परम पिता को सादर नमस्कार
परम आदरणीय
परम पिता
आपको सादर नमस्कार,
हे प्रभु! मैं मेरे मन को बहुत समझाता हूँ
कि सब समस्याओं की जड़ मोह है, फिर भी नहीं मनवा पाता हूँ।
मैं कोशिश करता हूँ ग्यान के द्वारा समझाने की
इन्द्रियों को भी विषयों से मुक्त करवाने की
परन्तु मुझे समझ में नहीं आता हठात् क्या हो जाता है
और मैं असहाय हो कर देखता हूँ कि मोह मुझे घेरे हुए है।
फिर तुझे याद करता हूँ परन्तु तुम भी तो प्रभु आँख मिचोनी करते हो।
अब क्या करूँ इन्द्रियों के झरोखे खुल जाते हैं।
मोह की हवा भीतर आती है और बस फैल जाती है।
मन तो मुझसे ज्यादा मेरी इन्द्रियों की सुनता है।
इस प्रकार प्रभु मेरा मोह का बन्धन मुझे जकड़ लेता है।
ये कैसे बन्द हों इन्द्रियों के झरोखें।
तू ही बता प्रभु मैं हूँ तेरे ही भरोसे।
मोह की हवा इतनी तेज होती है।
ग्यान का द्वीप क्षण में बुझा देती है।
दीप बुझा और चारों तरफ अन्धकार।
यश का नाग करने लगता है फुफकार।
अन्दर मेरे ज्वाला उठने लगती है
बस इस ज्वाला में आस्था हिल जाती है।
क्या करूँ मैं तो चाहता हूँ कि मुक्त रहूँ ॥
पर हो ही नहीं पाता मुझे पता नहीं क्या कहूँ।
मैं नाटक भी करता हूँ तुझे याद करने का।
कभी कभी मन को भी कहता हूँ भरोसा रखने का ॥
पर मन तो मुझे छोड़ कर मोह मान अपमान को चाहता है
मेरे लाख समझाने पर भी मेरी मानना ही नहीं चाहता है।
हे प्रभु! सुना है आप समर्पण से प्रसन्न होते हैं।
यह भी सुना है कि आप प्रसन्न होकर कृपा करते हैं।
ध्यान ग्यान और भक्ति आपको पाने के रास्ते सुने हैं।
पर मेरा मन तो इतना उत्ताल हो उठता है कि वो आता ही नहीं।
बिना मन के मैं कैसे ध्यान ग्यान व भक्ति करूँ।
असहाय हताश होकर मैं बेबश सा सदा डरूँ।
ऐसा नहीं है कि प्रभु मैं तुझे चाहता नहीं हूँ।
मैं चाहता हूँ परन्तु तुझको पाता ही नहीं हूँ ॥
फिर मैं दुनिया में पड़ जाता हूँ कि संसार भी गया
और अगर तू भी नहीं मिला तो फिर होगा क्या।
ऐसा विचार कर करके न संसार में ही रह पाता हूँ
न तेरे पास तेरी शरण में ही मैं आ पाता हूँ।
ऐसी दुविधा मत कर प्रभु मुझे अपने पास बुलाले।
ठीक है मेरे अन्दर बहुत अवगुण है परन्तु तू ही ठीक करले।
तेरे पास आऊँगा तो अवगुण सहज में ही छूट जायेगें।
प्रकाश के पास कभी अन्धेरा रहता नहीं सुना।
फिर मेरे अवगुण कैसे तुम्हारे प्रकाश के सामने रह पायेगें।
अतः प्रभु मेरा कर बद्ध निवेदन है कि मुझे संसार से तेरे
पास ले ले।
पर मेरी प्रार्थना है परीक्षा मत लेना वरना मैं डर जाऊँगा।
हे प्रभु! तू मुझे कुछ छोड़ने को मत कहना वरना तेरे पास नहीं आ पाऊँगा ॥
बस तू सहज है वैसे ही सहज मुझे तेरे पास बुला।
जिससे मैं आनन्द में रहूँ तेरे से कुछ नहीं करूँ गिला ॥
अब तू इतनी सी कृपा कर मुझे संसार के सुख दुःख से मुक्त कर।
मैं अभी तेरे पास आने को तैयार हूँ तू बुलाने की देर मत कर ॥
हे प्रभु! फिर कहता हूँ मेरी परीक्षा मत लेना।
परीक्षा का नाम सुनते ही रोएँ खड़े हो जाते हैं।
अतः केवल कृपा और अनुग्रह की राह से मुझे अपने पास बुलाना।
मैं तुझे शपथ दिलाता हूँ प्रभु मेरी परीक्षा मत लेना।
तू तो प्रभु सर्वस्व है परीक्षा की क्या जरुरत है।
तू तो दयालु है कृपालु आनन्द देने वाला है।
तू चाहे तो प्रारब्ध को क्षण में मिटा सकता है।
तेरा सब विधान है परन्तु तू तो विधान से परे है।
अतः तू अपनी कृपा कर और मुझे अपने पास बुलाले।
आपका पुत्र
लक्ष्मी नारायण