स्वारथ की पहचान
ओ बन्दे तुझे बताऊँ स्वारथ की पहचान रे।
स्वयं की इन्द्रियाँ स्वरथ होती है, विषय रमण सोई स्वारथ जान रे।।
ओ वन्दे.....
प्राण ऊर्जा से इन्द्रियाँ चलती, प्राण ही है स्वारथ का विज्ञान रे।।
प्राण को जो निर्मल कर लेता, उसको हो जाता स्वारथ का ज्ञान रे।।
ओ वन्दे.....
जो जान लिया मरम स्वारथ का, वो पा जाता पद निर्वाण रे।।
स्वारथ में दु:ख मिलता है, परमारथ में मिलता भगवान रे।।
ओ वन्दे.....
इन्द्रियों को विषय विरत करलो, परम आनन्द मिलेगा कहता लक्ष्मीनारायण रे।।
ओ वन्दे.....
‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके।
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