द्वन्द से बुद्धि पैदा होती है तथा बुद्धि के कारण इन्द्रियाँ आदि अंगों का आभास होता है । बुद्धि और इन्द्रियों के मिलने से क्रिया घटित होती है तथा क्रिया के माध्यम से कर्म घटित होता है । सत रज तम सो बुद्धि आधारा । मति हेतु घटहिं कर्म त्रिप्रकारा ॥ परहित हेतु होवहिं जो कर्मा । कहहिं सात्विक सकल धर्मा ॥ व्याख्या - सत्, रज व तमों गुण के भाव ही बुद्धि के आधार होते हैं, अतः बुद्धि के कारण ही कर्मों को भी तीन प्रकार का कहा गया है । जो कर्म परहित के लिये किये जाते हैं, उन्हें सभी धर्म सात्विक कर्म कहते हैं । सुख अरु यश इच्छा सुवाहहिं । घटहिं कर्म राजस कहावहिं । हेतु काम क्रोध मद लोभ अपारा । होहिं कर्म सोइ तामस प्रकारा ॥ व्याख्या - जब मन में सुख और यश प्राप्त करने की इच्छा होती है, तो जो कर्म होते हैं, वे राजसिक कर्म कहलाते हैं तथा जिन कर्मों का कारण काम, क्रोध, मद और लोभ होता है, वे तामस कर्म कहलाते हैं । मति अनुरूप लागहिं जग सारा । सोई जगत भयउ त्रिप्रकारा ॥ त्रिगुण प्रबल भाव इक धारा । बहत चलत सकल संसारा ॥ व्याख्या - बुद्धि के अनुसार ही समस्त संसार दिखाई देता है । इसलिए संसार भी तीन प्रकार का होता है । सत, रज व तम गुणों की प्रबल भाव धारा होती है, जिसमें समस्त संसार बहता चला जा रहा है । दया दान परहित हियँ माहिं । सुख अरु धन इच्छा मन नाहिं ॥ सत गुण प्रबल रजोगुण थोरा । सोई जुग त्रेता अनुभव मोरा ॥ व्याख्या - जब हृदय में दया, दान और परोपकार के भाव रहते हैं और सुख और धन की इच्छा नहीं सताती है, उस अवस्था में सतोगुण प्रबल होता है तथा रजोगुण थोड़ा बचा रहता है । मेरे अनुभव से संसार की इसी अवस्था को त्रेता युग की अवस्था कहा जाता है । सुत वित्त यश इच्छा जो गाढ़ी । तामस कम जानि रजो गुण बढ़ी ॥ निज पर भाव परबल माया । जग द्वापर सोई मन समझाया ॥ व्याख्या - जब पुत्र, धन और यश की इच्छा प्रबल हो जाती है, तब तमोगुण कम हो जाता है तथा रजोगुण बढ़ जाता है । जिससे मेरे-तेरे के भाव पैदा होकर, माया को प्रबल कर देते हैं । मेरे मन में यही समझ में आया है कि यह अवस्था ही द्वापर युग की अवस्था होती है । दो० - काम क्रोध मदादि प्रबल चहुँ दिसि तम अन्धकार । कलि सम देह लगई तब जान इहँ जुग कलि विस्तार ॥ २० ॥ व्याख्या - जब, क्रोध और मद के भाव बहुत प्रबल होते हैं, तब चारों तरफ तामसिक भावों का अन्धकार छा जाता है और शरीर मशीन की तरह लगने लग जाता है । इसी को संसार की कलियुगी अवस्था कहा जाता है । गुण पार नहिं तहँ भलमन्दा । सत जुग सोहि मूल आनन्दा ॥ इहँ भाँति भयउ जुग चारी । कहूँ अनुभव सत्य विचारी ॥ व्याख्या - जब तीनों गुणों से जीव मुक्त हो जाता है, तब अच्छे-बुरे का भेद भी मिट जाता है । उसी गुणातीत अवस्था को सतयुग की अवस्था कहा जाता है, जो आनन्द का मूल होती है । इस प्रकार कलियुग, द्वापर, त्रेता और सत् युग की चार अवस्थाएँ होती हैं । मैं मेरे अनुभव को सत्य मान कर कह रहा हूँ । अब कहूँ जुग लक्षण विस्तारी । मति अनुरूप हियँ विचारी ॥ करहु क्षमा प्रभु अवगुण मोरे । लिखहउँ सकल प्रेरणा तोरे ॥ व्याख्या - अब मैं यहाँ युगों के लक्षणों को विस्तारपूर्वक मेरी बुद्धि के अनुसार हृदय में विचार कर बताता हूँ । हे प्रभु ! मेरे अवगुणों को क्षमा करना । मैं तो सब कुछ आपकी प्रेरणा से ही लिख रहा हूँ । तामस बहु कलियुग कहाई । माया परिवार तहँ लहलई ॥ काम क्रोध मद लोभ अहंकारा । सकल जानउ माया परिवारा ॥ व्याख्या - तमोगुण जब बहुत बढ़ जाता है, तब वह कलियुग की अवस्था कहलाती है । जहाँ पर माया का परिवार बढ़ने लगता है । काम, क्रोध, मद, लोभ व अहंकार इन सबको माया का परिवार जानना चाहिए । बहु सुत सुता माया उपजाई । छल छद्म ईरषादि कटुताई ॥ झूठ फरेब बहुरि मक्कारी । सकल जानउ माया नातेदारी ॥ व्याख्या - माया के बहुत से पुत्र-पुत्रियाँ पैदा किये हुए हैं । जिनमें छल, छद्म, ईर्ष्या तथा कटुता रूपी पुत्र-पुत्रियाँ हैं । झूठ-फरेब और धोखाधड़ी आदि भाव माया के रिश्तेदार होते हैं । दो०- ममता मोह बन्धु जन, अरु वासना माया मातु । देह बुद्धि सुन्दर सदन, निज पर भाव सोई तातु ॥ २१ ॥ व्याख्या - ममता और मोह के भाव माया के मित्र हैं तथा वासना ही माया की जननी है तथा मेरा-तेरा का भाव ही माया का पिता है और देह बुद्धि ही माया का सुन्दर घर है । ज्यों-ज्यों बढ़हि माया परिवारा । त्यों-त्यों होई कलियुग विस्तारा ॥ राजा प्रजा अरु सब नर नारी । परहिं भ्रम असमंजस भारी ॥ व्याख्या - जैसे-जैसे माया का परिवार बढ़ने लगता है, वैसे-वैसे कलियुग का विस्तार होने लगता है तथा राजा-प्रजा व समस्त नर-नारी भ्रमित होकर किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो जाते हैं । बढ़हि अग्यता ग्यान बिसारी । होहिं कर्म देह बुद्धि अनुसारी ॥ कलियुग होहिं भूप अतिचारी । लोक शाही मानहि नहिं विकारी ॥ व्याख्या - कलियुग में अज्ञान बढ़ने लग जाता है, जिससे ज्ञान मिटने लग जाता है और जीव समस्त कर्म देह बुद्धि के अनुसार करने लग जाता है । कलियुग में राजा अत्याचार करनेवाला हो जाता है तथा विकारयुक्त राजा लोकतन्त्र में विश्वास नहीं करता है । सैन्य बल करहिं सब काजा । भोग चरम पावहिं नहिं लाजा ॥ भययुक्त चलहि प्रशासन । दण्ड हेतु प्रजा अनुशासन ॥ व्याख्या - सेना के बल पर ही राज्य का संचालन होता है और राजा अति भोगवादी होता है, फिर भी लज्जा नहीं पाता है। सारा प्रशासन भय के कारण चलता है तथा जनता भी दण्ड के भय से अनुशासित होती है। परहित बूझहि नहिं कोई। शोषक अति होवहिं बड़ सोई॥ नीति धरम जेहि मानहि प्रानी। हँसहहिं लोग जानि अग्यानी॥ व्याख्या - कलियुग में परोपकार को कोई समझता ही नहीं है तथा जो जितना दूसरों का शोषण करनेवाला होता है, उसको उतना ही बड़ा माना जाता है। नीति का पालन करनेवाले लोगों को अज्ञानी समझ कर लोग हँसते हैं। दो०- अग्यानी जद्यपि ग्यानी कहहि, सदा देखहहिं पर दोष। निज हिय अवगुण भण्डार भरा, तबहउ न समझे महाढोल॥ २२॥ व्याख्या - कलियुग में जीव अज्ञानी होते हुए भी स्वयं को ज्ञानी ही मानता है तथा हमेशा दूसरों के दोषों को ही देखता रहता है। यद्यपि उसके स्वयं के हृदय में अवगुणों का भण्डार भरा होता है। कलियुग में फिर भी मूर्ख जीव समझ नहीं पाता है। कदम कदम नृप तानाशाही। भयउ अबला तहँ लोकशाही॥ करहिं भूप परिग्रह विशाला। होहिं दीन जन सकल बेहाला॥ व्याख्या - कलियुग में राजा कदम-कदम पर तानाशाही करता है तथा लोक भावना अबला स्त्री की तरह असहाय हो जाती है। राजा विशाल संग्रह में लगा रहता है, जिससे लोग गरीब होकर बेहाल हो जाते हैं। जलहि समाज प्रतिशोध ज्वाला। राजा अरु प्रजा भयउ बेहाला॥ नृप इच्छा सोई नीति सुहाई। परहित तहँ सपनेउ नाई॥ व्याख्या - सारा समाज बदले की आग में जलता रहता है तथा राजा और प्रजा दोनों की बेहाल अवस्था रहती है। कलियुग में राजा की इच्छा ही नीति बन जाती है, जहाँ पर परोपकार स्वप्न में भी नहीं होता है। दल फँसहि स्वारथ दल माहि। कथनी करनी बहु भेद बढ़ाहि॥ नीति विमुख होइ दल प्रधाना। लच्छ हियँ तहँ सत्ता पाना॥ व्याख्या - सभी राजनीतिक दल स्वार्थ रूपी दल-दल में फँस जाते हैं, जिससे दलों की कथनी और करनी में बहुत भेद हो जाता है। सभी प्रमुख दल नीति विमुख हो जाते हैं और सत्ता प्राप्त करना ही उनका लक्ष्य हो जाता है। स्वारथ हेतु हिंसा ताण्डव। नीति न चलहहिं कोउ मानव॥ धरम अरथ आतंक चहुँओरा। भय बदरा बरषहि घन घोरा॥ व्याख्या - स्वार्थ के कारण समाज में हिंसा का ताण्डव होता रहता है तथा कोई भी मानव नीति पर नहीं चलते है। धर्म और अर्थ के नाम पर चारों तरफ आतंक छाया रहता है, जिससे समाज में भय का वातावरण बन जाता है। दो०- झूठ साँच सब एक सम जग भयउ स्वारथ प्रधान। परहित सपनेउ नहिं राजा प्रजा भई खींचा तान॥ २३॥ व्याख्या - झूठ और सच एक समान हो जाते हैं और संसार में स्वार्थ ही प्रधान हो जाता है। परहित की बात तो कोई सपने में भी नहीं सोचता है तथा राजा-प्रजा के बीच खींचतान की स्थिति बनी रहती है। तामस धरम देह कलि समाना। चिन्ता नरक हेतु अग्याना॥ धर्म अनुरूप सदा भा समाजा। तामस धरम तब काह सुकाजा॥ व्याख्या - जब तामसिक भावों को धारण किया जाता है, तब शरीर यन्त्र की तरह लगने लग जाता है। जिससे जीव अज्ञान के कारण चिन्ता रूपी नरक में पड़ जाता है। धर्म के अनुसार ही समाज का स्वरूप बन जाता है। अतः कलियुग में तामस धर्म होने पर अच्छे कार्य कैसे हो सकते हैं? भूत प्रेत अरु पूजहिं पिसाचा। जानहि नहिं कोउ झूठ न साचा॥ परद्रोह हेतु करहिं सब पूजा। भूत प्रेतादि छाड़ि न जानहि दूजा॥ व्याख्या - कलियुग में भूत और पिशाचों की पूजा करते हैं तथा झूठ और सत्य के भेद को कोई नहीं जानते हैं। दूसरों को परेशान करने के लिए ही पूजा करते हैं तथा भूत-प्रेत आदि को छोड़ कर दूसरा कोई देवता नहीं जानते हैं। नाम धर्म करहिं बहु पाखण्डा। अग्यता हेतु चढ़ावहिं मुण्डा॥ मरम धरम जानहिं नहिं कोई। पशुवत जीवहिं जीव अग्य सोई॥ व्याख्या - धर्म के नाम पर कलियुग में बहुत पाखण्ड किये जाते हैं तथा अज्ञानता के कारण बलि दी जाती है। धर्म के रहस्य को कोई नहीं जानते हैं और अज्ञानी जीव पशु की तरह जीवन जीते हैं। कर्म सब होहिं धर्म अनुसारी। बनहहिं समाज कृत्य विचारी॥ धरम कर्म सदा मेल अटूटा। तामस धरम होई कर्म कलूटा॥ व्याख्या - धर्म के अनुसार ही कर्म होते हैं तथा कर्मों के अनुसार समाज बनता है। इसलिए धर्म और कर्म का अटूट सम्बन्ध होता है तथा तामसिक धर्म होने पर दूषित कर्म ही होते हैं। दो० - भाव से धारणा बनै धारणा से धर्म महान। धरम ते सब कर्म घटै कर्म ते सकल जहान॥ २४॥ व्याख्या - जैसा भाव होता है, वैसी ही धारणा बन जाती है और धारणा के अनुरूप धर्म बन जाता है। धर्म के अनुरूप ही कर्म होने लगते हैं और कर्म के अनुसार ही समाज का स्वरूप बनता है। तामस मन तो जीव असहाई। सोइ कलिजुग अन्ध कहाई॥ जन्त्र तन्त्र बहु जादू टोना। पाखण्ड प्रसार दिसि चहुँकोना॥ व्याख्या - जब जीव का मन (भाव) तामसिक होता है, तो जीव असहाय हो जाता है और उसी अवस्था को अन्धा कलियुग कहा जाता है। उस अवस्था में जन्त्र-तन्त्र और जादू टोना का बोल-बाला हो जाता है तथा चारों दिशाओं में पाखण्ड फैल जाता है। आहार विहार बहु तामसताई। दशा दुर कलि जुग कहि न जाई॥ नारी-पुरुष आत्म बल हीना। पशुबल प्रबल हेतु दशा दीना॥ व्याख्या - आहार-व्यवहार में बहुत तामसिकता होती है। कलियुग की दुर्दशा का वर्णन नहीं किया जा सकता है। कलियुग में नारी-पुरुष सब में आत्मबल की कमी होती है तथा पशुबल ही प्रबल होता है। जिससे दीन अवस्था आ जाती है। ध्यान-ग्यान जानहि नहिं कोई। जप तप सपनेउ नहिं होई॥ अबला बनहहिं भोग सामाना। सब डूबहिं समाज मद पाना॥ व्याख्या - ध्यान-ज्ञान को कोई नहीं जानते हैं तथा जप-तप का विचार तो सपने में भी नहीं आता है। स्त्री को केवल भोग की वस्तु माना जाता है तथा पूरा समाज अहंकार के नशे में डूबा रहता है। कलि देह बरतहिं नर नारी। भोगहिं चिन्ता नरक अति भारी॥ कलिजुग नरक बहु प्रकारा। पावहिं जीव सो भाव अनुसारा॥ व्याख्या - स्त्री-पुरुष शरीर को मशीन की तरह मानते हैं, जिससे चिन्ता रूपी नरक भोगते हैं। कलियुग में नरक रूपी चिन्ता बहुत प्रकार की होती है, जो जीव के भाव के अनुसार होती है। दो० - स्वर्ग नरक देह बसै नहिं कहीं गगन के पार। तामस भाव नरक देत हैं भल भाव स्वर्ग द्वार ॥ २५ ॥ व्याख्या - स्वर्ग और नरक की अवस्था शरीर में ही होती है। ये दोनों आकाश के पार नहीं होते हैं। तामसिक भाव चिन्ता रूपी नरक देते हैं और अच्छे भाव सुख रूपी स्वर्ग दिखाते हैं। ॥ मानवधर्मशास्त्रस्य मासपरायण प्रथम पड़ाव ॥ अब इहाँ कहूँ नरक विस्तारा। केहि विधि परहिं जीव बिचारा॥ नरक मारग बहु कलि माहिं। काम क्रोध मदादि लोभ सबाहिं॥ व्याख्या - अब मैं यहाँ चिन्ता रूपी नरक को विस्तारपूर्वक बताता हूँ। जिसमें बेचारा जीव कैसे फँस जाता है। कलियुग में चिन्ता रूपी नरक के बहुत से रास्ते होते हैं। काम, क्रोध, मद, लोभ आदि तामसिक भाव चिन्ता रूपी नरक के मार्ग हैं। होहहिं क्रोध जीव ताप विशेषा । सोई नरक जलन जीव क्लेसा ॥ जीव जब होवहि मद अन्धा । परहिं नरक मल मूत्र गन्दा ॥ व्याख्या - जब जीव को क्रोध आता है, तो विशेष कष्ट होता है। इसी को जीव का जलन रूपी नरक कहा जाता है तथा जीव जब मद में अन्धा हुआ रहता है, तब मल-मूत्र रूपी गन्दा नरक कहलाता है। काम बिकल सोई नरक घोरा । घूम न होहि वासना क्षुधा हिलोरा ॥ लोभ लिप्त जीव जब होवहि । तेल गरम सो देह ढोवहि ॥ व्याख्या - जीव जब काम (इच्छा) की भावना से व्याकुल हो जाता है, तब वह घोर नरक की अवस्था होती है। जिसमें जीव वासनाओं के वशीभूत होकर सो भी नहीं पाता है। जीव जब लोभ की भावना में लिप्त हो जाता है, उसी को शरीर पर गर्म तेल डालनेवाला नरक कहा जाता है। जीव हिय जब आव ईरिषाई । मारा-मारी सोई नरक सुहाई ॥ लालसा उठहिं जेहि मन माहि । बरषहि अंगार जलन छाहि ॥ व्याख्या - जीव के हृदय में जब जलन का भाव आ जाता है, उसी अवस्था को आपस में मारा-मारी करनेवाला नरक कहा जाता है तथा लालसा पैदा हो जाना ही आग बरसनेवाला नरक कहा जाता है। जिससे जीव को जलन होती रहती है। दो०- तामस भाव देह सकल देहहिं जीव चिन्ता अपार । चिन्ता ते जीव बिकल अरु चिन्ता ही नरक प्रकार ॥ २६ ॥ व्याख्या - शरीर में सभी तामसिक भाव जीव को चिन्ता देते हैं तथा चिन्ता से जीव व्याकुल हो जाता है और चिन्ता को ही नरक के रूप में जाना जाता है। जब जब आव तम अहंकारा । परहिं जंजीर नरक अपारा ॥ वासना बहुरि मन ललचाई । सो नरक तहँ अहिगन सताई ॥ व्याख्या - जब-जब जीव में तामसिक अहंकार आता है, तब वह बेड़ियों में बँध जाता है। इसी को बेड़ियोंवाला नरक कहा जाता है और जब मन वासनाओं में फँस जाता है, उसी मनोस्थिति को सर्पों द्वारा सतानेवाला नरक कहा जाता है। होवहिं कर्म जब चोर जुआरी । भय नरक पाव जीव विचारी ॥ लोलुप लम्पट गमन पर नारी । सो जीव अपयश नरक अधिकारी ॥ व्याख्या - जब जीव चोरी और जुआ का कर्म करता है, तो उसे भयभीत करनेवाला नरक सताता है अर्थात् जीव सदा भयभीत रहता है । लोलुप, लम्पट और परनारी गमन करनेवाला जीव अपमान रूपी नरक प्राप्त करता है । पर निंदक कपटी गुरु द्रोही । नरक अन्ध बंध पावहहिं सोही ॥ मातु-पितु करहिं न सेवकाई । भोगहि नरक उलाहवन ताई ॥ व्याख्या - परनिंदा करनेवाला, कपटी व गुरु का विरोधी अंधकार रूपी नरक प्राप्त करता है अर्थात् उसे कभी अज्ञान से मुक्ति नहीं मिल पाती है । जो माता-पिता की सेवा नहीं करते हैं, उन्हें उलाहवन रूपी नरक (चिन्ता) सताता है । पति-पत्नी जो करहिं झगड़ा । परहिं नरक जातना तगड़ा ॥ ज्ञानी जन जे करहिं अपमाना । सोई नरक अन्ध कूप समाना ॥ व्याख्या - पति-पत्नी जो आपस में झगड़ा करते हैं, वे यातना रूपी नरक में पड़ते हैं तथा ज्ञानी लोगों का अपमान करनेवाले, अन्धे कूप रूपी नरक में पड़ते हैं । दो० - गुरु कपटी शिष्य स्वार्थी खेलहि मिचौनी खेल । उभय दावानल परहि नरक करइ ठेलम ठेल ॥ २७ ॥ व्याख्या - जब गुरु कपटी और शिष्य स्वार्थी होते हैं, तो दोनों एक दूसरे से आँख-मिचौनी का खेल खेलते रहते हैं तथा दोनों दावानल रूपी नरक में एक दूसरे को धक्के मारते रहते हैं । झूठ फरेब करहिं मक्कारी । विष कीट सतावहहिं तहँ भारी ॥ तामस नरक बहु दुःखदाई । शत्रु तउ उचित नहिं पराई ॥ व्याख्या - जो झूठ, फरेब और मक्कारी करते हैं, उन्हें जहरीले कीड़े सतानेवाली चिन्ता सताती है । तामसिक भावों की चिन्ता (नरक) बहुत दुःख दायी होती है । इसलिए दुश्मन को भी तामसिक नरक नहीं मिलना चाहिए । एहि भाँति नरक नाना प्रकारा । राजा-प्रजा तहँ परहिं अविचारा ॥ तन जर्जर मन बहु तनाई । सो चिन्ता बहुरि त्रास दिलाई ॥ व्याख्या - इस प्रकार नाना प्रकार के चिन्ता रूपी नरक होते हैं । जिसमें अज्ञानतावश राजा व प्रजा दोनों पड़ जाते हैं । चिन्ता रूपी नरक बहुत कष्ट देनेवाला होता है । जिससे शरीर जर्जर और मन तनावयुक्त हो जाता है । कलियुग भूप देह रजधानी । हेतु अज्ञान जीव करई नादानी ॥ माया कुटुम्ब सोई भूप वाहनी । अज्ञान प्रबल सो बन्ध निसानी ॥ व्याख्या - कलियुग रूपी राजा का शरीर ही राजधानी होता है । जहाँ अज्ञानता के कारण जीव फँस जाता है तथा माया का परिवार ही कलियुग रूपी राजा की सेना होती है और अज्ञान ही राजा की जेल होती है । देह सुख सोई सर्ग कलिमाहिं । तामस हेतु सोई अल्प सुहाहिं ॥ नरक बहुरि सर्ग अति अल्पा । कलि त्रास लागहिं सम कल्पा ॥ व्याख्या - शारीरिक सुख ही कलियुग में स्वर्ग कहलाता है, जो तामसिकता के कारण बहुत थोड़ा होता है । कलियुग में नरक बहुत होता है । परन्तु स्वर्ग थोड़ा-सा होता है । इसलिए कलियुग का आभास कल्प के समान होता है । दो० - तामस मन कलि सदन नहिं कहीं अन्य ठौर । चिन्ता सोई नरक हय सत्य ज्ञान नहिं किछु और ॥ २८ ॥ व्याख्या - मन की तामसिक अवस्था ही कलियुग कहलाती है । कलियुग का दूसरा कोई स्थान नहीं होता है तथा चिन्ता ही नरक की अवस्था होती है । अतः इसके अलावा दूसरा कोई सत्य ज्ञान नहीं है । मन भाव सोई कलि जुग दाता । मन ते सम्भव कलि त्राता ॥ कलियुग लक्षण कहा बखानी । अब कहहउँ द्वापर कहानी ॥ व्याख्या - वास्तव में तो मन का भाव ही कलियुग का आभास कराता है तथा मन के द्वारा ही कलियुग के आभास से मुक्त होना सम्भव है। मैंने कलियुग के लक्षण बता दिये हैं और अब मैं द्वापर के लक्षण बताता हूँ । जुग द्वापर रज गुण प्रधानी । सुख इच्छा प्रबल सोई निसानी ॥ रहहिं द्वापर मान अपमाना । सकल कर्म फल इच्छा प्रधाना ॥ व्याख्या - द्वापर की अवस्था में रजोगुण प्रमुख होता है तथा रजोगुण होने पर सुख की इच्छा प्रबल हो जाती है । यही द्वापर की पहचान होती है । द्वापर की अवस्था में मान-अपमान के भाव प्रबल होते हैं तथा समस्त कर्म फल की इच्छा से ही होते हैं । देह श्रम कम मन बेशी तनावा । कर्म बन्ध जीव बहु उरुझावा ॥ स्वारथ प्रधान चिन्ता नहिं दूसर । भोग लच्छ मानहिं इहां भूपर ॥ व्याख्या - द्वापर में शारीरिक श्रम कम होता है । परन्तु मानसिक तनाव बहुत होता है तथा कर्म के बन्धन में जीव उलझ जाता है । द्वापर में स्वयं का स्वार्थ ही प्रधान होता है तथा दूसरों की चिन्ता नहीं होती है । भोगों की प्राप्ति को ही पृथ्वी पर जीव अपना प्रमुख लक्ष्य समझता है । बिनु फल करहिं न कर्म आरम्भा । इहँ रज प्रभाव नहिं अचम्भा ॥ सुख हेतु जीव करहि प्रयासा । मिटहिं नहिं पर मन संत्रासा ॥ व्याख्या - द्वापर में जीव बिना फल की इच्छा के तो कर्म करना शुरू ही नहीं करता है । परन्तु इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है । क्योंकि यह तो रजोगुण का प्रभाव है । जीव हमेशा सुख के लिए प्रयास करता है । परन्तु शारीरिक सुख से मन का दुःख नहीं मिट पाता है । दो० - सुख हेतु संग्रह करै सुख हेतु भागम भाग मचाय । फल बन्धन ऐसा परै जीव निसि दिवस अकुलाय ॥ २९ ॥ व्याख्या - जीव सुख के लिए संग्रह करता है और सुख प्राप्ति को ही लक्ष्य बना कर कर्म के क्षेत्र में मारा-मारी करता है । परन्तु सुख के फल का बन्धन ऐसा पड़ जाता है, जिससे जीव रात-दिन चिन्ता में पड़ जाता है । आज छाड़ि चिन्ता भावी सताई । निजहहिं परै जीव उरुझाई ॥ सुख हेतु नित्य करहिं कर्मा । मिलइ दुःख जानहिं नहिं मर्मा ॥ व्याख्या - आज की चिन्ता नहीं करके जीव भविष्य के चिन्तन में पड़ जाता है और जीव स्वयं ही भविष्य की चिन्ता में उलझ जाता है । जीव नित्य उठ कर सुख प्राप्ति को लक्ष्य बना कर कर्म करता है । परन्तु फल की आसक्ति के कारण जीव को दुःख ही मिलता है और जीव इस रहस्य को जान नहीं पाता है । फल आसक्ति द्वापर अति भारी । होवहिं सकल कर्म ता अनुसारी ॥ सुत वित्त यश मोह परिवारा । बाढ़हि द्वापर सकल अपारा ॥ व्याख्या - कर्म फल की इच्छा द्वापर (राजसिक अवस्था) में बहुत बढ़ जाती है तथा समस्त कर्म फल की इच्छा से ही होने लगते हैं । रजोगुण की प्रधानता होने पर पुत्र, धन, लोक प्रतिष्ठा और परिवार का मोह अत्यधिक बढ़ जाता है । धर्म होहहिं इहाँ रज प्रधाना । ग्यान चाह तद्यपि हिय अग्याना ॥ फल हेतु पूजहहिं देव नाना । फल कारण परहित दया दाना ॥ व्याख्या - द्वापर युग की अवस्था में धर्म अर्थात् धारणा राजसिक हो जाती है और ज्ञान की चाहत होते हुए भी जीव रजोगुण के कारण अज्ञानी बना रहता है । फल की इच्छा के कारण ही द्वापर में नाना प्रकार के देवताओं की पूजा की जाती है और दया, दान व परोपकार के कार्य भी फल की इच्छा से ही किये जाते हैं । जप तप करहिं देव रिझावन । पूजहहिं मूरत मन भावन ॥ जावहिं तीर्थ समय अनुसारी । स्तुति करहहिं फल विचारी ॥ व्याख्या - द्वापर में जप-तप भी देवताओं को प्रसन्न करने के लिए ही किये जाते हैं तथा मन की भावना के अनुसार देव-मूर्ति की पूजा की जाती है । समय की अनुकूलता के अनुसार लोग तीर्थों में भी जाते हैं, परन्तु स्तुति आदि फल की इच्छा से ही करते हैं । दो० - इच्छा से इच्छा उपजत इच्छा हेतु तीरथ स्थान । निज घट प्रभु बसै मूरख सकै नहिं पहचान ॥ ३० ॥ व्याख्या - जीव की एक इच्छा से दूसरी इच्छा पैदा हो जाती है तथा इच्छा के कारण ही जीव तीर्थ यात्रा करता है । वास्तव में तो परमपिता जीव के हृदय में ही बसता है । परन्तु मूर्ख जीव पहचान नहीं पाता है । आचरण द्वैत बहु द्वापर माहिं । प्रवचन कहहहिं आचरहिं नाहिं ॥ भेष देखि मानहिं साधु सन्ता । फल अंध जानहिं नहिं अन्ता ॥ व्याख्या - द्वापर युग में बहुत दिखावे का आचरण होता है । लोग प्रवचन करते हैं, परन्तु अनुसरण नहीं करते हैं । भेष देख कर ही लोग साधु-सन्तों की पूजा करते हैं और फल की इच्छा में अन्धे हुए लोग अन्तःकरण को जान नहीं पाते हैं । कर्म कुशल सो कहावई योगी । दोष न देहहिं कोई द्वापर भोगी ॥ पूँजीपति पावहिं तहँ सम्माना । जद्यपि संग्रह घोर अग्याना ॥ व्याख्या - कर्म में जो कुशल होता है, उसी को द्वापर में योगी कहते हैं तथा द्वापर में भोग को बुरा नहीं मानते हैं । हालाँकि संग्रह घोर अज्ञान ही होता है, फिर भी पूँजीपति द्वापर में बहुत सम्मान प्राप्त करते हैं । साधु बोलहहिं ठकुर सुहाती । माया बहु तहँ सकल नचाती ॥ बहु विधि भौतिक ताप सताई । भोग अधीन सब लोग लुगाई ॥ व्याख्या - द्वापर में माया सब जीवों को नाच नचाती है तथा साधु लोग भी लोगों को खुश करनेवाली वाणी ही बोलते हैं । द्वापर में भौतिक सुखों की चिन्ता बहुत प्रकार से सताती है तथा सभी स्त्री-पुरुष भोग भावना के अधीन हो जाते हैं । जाति-पाँति अरु बहु मान बढ़ाई । नारी पुरुष ऊँच नीच उरझाई ॥ दम्भ श्रेष्ठ करावहहिं निंदा । होइ उलट जानहिं नहिं अन्दा ॥ व्याख्या - द्वापर में जाति-पाँति और बहुत मान-बड़ाई की धारणा रहती है तथा स्त्री-पुरुष भी ऊँच-नीच की भावना में उलझे रहते हैं । श्रेष्ठ बनने की भावना के दम्भ के कारण ही दूसरों की बुराई करते हैं । परन्तु परिणाम तो उल्टा ही होता है । फिर भी अज्ञानी जीव समझ नहीं पाते हैं । दो० - परनिंदा जेहि जीव करै सपनेउ सुख नहिं पाय । उलट निंदा निज परै विधि तो विधान चलाय ॥ ३१ ॥ व्याख्या - परनिंदा करनेवाला जीव सपने में भी सुख प्राप्त नहीं कर पाता है । क्योंकि प्रकृति के कार्य-कारण सिद्धान्त के कारण निंदा लौट कर निंदा करनेवाले पर ही आ जाती है । ग्रन्थन ग्रन्थि जीव उरुझाई । अनुसरहिं बिनु मरम बुझाई ॥ पाप पुण्य बहु करहि बखाना । भेद न जानहि जीव अग्याना ॥ व्याख्या - द्वापर में जीव बिना समझे शास्त्रों का अनुसरण करने लगता है और वह ग्रन्थों की रहस्यमय ग्रन्थियों में उलझ कर भ्रमित हो जाता है । रात-दिन पाप-पुण्य की चर्चा करने में लगा रहता है । परन्तु अज्ञान के कारण पाप-पुण्य के रहस्य को नहीं जान पाता है । पूजहिं ग्रन्थ मरम न गहहिं । पथ अन्धा तउ मूढ़ चलहिं ॥ शास्त्र सकल नहिं मूल अलादा । भेद बाहरी हेतु बंध मरजादा ॥ व्याख्या - द्वापर में ग्रन्थों की पूजा करते हैं । परन्तु शास्त्रों के मर्म को नहीं ग्रहण करते हैं और पंथ बना कर मूर्ख लोग अन्धे पथ पर चलते हैं । सभी शास्त्र मूल रूप में तो एक ही है । परन्तु मर्यादाओं के कारण बाहरी भेद दिखाई देता है । जप तप मख पूजा विधि नाना । बिनु कर्म चाहि फल इन्साना ॥ हेतु आसक्ति करम सकला । सर्ग-नरक बन्ध जीव बिकला ॥ व्याख्या - द्वापर अर्थात् रजोगुण की प्रधानता होने पर जीव जप, तप व यज्ञ आदि करने लगता है तथा बिना कर्म किये भगवान से फल की आशा करने लग जाता है । समस्त कर्म उस अवस्था में आसक्तियुक्त होते हैं, जिससे स्वर्ग-नरक की कल्पना के बन्धन में जीव फँस जाता है । चमक दमक भल तहँ लागहिं । देह नश्वर जद्यपि न मानहिं ॥ प्रभु गुण करहिं बहु बखाना । फल इच्छा पर हियँ प्रधाना ॥ व्याख्या - रजोगुण की प्रधानता होने पर चमक-दमक अच्छी लगती है तथा नश्वर होते हुए भी जीव शरीर की नश्वरता में विश्वास नहीं करता है । फल की इच्छा को हृदय में रखकर जीव द्वापर में नाना प्रकार से भगवान के गुणों का बखान करने लगता है । दो० - सुख लालसा मोह प्रबल सदा ता हेतु धन कमाय । पाप पुण्य कल्पना करै बिरथा कर्म बन्ध बढ़ाय ॥ ३२ ॥ व्याख्या - सुख प्राप्त करने की प्रबल लालसा मन में होती है और मोह भी प्रबल होता है तथा उसी के कारण हमेशा जीव धन कमाने में लगा रहता है । पाप-पुण्य की कल्पना करके जीव द्वापर में व्यर्थ में ही कर्म का बन्धन डाल लेता है । सुख लालच करहिं सब कर्मा । फल बंधन भूलहिं निज धर्मा ॥ कर्म काण्ड बहुरि विश्वासा । करि पाखण्ड फाँसहिं मन आशा ॥ व्याख्या - सुख प्राप्त करने की लालसा में जीव सब कर्म करने लगता है, जिससे फल-इच्छा का बंधन पड़ जाता है और जीव सहजता को भूल जाता है । द्वापर में कर्म काण्ड पर बहुत विश्वास होता है । जिससे जीव पाखण्ड में पड़ कर मन की इच्छाओं में फँस जाता है । इन्द्रियाँ बिकल मन बस नाहीं । हियँ भोग वासना बहु बढ़ाहीं ॥ मानसिक व्याधि अति रोगा । काह कहूँ बिकल सब लोगा ॥ व्याख्या - रजोगुण बढ़ने पर इन्द्रियाँ व्याकुल हो जाती हैं तथा मन वश में नहीं रह पाता है तथा शारीरिक भोगों की वासना हृदय में प्रबल हो उठती है । जिससे जीव के मानसिक रोग बढ़ जाते हैं । क्या वर्णन करूँ ? सब लोग इच्छाओं के संताप से व्याकुल होते रहते हैं । निज जानहिं श्रेष्ठ अरु विद्वाना । दूसर सम लगहिं न अग्याना ॥ दया दान अरु परहित भलाई । धन अरु यश इच्छा रहि छुपाई ॥ व्याख्या - द्वापर की अवस्था में जीव स्वयं को सबसे श्रेष्ठ और विद्वान मानने लगता है तथा दूसरों को अज्ञानी मानने लगता है । रजोगुण के प्रभाव में जीव दया, दान, परहित व भलाई आदि कार्य या तो धन कमाने के लिए करता है या फिर समाज में लोक प्रतिष्ठा पाने की इच्छा छिपी रहती है । समान बताए चराचर प्रानी । खुद कराइ पूजा महा अग्यानी ॥ परम ज्ञान करहिं उपदेसा । गृह आसक्त मन बहु क्लेसा ॥ व्याख्या - रजोगुण प्रभावी जीव बातों-बातों में तो समस्त प्राणियों को समान बताता है । परन्तु मौका मिलने पर स्वयं की पूजा करवाने से नहीं चूकता है । वह परम ज्ञान का बहुत उपदेश करता है, परन्तु स्वयं घर की आसक्ति में पड़ कर दु:खी होता रहता है । दो० - सफलता का दम्भ भरै विफलता प्रभु दोष लगाय । वासना द्वापर प्रबल अति भोगी जीव जग भरमाय ॥ ३३ ॥ व्याख्या - रजोगुणी जीव सफल होने पर स्वयं को सफलता का कारण मान लेता है तथा असफल होने पर प्रभु को दोष देने लगता है । द्वापर में वासना बहुत प्रबल होती है । जिसमें भोग कामनावाला जीव पड़कर भ्रमित होता रहता है । हरम नाच पर नारी गमना । मदपानादि रजोगुण लखना ॥ प्रमाद बस्य सारी दिन चर्या । नारी चिंतन खण्डित ब्रह्मचर्या ॥ व्याख्या - जो हरम में नारियों का नृत्य कराते हैं और मद्यपान करते हैं तथा परस्त्री गमन करते हैं, ये सब रजोगुण के प्रभाव के लक्षण हैं। ऐसे लोगों की दिनचर्या प्रमाद वश ही होती है तथा परनारी के चिन्तन से ब्रह्मचर्य खण्डित होता रहता है । पद लिप्सा अरु चाटुक्रताई। भोग अधीन सब लोग लुगाई॥ लोगन्ह हियँ लालच बहु भांति। सुख जुगत खोजहिं दिनु राति॥ व्याख्या - पद प्राप्त करने की लालसा, चाटुकारिता और भोग इच्छा सब स्त्री-पुरुषों को अधीन किये रहती है। लोगों के हृदय में लालच बहुत प्रकार से छिपा रहता है तथा रात-दिन सुख प्राप्त करने की युक्ति खोजते रहते हैं। पर दारा चिन्तन मन माहिं। निज नारी अनुराग हियँ नाहिं॥ भोगन्ह हेतु करहि सब कर्मा। जीव मूढ़ भूलहिं प्रकृति धर्मा॥ व्याख्या - द्वापर में मनुष्य दूसरों की स्त्रियों का मन में चिन्तन करता रहता है और स्वयं की पत्नी के प्रति स्नेह नहीं रखता है। मूर्ख जीव द्वापर में भोग प्राप्ति के लिए ही सब कर्म करता है तथा प्रकृति के सहज धर्म को भूल जाता है। दरस परस करहिं मद पाना। देखअहिं भोग अति हरषाना॥ जीव होवहिं तब भोग अधीना। अग्यान हियँ चिन्ता नवीना॥ व्याख्या - रजोगुणी लोग मिल-जुल कर मद्यपान करते हैं तथा भोगों को देख कर हर्षित हो उठते हैं। रजोगुण से जीव भोगों के अधीन हो जाता है तथा जीव के हृदय में अज्ञान छा जाता है। जिससे नयी-नयी चिन्ताएँ पैदा होने लग जाती हैं। दो० - देह जर्जर गो असहाय सब तबहऊँ न मन अघाय। भाव सागर उत्ताल भयउ चिन्ता दावानल जलाय॥ ३४॥ व्याख्या - सारा शरीर जर्जर हो जाये, तब भी मन भोगों से नहीं अघाता है। भोगों से भाव रूपी सागर उत्ताल हो उठता है। जिससे चिन्ता रूपी अग्नि जीव को बहुत प्रकार से जलाने लगती है। द्वापर चित्त वित्त स्थिर नाही। बिरथा सकल जीव भरमाही॥ कलि अरु द्वापर नहिं बहु भेदा। उभय हेतु पाइ जीव भव खेदा॥ व्याख्या - रजोगुणी (द्वापर) अवस्था में जीव का चित्त और अर्थ स्थिर नहीं रह पाते हैं। इसलिए व्यर्थ में सब जीव भ्रमित होते रहते हैं। कलियुग (तामसिक) और द्वापर (रजोगुण) में बहुत ज्यादा अन्तर नहीं होता है। क्योंकि राजसिक व तामसिक गुण जीव को भाव रूपी कष्ट देते हैं। द्वापर सुख दुःख एक समाना। भँवर जाल तहँ जीव फँसाना॥ अष्ट सुख होइ द्वापर माही। निगम पुराण सो सर्ग बताही॥ व्याख्या - द्वापर युग (राजसिक अवस्था) में सुख-दुःख एक समान मात्रा मे होते हैं। जिनके भँवर जाल में बेचारा जीव फँस जाता है। द्वापर में आठ प्रकार के सुख मूल रूप से होते हैं। जिनको वेद-पुराणों ने स्वर्ग के रूप मे वर्णन किया है। मन सर्ग सोई कहहूँ बखानी। जाल भोग बूझई नहिं अज्ञानी॥ यश प्रताप फैलहिं चहुँओरा। सोई भयउ स्वर्ग मन ठौरा॥ व्याख्या - अब मैं मन में निवास करनेवाले स्वर्ग का वर्णन कर रहा हूँ। जिसको अज्ञानी लोग भोग के जाल में पड़ कर समझ नहीं पाते हैं। जब रजोगुण (द्वापर) के प्रभाव के कारण जीव का यश चारो तरफ फैलने लग जाता है, तो वह अवस्था ही मन को सुख (स्वर्ग) की अनुभूति देनेवाली होती है। भूषण बसन व्यंजन नाना। मिलहिं सकल मन अनुमाना॥ सोई भा प्रथम स्वर्ग प्रकारा। पावहहिं जीव करम अनुसारा॥ व्याख्या - जब जीव को मनपसन्द खाना व वस्त्र मिल जाते हैं, तो वह स्वर्ग की प्रथम अवस्था होती है, जो कर्म की क्षमता के अनुसार ही जीव को मिल पाती है। दो० - स्वर्ग ठिकाना मन जीव का मन बाहिर किछु नाय। सुख अनुभूति जब मिलै सोइ सर्ग बैकुण्ठ कहाय ॥ ३५ ॥ व्याख्या - स्वर्ग का निवास स्थान जीव का मन ही होता है तथा मन के बाहर स्वर्ग-नरक कुछ भी नहीं होता है। जीव को जब सुख की अनुभूति होती है, वह अवस्था ही स्वर्ग व बैकुण्ठ की कहलाती है। द्वितीय स्वर्ग संभोग आधारा। कनक डोर बंधहि जीव बिचारा॥ संभोग लिप्त तहँ नर नारी। सोइ लोक इन्द्र सकल पुकारी॥ व्याख्या - दूसरा सुख संभोग की अवस्था होती है। जहाँ जीव सोने की जंजीर में बँध जाता है। जब स्त्री-पुरुष संभोग की अवस्था में होते हैं, उसी को इन्द्रलोक कहा जाता है। तीसर दम्भ तुष्ट सर्ग प्रकारा। सो स्वर्ग अधम युक्त विकारा। चउथ स्वर्ग भल परिवारी। सकल करहिं मरजाद विचारी॥ व्याख्या - जीव को तीसरा सुख स्वयं के दम्भ (अहंकार) की सन्तुष्टि से मिलता है। दम्भ सन्तुष्टि करानेवाला सुख (स्वर्ग) अधम प्रकृति का होता है। चौथा स्वर्ग परिवार का सुख होता है। जहाँ पर सभी लोग मर्यादाओं का पालन करते हैं। पंचम स्वर्ग बन्धु सुखदाई। परस्पर प्रीत कपट भूलाई॥ षष्ठं स्वर्ग भल प्रतिवेशी। कवनउ समय होइ न क्लेशी॥ व्याख्या - पाँचवा स्वर्ग भाई का होता है, जो आपस में कपट भुला कर परस्पर प्रेम करते हैं। छठा स्वर्ग अच्छे पड़ोसी से मिलता है, जो किसी भी समय क्लेश नहीं करता है। सप्तम स्वर्ग हरि गुण गाना। मन मत्त होइ जीव मस्ताना॥ दया दान तहँ अवसर पाई। श्रवणहिं यश जीव सुखदाई॥ व्याख्या - सातवाँ स्वर्ग प्रभु के गुणों का गान करना होता है । जिसमें जीव का मन मग्न हो जाता है और जीव मस्ताना हो जाता है तथा दया और दान देने का अवसर जब जीव को मिलता है, तो अपना यश सुन कर जीव को सुख प्राप्त होता है । अष्टम स्वर्ग सुत-सुता सुखदाई । आज्ञाकारी होवहिं सब भाई ॥ नारी पतिव्रता जो होवहिं । स्वर्ग सुख सब ताँह बिहोवहिं ॥ व्याख्या - आठवाँ स्वर्ग पुत्र-पुत्रियों का आज्ञाकारी होना होता है तथा जब सभी भाई-बहन आज्ञाकारी होते हैं, तो वह स्वर्ग सुख के समान होता है । जिस घर में पत्नी पतिव्रता होती है, उस घर में स्वर्ग के सभी सुख निवास करते हैं । दो० - अष्ट स्वर्ग सुख द्वापर, कहहउँ बुझि विस्तार । द्वैत भाव ते उपजत, सोइ जगत आधार ॥ ३६ ॥ व्याख्या - मैंने द्वापर के आठ स्वर्गों का वर्णन विस्तारपूर्वक कर दिया है । ये आठों स्वर्ग द्वैत भावों (राजसिक अवस्था) से ही पैदा होते हैं और यही द्वापर जगत का आधार होते हैं । अब कहहउँ त्रेता चारी । सत गुण प्रबल मोह अपारी ॥ ग्यान चाह तहँ बहुत सुहाई । जीव कर्म परहित चित लाई ॥ व्याख्या - अब मैं त्रेता युग के लक्षणों का वर्णन करता हूँ । त्रेता युग में सतोगुण प्रबल होता है, परन्तु मोह की अधिकता रहती है । त्रेता में ज्ञान प्राप्त करने की बहुत प्रबल इच्छा रहती है तथा जीव परोपकार के कार्यों में लगा रहता है । ग्यान हेतु त्रेता जग वासा । पूजहहिं निज हिय प्रभु विस्वासा ॥ ध्यान योग अरु जप तप कर्मा । मानहहिं जीव सत्य सोई धर्मा ॥ व्याख्या - त्रेता युग में जीव ज्ञान के लिए संसार में निवास करता है और अपने हृदय में ही प्रभु का वास मान कर पूजा करता है । त्रेता में जीव ध्यान, योग और जप-तप के कर्मों को ही सत्य धर्म मानता है । परहित हेतु तजहिं सुख भोगा । मिटहिं सकल भव व्याधि रोगा ॥ सहज सरल सब लोग लुगाई । प्रेम प्रीति चहुँ ओर सुहाई ॥ व्याख्या - त्रेता युग में परोपकार के लिए जीव शारीरिक सुखों का त्याग कर देता है । जिससे संसार के जन्म-मरण के रोग मिट जाते हैं । त्रेता में सभी स्त्री-पुरुष सहज और सरल स्वभाव के होते हैं तथा चारों ओर प्रेम और प्रीति का वातावरण रहता है । चउथ नरक होइ देह विकारी। भोग सुलभ सकै न भोग बिचारी॥ पंचम नरक कलह परिवारा। पाइ पल-पल दुःख जीव बिचारा॥ व्याख्या - चौथे प्रकार की चिन्ता देह के विकारों से पैदा होती है। उस अवस्था में जीव को सारे सुख सुलभ होते हैं। परन्तु शारीरिक विकारों के कारण जीव भोगों को भोग नहीं पाता है। पाँचवा नरक परिवार में क्लेश होने से होता है। जिससे जीव पल-पल में दुःख भोगता है। दो० - जो सुख नहीं परिवार में कबहूँ न बाहिर मिल पाय। नरक भोगहिं मूढ़ जन बिरथा जन्म मनुज का जाय ॥ ३७ ॥ व्याख्या - जब परिवार में ही सुख नहीं है, तो जीव को बाहर भी सुख नहीं मिल पाता है। मूर्ख लोग इस रहस्य को नहीं जान पाते हैं। इसलिए चिन्ता रूपी नरक भोगते रहते हैं। जिससे उनका मनुष्य जन्म लेना व्यर्थ ही चला जाता है। छठ नरक तहँ दम्भ अपारा। अग्यता बन्ध जीव लाचारा॥ सप्तम नरक सकल विरोधी। अकारण बरतहिं भाव क्रोधी॥ व्याख्या - छठा नरक (चिन्ता) दम्भ से मिलता है। जिससे जीव अज्ञानता की जंजीरों में बँध कर लाचार हो जाता है। सातवाँ नरक वह होता है, जिसमें सभी से विरोध हो जाता है और जीव बिना कारण के क्रोध करने लग जाता है। अष्टम नरक जाति अपमाना। पावहिं कष्ट तहँ मन नाना॥ बहु भाँति द्वापर सर्ग नरका। फँसहि जीव निकसहिं अरका॥ व्याख्या - द्वापर में आठवाँ नरक जाति का अपमान होता है (अर्थात् अपने बराबरवालों में अपमान होना ही जाति अपमान कहलाता है), जिससे जीव का मन नाना प्रकार के कष्ट पाता है। इस प्रकार द्वापर में बहुत प्रकार के स्वर्ग-नरक होते हैं, जिनमें फँस कर जीव का तेल निकल जाता है। जुग द्वापर नहिं आनन्द मूला। होहिं दैविक, दैहिक भौतिक शूला॥ अब कहहूँ त्रेता जुग बखानी। आनन्द रस सकल गुन खानी॥ व्याख्या - द्वापर युग (रजोगुण) आनन्द का मूल नहीं होता है। क्योंकि द्वापर युग में मानसिक, शारीरिक व आर्थिक कष्ट जीव को सताते ही रहते हैं। अतः अब मैं त्रेतायुग (सतोगुणी अवस्था) का वर्णन कर रहा हूँ, जो सब गुणों की खान व आनन्द देनेवाली है। सत प्रधान जो आनन्दाई। निगम-पुराण बहु महिमा गाई॥ राजा प्रजा तहँ होइ सहयोगी। प्रजा हितकर भूप सत जोगी॥ व्याख्या - त्रेतायुग की अवस्था सात्विक गुणोंवाली व आनन्द देनेवाली होती है, जिसकी वेदों व पुराणों ने बहुत प्रकार से महिमा गाई है । त्रेता युग की अवस्था में राजा और प्रजा एक दूसरे के सहयोगी होते हैं तथा राजा प्रजा का हित करनेवाला व सात्विक भावों में बरतनेवाला होता है । दो० - राज करहिं पर राजा नहीं त्रेता जुग इहँ बहु कमाल । प्रजा सेवक निज मानहिं सत गुण रत हृदय विशाल ॥३८ ॥ व्याख्या - त्रेतायुग में राजा ही राज्य का संचालन करता है । परन्तु स्वयं राजत्व का बोध नहीं करता है और स्वयं को प्रजा का सेवक मान कर, हमेशा सात्विक भावों में बरतता हुआ, अपने हृदय को विशाल रखता है । यही त्रेता युग का चमत्कार होता है । करहहिं प्रजा भूप गुन गाना । भूप देवहहिं प्रजा सम्माना ॥ उभय बंधहि डोर विश्वासा । चहुँदिस होहिं सहयोग प्रयासा ॥ व्याख्या - त्रेता (सतोगुण) की अवस्था में प्रजा राजा के गुणगान करती है तथा राजा भी विनम्र होकर प्रजा को सम्मान देता है । राजा और प्रजा दोनों विश्वास रूपी रस्सी में बँधे हुए होते हैं और चारों तरफ आपसी सहयोग का ही प्रयास होता रहता है । दरिद्र अबुध नहिं लच्छ हीना । सकल नागरिक ग्यान प्रवीणा ॥ करहिं करम क्षमता अनुसारी । नहिं हियँ भेद तहँ नर-नारी ॥ व्याख्या - त्रेतायुग में सभी नागरिक गुण व ज्ञानवान होते हैं तथा कोई भी गरीब, अशिक्षित और लक्षणहीन नहीं होता है । सभी लोग अपनी क्षमता के अनुसार कर्म करते हैं तथा समाज में स्त्री-पुरुष का भेद भी नहीं होता है । दया दान अरु लोक कल्याणा । करहिं सहज नहिं भाव सयाना ॥ सत गुण उपवन लहलार्इ । त्रेता जुग महिमा अमित सुहाई ॥ व्याख्या - त्रेतायुग में दया, दान व लोक कल्याण के कर्म दिखावे के लिए नहीं किए जाते हैं । बल्कि सहज में ही लोग दया, दान व लोक कल्याण करते हैं। त्रेतायुग की अपार महिमा होती है, जहाँ पर सतोगुण रूपी उपवन लहराता रहता है । दया दान शुचिता फूल खिलाई । पर उपकार समीर चलाई ॥ फैलहिं सुगन्ध तहँ अनुरागा । झरहहिं मधु सहज बिरागा ॥ व्याख्या - त्रेतायुग में सतोगुण रूपी उपवन में दया, दान व पवित्रता रूपी फूल खिले रहते हैं तथा परोपकार रूपी हवा चलती रहती है। जिसमें अनुराग रूपी सुगन्ध चारों तरफ फैलने लगती है तथा सहज वैराग्य रूपी मधु फूलों से निकलने लगता है । दो० - परम धर्म मानहि सब नहिं पालहिं तहँ पाखण्ड । प्रभु शरण सब सुखद हियँ राखहिं प्रीति अखण्ड ॥ ३९ ॥ व्याख्या - त्रेतायुग में सब परमधर्म (अहिंसा) का पालन करते हैं तथा उपासना के नाम पर पाखण्ड नहीं करते हैं । सभी लोग परमपिता की शरण में सुख का अनुभव करते हुए प्रभु के प्रति अखण्ड प्रेम रखते हैं । पढ़हिं ग्रन्थ मरम पहिचानी । बूझत करहिं न जीव नादानी ॥ सकल बरतहिं सहज सुभावा । सोई धर्म परम अहिंसा कहावा ॥ व्याख्या - त्रेतायुग में लोग ग्रन्थों का अध्ययन भी मर्म को जान कर ही करते हैं तथा ग्रन्थों को समझने में भूल नहीं करते हैं । सभी लोग अपने सहज स्वभाव में बरतते रहते हैं । उसी को परम धर्म अहिंसा कहा जाता है । जब जब कर्म हो वासना हीना । तबहिं जानहु अहिंसा प्रवीणा ॥ वासना मुक्त त्रेता सब कर्मा । सोइ पालहिं सब सहज धर्मा ॥ व्याख्या - जब-जब कर्म वासनाओं से मुक्त होते हैं, तब वह अवस्था ही अहिंसा के पालन करने की होती है । त्रेतायुग में सब कर्म वासना मुक्त ही होते हैं, इसलिए सभी लोग त्रेतायुग में सहज धर्म का पालन करते हैं । मन प्रसन्न तन उल्लासा । मिले अपबर्ग सहज प्रयासा ॥ समरस रहहिं सब परिवारा । गुरु पितु मातु होइ पूजा अपारा ॥ व्याख्या - त्रेता युग की अवस्था में मन प्रसन्न रहता है तथा शरीर में उत्साह बना रहता है तथा सहज में ही जीव सुख-दु:ख से मुक्ति (अपवर्ग) प्राप्त कर लेता है । समस्त परिवार में समरसता आ जाती है तथा गुरु, माता व पिता की पूजा होने लगती है । जाति पांति नहिं तहँ किछु पंथा । कर्म आधार सब जग संस्था ॥ नहिं कोउ दरिद्र अरु धनवंता । पावहहिं सम्मान साधु संता ॥ व्याख्या - त्रेतायुग में जाति-पाति व पंथों का कोई भेदभाव नहीं होता है तथा समाज में कर्म ही सामाजिक व्यवस्था का आधार होता है । त्रेतायुग में कोई गरीब व अमीर नहीं होते हैं तथा साधु-सन्तों का सम्मान किया जाता है । दो० - सत गुण रत जीव सदा तिन्ह हृदयँ बहु विशाल । निज पर मन भाव नहिं व्यापै नहिं तहँ माया जाल ॥ ४० ॥ व्याख्या - त्रेतायुग की अवस्था में जीव सदा सात्विक गुणों में बरतते रहते हैं तथा उनका हृदय भी विशाल होता है तथा वहाँ मन में मेरा-तेरा का भाव भी नही रहता है । जिससे माया भी जीव को नहीं सताती है । संग्रह हेतु करहिं नहीं कर्मा । सहज सुभाव अनुसरहिं धर्मा ॥ पर दुख देखि दुखित समाजा । पीड़ा हेतु पावहिं बहु लाजा ॥ व्याख्या - त्रेतायुग (सतो गुण की अवस्था) में जीव संग्रह नहीं करते हैं तथा सहज स्वभाववश ही प्रकृति के धर्म का पालन करते हुए कर्म करते हैं। सतो गुण की अवस्था में जीव दूसरों के दु:खों को देख कर दु:खी हो जाते हैं तथा दूसरों को कष्ट देने में लज्जित होते हैं। सकल पालहिं निज मरजादा । बड़ छोट कहत होई अपराधा ॥ जन सुख हेतु कर्म सब राजा । स्वामी सेवक सम नहीं कछु लाजा ॥ व्याख्या - त्रेतायुग में सब लोग अपनी-अपनी मर्यादाओं का पालन करते हैं तथा किसी को छोटा-बड़ा मानना ही त्रेता में अपराध होता है। राजा भी समस्त कर्म प्रजा के सुख के लिए ही करता है तथा स्वामी व सेवक को समान मानने में किसी को लज्जा नहीं आती है। त्रेता नहीं कोई सतावहिं रोगा । होवहिं सहज जोग अरु भोगा ॥ तन अरु मन नहीं कछु पीरा । सकल मस्त आनन्द समीरा ॥ व्याख्या - सतोगुण की अवस्था में जीव को कोई रोग नहीं सताते हैं तथा सहज में ही योग और भोग में सामंजस्य बैठ जाता है। शरीर और मन में कोई कष्ट नहीं होता है तथा सभी जीव आनन्द मगन रहते हैं। नीति निपुण सकल जन वासी । परस्पर प्रीत जाई नहीं भाषी ॥ कोई गुनग्य कोउ पण्डित ज्ञानी । सेवक स्वामी सब निराभिमानी ॥ व्याख्या - समस्त लोग नीति में कुशल होते हैं तथा परस्पर निश्चल प्रेम करनेवाले होते हैं। जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। कोई पण्डित, कोई ज्ञानी व कोई गुणवान होते हैं तथा सेवक और स्वामी दोनों ही अभिमान रहित होते हैं। सुत सुता सकल आग्या कारी । जुग त्रेता सब उत्तम आचारी ॥ सपनेउ नहिं संग्रह विचारा । धन केवल होहिं दान आधारा ॥ व्याख्या - त्रेतायुग में पुत्र-पुत्रियाँ सभी आज्ञाकारी होते हैं तथा सभी लोग त्रेता में उत्तम आचरण करने वाले होते हैं। सपने में भी लोग संग्रह करने का नहीं सोचते हैं तथा धन का महत्व केवल दान के लिए ही होता है। दो० - दया दान परहित प्रबल त्रेता सोइ सत गुण प्रधान । सहजहिं सब जीवन कटै नहिं हियँ मान अभिमान ॥ ४१ ॥ व्याख्या - त्रेतायुग की अवस्था में सात्विक गुणों की प्रधानता होती है तथा दया, दान व परोपकार के भाव बहुत प्रबल होते हैं, जिससे सहज में जीवन कट जाता है तथा किसी के हृदय में मान-अभिमान नहीं आता है । सत प्रबल पाई हरि शरणा । सब सुख सुलभ जाई न बरणा ॥ करहिं उपदेस परहित हेतु । धन कमाइ भरहिं नहिं पेटु ॥ व्याख्या - सतगुणों की प्रबलता होने पर परमात्मा की शरण मिल जाती है, जिससे सब सुखों की प्राप्ति हो जाती है । जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता है । त्रेता में प्रवचन भी परहित के लिए ही करते हैं तथा प्रवचन आदि को पेट भरने का साधन नहीं बनाते हैं । परनिन्दा सुनहिं नहिं कोउ काना । जीव रत परहित दया दाना ॥ नहिं कोउ लम्पट चोर जुआरी । करहहिं कर्म रुचि अनुसारी ॥ व्याख्या - किसी की बुराई कानों में सुनाई नहीं पड़ती है । क्योंकि सभी जीव तो दया, दान व परहित के भावों में लगे रहते हैं । कोई लम्पट, चोर व जुआरी नहीं होता है तथा सभी लोग अपनी-अपनी रुचि के अनुरूप कर्म करने में लगे रहते हैं । मूरत पूजहिं नहिं त्रेता माई । नहिं हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई ॥ नहिं पंथ नहिं विधि उपासना । भाव समरप नहिं मन आसना ॥ व्याख्या - त्रेता की अवस्था में मूर्ति पूजा नहीं होती है तथा हिन्दू, मुसलमान व सिक्ख-ईसाई का भी भेद नहीं होता है । उस अवस्था में न कोई पंथ और न कोई उपासना विधि की जरूरत होती है । क्योंकि जीव तो परमात्मा के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित होकर मन में कोई आशा ही नहीं रखता है । कर्म काण्ड करहिं नहिं पाखण्डा । सहज जीव सत वृति अखण्डा ॥ प्रेम सहज विगत राग द्वेषा । मन हुलस नहिं हियँ क्लेसा ॥ व्याख्या - त्रेता में कोई भी कर्म काण्ड करने का पाखण्ड नहीं करते हैं । क्योंकि जीव तो सहज होकर सात्विक वृत्तिवाला हो जाता है । उस समय सहज प्रेम की अवस्था आ जाती है । जिससे राग-द्वेष के भाव मिट जाते हैं और मन प्रसन्न हो जाता है तथा हृदय के क्लेश मिट जाते हैं । दो० - सहज प्रेम सहजहि बढ़ै जिमि उष्ण ज्वासा घास । सहजानन्द जीव मिलै व्यापहिं नहिं माया त्रास ॥ ४२ ॥ व्याख्या - त्रेता में सहज प्रेम सहजता से बढ़ने लगता है । जैसे गर्मी की ऋतु में ज्वासा का पेड़ बढ़ने लगता है । जिसके कारण जीव को सरलता से आनन्द की प्राप्ति होने लग जाती है और माया के क्लेशों से जीवमुक्त हो जाता है । जाति पांति नहिं धरम बढ़ाई । समरस रहहिं सब लोग लुगाई ॥ अहिंसा पालहिं सब नर-नारी । सपनेउ नहीं आव भाव विकारी ॥ व्याख्या - त्रेतायुग में जाति-पाति व धर्म पद्धति का दम्भ नहीं होता है तथा सब लोग समता की अवस्था में होते हैं । सभी स्त्री-पुरुष विषय वासनाओं से मुक्त होते हैं तथा उनके मन में सपने में भी विकार नहीं आते हैं । विषय-वासना से मुक्त अवस्था ही अहिंसा के पालन की अवस्था होती है । चलहिं सहज राज सब काजा । बड़ छोट कहत पावहिं लाजा ॥ निज मानि करहिं काज अधिकारी । धन भुजबल नहीं होइ विकारी ॥ व्याख्या - राज के सब कार्य सहज में ही होने लगते हैं तथा किसी को छोटा-बड़ा कहने में ही लोगों को लज्जा आती है । राज अधिकारी राज कार्य को स्वयं का कार्य मान कर करने लगते हैं तथा धन व भुजबल से प्रभावित नहीं होते हैं । करहिं न्याय बिवेक बिचारी । देवहहिं दण्ड भाव अनुसारी ॥ लुप्त साम दाम दण्ड भेदा । सकल समाज भयउ अभेदा ॥ व्याख्या - राज अधिकारी विचार कर न्याय करते हैं तथा कर्म की भावना को देख कर ही दण्ड का निर्धारण करते हैं । त्रेता युग में साम, दाम, दण्ड व भेद की नीति का कोई पालन नहीं करता है । क्योंकि समस्त समाज तो एकता के सूत्र में बंधा होता है । कुल आधार सकल मरजादा । पालहिं सकल देइ नहीं बाधा ॥ सकल बड़ पावहिं सन्माना । निश्छल प्रेम सहज हरसाना ॥ व्याख्या - परिवार का आधार समाज की मर्यादाएँ होती हैं तथा सभी लोग मर्यादाओं का पालन करते हैं तथा दूसरों को बाधा नहीं देते हैं । सभी परिवार के बड़े-बुजुर्ग सम्मान प्राप्त करते हैं तथा परिवार में निश्छल प्रेम और सहज खुशी बनी रहती है । दो० - सहज कुटुम्ब जो रहे सहजहि समाज सुहाय । सहज ते सहज भये सो कुटुम्ब वसुधैव कहाय ॥ ४३ ॥ व्याख्या - जब परिवार सहज हो जाता है, तो समाज भी स्वतः ही सहज हो जाता है तथा सहजता से सभी सहज हो जाते हैं तथा उसी अवस्था को वसुधैव कुटुम्ब की भावना के रूप में जाना जाता है । संयुत रहहिं सब परिवारा । समता प्रेम सहयोग आधारा ॥ कर्म अनुरूप समाज सुहाई । राजा प्रजा उभय सुख पाई ॥ व्याख्या - त्रेतायुग में (सतोगुणी अवस्था) संयुक्त परिवार होते हैं । जिनका समता, प्रेम और आपसी सहयोग की भावना ही आधार होती है। कर्म के अनुरूप ही समाज का स्वरूप बनता है। अतः त्रेता में राजा और प्रजा दोनों ही सुखी रहते हैं। करहिं कर्म सब रुचि अनुसारी। औसर समान सकल अधिकारी॥ कर्म चयन सुतन्त्र जनवासी। रहत उमंग नहिं मन उदासी॥ व्याख्या - सभी लोग अपनी-अपनी रुचि के अनुरूप कर्म करते हैं तथा सभी नागरिकों को कर्म के चुनाव की स्वतन्त्रता होती है तथा सभी को अवसर की समानता प्राप्त होती है। जिसके कारण नागरिकवृन्द उत्साहित रहते हैं तथा मन में कुण्ठा नहीं रहती है। मद्यपान नहिं सहज सुभाउ। त्रेता जुग सो करहिं नहिं काउ॥ करहिं मद्यपान होइ पछतावा। वात पित विकार देह अकुलावा॥ व्याख्या - मद्यपान जीव का सहज स्वभाव नहीं होता है। इसलिए त्रेता युग में कोई भी मद्यपान नहीं करते हैं और अगर कोई भूल से मद्यपान कर लेता है, तो पश्चाताप करना पड़ता है। क्योंकि मद्यपान से वात और पित विकार हो जाते हैं। जिससे शरीर में कष्ट होने लग जाता है। तन अरु मन होहहिं विकारी। हानि वित नहिं मद लाभकारी॥ उचित करहिं नहिं मदपाना। प्रभु शरण रहि जीव मस्ताना॥ व्याख्या - मद्यपान करने से तन और मन दोनों में विकार आ जाता है तथा धन की भी हानि होती है। इसलिए उचित यही है कि मद्यपान नहीं किया जाए। क्योंकि प्रभु की शरण में रहने पर जीव आनन्द में रहता है। दो० - सत गुण ते प्रभु शरण मिलै ऐहि ते किछु संशय नाय। प्रभु शरण सदा सुखद अति त्रेता सो सहजहिं मिल जाय ॥ ४४ ॥ व्याख्या - सात्विक भावों से परमात्मा की शरण मिल जाती है। इसमें कोई संशय नहीं है तथा परमपिता की शरण हमेशा सुख देनेवाली होती है, जो त्रेता की अवस्था में सहजता से ही मिल जाती है। त्रेता मनोरंजन हरि गुण गाना। स्तुति रत करहिं प्रभु ध्याना॥ जुग त्रेता महिमा गुरु अपारा। पूजहिं शिष्य जानि करतारा॥ व्याख्या - त्रेतायुग में परमपिता का गुणगान करना ही मनोरंजन का साधन होता है और लोग परमात्मा की स्तुति और ध्यान में मग्न रहते हैं। त्रेतायुग में गुरु की महिमा भी अपार होती है और शिष्य गुरु को भगवान मान कर पूजा करते हैं। गुरु सहज दयाल अविकारी। धन हरण रखहिं न मन विचारी॥ उभय मिलि जाहि प्रभु शरणा। सहज विराग आनन्द रमणा॥ व्याख्या - गुरु भी सहज, दयाल और विकारों से मुक्त होते हैं तथा शिष्य के धन का हरण करने का विचार भी मन में नहीं रखते हैं। गुरु और शिष्य दोनों मिल कर परमात्मा की शरण में रहते हैं तथा सहज में ही वैराग्य और आनन्द की अवस्था रहती है। गुरु कबहुँ करहिं न पाखण्डा। शिष्य हियँ चाइ भक्ति प्रचंडा॥ मिलि उभय हरि गुण गावहिं। नहिं संशय परमानन्द पावहिं॥ व्याख्या - गुरु कभी भी पाखण्ड नहीं करते हैं तथा हमेशा शिष्य के अन्दर प्रचण्ड भक्ति की कामना करते हैं। दोनों मिल कर परमात्मा के गुणों का बखान करते हैं। जिससे परम आनन्द को प्राप्त करते हैं। इसमें संशय नहीं है। गुरु सिखावहिं गुरु मरमा। पालहिं सहज प्रकृति धरमा॥ वासना मुक्ति युक्ति बतावहिं। अकपट आनन्द राह दिखावहिं॥ व्याख्या - गुरु ही गुरु तत्व के रहस्य को बताते हैं तथा प्रकृति के सहज धर्म का पालन करते हैं। शिष्य को निष्कपट होकर वासनाओं से मुक्ति के उपाय बताते हैं तथा आनन्द का मार्ग दिखाते हैं। दो० - गुरु सत शिष्य निर्मल भगवत कृपा ते होय। उभय भव तरहिं पल्ला पकड़ै नहिं कोय॥ ४५॥ व्याख्या - परमपिता की कृपा से गुरु सात्विक और शिष्य निर्मल होते हैं, जिससे दोनों भाव रूपी भवसागर को पार कर जाते हैं और उन्हें कोई बाधा नहीं आती है। समरप भाव हियँ सिखावहिं। हरि गुण धाम बहु समझावहिं॥ परमारथ रत प्रभु शरणा। धन्य जीव जेहि अनुसरण॥ व्याख्या - गुरु अपने शिष्य को बहुत प्रकार से परमात्मा के समक्ष समर्पण करना सिखाते हैं तथा परमात्मा के गुण, धाम आदि को बहुत प्रकार से समझाने की कोशिश करते हैं। जो लोग परमार्थ भाव में दृढ़ होकर परमपिता की शरण में होते हैं, वे बहुत धन्य होते हैं। त्रेता जुग बहु नारी सन्माना। सहज प्रीत सदा तहँ सुजाना॥ वस्तु भोग नहीं मानहिं नारी। जुग त्रेता इहँ महिमा अपारी॥ व्याख्या - सतोगुण की अवस्था में स्त्री का बहुत सम्मान होता है तथा लोग सहज में ही नारी से प्रीत करते हैं अर्थात् निष्काम प्रेम करते हैं। नारी भोग की वस्तु नहीं मानी जाती है। इसलिए त्रेतायुग की महिमा अपार होती है। सत पथ चलहिं सकल नारी। पर पुरुष न सपनेउ निहारी॥ करहिं पालन मरजादा सारी। धन्य धन्य जुग त्रेता नारी॥ व्याख्या - नारी भी सात्विक पथ पर चलनेवाली होती है तथा सपने में भी पराये पुरुष का चिन्तन नहीं करती है । नारी समस्त मर्यादाओं का पालन करती है । इसलिए त्रेता युग की नारी धन्य होती है । दैवी गुण बसहिं हृदयँ माहि । सत जानइ पुरुष न सताहि ॥ पावन अति सम्बन्ध संभोगा । प्रकृति रत नहि कारण भोगा ॥ व्याख्या - नारी के हृदय में प्रकृति का निवास होता है । इस सत्य को जान कर पुरुष भी नारी को नहीं सताते हैं । संभोग के सम्बन्ध भी अति पवित्र होते हैं । क्योंकि संभोग प्रकृति के अनुरूप ही करते हैं तथा वहाँ भोग हेतु संभोग नहीं किया जाता है । दो० - नारी पूजहिं सहज जब तब तब समरस होई समाज । त्रेता इहँ सुलभ सब मिलि जुल करत सब काज ॥ ४६ ॥ व्याख्या - जब नारी को सहज (निस्वार्थ) सम्मान दिया जाता है, तब-तब समाज में समरसता आ जाती है । इसलिए त्रेता युग में समरसता आसान होती है और स्त्री-पुरुष सब मिल-जुल कर सदा सब कार्य करते रहते हैं । त्रेता जुग भल सब सुखदाई । तबहूँ यश इच्छा हियँ छुपाई ॥ यश चाह जीव दुःख उपजार्इ । नहिं संशय इहँ त्रेता लघुताई ॥ व्याख्या - त्रेतायुग सब प्रकार के सुखों को देनेवाला होता है, परन्तु जीव के हृदय में यश की इच्छा छुपी रह जाती है और यश की इच्छा से जीव को दुःख हो जाता है, इसलिए त्रेतायुग भी पूरी तरह से मुक्तिदायक नहीं होता है, अतः यही त्रेतायुग की कमी है । सुख बहु त्रेता दुःख अति अल्पा । सत्य वचन इहँ नहिं कल्पा ॥ सतजुग उत्तम सब भाँति । नहिं दुःख आनन्द दिनु राति ॥ व्याख्या - त्रेतायुग में बहुत सुख की प्राप्ति होती है तथा दुःख बहुत ही कम व्यापता है । यह सत्य है, कोई कहानी नहीं है । परन्तु सतयुग सबसे उत्तम होता है, जहाँ पर दुःख का नामोनिशान नहीं होता है तथा दिन-रात आनन्द की अवस्था रहती है । ईश्वर अंश जीव अनुभूति । बरनिन जाई सत करतूति ॥ सोहम् सोहम् वृत्ति अखण्डा । भय गत हिय शक्ति प्रचण्डा ॥ व्याख्या - सतयुग की अवस्था में जीव को अपने अनुभव से समझ में आ जाता है कि मैं परमपिता का ही अंश हूँ । अतः उस सत की अवस्था का वर्णन नहीं किया जा सकता है । उस समय जीव की सोहम् वृत्ति अखण्ड हो जाती है । जिससे समस्त भय का नाश हो जाता है और जीव के हृदय में परमपिता की प्रचण्ड शक्ति प्रकट हो जाती है । कवि कोविद सकहिं नहीं गाई । मोहि सम अबुध कौन बसाई ॥ बाणी मौन नहीं वासना कोई । केहि विधि लेखन सम्भव होई ॥ व्याख्या - सत्युग की महिमा का बखान तो कवि और विद्वान भी नहीं कर सकते हैं । तब मेरे जैसे अज्ञानी की क्या बिसात है । सत्युग में तो वाणी भी मौन हो जाती है और कोई वासना मन में नहीं रहती है । तब बिना वाणी के वर्णन कैसे सम्भव हो सकता है ? दो० - प्रभु प्रेरित सत भाव हियँ जद्यपि नहिं मोहि सत ग्यान । सोइ सत इहाँ बरनहउँ सुनहु सत्य सकल जहान ॥ ४७ ॥ व्याख्या - मेरे हृदय में परमपिता की प्रेरणा से ही सत भाव आ रहे हैं । हालांकि मुझे सत का ज्ञान नहीं है । उसी सत का यहाँ मैं वर्णन कर रहा हूँ । हे जगत के लोगों ! मेरी सत्य बात को सुनो । शब्द बल सत जुग अपारा । वाणी अनुरूप प्रकृति आचारा ॥ जेहि बोलहि मानस होवइ सोई । सत जुग सम नहिं महिमा कोई ॥ व्याख्या - सत्युग में शब्द ब्रह्म की अपार शक्ति होती है । क्योंकि वाणी के अनुसार ही प्रकृति में घटनाएँ घटित होने लग जाती हैं । सत्युग में मन में बोलने से भी वाणी का प्रभाव हो जाता है । इसलिए सत्युग के समान दूसरे युगों की महिमा नहीं होती है । अनुसरहिं प्रकृति सदा मन भावा । सोइ मानस पाप पुण्य सुहावा ॥ सरदी गरमी बर्षा उष्णताई । सतजुग काहु कबहुँ न सताई ॥ व्याख्या - प्रकृति सत्युग में मन की भावना का अनुसरण करती है । इसलिए मानसिक पाप-पुण्य भी होते हैं । सत्युगी साधक को सर्दी-गर्मी, वर्षा व उष्णता आदि नहीं सताते हैं । सम सब गृहस्थ साधु सन्ता । सब मस्त जानि प्रभु अनन्ता ॥ नहिं पंथ नहिं विधि उपासना । सहज सकल रहित आसना ॥ व्याख्या - सत्युग में परमपिता को अनन्त जान कर साधु, सन्त व गृहस्थ मस्त रहते हैं । वहाँ न कोई उपासना की विधि होती है और न ही कोई पंथ ही होता है । वहाँ तो सभी वासनाओं से मुक्त होकर सहज रहते हैं । निज ब्रह्ममय सकल ब्रह्म जानी । नहिं ऊँच नीच सम सब प्रानी ॥ पशु पाखी सब बोलहिं निज भाषा । समझहिं मनुज सहज आभासा ॥ व्याख्या - सत्युग में जीव स्वयं तो ब्रह्ममय होता ही है । बाकी सभी को ब्रह्ममय जान कर ऊँच-नीच की भावना से मुक्त होकर, वह सबको समान मानता है । पशु-पक्षी भी अपनी भाषा बोलते हैं । जिसको मनुष्य भी सहज अभ्यास से समझने लगते हैं । दो० - सत जुग सम जुग नहीं देखहु मन ही मन विचार । सहज सुगम जीवन सरल कृपा बरषहिं करतार ॥ ४८ ॥ व्याख्या - सत्युग के समान दूसरा कोई युग नहीं होता है । मन में विचार करके देख लो । क्योंकि सत्युग में जीवन सहज, सुगम और सरल होता है तथा निरन्तर परमात्मा की कृपा बरसती रहती है । निज मन निज भूप सुहावहिं । सपनेउ पराधीन नहिं भावहिं ॥ देह गेह नहिं तहँ होवहिं मोहा । नहिं राग न लोभन क्षोभ न द्रोहा ॥ व्याख्या - सत्युग में जीव अपने मन का राजा स्वयं ही होता है तथा सपने में भी पराधीनता का भाव नहीं आता है । शरीर और घर में जीव की आसक्ति नहीं होती है और न ही राग, लोभ, क्षोभ और द्वेष होता है । नारी पुरुष नहिं कामासक्ता । संभोग सहज प्रकृति अनुरक्ता ॥ मन वच कर्म सब ब्रह्मचारी । माया विमुक्त सब नर नारी ॥ व्याख्या - नारी-पुरुष काम भावना के आसक्त नहीं होते हैं और प्रकृति की ऋतु के अनुरूप ही संभोग करते हैं । मन, वचन और कर्म से सभी लोग ब्रह्मचारी (ब्रह्ममय) होते हैं तथा सब स्त्री-पुरुष माया से मुक्त होते हैं । नहिं मरजाद सहज सुभावा । मोह कुटुम्ब तहँ न सुहावा ॥ बोलहिं बचन सत्य सुहाई । सतजुग महिमा सब जन गाई ॥ व्याख्या - सत्युग में मर्यादाओं का बन्धन नहीं होता है । वहाँ तो सहज स्वभाव में जीव रहता है तथा परिवार का मोह भी नहीं होता है । वहाँ वाणी सत्य हो जाती है । इसलिए सभी ने सत्युग की अपार महिमा का वर्णन किया है । सरग नरग नहिं नाम निशाना । केवल तहँ अपबर्ग ठिकाना ॥ मान अपमान नहिं कछु भेदा । आनन्द उमंग रहित सब खेदा ॥ व्याख्या - सत्युग में स्वर्ग नरक की कोई कल्पना नहीं रहती है अर्थात् सुख का कोई भाव नहीं रहता है । वहाँ तो सुख-दुख से परे अपवर्ग की अवस्था रहती है । वहाँ मान-अपमान का भी कोई भेद नहीं होता है तथा हृदय में दुःखमुक्त आनन्द व उमंग की अवस्था बनी रहती है । दो० - सत युग सत प्रधान भा नहीं तहँ मद मान अपमान । ग्यान अग्यान समान सब ब्रह्ममय सकल जहान ॥ ४९ ॥ व्याख्या - सत्युग सत प्रधान होता है, जहाँ पर मद, मान व अपमान की भावना नहीं रहती है तथा वहाँ ज्ञान-अज्ञान का भाव भी नहीं रहता है । जिससे समस्त संसार ब्रह्ममय दिखाई देने लगता है । अहार विहार रुचि अनुसारी । सकल जग संपदा अधिकारी ॥ निज पर नहीं भाव हिय माहिं । बिगत काम क्रोध मद सबाहिं ॥ व्याख्या - सत्युग की अवस्था में सभी जीव अपनी रुचि के अनुसार आहार-विहार करते हैं तथा सारा संसार ही समस्त सम्पदा का अधिकारी होता है । अर्थात् स्वयं की कोई सम्पदा नहीं होती है । जीव के हृदय में मेरे-तेरे का भाव भी नहीं रहता है तथा काम, क्रोध, मद, लोभ आदि मिट जाते हैं । सरल सहज होय दिन चर्या । अनवरत रह भाव ब्रह्मचर्या ॥ तहँ नहि होइ भेद भलमन्दा । सहज सुभाव मन मुकुन्दा ॥ व्याख्या - सत्युग में जीव की दिनचर्या सहज व सरल हो जाती है, जिससे वह निरंतर ब्रह्मभाव में स्थित हो जाता है । वहाँ कोई अच्छे-बुरे का भाव भी नहीं रहता है । जिससे जीव सहज हो जाता है और मन प्रसन्न रहता है । सपनेउ नहिं निज पर भावा । गत माया जीव बहु सुख पावा ॥ मन बचन कर्म साम्यता छाइ । सकल सम्पदा सकल सुहाई ॥ व्याख्या - वहाँ सपने में भी अपना-पराया नहीं होता है । जिससे माया समाप्त हो जाती है और माया के नहीं रहने से जीव बहुत सुखी रहता है । मन, वचन व कर्म से सत्युग में साम्यता आ जाती है । जिससे सभी लोग सभी सम्पदा को अपनी ही सम्पदा मानने लगते हैं । परम स्वाधीन जीव सुहाई । राजा प्रजा तहँ भेद मिटाई ॥ मन्दिर-मस्जिद नहिं संस्था । नहिं कोउ विधि नहिं कोइ पंथा ॥ व्याख्या - वहाँ जीव परम स्वाधीन अवस्था में रहता है तथा सत्युग में राजा-प्रजा का भी भेद मिट जाता है । वहाँ कोई मन्दिर-मस्जिद भी नहीं रहता है तथा कोई उपासना विधि और उपासना के पंथ भी नहीं होते हैं । दो० - सतजुग सहज सबहिं भिन्न न मानहिं भगवान । ब्रह्म भाव अवस्था भयी सब हियँ बसहिं ग्यान ॥ ५० ॥ व्याख्या - सत्युग में सभी की सहज अवस्था होती है । जिससे जीव भगवान को अपने से भिन्न नहीं मानता है । उस समय ब्रह्मभाव की अवस्था आ जाती है । जिससे हृदय में अज्ञान नहीं बच पाता है और सबके हृदय में ज्ञान का निवास हो जाता है । नहिं गुरु शिष्य नहिं कोइ देवा । निज स्वामी निज करहिं सेवा ॥ नहिं ग्यान वान नहिं अग्याना । नहिं मद लोभ नहिं दया दाना ॥ व्याख्या - सत्युग में न कोई गुरु होता है और न कोई शिष्य होता है तथा जीव स्वयं ही स्वयं का मालिक और स्वयं ही स्वयं का सेवक होता है । कोई ज्ञानी और अज्ञानी भी नहीं होता है तथा मद, लोभ, दया, दान आदि का भ्रम नहीं रहता है । गुणातीत जीव नहिं कछु पीरा । प्रकृति लय होवहिं मन धीरा ॥ सोहम सोहम वृत्ति निरन्ता । तिन्ह हियँ बसहिं भगवन्ता ॥ व्याख्या - सत्युग में जीव की गुणातीत अवस्था होती है तथा जीव प्रकृति लय व धीर मनवाला होता है । जीव की सत्युग में सोहम् वृत्ति अखण्ड हो जाती है, जिससे उसके हृदय में भगवान स्वयं निवास करने लग जाते हैं । वाणी निर्मल विगत राग द्वेषा । बोलहिं बचन सत्य हमेशा ॥ जप तप संयम नियम पारा । बनि द्रष्टा देखहिं जग सारा ॥ व्याख्या - सत्युग में जीव की वाणी निर्मल हो जाती है, जिससे वह हमेशा सत्य ही बोलता है । जीव जप, तप, नियम व संयम के बन्धन से भी मुक्त होकर संसार को द्रष्टा बन कर देखता है । प्रकृति विधि तिन्ह नियम सुहाई । मन मत्त रहहिं सहज सदाई ॥ करहिं सहज जग व्यवहारा । खान-पान सब सरल आचारा ॥ व्याख्या - सत्युग में प्रकृति के नियम ही जीव के नियम होते हैं । इसलिए जीव मन में मस्त होकर सहज बना रहता है । संसार में भी जीव का व्यवहार सहज होता है तथा खान-पान भी प्रकृति के अनुरूप सरल होता है । दो० - सहज संतोष सुखद सदा निरइच्छा निराभिमान । निसि दिवस आनन्द रस जानि चराचर इक समान ॥ ५१ ॥ व्याख्या - सत्युग में जीव सहज में ही संतोषी और सुख भाव में रहता हुआ निरइच्छा और अभिमानरहित रहता है तथा समस्त चराचर के जीवों को एक समान मान कर रात-दिन एक ही आनन्द अवस्था में रहता है । भूषण बसन नहिं किछु मोहा । सम सब पुर गिरि कानन खोहा ॥ आनन्द बह तिन्ह हियँ माहिं । धन्य धन्य जे जनु इहँ पाहिं ॥ व्याख्या - सत्युग में किसी भी प्रकार के आभूषण व वस्त्रों का कोई मोह नहीं होता है तथा जीव के लिए शहर, वन, पर्वत व गुफा एक जैसे ही लगते हैं । गत माया जीव परम सुहाए । आत्मा सोई परमात्मा कहाए ॥ भ्रम ग्रन्थि यहाँ जाई मिटाई । विगत भ्रम आनन्द दिवाई ॥ व्याख्या - जब माया चली जाती है, तो जीवात्मा शुद्ध होकर परम हो जाती है । उसी को आत्मा-परमात्मा कहा जाता है । उस अवस्था में भ्रम की सब ग्रन्थियाँ खुल जाती हैं और भ्रम के मिट जाने से आनन्द पैदा हो जाता है । सतजुग उत्तम जुग सुहाई । दुर्गम अति बिरला कोउ पाई ॥ जुग भल पर निवास कठीना । मिलहिं नहिं सोई भगति हीना ॥ व्याख्या - सत्युग उत्तम युग होता है । परन्तु प्राप्त करना बहुत कठिन होता है । इसलिए कोई बिरला जीव ही इस अवस्था में पहुँच पाता है । सत्युग अच्छा युग होता है । परन्तु इस अवस्था में रहना बहुत कठिन होता है और बिना भक्ति के इसे प्राप्त भी नहीं किया जा सकता है । सरल सहज नहीं कुटिलाई । सोई अवस्था भगति कहाई ॥ नहिं वासना नहिं चाह मन माहि । तब तबहि संभव सहजताहि ॥ व्याख्या - जब जीव सरल और सहज होता है तथा कुटिलता मुक्त होता है । उसी अवस्था को भक्ति कहा जाता है और जीव सहज तभी रह सकता है, जब वह वासनाओं व इच्छाओं से मुक्त हो । दो० - जब लगि वासना मन रहे तब लगि नहीं सहज सुभाव । बिनु सहजता सतजुग नहिं बिनु सतजुग मुक्ति न पाव ॥ ५३ ॥ व्याख्या - जब तक मन में वासनाएँ रहती हैं, तब तक जीव का स्वभाव सहज नहीं हो पाता है और बिना सहजता के सत्युग की अवस्था में जाया नहीं जा सकता है और बिना सत्युग की अवस्था के मुक्ति नहीं मिल सकती है । असहज कोटि जतन कर कोई । पाखण्ड भल भगति न होई ॥ सतजुग रहित सकल पाखण्डी । आनन्द भाव रहत अखण्डा ॥ व्याख्या - असहज होकर अगर कोई करोड़ों प्रयास करे, तब भी भक्ति की अवस्था को प्राप्त नहीं कर सकता है । बल्कि वह सब पाखण्ड ही होता है । सत्युग की अवस्था तो समस्त पाखण्डों से मुक्त होती है तथा वहाँ एकरस आनन्द की अवस्था बनी रहती है । तन मन सहज निरोगी काया । दाल न गलहहिं नटनी माया ॥ रहै अद्वैत जीव अष्ट यामा । भाव शान्त भयउ निष्कामा ॥ व्याख्या - सत्युग में तन और मन सहज हो जाते हैं । जिससे सहज में ही शरीर भी निरोग हो जाता है और वहाँ माया का प्रभाव भी नहीं पड़ता है । जीव आठों पहर परमात्मा से एक रूप हो जाता है, जिससे समस्त भाव शान्त हो जाते हैं और जीव निष्काम हो जाता है। सकल भरम नसावहिं जीवा। सोई कहावहिं अवस्था सीवा॥ सतजुग पार नहिं कोई होई। धन्य धन्य जो पावई सोई॥ व्याख्या - सत्युग की अवस्था में जीव के समस्त संशयों का नाश हो जाता है। अतः उसी अवस्था को परम शिव की अवस्था कहा जाता है। सत्युग से परे जीव की सीमा नहीं होती है, अतः वह जीव धन्य है, जो सत्युग की अवस्था में प्रवेश करता है। ऋषि मुनि सब हियँ अभिलाषा। केहि विधि पावहँ सत सुपासा॥ सत विचार सोई होई उपकारी। नहिं कोउ महिमा सत अगारी॥ व्याख्या - ऋषि-मुनि सभी के मन में यह इच्छा रहती है कि सत्युग की अवस्था को कैसे प्राप्त किया जाये? सत्युग का विचार आना ही कल्याणकारी हो जाता है। अतः सत्युग के बराबर किसी की महिमा नहीं हो सकती है। दो० - सत पथ जे चलहि तिन्ह हिय बसै भगवान। जिन्ह हियँ भगवान रहे तहँ न बचहिं अज्ञान॥ ५४॥ व्याख्या - जो सत्य (सहज) के रास्ते पर चलते हैं, उनके हृदय में भगवान निवास करते हैं और भगवान जिनके हृदय में निवास करते हैं, उनके हृदय में अज्ञान नहीं रह पाता है। छ० - कथा पावनि भ्रम नसावनि मतिअनुसार सब कही। लेखनी मोरी प्रेरणा तोरी लिखी अनुभूति सबही॥ जे जनु पढ़हिं भव तरहिं सत्य वचन संशय नहीं। करहिं ध्याना होवहिं ग्याना भव बँध सकल नसहीं॥ व्याख्या - यह कथा मैंने मेरी बुद्धि के अनुसार लिखी है। इसमें केवल लेखनी मेरी रही परन्तु प्रेरणा तो प्रभु आपकी ही रही है। जिससे समस्त अनुभूतियों को लिखा गया है। इसलिए जो लोग इस कथा को पढ़ेंगे, वे भाव रूपी भवसागर को पार कर जायेंगे, इसमें संशय नहीं है। जो परमपिता का ध्यान करेंगे, उनके हृदय में ज्ञान हो जायेगा और भावों का बंधन मिट जायेगा। ॥ इति श्री मानवधर्मशास्त्रस्य सकल संशय नाशनार्थम प्रथम सोपान सम्पूर्णम॥ ॥ मानवधर्मशास्त्रस्य मासपरायण द्वितीय पड़ाव॥
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