बिरथा तू जग में अकड़े रे
ओ जीव समझ अब तू
बिरथा जग में अकड़े रे ।
मैं मैं जब तू करता
मन तेरा तब बिगड़े रे ।
ओ जीव समझ ............................ ।
खुद के तू दोष ना देखे
तेरे कारण सब जग में झगड़े रे ।
ओ जीव समझ ............................ ।
अपना पराया तू ही करता
तू ही जग में उलझे रे ।
ओ जीव समझ ............................ ।
तू ही कर्ता तू ही भर्ता
तू ही खाये जग में रगड़े रे ।
ओ जीव समझ ............................ ।
सुख दुःख की चिन्ता करे
पाले ख्वाहब हियँ तगड़े रे ।
ओ जीव समझ ............................ ।
पर दोष तू सदा लागाये
मूढ़ तू मरम न समझे रे ।
ओ जीव समझ ............................ ।
कहत लक्ष्मी सुन रे बन्धु
खुद को समझ भव तर ले रे ।
ओ जीव समझ ............................ ।
‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके।
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