हे सतगुरु अब मैं कैसे गीत तेरे गाऊँ
हे सतगुरु अब मैं कैसे गीत तेरे गाऊँ।
नाम रूप रेख नहिं तेरे अब कैसे समझाऊँ।।
तू है सब जगत का स्रष्टा, रहता है तू बनकर दृष्टा
अब कैसे मैं बताऊँ।।
हे सतगुरु .....
तू है गुण गोतीत कर्म फल दाता
बिधि का मूल तू है जगत का बिधाता
तेरे चरणों में शीश झुकाऊँ
हे सतगुरु .....
तेरे सुमिरण से मुझे सुख मिलता
उठे उमंग मेरा हृदय कमल खिलता
कर दे करुणा मैं नहाऊँ।।
हे सतगुरु .....
जब भी तू मेरी सुरता में आए
मेरा मन झूम झूम आनन्द पाए
तेरी शरण में मैं सुख पाऊँ।।
हे सतगुरु .....
आदि अन्त नहिं तेरा सतगुरु
तुझसे ही अन्त तुझसे ही सब शुरु
अब तेरे सन्मुख समर्पण कराऊँ।।
हे सतगुरु .....
‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके।
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