समता
समता की दृष्टि बनाले आनन्द ही आनन्द रह जायेगा ।
अपना-पराया तू मिटाले भव सागर से तर पायेगा ।।
समता की दृष्टि बनाले .. .. .. .. .. ..
परमार्थ तू अपनाले बन्धन सब खुल जायेगा ।
सत कर्म की राह बनाले परमपिता तूझे बुलवायेगा ।।
समता की दृष्टि बनाले .. .. .. .. .. ..
पाँच भूत का अन्न जानले सृष्टि भेद समझ पायेगा ।
मन को तू लगाम लगाले बस खुदा खुद ही रह जायेगा ।।
समता की दृष्टि बनाले .. .. .. .. .. ..
देह का नर तू समझले ध्यान-ग्यान सब हो जायेगा ।
निज नारी तू पहचान ले माया निज वश कर पायेगा ।।
समता की दृष्टि बनाले .. .. .. .. .. ..
श्वास में दृष्टि मिलाले सच्चा साधक कहलायेगा ।
कहत लक्ष्मी सुनो रे बन्धु परम पद पा जायेगा ।।
समता की दृष्टि बनाले .. .. .. .. .. ..
‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके।
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