ओ मन आनन्द में जी ले
ओ मन आनन्द में जी ले
आनन्द ही आनन्द छा जायेगा ।
ओ ............................
राग द्वेष तू भूला दे
अपना ही अपना रह जायेगा ।
ओ ............................
भूत भविष्य को तू भूला दे
आनन्द ही आनन्द बच जायेगा ।
ओ ............................
कल की चिन्ता छोड़ मन
कष्ट तेरा सब मिट जायेगा ।
ओ ............................
तू ना भोग कर ना त्याग कर
सच्चा योगी कहलायेगा ।
ओ ............................
आवत जावत श्वास देख ले
वर्तमान तूझे मिल जायेगा ।
ओ ............................
ना भोग ना रोग सताए
बस तू सहज हो जायेगा ।
ओ ............................
कहत लक्ष्मी सुनो रे बन्धु
सहज ही मुक्ति पाएगा ।
ओ मन ............................
‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके।
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