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Lyrics

मोह की तरंग (Moh Ki Tarang)

Satyavani Bhajan (Part-1)
मोह की तरंग मोह तरंग उठाए मन में लहर उठत है तन में ॥ जब जब भाव आए अपनों का । सच लगता जग यह सपनों का ॥ मन में जब उठत तरंग । मान अपमान दौड़त कुरंग ॥ विषय वासना बातास चलाए । राग द्वेष तब झोंका खाए ॥ ग्यान दीप की लौ बुझ जाए । जीव बिरथा जग में दुख पाए ॥ मोह ने सुन्दर जाल फैलाया । कोई बिरला मुक्ति पाया ॥ कहत लक्ष्मी सुनो रे बन्धु । मोह तजो भोगो जग आनन्दू ॥ ‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके। Satyavani Bhajan, Awadhoot Laxminarayan, Awadhoot Devidas Maharaj, Manav Dharma Shastra, Satyavani Sangit Mahotsav,
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