प्रबल माया
प्रभु तेरी प्रबल जग माया ।
मन अरु धन में फँस गई काया ॥
प्रभु तेरी .........................
तूने प्रभु कैसा ये संसार बनाया ।
बिरथा जहाँ जीव दुःख पाया ॥
प्रभु तेरी .........................
चित वित ने ऐसा जाल फैलाया ।
राजा रंक साधु सबको फँसाया ॥
प्रभु तेरी .........................
काम क्रोध मद लोभ परिवार बढ़ाया ।
छुप छुप कर जग नाना रूप दिखाया ॥
प्रभु तेरी .........................
विषय वासना ऐसा वट लगाया ।
ऋषि मुनि जन को भी याने लुभाया ।
प्रभु तेरी .........................
जाने हरि नाम का कवच लगाया ।
वहाँ नहीं माया बस चल पाया ॥
प्रभु तेरी .........................
कहत लक्ष्मी सुन रे मोरे भाया ।
हरि शरण चल भग जाए माया ॥
प्रभु तेरी .........................
‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके।
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