मोह अन्धा
बन्धु मोह है जग में अन्धा ।
इसने डाल रखा गल में फन्दा ॥
जगत का जो भी है धन्धा ।
सबके पिछे मोह है कारण बन्दा ॥
संग्रह भी है मोह का खेल गन्दा ।
जीव फंसा कर देता है अन्धा ॥
मुनि जन का किया भंग आनन्दा ।
बिरला ही देख पाए मोह का फन्दा ॥
मोह सब पर चलत क्या साधू सन्ता ।
सतगुरु का चेला ही करे इसका अन्ता ॥
जो जीता मोह को वो सतगुरु बन्दा ।
मुक्ति वा की दासी होती सदा रह आनन्दा ॥
‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके।
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