Loading...

Lyrics

सनातन

Satyavani Bhajan (Part -4)
सनातन तन से सना सनातन है, मत पाखण्ड में भरमावो रे। हिन्दू-मुस्लिम जो करते, इनको दूर हटावो रे।। चार अवस्था देह की होती, इनको वर्ण चार समझावो रे।। मुख से कारज करता, सोइ मुख ब्राह्मण होवे रे।। भुजा करती रक्षा तन की, सोई रक्षा भाव क्षत्रिय कहावै रे।। उदर भरण की जुगति होती, सोई भाव वैश्य सुहावै रे। सेवा भावना होती तन की, सोई पद शुद्र कहावै रे। ज्ञान भाव ब्राह्मण होता, रक्षा भाव क्षत्रिय कहावै रे। पालन-पोषण भाव वैश्य का, सेवा भाव शुद्र सुहावै रे।। चारों भाव जुड़े हैं तन से, सोई सनातन लक्ष्मी समझावै रे।। ‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके। Satyavani Bhajan, Awadhoot Laxminarayan, Awadhoot Devidas Maharaj, Manav Dharma Shastra, Satyavani Sangit Mahotsav,
Special Thanks and credits to HTML Codex