गुरु शरण में आकर मन सुख पाता है
गुरु शरण में आकर मन सुख पाता है ।
गुरु संग उठे उमंग मन बहुत हरषाता है ॥
बढ़े सुसंग मिटै कुसंग यही तो गुरु करवाता है ।
उँगली पकड़ चलाए भटको को राह दिखाता है ॥
काम क्रोध के बन्धन खोले सदगुण भण्डार भराता है ।
पाखण्ड से मुक्त कराकर निज स्वरूप दरस कराता है ॥
सार तत्व यह है गुरु तो खुद को खुद से मिलवाता है ।
‘सत्यवाणी भजन’ की रचना गुरुदेव अवधूत लक्ष्मीनारायण जी ने सतगुरु अवधूत देवीदास महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से आत्मानुभव के आधार पर की है। इसमें आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सरल एवं गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, ताकि साधारण पाठक भी सहज रूप से आत्मा, जीव और परमात्मा के सत्य को समझ सके।
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