ओ सुन ले रे जग के इन्सान
ओ सुन ले रे जग के इन्सान।
तुझे समझाऊँ ब्रह्म का ग्यान ॥
इन्सान ही अल्लाह है है नर ही नारायण।
एक बीज से सब सृष्टि पैदा तब क्या हिन्दू क्या मुसलमान ॥
ओ सुन ले रे जग के इन्सान।
सब घट घट में प्रभु बसता होकर एक रुप प्रान।
ई ऊ स्वर ईश्वर है यही है प्रकृति का विधान ॥
ओ सुन ले रे जग के इन्सान।
सबका पालन प्रभु करता चराचर उसकी सन्तान।
भल सोच भला होता निर्मल मन सुख का साधन जान ॥
ओ सुन ले रे जग के इन्सान।
तू खुद ही खुदा है तेरा नेकी करके ले तू जान।
आवत जावत पवन सँभारों हृदय राखी गुरु कृपा निधान।
ओ सुन ले रे जग के इन्सान।
सब में समता का भाव रखो उर्जा ही शक्ति जान।
शक्ति ही ब्रह्म है ब्रह्म अखण्ड है यही सच्चा ज्ञान ॥
कहत लक्ष्मी सुन लो रे बन्धु ऐहि विधि पावोगे पद निर्वाण ॥
‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके।
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