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Lyrics

परम पिता उवाच (Param Pita Uvach)

Satyavani Bhajan (Part-1)
परम पिता उवाच प्रभु सदा बोलते हैं जीव तू नहीं पहचाने । बिनु परमपिता के पत्ता न हिलता तू क्यों न जाने ॥ देह तो नश्वर है क्यों नहीं वस्त्र जैसा माने । राग द्वेष तो मन विकार क्यों नहीं युद्ध इनसे ठाने ॥ प्रभु तो सदा बोलते जीव नहीं पहचाने......... बीज रूप है सृष्टि सारी फिर क्यों मोह में फँसाने । अपना-पराया देह का रिश्ता आत्मा को क्यों ना जाने ॥ प्रभु तो सदा बोलते जीव नहीं पहचाने......... भविष्य से इच्छा सारी कारण वासना क्यों ना माने । भाव से भव सागर बनता फिर चिन्ता क्यों लिपटाने ॥ प्रभु तो सदा बोलते जीव नहीं पहचाने......... देहाभिमान छोड़ जीव मन को मन से क्यों ना छाने । कहत लक्ष्मी सुनो भाई साधु प्रभु दर्शन की क्यों ना ठाने ॥ प्रभु तो सदा बोलते जीव नहीं पहचाने......... ‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके। Satyavani Bhajan, Awadhoot Laxminarayan, Awadhoot Devidas Maharaj, Manav Dharma Shastra, Satyavani Sangit Mahotsav,
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