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Lyrics

मन बुद्धि का है जगत विलास रे

Satyavani Bhajan (Part -4)
मन बुद्धि का है जगत विलास रे मन बुद्धि का है जगत विलास रे। ओ बन्धु तू निज घट में तलाश रे।। प्रभु तो व्यापक सब जग में, प्राण डोर से जुड़ा है कण-कण में तू करले निज घट में आभास रे। मन बुद्धि का...... गजब निराली प्रभु की सत्ता, बिनु प्राण के नहिं हिलता पत्ता करले बन्धु दृढ़ विश्वास रे।। मन बुद्धि का...... दृष्टा बनकर प्रभु रहता, भाव अनुरूप सब घटता भाव देखि आता प्रभु पास रे।। मन बुद्धि का...... प्रभु चरणों में जो मन लगाए, चिन्ता शोक उसके मिट जाए मन में छा जाता उल्लास रे। मन बुद्धि का...... कहत लक्ष्मी सुनो रे बन्धु, प्रभु शरण में पूर्ण सब आस रे।। मन बुद्धि का...... ‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके। Satyavani Bhajan, Awadhoot Laxminarayan, Awadhoot Devidas Maharaj, Manav Dharma Shastra, Satyavani Sangit Mahotsav,
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